देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| २०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| इत्युक्त्वा तरणिः कुन्तीं तन्मनस्कां सुलज्जिताम्।<br>भुक्त्वा जगाम देवेशो वरं दत्त्वातिवाञ्छितम्॥ २८ | यह कहकर सूर्यदेव अपनी ओर आसक्त मनवाली एवं लज्जाशील उस कुन्तीसे संसर्ग करके तथा उसे मनोवांछित वरदान देकर चले गये॥ २८॥ |
| गर्भं दधार सुश्रोणी सुगुप्ते मन्दिरे स्थिता।<br>धात्री वेद प्रिया चैका न माता न जनस्तथा॥ २९ | इस प्रकार उस सुश्रोणी कुन्तीने गर्भ धारण किया और वह अत्यन्त गुप्त भवनमें रहने लगी। केवल उसकी एक प्रिय दासी ही इस रहस्यको जानती थी, कुन्तीके माता-पिता भी इसे नहीं जानते थे॥ २९॥ |
| गुप्तः सद्मनि पुत्रस्तु जातश्चातिमनोहरः।<br>कवचेनातिरम्येण कुण्डलाभ्यां समन्वितः॥ ३० | यथासमय उसी गुप्त भवनमें कुन्तीको एक अत्यन्त सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सुन्दर कवच तथा दो कुण्डलोंसे युक्त था और दूसरे सूर्य तथा कुमार कार्तिकेयके समान प्रतीत हो रहा था। धात्रीने उसे अपने हाथमें उठाकर लज्जायुक्त कुन्तीसे कहा—हे सुन्दरि! मैं यहाँ हूँ, अतः तुम किस बातकी चिन्ता कर रही हो?॥ ३०-३१ १/२॥ |
| द्वितीय इव सूर्यस्तु कुमार इव चापरः।<br>करे कृत्वाथ धात्रेयी तामुवाच सुलज्जिताम्॥ ३१ | |
| कां चिन्तां करभोरु त्वमाधत्सेऽद्य स्थितास्म्यहम्।<br>मञ्जूषायां सुतं कुन्ती मुञ्चन्ती वाक्यमब्रवीत्॥ ३२ | तत्पश्चात् काष्ठमञ्जूषामें पुत्रको छोड़ती हुई कुन्ती कहने लगी—हे पुत्र! मैं क्या करूँ? मैं अत्यन्त दुःखित हूँ, जो कि तुझ प्राणप्रियको त्याग रही हूँ। मैं अभागिन तुझ सर्वलक्षणसम्पन्नका परित्याग कर दे रही हूँ॥ ३२-३३॥ |
| किं करोमि सुतातार्हं त्यजे त्वां प्राणवल्लभम्।<br>मन्दभाग्या त्यजामि त्वां सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ३३ | |
| पातु त्वां सगुणागुणा भगवती सर्वेश्वरी चाम्बिका<br>स्तन्यं सैव ददातु विश्वजननी कात्यायनी कामदा।<br>द्रक्ष्येऽहं मुखपङ्कजं सुललितं प्राणप्रियार्हं कदा<br>त्यक्त्वा त्वां विजने वने रविसुतं दुष्टा यथा स्वैरिणी॥ ३४ | सगुणा, निर्गुणा तथा सबकी स्वामिनी वे भगवती अम्बिका तुम्हारी रक्षा करें। वे जगज्जननी कामप्रदा कात्यायनी तुम्हें दुग्धपान करायें। हे पुत्र! तुम साक्षात् सूर्यनारायणके पुत्र हो और मेरे प्राणप्रिय हो—ऐसे तुमको इस निर्जन वनमें एक दुष्ट तथा कुलटा स्त्रीकी भाँति छोड़कर मैं कब तुम्हारा अति सुन्दर मुखकमल देख पाऊँगी॥ ३४॥ |
| पूर्वस्मिन्नपि जन्मनि त्रिजगतां माता न चाराधिता<br>न ध्यातं पदपङ्कजं सुखकरं देव्याः शिवायाश्चिरम्।<br>तेनाहं सुत दुर्भगास्मि सततं त्यक्त्वा पुनस्त्वां वने<br>तप्स्यामि प्रिय पातकं स्मृतवती बुद्ध्या कृतं यत्स्वयम्॥ ३५ | हे पुत्र! प्रतीत होता है कि मैंने पूर्वजन्ममें भी तीनों लोकोंकी जननी भगवतीकी आराधना नहीं की थी तथा भगवती शिवाके सुखदायक चरणकमलका भी मैंने कभी ध्यान नहीं किया था; इसी कारण मैं सदा अभागिनी हूँ। हे प्रिय! मैं तुम्हें इस वनमें त्यागकर जान-बूझकर स्वयं किये गये इस पापका स्मरण करती हुई सन्ताप सहूँगी॥ ३५॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तं सुतं कुन्ती मञ्जूषायां धृतं किल।<br>धात्रीहस्ते ददौ भीता जनदर्शनतस्तथा॥ ३६ | सूतजी बोले— इस प्रकार कहकर कुन्तीने मंजूषामें रखे हुए उस पुत्रको लोगोंकी दृष्टिसे बचाते हुए भयभीतभावसे धात्रीके हाथमें दे दिया॥ ३६॥ |