भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

| अ० ६ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०१ | | :--- | :--- |

| दाश उवाच | निषादने कहा—हे महाभाग! हे नृपनन्दन! | | त्वं गृहाण महाभाग पत्नीं कुरु नृपात्मज।<br>पुत्रोऽस्या न भवेद् राजा वर्तमाने त्वयीति वै॥ ५४ | आप स्वयं ही इसे अपनी भार्या बनाइये; क्योंकि आपके रहते इसका पुत्र राजा नहीं हो सकेगा॥ ५४॥ | | गाङ्गेय उवाच<br>मातेयं मम दाशेयी राज्यं नैव करोम्यहम्।<br>पुत्रोऽस्याः सर्वथा राज्यं करिष्यति न संशयः॥ ५५ | गांगेय बोले— आपकी यह कन्या मेरी माता है। मैं राज्य नहीं करूँगा। इसका पुत्र ही निश्चितरूपसे राज्य करेगा; इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥ ५५॥ | | दाश उवाच<br>सत्यं वाक्यं मया ज्ञातं पुत्रस्ते बलवान्भवेत्।<br>सोऽपि राज्यं बलान्नूनं गृह्णीयादिति निश्चयः॥ ५६ | निषादने कहा— मैंने आपकी बात सही मान ली; परंतु यदि आपका पुत्र बलवान् हुआ तो वह बलपूर्वक राज्यको निश्चय ही ले लेगा॥ ५६॥ | | गाङ्गेय उवाच<br>न दारसंग्रहं नूनं करिष्यामि हि सर्वथा।<br>सत्यं मे वचनं तात मया भीष्मं व्रतं कृतम्॥ ५७ | गांगेय बोले— हे तात! मैं कभी विवाह नहीं करूँगा; मेरा यह वचन सर्वथा सत्य है—यह मैंने भीष्म-प्रतिज्ञा कर ली॥ ५७॥ | | सूत उवाच<br>एवं कृतां प्रतिज्ञां तु निशम्य झषजीवकः।<br>ददौ सत्यवतीं तस्मै राज्ञे सर्वाङ्गशोभनाम्॥ ५८ | सूतजी बोले— गांगेयद्वारा की गयी ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर निषादने उन राजा शन्तनुको अपनी सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या सत्यवती सौंप दी॥ ५८॥ | | अनेन विधिना तेन वृता सत्यवती प्रिया।<br>न जानाति परं जन्म व्यासस्य नृपसत्तमः॥ ५९ | इस प्रकार राजा शन्तनुने प्रिया सत्यवतीसे विवाह कर लिया। वे नृपश्रेष्ठ शन्तनु पूर्वमें सत्यवतीसे व्यासजीका जन्म नहीं जानते थे॥ ५९॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे देवव्रतप्रतिज्ञावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥


अथ षष्ठोऽध्यायः

दुर्वासाका कुन्तीको अमोघ कामद मन्त्र देना, मन्त्रके प्रभावसे कन्यावस्थामें ही कर्णका जन्म, कुन्तीका राजा पाण्डुसे विवाह, शापके कारण पाण्डुका सन्तानोत्पादनमें असमर्थ होना, मन्त्र-प्रयोगसे कुन्ती और माद्रीका पुत्रवती होना, पाण्डुकी मृत्यु और पाँचों पुत्रोंको लेकर कुन्तीका हस्तिनापुर आना

सूत उवाचसूतजी बोले—इस प्रकार उन शन्तनुने सत्यवतीसे
एवं सत्यवती तेन वृता शन्तनुना किल।<br>द्वौ पुत्रौ च तया जातौ मृतौ कालवशादपि॥ १विवाह कर लिया। उसको [चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक] दो पुत्र उत्पन्न हुए और कालवश वे दोनों मृत्युको भी प्राप्त हो गये॥ १॥
व्यासवीर्यात्तु सञ्जातो धृतराष्ट्रोऽन्ध एव च।<br>मुनिं दृष्ट्वाथ कामिन्या नेत्रसम्मीलने कृते॥ २पुनः व्यासजीके तेजसे धृतराष्ट्र उत्पन्न हुए, जो जन्मसे ही अन्धे थे; क्योंकि मुनिको देखकर उस स्त्रीने अपने नेत्र बन्द कर लिये थे॥ २॥
श्वेतरूपा यतो जाता दृष्ट्वा व्यासं नृपात्मजा।<br>व्यासकोपात्समुत्पन्नः पाण्डुस्तेन न संशयः॥ ३तत्पश्चात् छोटी रानी व्यासजीको देखकर पीली पड़ गयी, जिससे व्यासजीके कोपके कारण उससे पीतवर्ण पाण्डुका जन्म हुआ; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३॥