भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 223
२१४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८

| तदा पृष्ट्वा ययुः सर्वे पाण्डवा मुनयस्तथा।<br>राजा नागपुरं प्राप्तः कुर्वन्व्यासकथां पथि॥ ६८ | तत्पश्चात् [धृतराष्ट्र आदि तापसोंसे] आज्ञा लेकर सभी पाण्डव तथा मुनिजन वहाँसे चल दिये। राजा युधिष्ठिर भी मार्गमें व्यासजीकी चर्चा करते हुए हस्तिनापुर आ गये॥ ६८॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे पाण्डवानां कथानकं मृतानां दर्शनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥


अथाष्टमोऽध्यायः

धृतराष्ट्र आदिका दावाग्निमें जल जाना, प्रभासक्षेत्रमें यादवोंका परस्पर युद्ध और संहार, कृष्ण और बलरामका परमधामगमन, परीक्षित्को राजा बनाकर पाण्डवोंका हिमालय-पर्वतपर जाना, परीक्षित्को शापकी प्राप्ति, प्रमद्वरा और रुरुका वृत्तान्त

सूत उवाचसूतजी बोले—
ततो दिने तृतीये च धृतराष्ट्रः स भूपतिः।<br>दावाग्निना वने दग्धः सभार्यः कुन्तिसंयुतः॥ १वहाँसे पाण्डवोंके प्रस्थित होनेके तीसरे दिन उस वनमें लगी दावाग्निमें कुन्ती एवं गान्धारीसहित राजा धृतराष्ट्र दग्ध हो गये॥ १॥
सञ्जयस्तीर्थयात्रायां गतस्त्यक्त्वा महीपतिम्।<br>श्रुत्वा युधिष्ठिरो राजा नारदाद्दुःखमाप्तवान्॥ २संजय पहले ही धृतराष्ट्रको छोड़कर तीर्थयात्राके लिये चले गये थे। नारदजीसे यह वृत्तान्त सुनकर राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हुए॥ २॥
षट्त्रिंशेऽथ गते वर्षे कौरवाणां क्षयात्पुनः।<br>प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापात्क्षयं गताः॥ ३<br><br>ते पीत्वा मदिरां मत्ताः कृत्वा युद्धं परस्परम्।<br>क्षयं प्राप्ता महात्मानः पश्यतो रामकृष्णयोः॥ ४कौरवोंके विनाशके छत्तीस वर्ष बीतनेपर विप्र-शापके प्रभावसे सभी यादव प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये। वे सभी यादव मदिरा पीकर मतवाले हो गये और आपसमें लड़कर बलराम तथा श्रीकृष्णके देखते-देखते मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ३-४॥
देहं तत्याज रामस्तु कृष्णः कमललोचनः।<br>व्याधबाणहतः शापं पालयन्भगवान्हरिः॥ ५तदनन्तर बलरामजीने योगक्रियाद्वारा शरीरका त्याग किया और कमलके समान नेत्रवाले भगवान् श्रीकृष्णने शापकी मर्यादा रखते हुए एक बहेलियेके बाणसे आहत होकर महाप्रयाण किया॥ ५॥
वसुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा देहत्यागं हरेरथ।<br>जहौ प्राणाञ्छुचीन्कृत्वा चित्ते श्रीभुवनेश्वरीम्॥ ६इसके पश्चात् जब वसुदेवजीने श्रीकृष्णके शरीर-त्यागका समाचार सुना तो उन्होंने अपने चित्तमें श्रीभुवनेश्वरी देवीका ध्यान करके अपने पवित्र प्राणोंका परित्याग कर दिया॥ ६॥
अर्जुनस्तु ततो गत्वा प्रभासे चातिदुःखितः।<br>संस्कारं तत्र सर्वेषां यथायोग्यं चकार ह॥ ७तत्पश्चात् अत्यन्त शोक-संतप्त अर्जुनने प्रभास-क्षेत्रमें पहुँचकर सभीका यथोचित अन्तिम संस्कार सम्पन्न किया॥ ७॥
समीक्ष्याथ हरेर्देहं कृत्वा काष्ठस्य सञ्चयम्।<br>अष्टाभिः सह पत्नीभिर्दहयामास पार्थिवः॥ ८भगवान् श्रीकृष्णका शरीर खोजकर और लकड़ी जुटाकर अर्जुनने आठ पटरानियोंके साथ उनका दाह-संस्कार किया॥ ८॥