देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| २९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| गङ्गां गच्छन्द्वितीयेऽह्नि वने राजा युधिष्ठिरः।<br>ददर्श विदुरं क्षामं तपसा संशितव्रतम्॥ ४६<br><br>दृष्ट्वोवाच महीपालो वन्देऽहं त्वां युधिष्ठिरः।<br>तस्थौ श्रुत्वा च विदुरः स्थाणुभूत इवानघः॥ ४७ | दूसरे दिन गंगाजीकी ओर जाते हुए युधिष्ठिरने वनमें तपस्याके कारण क्षीण देहवाले व्रतधारी विदुरजीको देखा। उन्हें देखकर महाराज युधिष्ठिरने कहा—मैं आपको प्रणाम करता हूँ। यह सुनकर भी निष्पाप विदुरजी ठूँठवृक्षके समान अचल स्थित रहे॥ ४६-४७॥ |
| क्षणेन विदुरस्यास्यान्निःसृतं तेज अद्भुतम्।<br>लीनं युधिष्ठिरस्यास्ये धर्मांशत्वात्परस्परम्॥ ४८ | उसी क्षण विदुरजीके मुखसे एक अद्भुत तेज निकला और वह तत्काल युधिष्ठिरके मुखमें समा गया; क्योंकि वे दोनों ही धर्मके अंश थे॥ ४८॥ |
| क्षत्ता जहाँ तदा प्राणाञ्छुशोचाति युधिष्ठिरः।<br>दाहार्थं तस्य देहस्य कृतवानुद्यमं नृपः॥ ४९ | इस प्रकार विदुरजीने प्राणत्याग कर दिया और युधिष्ठिर अत्यन्त शोकाकुल हो गये। वे राजा युधिष्ठिर उनके शरीरका दाह-संस्कार करनेका प्रबन्ध करने लगे॥ ४९॥ |
| शृण्वतस्तु तदा राज्ञो वागुवाचाशरीरिणी।<br>विरक्तोऽयं न दाहार्हो यथेष्टं गच्छ भूपते॥ ५० | उसी समय राजाको सुनाते हुए आकाशवाणी हुई—हे राजन्! ये विदुरजी विरक्त हैं, अतः ये दाह-संस्कारके योग्य नहीं हैं। अब आप इच्छानुसार यहाँसे प्रस्थान करें॥ ५०॥ |
| श्रुत्वा ते भ्रातरः सर्वे सस्नुर्गङ्गाजलेऽमले।<br>गत्वा निवेदयामासुर्धृतराष्ट्राय विस्तरात्॥ ५१ | यह सुनकर उन सभी भाइयोंने गंगाके निर्मल जलमें स्नान किया और वहाँ जाकर धृतराष्ट्रसे [सभी वृत्तान्त] विस्तारपूर्वक बताया॥ ५१॥ |
| स्थितास्तत्राश्रमे सर्वे पाण्डवा नागरैः सह।<br>तत्र सत्यवतीसूनुर्नारदश्च समागतः॥ ५२<br><br>मुनयोऽन्ये महात्मानश्चागता धर्मनन्दनम्।<br>कुन्ती प्राह तदा व्यासं संस्थितं शुभदर्शनम्॥ ५३ | तत्पश्चात् सब पाण्डव नागरिकोंके साथ उस आश्रममें बैठ गये। उसी समय सत्यवतीपुत्र व्यासजी तथा नारदजी भी वहाँ पहुँच गये। अन्य मुनिगण भी वहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिरके पास आ गये। उस समय कुन्तीने वहाँ विराजमान शुभदर्शन व्यासजीसे कहा—॥ ५२-५३॥ |
| कृष्ण कर्णस्तु पुत्रो मे जातमात्रस्तु वीक्षितः।<br>मनो मे तप्यतेऽत्यर्थं दर्शयस्व तपोधन॥ ५४<br>समर्थोऽसि महाभाग कुरु मे वाञ्छितं प्रभो। | हे कृष्णद्वैपायन! मैंने अपने पुत्र कर्णको जन्मके समय ही देखा था। [उसे देखनेके लिये] मेरा मन बहुत तड़प रहा है, अतः हे तपोधन! मुझे उसको दिखा दीजिये। हे महाभाग! आप समर्थ हैं, अतः मेरी यह इच्छा पूर्ण कीजिये॥ ५४ १/२॥ |
| गान्धार्युवाच<br>दुर्योधनो रणेऽगच्छद्वीक्षितो न मया मुने॥ ५५<br><br>तं दर्शय मुनिश्रेष्ठ पुत्रं मे त्वं सहानुजम्। | गान्धारी बोली—हे मुने! दुर्योधन समरभूमिमें चला गया था और मैं उसे देख नहीं पायी। अतः हे मुनिश्रेष्ठ! छोटे भाइयोसहित उस दुर्योधनको आप मुझे दिखा दीजिये॥ ५५ १/२॥ |
| सुभद्रोवाच<br>अभिमन्युं महावीरं प्राणादप्यधिकं प्रियम्॥ ५६<br>द्रष्टुकामास्मि सर्वज्ञ दर्शयाद्य तपोधन। | सुभद्रा बोली—हे सर्वज्ञ! मैं प्राणोंसे भी अधिक प्रिय अपने महान् वीर पुत्र अभिमन्युको देखना चाहती हूँ। अतः हे तपोधन! उसे अभी दिखा दीजिये॥ ५६ १/२॥ |