भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 219
२१०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तव दुर्मन्त्रितेनाथ दुःखं प्राप्ता वने वयम्।<br>द्रौपदी च महाभागा समानीता दुरात्मना॥ २३आपकी दूषित मन्त्रणाके फलस्वरूप ही हमलोगोंने वनवासका कठोर कष्ट सहा। दुरात्मा दुःशासन महारानी द्रौपदीको अपमानपूर्वक सभामें खींच लाया॥ २३॥
विराटभवने वासः प्रसादात्तव सुव्रत।<br>दासत्वं च कृतं सर्वैर्मत्स्यस्यामितविक्रमैः॥ २४हे सुव्रत! आपकी कृपासे ही हमलोगोंको विराट राजाके घर रहना पड़ा तथा हम अमित पराक्रमवालोंको मत्स्यदेशके राजाकी दासता करनी पड़ी थी॥ २४॥
देविता त्वं न चेज्ज्येष्ठः प्रभवेत्संक्षयः कथम्।<br>सूपकारो विराटस्य हत्वाभूवं तु मागधम्॥ २५हम सबमें ज्येष्ठ आप यदि जुआ न खेलते तो हम लोगोंकी दुर्गति क्यों होती? मगधनरेश जरासंधका वध करनेवाले मुझको राजा विराटके यहाँ रसोइया बनना पड़ा॥ २५॥
बृहन्नला कथं जिष्णुर्भवेद् बालस्य नर्तकः।<br>कृत्वा वेषं महाबाहुर्योषाया वासवात्मजः॥ २६<br><br>गाण्डीवशोभितौ हस्तौ कृतौ कङ्कणशोभितौ।<br>मानुषं च वपुः प्राप्य किं दुःखं स्यादतः परम्॥ २७<br><br>दृष्ट्वा वेणीं कृतां मूर्ध्नि कज्जलं लोचने तथा।<br>असिं गृहीत्वा तरसा छेत्स्यहं नान्यथा सुखम्॥ २८आपके ही कारण इन्द्रपुत्र महाबाहु अर्जुनको विराट राजाके यहाँ स्त्रीका रूप धारण करके उनके बच्चोंको नृत्यकी शिक्षा देनेके लिये बृहन्नला बनना पड़ा। गाण्डीव धनुषके स्थानपर अर्जुनको अपने हाथोंमें कंकण धारण करना पड़ा। मनुष्यका शरीर पाकर भला इससे बड़ा कष्ट और क्या हो सकता है? अर्जुनके सिरपर चोटी और आँखोंमें काजलकी बातका स्मरण करके तो मनमें यही आता है कि मैं अभी तलवार लेकर शीघ्र ही धृतराष्ट्रका सिर काट दूँ; इसके अतिरिक्त मुझे शान्ति नहीं मिल सकती॥ २६—२८॥
अपृष्ट्वा च महीपालं निक्षिप्तोऽग्निर्मया गृहे।<br>दग्धुकामश्च पापात्मा निर्दग्धोऽसौ पुरोचनः॥ २९आप महाराजसे बिना पूछे ही मैंने लाक्षागृहमें अग्नि लगा दी थी, जिससे हमलोगोंको जलानेकी इच्छावाला वह पापी पुरोचन स्वयं जल गया॥ २९॥
कीचका निहताः सर्वे त्वामपृष्ट्वा जनाधिप।<br>न तथा निहताः सर्वे सभार्या धृतराष्ट्रजाः॥ ३०हे राजन्! मैंने आपसे परामर्श किये बिना ही जैसे सभी कीचकोंका वध कर डाला, वैसे ही स्त्रियोंसमेत धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका भी वध मैं नहीं कर पाया॥ ३०॥
मूर्खत्वं तव राजेन्द्र गन्धर्वेभ्यश्च मोचिताः।<br>दुर्योधनादयः कामं शत्रवो निगडीकृताः॥ ३१हे राजेन्द्र! यह आपकी नासमझी ही थी कि जब गन्धर्वोंने दुर्योधन आदि हमारे शत्रुओंको बन्दी बना लिया था, तब आपने ही उन्हें छुड़ा दिया॥ ३१॥
दुर्योधनहितायाद्य धनं दातुं त्वमिच्छसि।<br>नाहं ददे महीपाल सर्वथा प्रेरितस्त्वया॥ ३२हे राजन्! आज पुनः उसी दुष्ट दुर्योधनके कल्याणके लिये आप धन देनेकी इच्छा कर रहे हैं। आपके कहनेपर भी मैं उन्हें धन नहीं देने दूँगा॥ ३२॥
इत्युक्त्वा निर्गते भीमे त्रिभिः परिवृतो नृपः।<br>ददौ वित्तं सुबहुलं धृतराष्ट्राय धर्मजः॥ ३३ऐसा कहकर भीमके चले जानेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने [अर्जुन, नकुल तथा सहदेव—इन] तीनोंकी सम्मति लेकर धृतराष्ट्रको बहुत-सा धन दे दिया॥ ३३॥