देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 212, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 212
| अ० ६ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ददौ मन्त्रं शुभं तस्यै येनाहूतः सुरः स्वयम्।<br>समायाति तथा कामं पूरयिष्यति वाञ्छितम् ॥ १६ | एक ऐसे मन्त्रका उपदेश दिया, जिसके प्रयोगसे आवाहित किये गये देवता स्वयं उपस्थित होंगे और उसकी अभिलाषा पूर्ण करेंगे॥ १५-१६॥ |
| गते मुनौ ततः कुन्ती निश्चयार्थं गृहे स्थिता।<br>चिन्तयामास मनसा कं सुरं समचिन्तये ॥ १७ | दुर्वासामुनिके वहाँसे चले जानेपर अपने गृहमें बैठी हुई कुन्ती उस मन्त्रकी परीक्षाके लिये मनमें सोचने लगी कि मैं किस देवताका ध्यान करूँ?॥ १७॥ |
| उदितश्च तदा भानुस्तया दृष्टो दिवाकरः।<br>मन्त्रोच्चारं तया कृत्वा चाहूतस्तिग्मगुस्तदा ॥ १८ | उसने पूर्व दिशामें उदित होते हुए सूर्यको देखा और उस मन्त्रका उच्चारण करके उसने सूर्यका आवाहन किया। तब सूर्य अपने मण्डलसे अत्यन्त |
| मण्डलान्मानुषं रूपं कृत्वा सर्वातिपेशलम्।<br>अवातरत्तदाकाशात्समीपे तत्र मन्दिरे ॥ १९ | सुन्दर मनुष्यका रूप धारण करके आकाशसे कुन्तीके पास उस भवनमें उतर आये॥ १८-१९॥ |
| दृष्ट्वा देवं समायान्तं कुन्ती भानुं सुविस्मिता।<br>वेपमाना रजोदोषं प्राप्ता सद्यस्तु भामिनी ॥ २० | सूर्यदेवको आते हुए देखकर कुन्ती आश्चर्यचकित हो गयी। वह सुन्दरी काँपती हुई तत्काल रजोधर्मको प्राप्त हो गयी॥ २०॥ |
| कृताञ्जलिः स्थिता सूर्यं बभाषे चारुलोचना।<br>सुप्रीता दर्शनेनाद्य गच्छ त्वं निजमण्डलम्॥ २१ | उस समय सुन्दर नेत्रवाली कुन्ती हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी और सूर्यसे बोली—मैं आपके दर्शनसे प्रसन्न हो गयी; अब आप अपने मण्डलको चले जाइये॥ २१॥ |
| सूर्य उवाच<br>आहूतोऽस्मि कथं कुन्ति त्वया मन्त्रबलेन वै।<br>न मां भजसि कस्मात्त्वं समाहूय पुरोगतम् ॥ २२ | सूर्य बोले—हे कुन्ति! तुमने मन्त्रबलसे मुझे क्यों बुलाया है? तुम मुझे बुला करके भी अपने समक्ष उपस्थित मुझ सूर्यकी सेवा क्यों नहीं करती?॥ २२॥ |
| कामार्तोऽस्म्यसितापाङ्गि भज मां भावसंयुतम्।<br>मन्त्रेणाधीनतां प्राप्तं क्रीडितुं नय मामिति ॥ २३ | हे चारुलोचने! मैं इस समय कामार्त हूँ, अतः प्रेमके साथ मेरा सेवन करो। मन्त्रके द्वारा अधीनताको प्राप्त मुझको तुम विहार करनेके लिये ले चलो॥ २३॥ |
| कुन्त्युवाच<br>कन्यास्म्यहं तु धर्मज्ञ सर्वसाक्षिन्नमाम्यहम्।<br>तवाप्यहं न दुर्वाच्या कुलकन्यास्मि सुव्रत ॥ २४ | कुन्ती बोली—हे धर्मज्ञ! मैं अभी कन्या हूँ। हे सर्वसाक्षिन्! मैं आपको प्रणाम करती हूँ। हे सुव्रत! आप मेरे प्रति अनुचित बातें न कहें; क्योंकि मैं कुलीन कन्या हूँ॥ २४॥ |
| सूर्य उवाच<br>लज्जा मे महती चाद्य यदि गच्छाम्यहं वृथा।<br>वाच्यतां सर्वदेवानां यास्याम्यत्र न संशयः ॥ २५ | सूर्य बोले—यदि मैं इस समय व्यर्थ लौट जाता हूँ तो मेरे लिये बड़ी लज्जाकी बात होगी और मैं सभी देवताओंमें निन्दाका पात्र बनूँगा; इसमें संशय नहीं है॥ २५॥ |
| शप्स्यामि तं द्विजं चाद्य येन मन्त्रः समर्पितः।<br>त्वां चापि सुभृशं कुन्ति नोचेन्मां त्वं भजिष्यसि ॥ २६<br><br>कन्याधर्मः स्थिरस्ते स्यान्न ज्ञास्यन्ति जनाः किल।<br>मत्समस्तु तथा पुत्रो भविता ते वरानने॥ २७ | हे कुन्ति! यदि तुम मेरे साथ रमण नहीं करोगी तो मैं तुम्हें तथा उस मुनिको शाप दे दूँगा, जिसने तुम्हें वह मन्त्र बताया है। हे सुन्दरि! तुम्हारा कन्याधर्म स्थिर रहेगा। इस रहस्यको लोग नहीं जान सकेंगे तथा हे वरानने! मेरे समान ही तेजस्वी पुत्र तुमको प्राप्त होगा॥ २६-२७॥ |