देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| २०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
|---|
| इत्याकर्ण्य तदा प्राह कुन्तीं कमललोचनाम्।<br>सुतमुत्पादयाशु त्वं मुनिं गत्वा तपोऽन्वितम्॥ ४९<br>ममाज्ञया न दोषस्ते पुरा राज्ञा महात्मना।<br>वसिष्ठाज्जनितः पुत्रः सौदासेनेति मे श्रुतम्॥ ५० | यह सुनकर राजा पाण्डुने कमलके समान नेत्रवाली कुन्तीसे कहा—तुम किसी तपोनिष्ठ मुनिके पास जाकर शीघ्र पुत्र उत्पन्न करो। मेरी आज्ञा होनेके कारण तुम्हें दोष नहीं लगेगा। मैंने सुना है कि पूर्वकालमें महात्मा राजा सौदासेने वसिष्ठसे पुत्र उत्पन्न कराया था॥ ४९-५०॥ | | तं कुन्ती वचनं प्राह मम मन्त्रोऽस्ति कामदः।<br>दत्तो दुर्वाससा पूर्वं सिद्धिदः सर्वथा प्रभो॥ ५१ | कुन्ती उनसे यह वचन बोली—सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाला एक मन्त्र मेरे पास है। हे प्रभो! पूर्वकालमें महर्षि दुर्वासाने सिद्धि प्रदान करनेवाला वह मन्त्र मुझे प्रदान किया था॥ ५१॥ | | निमन्त्रयेऽहं यं देवं मन्त्रेणानेन पार्थिव।<br>आगच्छेत्सर्वथासौ वै मम पार्श्वं निमन्त्रितः॥ ५२ | हे राजन्! मैं इस मन्त्रद्वारा जिस देवताका आवाहन करूँगी, वह निमन्त्रित होकर निश्चय ही मेरे पास आ जायगा॥ ५२॥ | | भर्तुर्वाक्येन सा तत्र स्मृत्वा धर्मं सुरोत्तमम्।<br>सङ्गम्य सुषुवे पुत्रं प्रथमं च युधिष्ठिरम्॥ ५३ | पतिकी आज्ञासे वहाँ कुन्तीने देवताओंमें श्रेष्ठ धर्मराजका स्मरण करके उनके संयोगसे सर्वप्रथम युधिष्ठिरको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ५३॥ | | वायोर्वृकोदरं पुत्रं जिष्णुं चैव शतक्रतोः।<br>वर्षे वर्षे त्रयः पुत्राः कुन्त्या जाता महाबलाः॥ ५४ | तत्पश्चात् उसने वायुके द्वारा भीमको और इन्द्रके द्वारा अर्जुनको उत्पन्न किया। इस प्रकार एक-एक वर्षके अन्तरालमें कुन्तीके तीन महाबली पुत्र उत्पन्न हुए॥ ५४॥ | | माद्री प्राह पतिं पाण्डुं पुत्रं मे कुरु सत्तम।<br>किं करोमि महाराज दुःखं नाशय मे प्रभो॥ ५५ | इसके बाद माद्रीने भी अपने पति पाण्डुसे कहा—हे श्रेष्ठ! मुझे भी पुत्र प्रदान कीजिये। हे महाराज! मैं क्या करूँ? हे प्रभो! मेरा दुःख दूर कीजिये॥ ५५॥ | | प्रार्थिता पतिना कुन्ती ददौ मन्त्रं दयान्विता।<br>एकपुत्रप्रबन्धेन माद्री पतिमते स्थिता॥ ५६<br>स्मृत्वा तदाश्विनौ देवौ मद्रराजसुता सुतौ।<br>नकुलः सहदेवश्च सुषुवे वरवर्णिनी॥ ५७ | तब पति पाण्डुके प्रार्थना करनेपर दयालु कुन्तीने वह मन्त्र माद्रीको बता दिया। सुन्दरी माद्रीने भी एक पुत्रकी प्राप्तिके लिये पतिसे अनुमति पाकर अश्विनीकुमारोंका स्मरण करके नकुल और सहदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न किये॥ ५६-५७॥ | | एवं ते पाण्डवाः पञ्च क्षेत्रोत्पन्नाः सुरात्मजाः।<br>वर्षवर्षान्तरे जाता वने तस्मिन्द्विजोत्तमाः॥ ५८ | हे मुनिवरो! इस प्रकार वे पाँचों पाण्डव देवताओंके पुत्र थे। वे क्षेत्रज पुत्रके रूपमें उस वनमें क्रमशः एक-एक वर्षके अन्तरसे उत्पन्न हुए॥ ५८॥ | | एकस्मिन्समये पाण्डुर्माद्रीं दृष्ट्वाथ निर्जने।<br>आश्रम चातिकामातों जग्राहागतवैशसः॥ ५९ | एक बार राजा पाण्डुने माद्रीको निर्जन आश्रममें देखकर अपनी मृत्यु निकट आयी होनेके कारण अत्यन्त कामातुर हो पकड़ लिया। माद्रीके द्वारा 'नहीं-नहीं'—ऐसा कहकर बार-बार निषेध करनेपर |