भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 889 में से

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पृष्ठ 220
अ० ७ ]द्वितीय स्कन्ध२११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कारयामास विधिवत्पुत्राणां चौर्ध्वदैहिकम्।<br>ददौ दानानि विप्रेभ्यो धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः॥ ३४तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने धन लेकर अपने पुत्रोंका विधिवत् श्राद्धकर्म कराया और ब्राह्मणोंको विविध दान दिये॥ ३४॥
कृत्वौर्ध्वदैहिकं सर्वं गान्धारीसहितो नृपः।<br>प्रविवेश वनं तूर्णं कुन्त्या च विदुरेण च॥ ३५इस प्रकार अपने पुत्रोंका श्राद्धकर्म करके गान्धारीसहित महाराज धृतराष्ट्र कुन्ती तथा विदुरके साथ शीघ्र ही वनमें चले गये॥ ३५॥
सञ्जयेन परिज्ञातो निर्गतोऽसौ महामतिः।<br>पुत्रैर्निवार्यमाणापि शूरसेनसुता गता॥ ३६संजयद्वारा सबको यह समाचार मिला कि महामति धृतराष्ट्र वनमें जा रहे हैं, उस समय अपने पुत्रोंके मना करनेपर भी शूरसेनकी पुत्री कुन्ती उनके साथ चली गयी॥ ३६॥
विलपन्भीमसेनोऽपि तथान्ये चापि कौरवाः।<br>गङ्गातीरात्परावृत्य ययुः सर्वे गजाह्वयम्॥ ३७यह देखकर भीम भी रोने लगे। वे तथा अन्यान्य सभी कौरव उन लोगोंको गंगातटतक पहुँचाकर पुनः हस्तिनापुरको लौट आये॥ ३७॥
ते गत्वा जाह्नवतीरे शतयूपाश्रमं शुभम्।<br>कृत्वा तृणैः कुटीं तत्र तपस्तेपुः समाहिताः॥ ३८तत्पश्चात् धृतराष्ट्र आदि गंगातटपर स्थित शुभ शतयूप-आश्रममें पहुँचे और वहाँ पर्णकुटी बनाकर एकचित्त हो तपस्या करने लगे॥ ३८॥
गतान्यब्दानि षट् तेषां यदा याता हि तापसाः।<br>युधिष्ठिरस्तु विरहादनुजानिदमब्रवीत्॥ ३९<br><br>स्वप्ने दृष्टा मया कुन्ती दुर्बला वनसंस्थिता।<br>मनो मे जायते द्रष्टुं मातरं पितरौ तथा॥ ४०<br><br>विदुरं च महात्मानं सञ्जयं च महामतिम्।<br>रोचते यदि वः सर्वान् व्रजाम इति मे मतिः॥ ४१जब वे तपस्वी चले गये और इस प्रकार छः वर्ष बीत गये, तब उनके विरहसे सन्तप्त युधिष्ठिर अपने भाइयोंसे कहने लगे—मैंने स्वप्न देखा है कि वनमें रहती हुई माता कुन्ती अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं, अतः माता तथा पितृजनोंको देखनेकी मनमें इच्छा हो रही है। साथ ही महात्मा विदुर तथा महाबुद्धिमान् संजयसे भी मिलनेकी मेरी इच्छा है। यदि आप लोगोंको भी यह उचित प्रतीत होता हो तो हमलोग वहाँ चलें—ऐसा मेरा विचार है॥ ३९-४१॥
ततस्ते भ्रातरः सर्वे सुभद्रा द्रौपदी तथा।<br>वैराटी च महाभागा तथा नागरिको जनः॥ ४२<br><br>प्राप्ताः सर्वजनैः सार्धं पाण्डवा दर्शनोत्सुकाः।<br>शतयूपाश्रमं प्राप्य ददृशुः सर्व एव ते॥ ४३तब वे सभी भाई, सुभद्रा, द्रौपदी, महाभागा उत्तरा तथा अन्यान्य नागरिकजन वहाँ एकत्र हुए। दर्शनके लिये उत्सुक उन पाण्डवोंने सभी लोगोंके साथ शतयूप-आश्रममें जाकर धृतराष्ट्र आदिको देखा॥ ४२-४३॥
विदुरो न यदा दृष्टो धर्मस्तं पृष्टवांस्तदा।<br>क्वास्ते स विदुरो धीमांस्तमुवाचाम्बिकासुतः॥ ४४<br><br>विरक्तश्चरते क्षत्ता निरीहो निष्परिग्रहः।<br>कुतोऽप्येकान्तसंवासी ध्यायतेऽन्तः सनातनम्॥ ४५वहाँ जब विदुरजी दिखायी नहीं दिये, तब धर्मराज युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रसे पूछा—वे बुद्धिमान् विदुरजी कहाँ हैं? तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने उनसे कहा—विदुर तो विरक्त एवं निष्काम होकर तथा सब कुछ त्यागकर कहीं एकान्तमें रहते हुए अन्तःकरणमें परमात्माका ध्यान कर रहे होंगे॥ ४४-४५॥