भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 216

अ० ६ ] द्वितीय स्कन्ध २०७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मा मा मा मेति बहुधा निषिद्धोऽपि तया भृशम्।<br>आलिलिङ्ग प्रियां दैवात्पपात धरणीतले॥ ६०भी उन्होंने बलपूर्वक अपनी उस प्रियाका आलिंगन कर लिया और वे दैववश [शापके कारण] पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ५९-६०॥
यथा वृक्षगता वल्ली छिन्ने पतति वै द्रुमे।<br>तथा सा पतिता बाला कुर्वन्ती रोदनं बहु॥ ६१जैसे वृक्षपर चढ़ी हुई लता वृक्षके कट जानेपर गिर पड़ती है, वैसे ही वह रानी माद्री भी बहुत रुदन करती हुई गिर पड़ी॥ ६१॥
प्रत्यागता तदा कुन्ती रुदती बालकास्तथा।<br>मुनयश्च महाभागाः श्रुत्वा कोलाहलं तदा॥ ६२उस समय कोलाहल सुनकर रोती हुई कुन्ती, सभी बालक और महाभाग मुनिगण भी वहाँ आ गये॥ ६२॥
मृतः पाण्डुस्तदा सर्वे मुनयः संशितव्रताः।<br>सहाग्निभिर्विधिं कृत्वा गङ्गातीरे तदादहन्॥ ६३<br>चक्रे सहैव गमनं माद्री दत्त्वा सुतौ शिशू।<br>कुन्त्यै धर्मं पुरस्कृत्य सतीनां सत्यकामतः॥ ६४इस प्रकार जब पाण्डु मर गये, तब सभी व्रतधारी मुनियोंने गंगाके तटपर चिता लगाकर उनका दाह-संस्कार कर दिया। तत्पश्चात् अपने दोनों पुत्र कुन्तीको सौंप करके सती-धर्मका पालन करते हुए वह माद्री सत्यकी कामनासे उनके साथ ही सती हो गयी॥ ६३-६४॥
जलदानादिकं कृत्वा मुनयस्तत्र वासिनः।<br>पञ्चपुत्रयुतां कुन्तीमनयन्हस्तिनापुरम्॥ ६५वहाँके निवासी मुनिगण जलांजलि आदि देकर पाँचों पुत्रोंसहित कुन्तीको हस्तिनापुर ले आये॥ ६५॥
तां प्राप्तां च समाज्ञाय गाङ्गेयो विदुरस्तथा।<br>नगरीं धृतराष्ट्रस्य सर्वे तत्र समाययुः॥ ६६धृतराष्ट्रकी नगरी हस्तिनापुरमें कुन्तीके आनेका समाचार पाकर भीष्म, विदुर आदि सभी लोग वहाँ आ पहुँचे॥ ६६॥
पप्रच्छुश्च जनाः सर्वे कस्य पुत्रा वरानने।<br>पाण्डोः शापं समाज्ञाय कुन्ती दुःखान्विता तदा॥ ६७<br>तानुवाच सुराणां वै पुत्राः कुरुकुलोद्भवाः।<br>विश्वासार्थं समाहूताः कुन्त्या सर्वे सुरास्तदा॥ ६८<br>आगत्य खे तदा तैस्तु कथितं नः सुताः किल।<br>भीष्मेण सत्कृतं वाक्यं देवानां सत्कृताः सुताः॥ ६९सभी लोगोंने कुन्तीसे पूछा—हे सुमुखि! ये किसके पुत्र हैं? तब कुन्ती अत्यन्त दुःखित होकर पाण्डुकी शापजन्य मृत्युका उल्लेख करके बोली—कुरुवंशमें उत्पन्न हुए ये सब बालक देवताओंके पुत्र हैं। उन्हें विश्वास दिलानेके लिये कुन्तीने उस समय सभी देवताओंका आह्वान भी किया, तब उन देवताओंने आकाशमें प्रकट होकर कहा—ये पाँचों निःसन्देह हमलोगोंके पुत्र हैं। भीष्मने देवताओंके वचनका अनुमोदन किया तथा कुन्तीके पाँचों पुत्रोंका स्वागत किया॥ ६७-६९॥
गता नागपुरं सर्वे तानादाय सुतान्वधूम्।<br>भीष्मादयः प्रीतचित्ताः पालयामासुरर्थतः॥ ७०<br>एवं पार्थाः समुत्पन्ना गाङ्गेयेनाथ पालिताः॥ ७१तत्पश्चात् उन पुत्रों तथा वधू कुन्तीको लेकर भीष्म आदि सभी लोग हस्तिनापुर चले गये और प्रसन्नचित्त होकर प्रयत्नपूर्वक उनका पालन-पोषण करने लगे। इस प्रकार पाण्डव उत्पन्न हुए और भीष्मने उनका परिपालन किया॥ ७०-७१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे युधिष्ठिरादीनामुत्पत्तिवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

देवी भागवत महापुराण · पृष्ठ 216, कुल 889 में से · BharatKosha