देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 214, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 214
| अ० ६ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्नात्वा त्रस्ता तदा कुन्ती पितृवेश्मन्युवास सा।<br>मञ्जूषा वहमाना च प्राप्ता ह्याधिरथेन वै॥ ३७<br>राधा सूतस्य भार्या वै तयाऽसौ प्रार्थितः सुतः।<br>कर्णोऽभूद् बलवान्वीरः पालितः सूतसद्मनि॥ ३८ | तत्पश्चात् स्नान करके भयभीत वह कुन्ती अपने पिताके घरमें रहने लगी। जलमें बहती हुई वह मंजूषा अधिरथ नामक सूतको प्राप्त हुई। उस सूतकी भार्या राधा थी। उसने बच्चेको माँग लिया। इस प्रकार सूतके घरमें पलकर वह कर्ण बलवान् तथा वीर हो गया॥ ३७-३८॥ |
| कुन्ती विवाहिता कन्या पाण्डुना सा स्वयंवरे।<br>माद्री चैवापरा भार्या मद्रराजसुता शुभा॥ ३९ | इसके बाद स्वयंवरमें कुन्तीका विवाह पाण्डुके साथ हुआ। उनकी दूसरी पत्नी मद्रदेशके राजाकी सुलक्षणा कन्या माद्री थी॥ ३९॥ |
| मृगयां रममाणस्तु वने पाण्डुर्महाबलः।<br>जघान मृगबुद्ध्या तु रममाणं मुनिं वने॥ ४०<br>शप्तस्तेन तदा पाण्डुर्मुनिना कुपितेन च।<br>स्त्रीसङ्गं यदि कर्तासि तदा ते मरणं ध्रुवम्॥ ४१ | एक बार वनमें आखेट करनेमें तत्पर महाबली पाण्डुने मृग समझकर रमण करते हुए एक मुनिपर प्रहार कर दिया। तब उस कुपित मुनिने पाण्डुको शाप दे दिया कि यदि तुम स्त्रीके साथ संसर्ग करोगे तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है॥ ४०-४१॥ |
| इति शप्तस्तु मुनिना पाण्डुः शोकसमान्वितः।<br>त्यक्त्वा राज्यं वने वासं चकार भृशदुःखितः॥ ४२ | मुनिके यह शाप दे देनेपर पाण्डु शोकाकुल हो गये। वे राज्य त्यागकर अत्यन्त दुःखित हो वनमें रहने लगे॥ ४२॥ |
| कुन्ती माद्री च भार्ये द्वे जग्मतुः सह सङ्गते।<br>सेवनार्थं सतीधर्मं संश्रिते मुनिसत्तमाः॥ ४३ | हे मुनिवरो! उनकी दोनों पत्नियाँ माद्री और कुन्ती भी सतीधर्मका आश्रय लेकर उनकी सेवा करनेके लिये उनके साथ ही वनमें चली गयीं॥ ४३॥ |
| गङ्गातीरे स्थितः पाण्डुर्मुनीनामाश्रमेषु च।<br>शृण्वानो धर्मशास्त्राणि चकार दुश्चरं तपः॥ ४४ | राजा पाण्डु गङ्गाजीके तटपर मुनियोंके आश्रमोंमें रहने लगे और धर्मशास्त्रोंका श्रवण करते हुए कठिन तपस्या करने लगे॥ ४४॥ |
| कथायां वर्तमानायां कदाचिद्धर्मसंश्रितम्।<br>अशृणोद्वचनं राजा सुपृष्टं मुनिभाषितम्॥ ४५<br>अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे गन्तुं परन्तप।<br>येन केनाप्युपायेन पुत्रस्य जननं चरेत्॥ ४६ | किसी समय कथाप्रसंगमें सम्यक् प्रकारसे पूछनेपर किसी मुनिके द्वारा कहा गया यह धार्मिक वचन राजाने सुना—हे परन्तप! अपुत्रकी गति नहीं होती; वह स्वर्ग जानेका अधिकारी नहीं होता अतएव जिस किसी भी उपायसे पुत्र उत्पन्न करना चाहिये॥ ४५-४६॥ |
| अंशजः पुत्रिकापुत्रः क्षेत्रजो गोलकस्तथा।<br>कुण्डः सहोढः कानीनः क्रीतः प्राप्तस्तथा वने॥ ४७<br>दत्तः केनापि चाशक्तौ धनग्राहिसुताः स्मृताः।<br>उत्तरोत्तरतः पुत्रा निकृष्टा इति निश्चयः॥ ४८ | अंशज, पुत्रिकापुत्र, क्षेत्रज , गोलक, कुण्ड, सहोढ, कानीन, क्रीत, वनमें प्राप्त, पालन करनेमें असमर्थ किसीका दिया हुआ—इतने प्रकारके पुत्र पिताकी सम्पत्तिके उत्तराधिकारी कहे गये हैं, इनमें उत्तरोत्तर एक दूसरेसे निकृष्ट पुत्र हैं; यह सुनिश्चित है॥ ४७-४८॥ |