देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 218, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 218
| अ० ७ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| धर्मपुत्रोऽपि धर्मात्मा चकार सेवनं पितुः।<br>पुत्रशोकोद्भवं दुःखं तस्य विस्मारयन्निव॥ १० | धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर भी अपने पितातुल्य धृतराष्ट्रके पुत्रशोकजनित दुःखको विस्मारित कराते हुए उनकी सेवा करने लगे॥ १०॥ |
| यथा शृणोति वृद्धोऽसौ तथा भीमोऽतिरोषितः।<br>वाग्बाणेनाहनत्तं तु श्रावयन्संस्थिताञ्जनान्॥ ११<br>मया पुत्रा हताः सर्वे दुष्टस्यान्धस्य ते रणे।<br>दुःशासनस्य रुधिरं पीतं हृद्यं तथा भृशम्॥ १२<br>भुनक्ति पिण्डमन्धोऽयं मया दत्तं गतत्रपः।<br>ध्वांक्षवद्वा श्ववच्चापि वृथा जीवत्यसौ जनः॥ १३ | जिस किसी भी प्रकार यह वृद्ध धृतराष्ट्र सुन ले [यह ध्यानमें रखकर] भीम अत्यन्त क्रोधित होकर अपने वचनरूपी बाणोंसे उनपर सर्वदा प्रहार किया करते थे। वहाँ उपस्थित लोगोंको सुना-सुनाकर भीम कहा करते थे कि मैंने इस दुष्ट अन्धेके सभी पुत्रोंको रणभूमिमें मार डाला और दुःशासनके हृदयका रक्त जी-भरके पी लिया है। अब यह अन्धा निर्लज्ज होकर मेरे दिये हुए पिण्डको कौओं एवं कुत्तोंकी भाँति खाता है। अब तो यह व्यर्थ ही जीवन बिता रहा है॥ ११-१३॥ |
| एवंविधानि रूक्षाणि श्रावयत्यनुवासरम्।<br>आश्वासयति धर्मात्मा मूर्खोऽयमिति च ब्रुवन्॥ १४ | भीम इस प्रकारकी कठोर बातें प्रतिदिन उन्हें सुनाते थे; परंतु धर्मात्मा युधिष्ठिर यह कहते हुए धृतराष्ट्रको धैर्य प्रदान करते थे कि यह भीम मूर्ख है॥ १४॥ |
| अष्टादशैव वर्षाणि स्थित्वा तत्रैव दुःखितः।<br>धृतराष्ट्रो वने यानं प्रार्थयामास धर्मजम्॥ १५<br>अयाचत धर्मपुत्रं धृतराष्ट्रो महीपतिः।<br>पुत्रेभ्योऽहं प्रदाम्यद्य निर्वापं विधिपूर्वकम्॥ १६<br>वृकोदरेण सर्वेषां कृतमत्रौर्ध्वदैहिकम्।<br>न कृतं मम पुत्राणां पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ १७<br>ददासि चेद्धनं मह्यं कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम्।<br>गमिष्येऽहं वनं तप्तुं तपः स्वर्गफलप्रदम्॥ १८ | इस प्रकार उस दुःखी धृतराष्ट्रने अठारह वर्षतक वहाँ रहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे वनमें जानेकी इच्छा प्रकट की। महाराज धृतराष्ट्रने धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे यह भी प्रार्थना की कि अब मैं अपने पुत्रोंके लिये विधि-पूर्वक पिण्डदान करूँगा। यद्यपि भीमने सभीका और्ध्वदैहिककर्म कर दिया था, किंतु पूर्व वैरका स्मरण करते हुए उन्होंने मेरे पुत्रोंका नहीं किया। अतः यदि आप मुझे कुछ धन दें तो मैं अपने पुत्रोंका और्ध्वदैहिककर्म करके स्वर्गफल देनेवाला तप करनेके लिये वनमें चला जाऊँगा॥ १५-१८॥ |
| एकान्ते विदुरेणोक्तो राजा धर्मसुतः शुचिः।<br>धनं दातुं मनश्चक्रे धृतराष्ट्राय चार्थिने॥ १९<br>समाहूय निजान्सर्वानुवाच पृथिवीपतिः।<br>धनं दास्ये महाभागाः पित्रे निर्वापकामिने॥ २० | विदुरने भी एकान्तमें पवित्रात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे जब ऐसा कहा तब उन्होंने धनार्थी धृतराष्ट्रको धन देनेका निश्चय कर लिया। राजा युधिष्ठिरने परिवारके सभी जनोंको बुलाकर कहा— हे महाभाग ! मैं कौरवोंका श्राद्ध करनेके इच्छुक ज्येष्ठ पिताको धन प्रदान करूँगा॥ १९-२०॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं भ्रातुर्ज्येष्ठस्यामिततेजसः।<br>संग्रहेऽस्य महाबाहुर्मारुतिः कुपितोऽब्रवीत्॥ २१<br>धनं देयं महाभाग दुर्योधनहिताय किम्।<br>अन्धोऽपि सुखमाप्नोति मूर्खत्वं किमतः परम्॥ २२ | महातेजस्वी ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरका वचन सुनकर वायुपुत्र महाबली भीमने अत्यन्त क्रोधित होकर कहा— हे महाभाग! दुर्योधनके कल्याणके लिये राजकोषका धन क्यों दिया जाय? इससे अन्धे धृतराष्ट्रको भी सुख मिलेगा; इससे बड़ी मूर्खता और क्या होगी ?॥ २१-२२॥ |