भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 224
अ० ८ ]द्वितीय स्कन्ध२१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देहं रामस्य रेवत्या सह दग्ध्वा विभावसौ।<br>अर्जुनो द्वारकामेत्य पुरान्निष्क्रामयज्जनम्॥ ९तदनन्तर रेवतीके साथ बलरामजीके मृतशरीरका दाह-संस्कार करके अर्जुनने द्वारकापुरी पहुँचकर उस नगरीसे नागरिकोंको बाहर निकाला॥ ९॥
पुरी सा वासुदेवस्य प्लावितोदधिना ततः।<br>अर्जुनः सर्वलोकान्वै गृहीत्वा निर्गतस्तदा॥ १०तत्पश्चात् कुछ ही क्षणोंमें भगवान् श्रीकृष्णकी वह द्वारकापुरी समुद्रमें डूब गयी, किंतु अर्जुन सभी लोगोंको साथ लेकर बाहर निकल गये थे॥ १०॥
कृष्णपत्न्यस्तदा मार्गे चौरार्भीरैश्च लुण्ठिताः।<br>धनं सर्वं गृहीतं च निस्तेजश्चार्जुनोऽभवत्॥ ११मार्गमें चोरों और भीलोंने श्रीकृष्णकी पत्नियोंको लूट लिया और समस्त धन छीन लिया; उस समय अर्जुन तेजहीन हो गये॥ ११॥
इन्द्रप्रस्थे समागत्य वज्रो राजा कृतस्तदा।<br>अनिरुद्धसुतो नाम्ना पार्थेनामिततेजसा॥ १२तदनन्तर अपरिमित तेजसे सम्पन्न अर्जुनने इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर अनिरुद्धके वज्र नामक पुत्रको राजा बनाया॥ १२॥
व्यासाय कथितं दुःखं तेनोक्तोऽसौ महारथः।<br>पुनर्यदा हरिस्त्वञ्च भवितासि महामते॥ १३<br><br>तदा तेजस्तवात्युग्रं भविष्यति पुनर्युगे।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं पार्थो गत्वा नागपुरेऽर्जुनः॥ १४<br><br>दुःखितो धर्मराजानं वृत्तान्तं सर्वमब्रवीत्।<br>देहत्यागं हरेः श्रुत्वा यादवानां क्षयं तथा॥ १५अर्जुनने अपने तेजहीन होनेका दुःख व्यासजीसे निवेदन किया, जिसपर व्यासजीने उस महारथी अर्जुनसे कहा—हे महामते! जब भगवान् श्रीकृष्ण और आपका पुनः अवतार होगा, तब उस युगमें आपका तेज पुनः अत्यन्त उग्र हो जायगा। उनका यह वचन सुनकर अर्जुन वहाँसे हस्तिनापुर चले गये। वहाँपर अत्यन्त दुःखी होकर अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरसे समस्त वृत्तान्त कहा॥ १३-१४ १/२॥
गमनाय मतिं चक्रे राजा हैमाचलं प्रति।<br>षट्त्रिंशद्वार्षिकं राज्ये स्थापयित्वोत्तरासुतम्॥ १६<br><br>निर्जगाम वनं राजा द्रौपद्या भ्रातृभिः सह।<br>षट्त्रिंशच्चैव वर्षाणि कृत्वा राज्यं गजाह्वये॥ १७श्रीकृष्णके देहत्याग एवं यादवोंके विनाशका समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरने हिमालयकी ओर जानेका निश्चय कर लिया। इसके बाद छत्तीसवर्षीय उत्तरापुत्र परीक्षित्को राजसिंहासनपर प्रतिष्ठित करके वे राजा युधिष्ठिर द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ वनकी ओर निकल गये। इस प्रकार छत्तीस वर्षकी अवधितक हस्तिनापुरमें राज्य करके द्रौपदी तथा कुन्तीपुत्रों—इन छहोंने हिमालयपर्वतपर जाकर प्राण त्याग दिये॥ १५-१७ १/२॥
गत्वा हिमाचले षट् ते जहुः प्राणान्पृथासुताः।<br>परीक्षिदपि राजर्षिः प्रजाः सर्वाः सुधार्मिकः॥ १८<br><br>अपालयच्च राजेन्द्रः षष्टिवर्षाण्यतन्द्रितः।<br>बभूव मृगयाशीलो जगाम च वनं महत्॥ १९इधर धर्मनिष्ठ राजर्षि परीक्षित्ने भी आलस्यरहित भावसे साठ वर्षोंतक सम्पूर्ण प्रजाका पालन किया। वे एक बार आखेटहेतु एक विशाल जंगलमें गये॥ १८-१९॥
विद्धं मृगं विचिन्वानो मध्याह्ने भूपतिः स्वयम्।<br>तृषितश्च परिश्रान्तः क्षुधितश्चोत्तरासुतः॥ २०अपने बाणसे विद्ध एक मृगको खोजते-खोजते मध्याह्नकालमें उत्तरापुत्र राजा परीक्षित् भूख-प्यास तथा थकानसे व्याकुल हो गये॥ २०॥