देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| २०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ | | :--- | :--- |
| सन्तोषितास्तया व्यासो दास्या कामकलाविदा।<br>विदुरस्तु समुत्पन्नो धर्मांशः सत्यवाक् शुचिः॥ ४ | निपुण दासीने व्यासजीको सन्तुष्ट किया, जिसके परिणामस्वरूप धर्मके अंश, सत्यवादी तथा पवित्र विचारवाले विदुर उत्पन्न हुए॥ ४॥ |
| राज्ये संस्थापितः पाण्डुः कनीयानपि मन्त्रिभिः।<br>अन्धत्वाद् धृतराष्ट्रोऽसौ नाधिकारे नियोजितः॥ ५<br><br>भीष्मस्यानुमते राज्यं प्राप्तः पाण्डुर्महाबलः।<br>विदुरोऽप्यथ मेधावी मन्त्रकार्ये नियोजितः॥ ६ | [बड़े होनेपर भी] अन्धे होनेके कारण धृतराष्ट्रको राज्य नहीं दिया गया और छोटे होते हुए भी पाण्डुको ही मन्त्रियोंने राजसिंहासनपर अभिषिक्त किया। भीष्मकी सम्मतिसे ही महाबली पाण्डुको राज्य प्राप्त हुआ तथा प्रतिभासम्पन्न विदुरजी मन्त्रणा-कार्यमें नियुक्त किये गये॥ ५-६॥ |
| धृतराष्ट्रस्य द्वे भार्ये गान्धारी सौबली स्मृता।<br>द्वितीया च तथा वैश्या गार्हस्थ्येषु प्रतिष्ठिता॥ ७ | धृतराष्ट्रकी दो स्त्रियाँ थीं। उनमें पहली सुबलपुत्री गान्धारी कही गयी है और दूसरी एक वैश्यपुत्री थी, जो गृहकार्योंमें प्रतिष्ठित की गयी थी॥ ७॥ |
| पाण्डोरपि तथा पत्न्यौ द्वे प्रोक्ते वेदवादिभिः।<br>शौरसेनी तथा कुन्ती माद्री च मद्रदेशजा॥ ८ | वेदवादी विद्वानोंने पाण्डुकी भी दो पत्नियाँ बतायी हैं। एक शूरसेनकी पुत्री कुन्ती और दूसरी मद्रदेशकी राजकुमारी माद्री॥ ८॥ |
| गान्धारी सुषुवे पुत्रशतं परमशोभनम्।<br>वैश्याप्येकं सुतं कान्तं युयुत्सुं सुषुवे प्रियम्॥ ९ | गान्धारीने परम सुन्दर सौ पुत्र उत्पन्न किये एवं वैश्या रानीने युयुत्सु नामका एक कान्तिमान् और प्रिय पुत्र उत्पन्न किया॥ ९॥ |
| कुन्ती तु प्रथमं कन्या सूर्यात्कर्णं मनोहरम्।<br>सुषुवे पितृगेहस्था पश्चात्पाण्डुपरिग्रहः॥ १० | कुन्तीने कुमारी अवस्थामें ही अपने पिताके घर रहते हुए सूर्यसे कर्ण नामक एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया था; तदनन्तर कुन्तीका विवाह पाण्डुसे हुआ॥ १०॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>किमेतत्सूत चित्रं त्वं भाषसे मुनिसत्तम।<br>जनितश्च सुतः पूर्वं पाण्डुना सा विवाहिता॥ ११ | ऋषिगण बोले— हे मुनिवर सूतजी! आप यह कैसी आश्चर्यजनक बात बता रहे हैं? पहले पुत्र उत्पन्न हुआ और बादमें पाण्डुके साथ कुन्तीका विवाह हुआ!॥ ११॥ |
| सूर्यात्कर्णः कथं जातः कन्यायां वद विस्तरात्।<br>कन्या कथं पुनर्जाता पाण्डुना सा विवाहिता॥ १२ | सूर्यके द्वारा कन्या कुन्तीसे कर्णकी उत्पत्ति कैसे हुई? वह कुन्ती पुनः कन्या कैसे रह गयी, जो पाण्डुके साथ उसका विवाह हो गया। यह आप विस्तारपूर्वक बताइये॥ १२॥ |
| सूत उवाच<br>शूरसेनसुता कुन्ती बालभावे यदा द्विजाः।<br>कुन्तिभोजेन राज्ञा तु प्रार्थिता कन्यका शुभा॥ १३<br><br>कुन्तिभोजेन सा बाला पुत्री तु परिकल्पिता।<br>सेवनार्थं तु दीप्तस्य विहिता चारुहासिनी॥ १४ | सूतजी बोले— हे द्विजगण! शूरसेनकी वह पुत्री कुन्ती जब शिशु थी, तभी राजा कुन्तिभोजने उस सुन्दर कन्याको माँग लिया था। उन्होंने उस चारुहासिनी कन्याको अपनी पुत्री बनाकर रखा और उसे अग्निहोत्रके काममें नियुक्त कर दिया॥ १३-१४॥ |
| दुर्वासास्तु मुनिः प्राप्तश्चातुर्मास्ये स्थितो द्विजः।<br>परिचर्या कृता कुन्त्या मुनिस्तोषं जगाम ह॥ १५ | एक बार महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुँचे और चातुर्मास्यके लिये वहीं रहने लगे। कुन्तीने उनकी सेवा की, जिससे मुनिवर सन्तुष्ट हुए और उसको |