भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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२०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७


अथ सप्तमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरसे दुर्योधनके पिण्डदानहेतु धन माँगना, भीमसेनका प्रतिरोध; धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती, विदुर और संजयका वनके लिये प्रस्थान, वनवासी धृतराष्ट्र तथा माता कुन्तीसे मिलनेके लिये युधिष्ठिरका भाइयोंके साथ वनगमन, विदुरका महाप्रयाण, धृतराष्ट्रसहित पाण्डवोंका व्यासजीके आश्रमपर आना, देवीकी कृपासे व्यासजीद्वारा महाभारत-युद्धमें मरे कौरवों-पाण्डवोंके परिजनोंको बुला देना

सूत उवाचसूतजी बोले—
पञ्चानां द्रौपदी भार्या सा मान्या सा पतिव्रता।<br>पञ्च पुत्रास्तु तस्याः स्युर्भर्तृभ्योऽतीव सुन्दराः ॥ १[हे मुनिगण!] माननीया द्रौपदी उन पाँचों पाण्डवोंकी पतिव्रता पत्नी थी। उन द्रौपदीको अत्यन्त सुन्दर पाँच पुत्र उन पतियोंसे उत्पन्न हुए॥ १॥
अर्जुनस्य तथा भार्या कृष्णस्य भगिनी शुभा।<br>सुभद्रा या हृता पूर्वं जिष्णुना हरिसम्मते ॥ २अर्जुनकी एक दूसरी सुन्दर पत्नी श्रीकृष्णकी बहन सुभद्रा थीं, जिन्हें अर्जुनने पूर्वकालमें भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमतिसे हर लिया था॥ २॥
तस्यां जातो महावीरो निहतोऽसौ रणाजिरे।<br>अभिमन्युर्हतास्तत्र द्रौपद्याश्च सुताः किल ॥ ३उन्हीं सुभद्राके गर्भसे महान् वीर अभिमन्युका जन्म हुआ। वह संग्राम-भूमिमें मारा गया था। उसी युद्धमें द्रौपदीके पाँचों पुत्र भी मारे गये थे॥ ३॥
अभिमन्योर्वरा भार्या वैराटी चातिसुन्दरी।<br>कुलान्ते सुषुवे पुत्रं मृतो बाणाग्निना शिशुः ॥ ४<br><br>जीवितः स तु कृष्णेन भागिनेयसुतः स्वयम्।<br>द्रौणिबाणाग्निनिर्दग्धः प्रतापेनाद्भुतेन च ॥ ५वीर अभिमन्युकी श्रेष्ठ तथा अत्यन्त सुन्दर पत्नी महाराज विराटकी पुत्री उत्तरा थी। [महाभारतके युद्धमें] कुरुकुलका नाश हो जानेपर उसने एक पुत्र उत्पन्न किया था; वह द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी बाणाग्निसे [पहले गर्भमें ही] मर गया था, किंतु बादमें भगवान् श्रीकृष्णने अश्वत्थामाकी बाणाग्निसे निर्दग्ध अपने भांजेके पुत्रको अपने अद्भुत प्रतापसे पुनः जीवित कर दिया था॥ ४-५॥
परिक्षीणेषु वंशेषु जातो यस्माद्वरः सुतः।<br>तस्मात्परीक्षितो नाम विख्यातः पृथिवीतले ॥ ६कुरुवंशके समाप्त होनेपर वह श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ था; इसलिये वह बालक ‘परीक्षित्’ नामसे पृथवीतलपर प्रसिद्ध हुआ॥ ६॥
निहतेषु च पुत्रेषु धृतराष्ट्रोऽतिदुःखितः।<br>तस्थौ पाण्डवराज्ये च भीमवाग्बाणपीडितः ॥ ७<br><br>गान्धारी च तथातिष्ठत् पुत्रशोकातुरा भृशम्।<br>सेवां तयोर्दिवारात्रं चकारार्तो युधिष्ठिरः ॥ ८अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेपर अत्यन्त दुःखित राजा धृतराष्ट्र भीमके वाग्बाणोंसे सन्तप्त रहते हुए अब पाण्डवोंके राज्यमें रहने लगे। वैसे ही गान्धारी भी अत्यन्त दुःखी होकर जीवन-यापन करने लगी। दुःखित युधिष्ठिर दिन-रात उन दोनोंकी सेवा करने लगे॥ ७-८॥
विदुरोऽप्यतिधर्मात्मा प्रज्ञानेत्रमबोधयत्।<br>युधिष्ठिरस्यानुमते भ्रातृपार्श्वे व्यतिष्ठत ॥ ९महान् धर्मात्मा विदुर युधिष्ठिरकी अनुमतिसे अपने भाई धृतराष्ट्रके पासमें ही रहते थे और वे उन प्रज्ञाचक्षुको समझाते-बुझाते रहते थे॥ ९॥