देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० ७ ] | द्वितीय स्कन्ध | २१३ |
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| सूत उवाच<br>एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा सत्यवतीसुतः ॥ ५७<br>प्राणायामं ततः कृत्वा दध्यौ देवीं सनातनीम्।<br>सन्ध्याकालेऽथ सम्प्राप्ते गङ्गायां मुनिसत्तमः ॥ ५८<br>सर्वांस्तांश्च समाहूय युधिष्ठिरपुरोगमान्।<br>तुष्टाव विश्वजननीं स्नात्वा पुण्यसरिज्जले ॥ ५९<br>प्रकृतिं पुरुषारामां सगुणां निर्गुणां तथा।<br>देवदेवीं ब्रह्मरूपां मणिद्वीपाधिवासिनीम् ॥ ६० | सूतजी बोले— इस प्रकारके वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासजीने प्राणायाम करके सनातनी देवी भगवतीका ध्यान किया। तब सायंकाल आनेपर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी युधिष्ठिर आदि सभी जनोंको गंगाजीके तटपर बुलाकर पुण्यनदी गंगाके पवित्र जलमें स्नान करके प्रकृतिस्वरूपिणी, परम पुरुषको प्रसन्न करनेवाली, सगुण-निर्गुणरूपा, देवताओंकी भी देवी, ब्रह्मस्वरूपिणी उन मणिद्वीपनिवासिनी भगवतीकी स्तुति करने लगे ॥ ५७—६० ॥ | | यदा न वेधा न च विष्णुरीश्वरो<br>न वासवो नैव जलाधिपस्तथा।<br>न वित्तपो नैव यमश्च पावक-<br>स्तदासि देवि त्वमहं नमामि ताम् ॥ ६१ | हे देवि! जब ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम तथा अग्नि—ये कोई भी नहीं थे, उस समय भी आपकी सत्ता थी; ऐसी उन आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६१ ॥ | | जलं न वायुर्न धरा न चाम्बरं<br>गुणा न तेषां च न चेन्द्रियाण्यहम्।<br>मनो न बुद्धिर्न च तिग्मगुः शशी<br>तदासि देवि त्वमहं नमामि ताम् ॥ ६२ | जिस समय जल, वायु, पृथ्वी, आकाश तथा उनके रस आदि गुण, समस्त इन्द्रियाँ, अहंकार, मन, बुद्धि, सूर्य तथा चन्द्रमा—ये कोई भी नहीं थे, तब भी आप विद्यमान थीं; ऐसी उन आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६२ ॥ | | इमं जीवलोकं समाधाय चित्ते<br>गुणैर्लिङ्गकोशं च नीत्वा समाधौ।<br>स्थिता कल्पकालं नयस्यात्मतन्त्रा<br>न कोऽप्यस्ति वेत्ता विवेकं गतोऽपि ॥ ६३ | इस जीवलोकको अपने चित्तमें समाहित करके सत्व-रज-तम आदि गुणोंसहित लिंग-कोशको समाधिकी अवस्थामें पहुँचाकर जब आप कल्पपर्यन्त स्वतन्त्र होकर विहार करती हैं, तब विवेकप्राप्त पुरुष भी आपको जाननेमें समर्थ नहीं होता ॥ ६३ ॥ | | प्रार्थयत्येष मां लोको मृतानां दर्शनं पुनः।<br>नाहं क्षमोऽस्मि मातस्त्वं दर्शयाशु जनान्मृतान् ॥ ६४ | हे माता! ये लोग मृत व्यक्तियोंके पुनः दर्शनके लिये मुझसे प्रार्थना कर रहे हैं, किंतु मैं ऐसा कर पानेमें समर्थ नहीं हूँ। अतएव आप इन्हें मृत व्यक्तियोंको शीघ्र ही दिखा दें ॥ ६४ ॥ | | सूत उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी माया श्रीभुवनेश्वरी।<br>स्वर्गादाहूय सर्वान्वै दर्शयामास पार्थिवान् ॥ ६५ | सूतजी बोले— व्यासजीके द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर महामाया श्रीभुवनेश्वरी देवीने समस्त मृत राजाओंको स्वर्गसे बुलाकर दिखा दिया ॥ ६५ ॥ | | दृष्ट्वा कुन्ती च गान्धारी सुभद्रा च विराटजा।<br>पाण्डवा मुमुदुः सर्वे वीक्ष्य प्रत्यागतान्स्वकान् ॥ ६६ | कुन्ती, गान्धारी, सुभद्रा, विराटपुत्री उत्तरा एवं सभी पाण्डव वापस आये हुए स्वजनोंको देखकर प्रसन्न हो गये ॥ ६६ ॥ | | पुनर्विसर्जितास्तेन व्यासेनामिततेजसा।<br>स्मृत्वा देवीं महामायामिन्द्रजालमिवोद्यतम् ॥ ६७ | तदनन्तर अपरिमित तेजवाले व्यासजीने महामाया देवीका स्मरण करके इन्द्रजालकी भाँति प्रकट हुए उन सबको पुनः लौटा दिया ॥ ६७ ॥ |