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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० ८ ]द्वितीय स्कन्ध२१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देहं रामस्य रेवत्या सह दग्ध्वा विभावसौ।<br>अर्जुनो द्वारकामेत्य पुरान्निष्क्रामयज्जनम्॥ ९तदनन्तर रेवतीके साथ बलरामजीके मृतशरीरका दाह-संस्कार करके अर्जुनने द्वारकापुरी पहुँचकर उस नगरीसे नागरिकोंको बाहर निकाला॥ ९॥
पुरी सा वासुदेवस्य प्लावितोदधिना ततः।<br>अर्जुनः सर्वलोकान्वै गृहीत्वा निर्गतस्तदा॥ १०तत्पश्चात् कुछ ही क्षणोंमें भगवान् श्रीकृष्णकी वह द्वारकापुरी समुद्रमें डूब गयी, किंतु अर्जुन सभी लोगोंको साथ लेकर बाहर निकल गये थे॥ १०॥
कृष्णपत्न्यस्तदा मार्गे चौरार्भीरैश्च लुण्ठिताः।<br>धनं सर्वं गृहीतं च निस्तेजश्चार्जुनोऽभवत्॥ ११मार्गमें चोरों और भीलोंने श्रीकृष्णकी पत्नियोंको लूट लिया और समस्त धन छीन लिया; उस समय अर्जुन तेजहीन हो गये॥ ११॥
इन्द्रप्रस्थे समागत्य वज्रो राजा कृतस्तदा।<br>अनिरुद्धसुतो नाम्ना पार्थेनामिततेजसा॥ १२तदनन्तर अपरिमित तेजसे सम्पन्न अर्जुनने इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर अनिरुद्धके वज्र नामक पुत्रको राजा बनाया॥ १२॥
व्यासाय कथितं दुःखं तेनोक्तोऽसौ महारथः।<br>पुनर्यदा हरिस्त्वञ्च भवितासि महामते॥ १३<br><br>तदा तेजस्तवात्युग्रं भविष्यति पुनर्युगे।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं पार्थो गत्वा नागपुरेऽर्जुनः॥ १४<br><br>दुःखितो धर्मराजानं वृत्तान्तं सर्वमब्रवीत्।<br>देहत्यागं हरेः श्रुत्वा यादवानां क्षयं तथा॥ १५अर्जुनने अपने तेजहीन होनेका दुःख व्यासजीसे निवेदन किया, जिसपर व्यासजीने उस महारथी अर्जुनसे कहा—हे महामते! जब भगवान् श्रीकृष्ण और आपका पुनः अवतार होगा, तब उस युगमें आपका तेज पुनः अत्यन्त उग्र हो जायगा। उनका यह वचन सुनकर अर्जुन वहाँसे हस्तिनापुर चले गये। वहाँपर अत्यन्त दुःखी होकर अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरसे समस्त वृत्तान्त कहा॥ १३-१४ १/२॥
गमनाय मतिं चक्रे राजा हैमाचलं प्रति।<br>षट्त्रिंशद्वार्षिकं राज्ये स्थापयित्वोत्तरासुतम्॥ १६<br><br>निर्जगाम वनं राजा द्रौपद्या भ्रातृभिः सह।<br>षट्त्रिंशच्चैव वर्षाणि कृत्वा राज्यं गजाह्वये॥ १७श्रीकृष्णके देहत्याग एवं यादवोंके विनाशका समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरने हिमालयकी ओर जानेका निश्चय कर लिया। इसके बाद छत्तीसवर्षीय उत्तरापुत्र परीक्षित्को राजसिंहासनपर प्रतिष्ठित करके वे राजा युधिष्ठिर द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ वनकी ओर निकल गये। इस प्रकार छत्तीस वर्षकी अवधितक हस्तिनापुरमें राज्य करके द्रौपदी तथा कुन्तीपुत्रों—इन छहोंने हिमालयपर्वतपर जाकर प्राण त्याग दिये॥ १५-१७ १/२॥
गत्वा हिमाचले षट् ते जहुः प्राणान्पृथासुताः।<br>परीक्षिदपि राजर्षिः प्रजाः सर्वाः सुधार्मिकः॥ १८<br><br>अपालयच्च राजेन्द्रः षष्टिवर्षाण्यतन्द्रितः।<br>बभूव मृगयाशीलो जगाम च वनं महत्॥ १९इधर धर्मनिष्ठ राजर्षि परीक्षित्ने भी आलस्यरहित भावसे साठ वर्षोंतक सम्पूर्ण प्रजाका पालन किया। वे एक बार आखेटहेतु एक विशाल जंगलमें गये॥ १८-१९॥
विद्धं मृगं विचिन्वानो मध्याह्ने भूपतिः स्वयम्।<br>तृषितश्च परिश्रान्तः क्षुधितश्चोत्तरासुतः॥ २०अपने बाणसे विद्ध एक मृगको खोजते-खोजते मध्याह्नकालमें उत्तरापुत्र राजा परीक्षित् भूख-प्यास तथा थकानसे व्याकुल हो गये॥ २०॥
२१६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राजा घर्मेण सन्तप्तो ददर्श मुनिमन्तिके ।<br>ध्याने स्थितं मुनिं राजा जलं पप्रच्छ चातुरः ॥ २१धूपसे पीड़ित राजाने समीपमें ही एक ध्यानमग्न मुनिको विराजमान देखा और प्याससे व्याकुल उन्होंने मुनिसे जल माँगा ॥ २१ ॥
नोवाच किञ्चिन्मौनस्थश्चुकोप नृपतिस्तदा ।<br>मृतं सर्पं तदादाय धनुष्कोट्या तृषातुरः ॥ २२<br>कलिनाविष्टचित्तस्तु कण्ठे तस्य न्यवेशयत् ।<br>आरोपिते तथा सर्पे नोवाच मुनिसत्तमः ॥ २३मौन व्रतमें स्थित वे मुनि कुछ भी नहीं बोले, जिससे राजा कुपित हो गये और प्याससे आकुल तथा कलिसे प्रभावित चित्तवाले राजाने अपने धनुषकी नोकसे एक मृत साँप उठाकर उनके गलेमें डाल दिया। गलेमें सर्प डाल दिये जानेके बाद भी वे मुनिश्रेष्ठ कुछ भी नहीं बोले ॥ २२-२३ ॥
न चचाल समाधिस्थो राजापि स्वगृहं गतः ।<br>तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी गविजातो महातपाः ॥ २४वे थोड़ा भी विचलित नहीं हुए और समाधिमें स्थित रहे। राजा भी अपने घर चले गये। उन मुनिका पुत्र गविजात अत्यन्त तेजस्वी तथा महातपस्वी था ॥ २४ ॥
महाशक्तोऽथ शुश्राव क्रीडमानो वनान्तिके ।<br>मित्राण्याहुश्च तत्पुत्रं पितुः कण्ठे तवाधुना ॥ २५<br>लम्बितोऽस्ति मृतः सर्पः केनापीति मुनीश्वर ।<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चुकोपातिशयं तदा ॥ २६<br>शशाप नृपतिं क्रुद्धो गृहीत्वाशु करे जलम् ।<br>पितुः कण्ठेऽद्य मे येन विनिक्षिप्तो मृतोरगः ॥ २७<br>तक्षकः सप्तरात्रेण तं दशेत्पापपूरुषम् ।<br>मुनेः शिष्योऽथ राजानं समुपेत्य गृहे स्थितम् ॥ २८<br>शापं निवेदयामास मुनिपुत्रेण चार्पितम् ।<br>अभिमन्युसुतः श्रुत्वा शापं दत्तं द्विजेन वै ॥ २९<br>अनिवार्यं च विज्ञाय मन्त्रिवृद्धानुवाच ह ।<br>शप्तोऽहं द्विजरूपेण मम द्वेषादसंशयम् ॥ ३०पराशक्तिके आराधक उस गविजातने पासके वनमें खेलते हुए अपने मित्रोंको ऐसा कहते हुए सुना कि हे मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारे पिताके गलेमें किसीने मृत सर्प डाल दिया है। उनकी यह बात सुनकर वह अत्यन्त कुपित हुआ और शीघ्र ही हाथमें जल लेकर उसने कुपित होकर राजाको शाप दे दिया—जिस व्यक्तिने मेरे पिताजीके कण्ठमें मृत सर्प डाला है, उस पापी पुरुषको एक सप्ताहमें तक्षक डस लेगा। मुनिके शिष्यने महलमें स्थित राजा परीक्षित्‌के समीप जाकर मुनिपुत्रके द्वारा दिये गये शापकी बात कही। ब्राह्मणके द्वारा दिये गये शापको सुनकर अभिमन्युपुत्र परीक्षित्‌ने उसे अनिवार्य समझकर वृद्ध मन्त्रियोंसे कहा—अपने अपराधके कारण मैं मुनिपुत्रसे शापित हुआ हूँ ॥ २५-३० ॥
किं विधेयं मयामात्या उपायश्चिन्त्यतामिह ।<br>मृत्युः किलानिवायोऽसौ वदन्ति वेदवादिनः ॥ ३१<br>यत्नस्तथापि शास्त्रोक्तः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः ।<br>उपायवादिनः केचित्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ३२<br>विज्ञोपायेन सिध्यन्ति कार्याणि नेतरस्य च ।<br>मणिमन्त्रौषधीनां वै प्रभावाः खलु दुर्विदः ॥ ३३<br>न भवेदिति किं तैस्तु मणिमद्भिः सुसाधितैः ।<br>सर्पदष्टा पुरा भार्या मुनेः सञ्जीविता मृता ॥ ३४हे मन्त्रियो! अब मुझे क्या करना चाहिये? आप लोग कोई उपाय सोचें। मृत्यु तो अनिवार्य है—ऐसा वेदवादी लोग कहते हैं, तथापि बुद्धिमान् पुरुषोंको शास्त्रोक्त रीतिसे सर्वथा प्रयत्न करना ही चाहिये। कुछ पुरुषार्थवादी विद्वान् ऐसा कहते हैं कि बुद्धिमानीके साथ उपाय करनेपर कार्य सिद्ध हो जाते हैं; न करनेपर नहीं। मणि, मन्त्र और औषधोंके प्रभाव अत्यन्त ही दुर्ज्ञेय होते हैं। मणि धारण करनेवाले सिद्धजनोंके द्वारा क्या नहीं सम्भव हो जाता? पूर्वकालमें किसी ऋषिपत्नीको सर्पने काट लिया था, जिससे वह मर गयी थी; उस समय उस मुनिने अपनी आयुका आधा
अ० ८ ]द्वितीय स्कन्ध२१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दत्त्वार्धमायुषस्तेन मुनिना सा वराप्सराः।<br>भवितव्ये न विश्वासः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः ॥ ३५भाग देकर उस श्रेष्ठ अप्सराको जीवित कर दिया था। अतः बुद्धिमान् लोगोंको चाहिये कि वे भवितव्यतापर विश्वास न करें, उपाय भी करें ॥ ३१—३५ ॥
प्रत्यक्षं तत्र दृष्टान्तं पश्यन्तु सचिवाः किल।<br>दिवि कोऽपि पृथिव्यां वा दृश्यते पुरुषः क्वचित् ॥ ३६<br><br>दैवे मतिं समाधाय यस्तिष्ठेत्तु निरुद्यमः।<br>विरक्तस्तु यतिर्भूत्वा भिक्षार्थं याति सर्वथा ॥ ३७<br><br>गृहस्थानां गृहे काममाहूतो वाथवान्यथा।<br>यदृच्छयोपपन्नं च क्षिप्तं केनापि वा मुखे ॥ ३८<br><br>उद्यमेन विना चास्यादुदरे संविशेत्कथम्।<br>प्रयत्नश्चोद्यमे कार्यो यदा सिद्धिं न याति चेत् ॥ ३९<br><br>तदा दैवं स्थितं चेति चित्तमालम्बयेद् बुधः।हे सचिवो ! आपलोग यह दृष्टान्त प्रत्यक्ष देख लें। इस लोक या परलोकमें ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं दिखायी देता, जो केवल भाग्यके भरोसे रहकर उद्यम न करता हो। गृहस्थीसे विरक्त मनुष्य संन्यासी होकर जगह-जगह भिक्षाटनके लिये बुलानेपर अथवा बिना बुलाये भी गृहस्थोंके घर जाता ही है। दैवप्राप्त उस भोजनको भी क्या कोई मुखमें डाल देता है ? उद्यमके बिना वह भोजन मुखसे उदरमें कैसे प्रवेश कर सकता है ? अतः प्रयत्नपूर्वक उद्यम तो करना ही चाहिये, यदि सफलता न मिले तो बुद्धिमान् मनुष्य मनमें विश्वास कर ले कि दैव यहाँ प्रबल है ॥ ३६—३९ ½ ॥
मन्त्रिण ऊचुः<br>को मुनिर्येन दत्त्वार्धमायुषो जीविता प्रिया ॥ ४०<br>कथं मृता महाराज तन्नो ब्रूहि सविस्तरम्।मन्त्रियोंने कहा— हे महाराज ! वे कौन मुनि थे, जिन्होंने अपनी आधी आयु देकर अपनी प्रिय पत्नीको जीवित किया था ? वह कैसे मरी थी ? यह कथा विस्तारसे हमसे कहिये ॥ ४० ½ ॥
राजोवाच<br>भृगोर्भार्या वरारोहा पुलोमा नाम सुन्दरी ॥ ४१<br>तस्यां तु च्यवनो नाम मुनिर्जातोऽतिविश्रुतः।<br>च्यवनस्य च शर्यातेः सुकन्या नाम सुन्दरी ॥ ४२राजा बोले— महर्षि भृगुकी एक सुन्दर स्त्री थी, जिसका नाम पुलोमा था। उससे परम विख्यात च्यवनमुनिका जन्म हुआ। च्यवनकी पत्नीका नाम सुकन्या था, वह महाराज शर्यातिकी रूपवती कन्या थी ॥ ४१-४२ ॥
तस्यां जज्ञे सुतः श्रीमान्प्रमतिर्नाम विश्रुतः।<br>प्रमतेस्तु प्रिया भार्या प्रतापी नाम विश्रुता ॥ ४३<br>रुरुर्नाम सुतो जातस्तथा परमतापसः।उस सुकन्यासे श्रीमान् प्रमतिने जन्म लिया, जो बड़े यशस्वी थे। उस प्रमतिकी प्रिय पत्नीका नाम प्रतापी था। उन्हीं राजा प्रमतिके पुत्र परम तपस्वी 'रुरु' हुए ॥ ४३ ½ ॥
तस्मिंश्च समये कश्चित्स्थूलकेशश्च विश्रुतः ॥ ४४<br>बभूव तपसा युक्तो धर्मात्मा सत्यसम्मतः।<br>एतस्मिन्नन्तरे मान्या मेनका च वराप्सराः ॥ ४५<br>क्रीडां चक्रे नदीतीरे त्रिषु लोकेषु सुन्दरी।<br>गर्भं विश्वावसोः प्राप्य निर्गता वरवर्णिनी ॥ ४६उन्हीं दिनों स्थूलकेश नामक एक विख्यात ऋषि थे, जो बड़े ही तपस्वी, धर्मात्मा एवं सत्यनिष्ठ थे। इसी बीच त्रिलोकसुन्दरी मेनका नामकी श्रेष्ठ अप्सरा नदीके किनारे जलक्रीडा कर रही थी। वह अप्सरा विश्वावसुके द्वारा गर्भवती होकर वहाँसे निकल पड़ी ॥ ४४—४६ ॥
स्थूलकेशाश्रमे गत्वा विससर्ज वराप्सराः।<br>कन्यकां च नदीतीरे त्रिषु लोकेषु सुन्दरीम् ॥ ४७उस श्रेष्ठ अप्सराने स्थूलकेशके आश्रममें जाकर नदीतटपर एक त्रैलोक्यसुन्दरी कन्याको जन्म दिया और वह उसे छोड़कर चली गयी। तब उस नवजात शिशु

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे रुरुचरित्रवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥

२१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९

संस्कृतहिन्दी
दृष्ट्वानाथां तदा कन्यां जग्राह मुनिसत्तमः।<br>पुपोष स्थूलकेशस्तु नाम्ना चक्रे प्रमद्वराम्॥ ४८कन्याको अनाथ जानकर मुनिवर स्थूलकेश अपने आश्रममें ले गये और उसका पालन-पोषण करने लगे। उन्होंने उसका नाम प्रमद्वरा रखा॥ ४७-४८॥
सा काले यौवनं प्राप्ता सर्वलक्षणसंयुता।<br>रुरुर्दृष्ट्वाथ तां बालां कामबाणार्दितो ह्यभूत्॥ ४९वह सर्वलक्षणसम्पन्न कन्या यथासमय यौवनको प्राप्त हुई। उस सुन्दरीको देखकर रुरु काममोहित हो गये॥ ४९॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे रुरुचरित्रवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥


अथ नवमोऽध्यायः

सर्पके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु, रुरुद्वारा अपनी आधी आयु देकर उसे जीवित कराना, मणि-मन्त्र-औषधिद्वारा सुरक्षित राजा परीक्षित्का सात तलवाले भवनमें निवास करना

संस्कृतहिन्दी
परीक्षिदुवाच<br>कामार्तः स मुनिर्गत्वा रुरुः सुप्तो निजाश्रमे।<br>पिता पप्रच्छ दीनं तं किं रुरो विमना असि॥ १परीक्षित् बोले—[हे सचिववृन्द!] इस प्रकार कामासक्त होकर रुरुमुनि अपने आश्रममें सो गये, तब उनके पिताने उन्हें दुःखी देखकर पूछा—हे रुरु! तुम इतने उदास क्यों हो?॥ १॥
स तमाहातिकामार्तः स्थूलकेशस्य चाश्रमे।<br>कन्या प्रमद्वरा नाम सा मे भार्या भवेदिति॥ २कामातुर रुरुने अपने पितासे कहा—महर्षि स्थूलकेशके आश्रममें प्रमद्वरा नामकी एक कन्या है; मैं चाहता हूँ कि वह मेरी पत्नी बन जाय॥ २॥
स गत्वा प्रमतिस्तूर्णं स्थूलकेशं महामुनिम्।<br>प्रमुह्य सुमुखं कृत्वा ययाचे तां वराननाम्॥ ३उन प्रमतिने महामुनि स्थूलकेशके पास शीघ्र जाकर उन्हें प्रसन्न तथा अपने अनुकूल करके उस सुन्दर कन्याकी याचना की॥ ३॥
ददौ वाचं स्थूलकेशः प्रदास्यामि शुभेऽहनि।<br>विवाहार्थं च सम्भारं रचयामासतुर्वने॥ ४<br><br>प्रमतिः स्थूलकेशश्च विवाहार्थं समुद्यतौ।<br>बभूवतुर्महात्मानौ समीपस्थौ तपोवने॥ ५महामुनि स्थूलकेशने यह वचन दे दिया कि किसी अच्छे मुहूर्तमें कन्यादान दूँगा। अब उस वनमें वे दोनों विवाहकी सामग्रीका प्रबन्ध करने लगे। इस प्रकार उस तपोवनमें समीपमें ही रहकर प्रमति और स्थूलकेश दोनों महात्मा विवाहोत्सवकी तैयारी करने लगे॥ ४-५॥
तस्मिन्नवसरे कन्या रममाणा गृहाङ्गणे।<br>प्रसुप्तं पन्नगं पादेनास्पृशच्चारुलोचना॥ ६<br><br>दष्टा तु पन्नगेनाथ सा ममार वराङ्गना।<br>कोलाहलस्तदा जातो मृतां दृष्ट्वा प्रमद्वराम्॥ ७उसी अवसरपर वह कन्या अपने घरके आँगनमें खेल रही थी, तभी एक सोये हुए सर्पसे उस सुनयनीका पैर छू गया। [स्पर्श होते ही] सर्पने उसे डँस लिया और वह सुन्दरी कन्या मर गयी। तब मृत्युको प्राप्त हुई प्रमद्वराको देखकर वहाँ कोलाहल मच गया॥ ६-७॥
मिलिता मुनयः सर्वे चुक्रुशुः शोकसंयुताः।<br>भूमौ तां पतितां दृष्ट्वा पिता तस्यातिदुःखितः॥ ८सभी मुनि जुट गये और शोकसे ग्रस्त होकर रोने लगे। पृथ्वीपर प्राणहीन होकर पड़ी हुई अत्यन्त तेजसे देदीप्यमान उस कन्याको देखकर उसके पिता

अ० ९] द्वितीय स्कन्ध २१९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रुरोद विगतप्राणां दीप्यमानां सुतेजसा।<br>रुरुः श्रुत्वा तदाक्रन्दं दर्शनार्थं समागतः॥ ९<br><br>ददर्श पतितां तत्र सजीवामिव कामिनीम्।<br>रुदन्तं स्थूलकेशं च दृष्ट्वान्यानृषिसत्तमान्॥ १०<br><br>रुरुः स्थानाद् बहिर्गत्वा रुरोद विरहाकुलः।स्थूलकेश अत्यन्त दुःखित होकर रुदन करने लगे। उस समय करुण क्रन्दन सुनकर रुरु भी उसे देखनेके लिये आये। उन्होंने उस मृत पड़ी सुन्दरीको सजीव-जैसी देखा। स्थूलकेश तथा अन्य श्रेष्ठ मुनियोंको रुदन करते देखकर रुरुमुनि उस स्थानसे बाहर आ करके विरहाकुल होकर रोने लगे॥ ८—१० १/२॥
अहो दैवेन सर्पोऽयं प्रेषितः परमाद्भूतः॥ ११<br><br>मम शर्मविघाताय दुःखहेतुरयं किल।<br>किं करोमि क्व गच्छामि मृता मे प्राणवल्लभा॥ १२<br><br>न वै जीवितुमिच्छामि वियुक्तः प्रिययानया।<br>नालिङ्गिता वरारोहा न मया चुम्बिता मुखे॥ १३<br><br>न पाणिग्रहणं प्राप्तं मन्दभाग्येन सर्वथा।<br>लाजाहोमस्तथा चाग्नौ न कृतस्त्वनया सह॥ १४<br><br>मानुष्यं धिगिदं कामं गच्छन्त्वद्य ममासवः।<br>दुःखितस्य न वा मृत्युर्वाञ्छितः समुपैति हि॥ १५<br><br>सुखं तर्हि कथं दिव्यमाप्यते भुवि वाञ्छितम्।<br>प्रपतामि ह्रदे घोरे पावके प्रपताम्यहम्॥ १६<br><br>विषमद्य गले पाशं कृत्वा प्राणांस्त्यजाम्यहम्।[वे कहने लगे—] अहो! प्रारब्धने ही मेरे सुखके विनाशके लिये ही यह अत्यन्त विचित्र सर्प भेजा था। यह निश्चित ही मेरे दुःखका कारण है। अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मेरी प्राणप्रिया तो मर गयी। अब मैं अपनी इस प्रियासे विलग होकर जीना नहीं चाहता। अभीतक मैंने उस सुन्दरीका आलिंगन आदि कोई सांसारिक सुख भी नहीं प्राप्त किया था। मैं ऐसा अभागा हूँ कि उसका पाणिग्रहण नहीं कर सका और न तो उसके साथ अग्निमें लाजाहोम ही कर पाया। मेरे इस मनुष्य-जीवनको धिक्कार है। अब तो मेरे प्राण निकल जायँ तो अच्छा है, जब दुःखित मनुष्यको चाहनेपर भी मृत्यु नहीं मिलती, तब इस संसारमें वांछित उत्तम सुख कैसे मिल सकता है? अब मैं या तो कहीं किसी भयानक तालाबमें डूब जाऊँ, अग्निमें कूद पडूँ, विष खा लूँ अथवा गलेमें फाँसी लगाकर प्राण त्याग दूँ॥ ११—१६ १/२॥
विलप्यैवं रुरुस्तत्र विचार्य मनसा पुनः॥ १७<br><br>उपायं चिन्तयामास स्थितस्तस्मिन्नदीतटे।<br>मरणात्किं फलं मे स्यादात्महत्या दुरत्यया॥ १८<br><br>दुःखितश्च पिता मे स्याज्जननी चातिदुःखिता।<br>दैवस्तुष्टो भवेत्कामं दृष्ट्वा मां त्यक्तजीवितम्॥ १९<br><br>सर्वः प्रमुदितश्च स्यान्मत्क्षये नात्र संशयः।<br>उपकारः प्रियायाः कः परलोके भवेदपि॥ २०<br><br>मृते मय्यात्मघातेन विरहात्पीडितेऽपि च।<br>परलोके प्रिया सापि न मे स्यादात्मघातिनः॥ २१<br><br>एतदर्थं मृते दोषा मयि नैवामृते पुनः।इस प्रकार विलाप करके रुरु अपने मनमें विचारकर उस नदीके तटपर स्थित रहते हुए उपाय सोचने लगे। प्राण त्यागनेसे मुझे क्या लाभ होगा? आत्महत्याका फल तो अत्यन्त दुर्निवार्य होता है। [मेरी मृत्यु सुनकर] पिताजी दुःखी होंगे, माताजीको भी महान् कष्ट होगा। हाँ, हो सकता है कि मुझे मरा हुआ देखकर प्रारब्ध सन्तुष्ट हो जाय? मेरे मर जानेपर मेरे सभी शत्रु भी प्रसन्न होंगे, इसमें सन्देह नहीं है, किंतु इससे परलोकमें मेरी प्रियाका क्या उपकार होगा? इस प्रकार विरहसे सन्तप्त होकर आत्महत्या करके मेरे मर जानेपर भी परलोकमें मुझ आत्मघातीको मेरी वह प्रिया नहीं मिलेगी। इसलिये मेरे मरनेमें बहुत दोष हैं और न मरनेपर मुझे कोई दोष नहीं होगा॥ १७—२१ १/२॥
२२०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९

| विमृश्यैवं रुरुस्तत्र स्नात्वाचम्य शुचिः स्थितः॥ २२<br>अब्रवीद्वचनं कृत्वा जलं पाणावसौ मुनिः।<br>यन्मया सुकृतं किञ्चित्कृतं देवार्चनादिकम्॥ २३<br>गुरवः पूजिता भक्त्या हुतं जप्तं तपः कृतम्।<br>अधीतास्त्वखिला वेदा गायत्री संस्कृता यदि॥ २४<br>रविराराधितस्तेन सञ्जीवतु मम प्रिया।<br>यदि जीवेन्न मे कान्ता त्यजे प्राणानहं ततः॥ २५<br>इत्युक्त्वा तज्जलं भूमौ चिक्षेपाराध्य देवताः। | ऐसा सोचकर रुरु स्नान तथा आचमन करके पवित्र होकर वहींपर बैठ गये। इसके बाद उन मुनिने हाथमें जल लेकर यह वचन कहा—यदि मेरे द्वारा देवाराधन आदि कुछ भी पुण्य कर्म सम्पादित किया गया हो, यदि मैंने श्रद्धापूर्वक गुरुओंकी पूजा की हो; हवन, जप एवं तप किया हो, समस्त वेदोंका अध्ययन किया हो, गायत्रीकी उपासना की हो और सूर्यकी आराधना की हो तो उस पुण्यके प्रभावसे मेरी प्रिया जीवित हो जाय। यदि मेरी प्रिया जीवित नहीं होगी तो मैं प्राण त्याग दूँगा। ऐसा कहकर देवताओंका ध्यान करके उन्होंने वह जल जमीनपर छोड़ दिया॥ २२—२५ १/२॥ | | राजोवाच<br>एवं विलपतस्तस्य भार्यया दुःखितस्य च॥ २६<br>देवदूतस्तदाभ्येत्य वाक्यमाह रुरुं ततः। | राजा बोले—तदनन्तर इस प्रकार अपनी भार्याके लिये विलाप कर रहे उन दुःखित रुरुके पास एक देवदूत आकर यह वाक्य बोला॥ २६ १/२॥ | | देवदूत उवाच<br>माकार्षीः साहसं ब्रह्मन्कथं जीवेन्मृता प्रिया॥ २७<br>गतायुरेशा सुश्रोणी गन्धर्वाप्सरसोः सुता।<br>अन्यां कामय चार्वङ्गीं मृतेयं चाविवाहिता॥ २८<br>किं रोदिषि सुदुर्बुद्धे का प्रीतिस्तेऽनया सह। | देवदूत बोला—हे ब्रह्मन्! ऐसा साहस मत कीजिये। आपकी मरी हुई प्रियतमा भला कैसे जीवित हो सकेगी? गन्धर्व और अप्सराकी इस सुन्दर कन्याकी आयु समाप्त हो चुकी थी, जिससे यह अविवाहिता ही मर गयी; अतः अब आप किसी अन्य शुभ अंगोंवाली कन्याका वरण कर लीजिये। हे हतबुद्धि! आप क्यों रो रहे हैं? इसके साथ आपका कैसा प्रेम है?॥ २७-२८ १/२॥ | | रुरुरुवाच<br>देवदूत न चान्यां वै वरिष्याम्यहमङ्गनाम्॥ २९<br>यदि जीवेन्न जीवेद्वा मर्तव्यं चाधुना मया। | रुरु बोले—हे देवदूत! मैं किसी अन्य सुन्दरीका वरण नहीं करूँगा। यदि यह जीवित हो जाती है तो ठीक है, अन्यथा मैं इसी समय अपने प्राण त्याग दूँगा॥ २९ १/२॥ | | राजोवाच<br>विदित्वेति हठं तस्य देवदूतो मुदान्वितः॥ ३०<br>उवाच वचनं तथ्यं सत्यं चातिमनोहरम्।<br>उपायं शृणु विप्रेन्द्र विहितं यत्सुरैः पुरा॥ ३१<br>आयुषोऽर्धप्रदानेन जीवयाशु प्रमद्वराम्। | राजा बोले—उन मुनिका यह हठ देखकर देवदूतने प्रसन्न होकर तथ्यपूर्ण, सत्य तथा मनोहर वचन कहा—हे विप्रेन्द्र! देवताओंके द्वारा इसका पूर्वविहित उपाय मुझसे सुनिये। आप अपनी आयुका आधा भाग देकर अपनी प्रमद्वराको शीघ्र ही जीवित कर लीजिये॥ ३०-३१ १/२॥ | | रुरुरुवाच<br>आयुषोऽर्धं प्रयच्छामि कन्यायै नात्र संशयः॥ ३२<br>अद्य प्रत्यावृतप्राणा प्रोत्तिष्ठतु मम प्रिया।<br>विश्वावसुस्तदा तत्र विमानेन समागतः॥ ३३ | रुरु बोले—मैं निःसन्देह अपनी आयुका आधा भाग इस कन्याको दे रहा हूँ। अब मेरी प्रियतमाके प्राण वापस आ जायें और यह उठकर बैठ जाय। उसी समय विश्वावसु अपनी पुत्री प्रमद्वराकी मृत्यु |

| अ० ९ ] | द्वितीय स्कन्ध | २२१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ज्ञात्वा पुत्रीं मृतां चाशु स्वर्गलोकात्प्रमद्वराम्।<br>ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमः॥ ३४<br><br>धर्मराजमुपेत्येदं वचनं प्रत्यभाषताम्।<br>धर्मराज रुरोः पत्नी सुता विश्वावसोस्तथा॥ ३५<br><br>मृता प्रमद्वरा कन्या दष्टा सर्पेण चाधुना।<br>सा रुरोरायुषोऽर्धेन मर्तुकामस्य सूर्यज॥ ३६<br><br>समुत्तिष्ठतु तन्वङ्गी व्रतचर्याप्रभावतः।जान करके स्वर्गलोकसे विमानद्वारा शीघ्र ही वहाँ आ गये। तत्पश्चात् गन्धर्वराज विश्वावसु तथा उस श्रेष्ठ देवदूतने धर्मराजके पास पहुँचकर यह वचन कहा— हे धर्मराज! रुरुकी पत्नी तथा विश्वावसुकी पुत्री इस प्रमद्वरा नामक कन्याकी सर्पदंशके कारण इस समय मृत्यु हो गयी है। हे सूर्यतनय! इसके वियोगमें मरणके लिये उद्यत मुनि रुरुकी आधी आयु तथा उनकी तपस्याके प्रभावसे यह कोमलांगी जीवित हो जाय॥ ३२—३६ १/२॥
धर्म उवाच<br>विश्वावसुसुतां कन्यां देवदूत यदीच्छसि॥ ३७<br><br>उत्तिष्ठत्वायुषोऽर्धेन रुरुं गत्वा त्वमर्पय।धर्मराजने कहा— हे देवदूत! यदि तुम ऐसा चाहते हो तो उसकी आधी आयुसे विश्वावसुकी यह कन्या जीवित होकर उठ जाय और तुम जाकर इसे रुरुको समर्पित कर दो॥ ३७ १/२॥
राजोवाच<br>एवमुक्तस्ततो गत्वा जीवयित्वा प्रमद्वराम्॥ ३८<br><br>रुरोः समर्पयामास देवदूतस्त्वरान्वितः।<br>ततः शुभेऽह्नि विधिना रुरुणापि विवाहिता॥ ३९राजा बोले— धर्मराजके ऐसा कहनेपर देवदूतने जाकर प्रमद्वराको जीवित करके शीघ्र ही रुरुको समर्पित कर दिया और तत्पश्चात् रुरुने किसी शुभ दिन उसके साथ विधानपूर्वक विवाह कर लिया॥ ३८-३९॥
इत्थं चोपाययोगेन मृताप्युज्जीविता तदा।<br>उपायस्तु प्रकर्तव्यः सर्वथा शास्त्रसम्मतः॥ ४०इस प्रकार उपायका आश्रय लेकर मृत प्रमद्वराको भी जीवित कर लिया गया था। अतः मणि, मन्त्र तथा औषधियोंके विधिवत् प्रयोगद्वारा प्राणरक्षाके लिये शास्त्र-सम्मत उपाय अवश्य किया जाना चाहिये॥ ४० १/२॥
मणिमन्त्रौषधीभिश्च विधिवत्प्राणरक्षणे।<br>इत्युक्त्वा सचिवान् राजा कल्पयित्वा सुरक्षकान्॥ ४१<br><br>कार्यित्वाथ प्रासादं सप्तभूमिकमुत्तमम्।<br>आरुरोहोत्तरासूनुः सचिवैः सह तत्क्षणम्॥ ४२मन्त्रियोंसे यह कहकर उत्तम रक्षकोंकी व्यवस्था करके एक सात तलवाला उत्तम राजभवन बनवाकर उसी क्षण उत्तरापुत्र परीक्षित् अपने मन्त्रियोंके साथ उसपर चढ़ गये॥ ४१-४२॥
मणिमन्त्रधराः शूराः स्थापितास्तत्र रक्षणे।<br>प्रेषयामास भूपालो मुनिं गौरमुखं ततः॥ ४३<br><br>प्रसादार्थं सेवकस्य क्षमस्वेति पुनः पुनः।<br>ब्राह्मणान्सिद्धमन्त्रज्ञान् रक्षणार्थमितस्ततः॥ ४४उस भवनकी सम्यक् सुरक्षाके लिये मणि-मन्त्र-धारी वीरोंको नियुक्त किया गया और इसके बाद राजाने गौरमुखमुनिको [गविजातके पास उन्हें] प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे भेजा और कहलाया कि मुझ सेवकका अपराध वे बार-बार क्षमा करें। तत्पश्चात् राजाने मन्त्र-प्रयोगमें निपुण ब्राह्मणोंको रक्षा-कार्यके निमित्त चारों ओर नियुक्त कर दिया॥ ४३-४४॥
मन्त्रिपुत्रः स्थितस्तत्र स्थापयामास दन्तिनः।<br>न कश्चिदारुहेत्तत्र प्रासादे चातिरक्षिते॥ ४५एक मन्त्रिपुत्र वहाँ नियुक्त किया गया, जिसने महलके चारों ओर हाथियोंका घेरा स्थापित कराया ताकि विशेषरूपसे रक्षित उस महलपर कोई चढ़ न सके॥ ४५॥

अथ दशमोऽध्यायः

२२२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १०

| वातोऽपि न चरेत्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते।<br>भक्ष्यभोज्यादिकं राजा तत्रस्थश्च चकार सः॥ ४६<br>स्नानसन्ध्यादिकं कर्म तत्रैव विनिवर्त्य च।<br>राजकार्याणि सर्वाणि तत्रस्थश्चाकरोन्नृपः॥ ४७<br>मन्त्रिभिः सह सम्मन्त्र्य गणयन्दिवसानपि।<br>कश्चिच्च कश्यपो नाम ब्राह्मणो मन्त्रिसत्तमः॥ ४८<br>शुश्राव च तथा शापं प्राप्तं राज्ञा महात्मना।<br>स धनार्थी द्विजश्रेष्ठः कश्यपः समचिन्तयत्॥ ४९<br>व्रजामि तत्र यत्रास्ते शप्तो राजा द्विजेन ह।<br>इति कृत्वा मतिं विप्रः स्वगृहान्निःसृतः पथि॥ ५०<br>कश्यपो मन्त्रविद्विद्वान्धनार्थी मुनिसत्तमः॥ ५१ | महलके भीतर वायुका भी संचरण नहीं हो पाता था; क्योंकि उसका प्रवेश सर्वथा वर्जित था। राजा वहीं स्थित रहकर भोजनादि करने लगे। वहींपर रहते हुए स्नान एवं सन्ध्यादि कार्योंसे निवृत्त होकर राजा मन्त्रियोंसे मन्त्रणा करते तथा शापके दिन गिनते हुए समस्त राजकार्योंको संचालित करते थे॥ ४६-४७ १/२॥<br>इसी बीच किसी कश्यप नामक मन्त्र-विशेषज्ञ ब्राह्मणने सुना कि राजा परीक्षित्को [सर्पद्वारा काटे जानेका] शाप प्राप्त हुआ है। उस धनाभिलाषी ब्राह्मणश्रेष्ठ कश्यपने विचार किया कि मुनिके द्वारा शापित राजा इस समय जहाँ रह रहे हैं, मैं वहीं पर जाऊँगा। ऐसा निश्चय करके मन्त्रज्ञ, विद्वान् तथा धनाभिलाषी वह कश्यप नामक मुनिश्रेष्ठ विप्र अपने घरसे निकलकर रास्तेपर चल पड़ा॥ ४८-५१॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिद्राज्ञो गुप्तगृहे वासवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥


अथ दशमोऽध्यायः

महाराज परीक्षित्को डँसनेके लिये तक्षकका प्रस्थान, मार्गमें मन्त्रवेत्ता कश्यपसे भेंट, तक्षकका एक वटवृक्षको डँसकर भस्म कर देना और कश्यपका उसे पुनः हरा-भरा कर देना, तक्षकद्वारा धन देकर कश्यपको वापस कर देना, सर्पदंशसे राजा परीक्षित्की मृत्यु

सूत उवाचसूतजी बोले—
तस्मिन्नेव दिने नाम्ना तक्षकस्तं नृपोत्तमम्।<br>शप्तं ज्ञात्वा गृहात्तूर्णं निःसृतः पुरुषोत्तमः॥ १<br>वृद्धब्राह्मणवेषेण तक्षकः पथि निर्गतः।<br>अपश्यत्कश्यपं मार्गे व्रजन्तं नृपतिं प्रति॥ २[हे मुनिवृन्द!] उसी दिन तक्षक नामक नाग नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को शापित जानकर एक उत्तम मनुष्यका रूप धारण करके अपने घरसे शीघ्र निकल पड़ा। वृद्ध ब्राह्मणके वेषमें रास्तेपर चलते हुए उस तक्षकने महाराज परीक्षित्के यहाँ जाते हुए कश्यपको देखा॥ १-२॥
तमपृच्छत्पन्नगोऽसौ ब्राह्मणं मन्त्रवादिनम्।<br>क्व भवांस्त्वरितो याति किञ्च कार्यं चिकीर्षति॥ ३उस नागने उन मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणसे पूछा—आप इतनी शीघ्र गतिसे कहाँ चले जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करनेकी आपकी इच्छा है?॥ ३॥
कश्यप उवाचकश्यपने कहा—
परीक्षितं नृपश्रेष्ठं तक्षकश्च प्रधक्ष्यति।<br>तत्राहं त्वरितो यामि नृपं कर्तुमपज्वरम्॥ ४महाराज परीक्षित्को तक्षकनाग डँसनेवाला है। अतः मैं उन्हें विषमुक्त करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक वहीं जा रहा हूँ॥ ४॥
मन्त्रोऽस्ति मम विप्रेन्द्र विषनाशकरः किल।<br>जीवयिष्याम्यहं तं वै जीवितव्येऽधुना किल॥ ५हे विप्रेन्द्र! मेरे पास प्रबल विषनाशक मन्त्र है, अतएव यदि उनकी आयु शेष होगी तो मैं उन्हें जीवित कर दूँगा॥ ५॥
अ० १० ]द्वितीय स्कन्ध२२३
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
तक्षक उवाच<br>अहं स पन्नगो ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम्।<br>निवर्त्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम्॥ ६तक्षकने कहा—हे ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षकनाग हूँ और मैं ही महाराज परीक्षित्‌को काटूँगा। मेरे काट लेनेपर आप चिकित्सा करनेमें समर्थ नहीं हो सकेंगे; अतएव आप लौट जाइये॥ ६॥
कश्यप उवाच<br>अहं दष्टं त्वया सर्प नृपं शप्तं द्विजेन वै।<br>जीवयिष्याम्यसन्देहं कामं मन्त्रबलेन वै॥ ७कश्यपने कहा—हे सर्प! ब्राह्मणके द्वारा शापित किये गये राजाको आपके काटनेके उपरान्त मैं उन्हें अपने मन्त्रबलसे निःसन्देह जीवित कर दूँगा॥ ७॥
तक्षक उवाच<br>यदि त्वं जीवितुं यासि मया दष्टं नृपोत्तमम्।<br>मन्त्रशक्तिबलं विप्र दर्शय त्वं ममानघ॥ ८<br>धक्ष्याम्येनं च न्यग्रोधं विषदंष्ट्राभिरद्य वै।तक्षकने कहा—हे विप्र! हे अनघ! यदि आप मेरे काटे हुए नृपश्रेष्ठ परीक्षित्‌को जीवित करनेके लिये जा रहे हैं तो आप अपनी मन्त्र-शक्तिका प्रभाव दिखाइये। मैं इसी समय इस वटवृक्षको अपने विषैले दाँतोंसे डँसता हूँ॥ ८ १/२ ॥
कश्यप उवाच<br>जीवयिष्ये त्वया दष्टं दग्धं वा पन्नगोत्तम॥ ९कश्यपने कहा—हे सर्पश्रेष्ठ! आप इसे काट लें अथवा इसे जलाकर भस्म कर दें तो भी मैं इसे पुनः जीवित कर दूँगा॥ ९॥
सूत उवाच<br>अदशत्पन्नगो वृक्षं भस्मसाच्च चकार तम्।<br>उवाच कश्यपं भूयो जीवयैनं द्विजोत्तम॥ १०सूतजी बोले—नागराज तक्षकने उस वृक्षको डँस लिया और उसे जलाकर भस्म कर दिया। तब उसने कश्यपसे कहा—‘हे द्विजश्रेष्ठ! अब आप इसे पुनः जीवित कीजिये’॥ १०॥
दृष्ट्वा भस्मीकृतं वृक्षं पन्नगेन विषाग्निना।<br>सर्वं भस्म समाहृत्य कश्यपो वाक्यमब्रवीत्॥ ११<br>पश्य मन्त्रबलं मेऽद्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तम।<br>जीवयाम्यद्य वृक्षं वै पश्यतस्ते महाविष॥ १२तक्षकनागकी विषाग्निसे भस्म हुए वृक्षके सम्पूर्ण भस्मको एकत्र करके कश्यपने यह बात कही—हे महाविषधर नागराज! अब आप मेरे मन्त्रका प्रभाव देखिये। मैं आपके देखते-देखते इस वटवृक्षको जीवन प्रदान करता हूँ॥ ११-१२॥
इत्युक्त्वा जलमादाय कश्यपो मन्त्रवित्तमः।<br>सिषेच भस्मराशिं तं मन्त्रितेनैव वारिणा॥ १३<br>तद्वारिसेचनाज्जातो न्यग्रोधः पूर्ववच्छुभः।<br>विस्मयं तक्षकः प्राप्तो दृष्ट्वा तं जीवितं नगम्॥ १४ऐसा कहकर हाथमें जल लेकर मन्त्रविद् कश्यपने उस जलको अभिमन्त्रित किया और उसे भस्मराशिपर छिड़क दिया। जलके पड़ते ही वह वटवृक्ष पुनः पहलेकी भाँति सुन्दर हो गया। उस वृक्षको इस प्रकार जीवित देखकर तक्षकको बड़ा आश्चर्य हुआ॥ १३-१४॥
तमाह कश्यपं नागः किमर्थं ते परिश्रमः।<br>सम्पादयामि तं कामं ब्रूहि वाडव वाञ्छितम्॥ १५उस नागराजने कश्यपसे कहा—हे विप्र! आप इतना परिश्रम किसलिये करेंगे? आपकी वह कामना मैं ही पूर्ण कर दूँगा। कहिये, आप क्या चाहते हैं?॥ १५॥
कश्यप उवाच<br>वित्तार्थी नृपतिं मत्वा शप्तं पन्नग निःसृतः।<br>गृहादहं चोपकर्तुं विद्यया नृपसत्तमम्॥ १६कश्यपने कहा—हे पन्नग! मैं धनका अभिलाषी हूँ; नृपश्रेष्ठ परीक्षित्‌को शापित जानकर अपनी मन्त्रविद्यासे उनका उपकार करनेके लिये मैं अपने घरसे निकला हुआ हूँ॥ १६॥
२२४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १०

| तक्षक उवाच<br>वित्तं गृहाण विप्रेन्द्र यावदिच्छसि पार्थिवात्।<br>ददामि स्वगृहं याहि सकामोऽहं भवाम्यतः॥ १७ | तक्षकने कहा—हे विप्रवर ! राजासे जितना धन आप चाहते हैं, उतना धन मुझसे अभी ले लें और अपने घर लौट जायँ, जिससे मैं अपने कृत्यमें सफल हो सकूँ॥ १७॥ | | सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कश्यपः परमार्थवित्।<br>चिन्तयामास मनसा किं करोमि पुनः पुनः॥ १८<br><br>धनं गृहीत्वा स्वगृहं प्रयामि यद्यहं पुनः।<br>भविष्यति न मे कीर्तिर्लोके लोभसमाश्रयात्॥ १९<br><br>जीवितेऽथ नृपश्रेष्ठे कीर्तिः स्यादचला मम।<br>धनप्राप्तिश्च बहुधा भवेत्पुण्यं च जीवनात्॥ २० | सूतजी बोले—तक्षककी यह बात सुनकर परमार्थवेत्ता कश्यपजी मनमें बार-बार सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं धन लेकर अपने घर जाता हूँ तो धनलोलुप होनेके कारण संसारमें मेरी कीर्ति नहीं होगी। यदि राजा जीवित हो जाते हैं तो मेरी अचल कीर्ति होगी तथा धन-प्राप्तिके साथ-साथ पुण्य भी प्राप्त होगा॥ १८–२०॥ | | रक्षणीयं यशः कामं धिग्ध्नं यशसा विना।<br>सर्वस्वं रघुणा पूर्वं दत्तं विप्राय कीर्तये॥ २१<br><br>हरिश्चन्द्रेण कर्णेन कीर्त्यर्थं बहुविस्तरम्।<br>उपेक्ष्यं कथं भूपं दह्यमानं विषाग्निना॥ २२ | यश ही रक्षणीय है और बिना यशके धनको धिक्कार है; क्योंकि प्राचीन कालमें महाराज रघुने कीर्तिके लिये अपना सब कुछ ब्राह्मणको दे दिया था। सत्यवादी हरिश्चन्द्र तथा दानी कर्णने भी केवल कीर्तिके लिये बहुत कुछ किया था। अतः विषकी अग्निसे जलते हुए राजा परीक्षित्की उपेक्षा मैं कैसे करूँ?॥ २१-२२॥ | | जीवितेऽद्य मया राज्ञि सुखं सर्वजनस्य च।<br>अराजके प्रजानाशो भविता नात्र संशयः॥ २३ | यदि मैं महाराजको जिला दूँ तो सब लोगोंको अत्यन्त सुख मिलेगा और यदि राजा मर गये तो अराजकताके कारण सारी प्रजा नष्ट हो जायगी, इसमें सन्देह नहीं है॥ २३॥ | | प्रजानाशस्य पापं मे भविष्यति मृते नृपे।<br>अपकीर्तिश्च लोकेषु धनलोभाद्भविष्यति॥ २४ | राजाके मृत हो जाने पर मुझे प्रजानाशका पाप लगेगा तथा संसारमें धन-लोभके कारण मेरी अपकीर्ति भी होगी॥ २४॥ | | इति सञ्चिन्त्य मनसा ध्यानं कृत्वा स कश्यपः।<br>गतायुषं च नृपतिं ज्ञातवान्बुद्धिमत्तरः॥ २५ | मनमें ऐसा विचार करके परम बुद्धिमान् कश्यपने ध्यान करके जाना कि महाराज परीक्षित्की आयु अब समाप्त हो चुकी है॥ २५॥ | | आसन्नमृत्युं राजानं ज्ञात्वा ध्यानेन कश्यपः।<br>गृहं ययौ स धर्मात्मा धनमादाय तक्षकात्॥ २६ | इस प्रकार ध्यान-दृष्टिसे धर्मात्मा कश्यप राजाकी मृत्यु निकट जानकर तक्षकसे धन लेकर अपने घर लौट गये॥ २६॥ | | निवर्त्य कश्यपं सर्पः सप्तमे दिवसे नृपम्।<br>हन्तुकामो जगामाशु नगरं नागसाह्वयम्॥ २७ | कश्यपको लौटाकर वह नाग सातवें दिन राजाको डँसनेकी इच्छासे शीघ्र हस्तिनापुर चला गया॥ २७॥ | | शुश्राव नगरस्यान्ते प्रासादस्थं परीक्षितम्।<br>मणिमन्त्रौषधैः कामं रक्ष्यमाणमतन्द्रितम्॥ २८ | नगरमें पहुँचते ही उसने सुना कि मणि, मन्त्र तथा औषधियोंसे भलीभाँति सावधानीपूर्वक सुरक्षित होकर राजा परीक्षित् अपने महलमें रह रहे हैं॥ २८॥ |

अ० १०] द्वितीय स्कन्ध २२५

अ० १०] द्वितीय स्कन्ध २२५

चिन्ताविष्टस्तदा नागो विप्रशापभयाकुलः।<br>चिन्तयामास योगेन प्रविशेयं गृहं कथम्॥ २९<br><br>वञ्चयामि कथं चैनं राजानं पापकारिणम्।<br>विप्रशापादतं मूढं विप्रपीडाकरं शठम्॥ ३०[यह जानकर] ब्राह्मणके शापसे भयभीत सर्पराज तक्षकको बड़ी चिन्ता हुई। वह सोचने लगा कि अब मैं किस उपायसे इस राजभवनमें प्रवेश करूँ? और इस पापी, मूढ, विप्रको पीड़ित करनेवाले तथा मुनिके शापसे आहत इस दुष्ट राजाको मैं कैसे छलूँ?॥ २९-३०॥
पाण्डवानां कुले जातः कोऽपि नैतादृशो भवेत्।<br>तापसस्य गले येन मृतः सर्पो निवेशितः॥ ३१पाण्डववंशमें ऐसा कोई नहीं हुआ, जिसने इस प्रकार किसी तपस्वी ब्राह्मणके गलेमें मृत सर्प डाल दिया हो॥ ३१॥
कृत्वा विगर्हितं कर्म जानन्कालगतिं नृपः।<br>रक्षकान्भवने कृत्वा प्रासादमभिगम्य च॥ ३२<br><br>मृत्युं वञ्चयते राजा वर्ततेऽद्य निराकुलः।<br>तं कथं धक्ष्यिष्यामि विप्रवाक्येन चोदितः॥ ३३ऐसा निन्दित कर्म करके कालचक्रको जानते हुए भी यह राजा भवनमें रक्षकोंकी नियुक्ति करके राज-भवनमें छिपकर मृत्युकी वंचना कर रहा है और निश्चिन्त होकर पड़ा है। विप्रके शापानुसार मैं उस राजाको कैसे डसूँ?॥ ३२-३३॥
न जानाति च मन्दात्मा मरणं ह्यनिवर्तनम्।<br>तेनासौ रक्षकान्स्थाप्य सौधारूढोऽद्य मोदते॥ ३४यह मन्दबुद्धि इतना भी नहीं जानता कि मृत्यु तो अनिवार्य है? इसी कारण यह रक्षकोंकी नियुक्ति करके स्वयं भवनपर चढ़कर आनन्द ले रहा है॥ ३४॥
यदि वै विहितो मृत्युर्दैवेनामिततेजसा।<br>स कथं परिवर्तेत कृतैर्यत्नैस्तु कोटिभिः॥ ३५यदि अमित तेजवाले दैवने मृत्यु निश्चित कर दी है तो करोड़ों प्रकारके प्रयत्नोंसे भी उसे कैसे टाला जा सकता है?॥ ३५॥
पाण्डवस्य च दायादो जानन्मृत्युं गतं नृपः।<br>जीवने मतिमास्थाय स्थितः स्थाने निराकुलः॥ ३६पाण्डववंशका उत्तराधिकारी यह राजा परीक्षित् अपनेको मृत्युके मुखमें गया हुआ जानते हुए भी जीवित रहनेकी अभिलाषा रखकर सुरक्षित स्थानमें निश्चिन्त होकर पड़ा हुआ है॥ ३६॥
दानपुण्यादिकं राजा कर्तुमर्हति सर्वथा।<br>धर्मेण हन्यते व्याधिर्येनायुः शाश्वतं भवेत्॥ ३७यह यदि चाहता तो अनेक प्रकारके दान-पुण्य-द्वारा अपनी आयु बढ़ा सकता था; क्योंकि धर्माचरणसे व्याधि नष्ट होती है और उससे आयु स्थिर होती है॥ ३७॥
नोचेन्मृत्युविधिं कृत्वा स्नानदानादिकाः क्रियाः।<br>मरणं स्वर्गलोकाय नरकायान्धथा भवेत्॥ ३८यदि ऐसा सम्भव नहीं था तो मृत्युके समय सम्पन्न की जानेवाली स्नान, दान आदि क्रियाएँ करके मृत्युके अनन्तर स्वर्गयात्रा कर सकता था, अन्यथा इसे नरक जाना होगा॥ ३८॥
द्विजपीडाकृतं पापं पृथग्वास्य च भूपतेः।<br>विप्रशापस्तथा घोर आसन्ने मरणे किल॥ ३९मुनिको पीड़ा पहुँचानेका पाप इस राजाको था ही और ब्राह्मणका घोर शाप अलगसे है। अतः अब इसकी मृत्यु सन्निकट है॥ ३९॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 A

२२६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १०

| न कोऽपि ब्राह्मणः पार्श्वे य एनं प्रतिबोधयेत्।<br>वेधसा विहितो मृत्युरनिवार्यस्तु सर्वथा॥ ४० | इस समय ऐसा कोई ब्राह्मण भी इसके पास नहीं है, जो इसे यह बता सके कि विधाताके द्वारा निर्धारित मृत्यु सर्वथा अनिवार्य है॥ ४०॥ | | इति सञ्चिन्त्य सर्पोऽसौ स्वानागानिकटे स्थितान्।<br>कृत्वा तापसवेषांस्तानग्राहिणोत्सुभुजङ्गमान्॥ ४१<br><br>फलमूलादिकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः।<br>स्वयं च कीटरूपेण फलमध्ये ससार ह॥ ४२ | ऐसा विचारकर तक्षकनागने अपने निकटवर्ती श्रेष्ठ नागोंको तपस्वी ब्राह्मणोंका वेष धारण कराकर राजाके पास भेजा। वे राजाको देनेके लिये फल-मूल आदि लेकर तैयार हो गये और तक्षकनाग भी एक छोटे-से कीटके रूपमें फलके बीचमें छिप गया॥ ४१-४२॥ | | निर्गतास्ते तदा नागाः फलान्यादाय सत्वराः।<br>ते राजभवनं प्राप्य स्थिताः प्रासादसन्निधौ॥ ४३ | तब वे नाग फल आदि लेकर शीघ्र ही निकल पड़े और राजभवनमें पहुँचकर महलके पास खड़े हो गये॥ ४३॥ | | रक्षकास्तापसान्दृष्ट्वा पप्रच्छुस्तच्चिकीर्षितम्।<br>ऊचुस्ते भूपतिं द्रष्टुं प्राप्ताः स्मोऽद्य तपोवनात्॥ ४४ | इस प्रकार तपस्वियोंको खड़े देखकर रक्षकोंने उनसे पूछा कि आपलोगोंकी क्या इच्छा है? तब उन्होंने कहा—हमलोग महाराजको देखनेके लिये तपोवनसे आये हैं॥ ४४॥ | | अभिमन्युसुतं वीरं कुलार्कं चारुदर्शनम्।<br>परिवर्धयितुं प्राप्ता मन्त्रैराथर्वणैस्तथा॥ ४५ | पाण्डवकुलके सूर्य, शुभदर्शन तथा पराक्रमी अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित्को अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे आशीर्वाद देनेहेतु हमलोग यहाँ आये हैं॥ ४५॥ | | निवेदयध्वं राजानं दर्शनार्थगतान्मुनीन्।<br>कृत्वाभिषेकान्यास्यामो दत्त्वा मिष्टफलानि च॥ ४६ | आप जाकर महाराजसे कहें कि कुछ मुनिजन उनसे मिलने आये हैं और वे महाराजका मन्त्राभिषेक करके उन्हें मधुर फल देकर लौट जायेंगे॥ ४६॥ | | भारतानां कुले क्वापि न दृष्टा द्वाररक्षकाः।<br>न श्रुतं तापसानां तु राज्ञोऽसन्दर्शनं किल॥ ४७<br><br>आरोहामो वयं तत्र यत्र राजा परीक्षितः।<br>आशीर्भिर्वर्धयित्वैनं दत्ताज्ञाः प्रव्रजामहे॥ ४८ | भरतवंशी राजाओंके कुलमें कभी भी द्वाररक्षक नहीं देखे गये। ऐसा भी कहीं सुना नहीं गया कि तपस्वियोंको राजाका दर्शन न मिले। जहाँ महाराज परीक्षित् विराजमान हैं, वहाँ हमलोग जायँगे और उन्हें अपने आशीर्वादसे दीर्घायुष्य बनाकर आज्ञा लेकर लौट जायँगे॥ ४७-४८॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तेषां तापसानां तु रक्षकाः।<br>प्रत्युचुस्तान् द्विजान्मत्वा निदेशं भूपतेर्यथा॥ ४९<br><br>नाद्य वो दर्शनं विप्रा राज्ञः स्यादिति नो मतिः।<br>श्वः सर्वतापसैरत्र त्वागन्तव्यं नृपालये॥ ५० | सूतजी बोले—उन तपस्वियोंका वचन सुनकर रक्षकोंने उन्हें ब्राह्मण समझकर महाराजका आदेश सुनाते हुए कहा—हे विप्रो! हमारे विचारमें आज आपलोगोंको राजाका दर्शन नहीं हो सकेगा। अतः आप समस्त तपस्वीजन राजभवनमें कल पधारें॥ ४९-५०॥ | | अनारोहस्तु प्रासादो विप्राणां मुनिसत्तमाः।<br>विप्रशापभयाद्राज्ञा विहितोऽस्ति न संशयः॥ ५१ | हे मुनिश्रेष्ठो! विप्रशापसे भयभीत होकर राजाने अपने महलमें ब्राह्मणोंका प्रवेश वर्जित कर रखा है; इसमें संशय नहीं है॥ ५१॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 B

अ० १० ]द्वितीय स्कन्ध२२७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदोचुस्तानथो विप्राः फलमूलजलानि च।<br>विप्राशिषश्च राज्ञेऽथ ग्राहयन्तु सुरक्षकाः॥ ५२तब ब्राह्मणोंने उनसे कहा—हमलोगोंकी ओरसे ये फल-मूल तथा जल आप रक्षकगण राजाको दे दें और हमलोगोंका आशीर्वाद पहुँचा दें॥ ५२॥
ते गत्वा नृपतिं प्रोचुस्तापसानागताञ्जनाः।<br>राजोवाचानयध्वं वै फलमूलादिकं च यत्॥ ५३<br>पृच्छध्वं तापसान्कार्यं प्रातरागमनं पुनः।<br>प्रणामं कथयध्वं मे नाद्य सन्दर्शनं मम॥ ५४उन्होंने राजाके पास जाकर तपस्वियोंके आगमनकी बात बता दी। इसपर राजाने आज्ञा दी कि वे लोग फल-मूल आदि जो कुछ दे रहे हैं, उन्हें यहाँ लाओ और उन तपस्वियोंके आनेका कारण पूछ लो और उन्हें पुनः कल प्रातः आनेको कह दो। साथ ही मेरी ओरसे उन्हें प्रणाम कहकर यह भी कह देना कि आज मेरा मिलना सम्भव नहीं है॥ ५३-५४॥
ते गत्वाथ समादाय फलमूलादिकं च यत्।<br>राज्ञे समर्पयामासुर्बहुमानपुरःसरम्॥ ५५उन द्वारपालोंने तपस्वियोंके पास जाकर उनके दिये हुए फल-मूल आदि लाकर आदरपूर्वक राजाको अर्पित कर दिये॥ ५५॥
गतेषु तेषु नागेषु विप्रवेषावृतेषु च।<br>फलान्यादाय राजासौ सचिवानिदमब्रवीत्॥ ५६<br>सुहृदो भक्षयन्त्वद्य फलान्येतानि सर्वशः।<br>अद्याहं चैकमेतद्वै फलं विप्रार्पितं महत्॥ ५७उन विप्रवेषमें आये नागोंके चले जानेपर महाराजने फलोंको लेकर मन्त्रियोंसे कहा—हे सचिवो! आपलोग भी इन फलोंका सम्यक् सेवन कीजिये। मैं तो तपस्वियोंद्वारा अर्पित यही एक बड़ा फल खाऊँगा॥ ५६-५७॥
इत्युक्त्वा तत्फलं दत्त्वा सुहृद्भ्यश्चोत्तरासुतः।<br>करे कृत्वा फलं पक्वं ददार नृपतिः स्वयम्॥ ५८ऐसा कहकर उत्तरासुत राजा परीक्षित्ने सब फल अपने सुहृद् सचिवोंमें बाँट दिये और एक सुन्दर पका फल हाथमें लेकर उसे स्वयं विदीर्ण किया॥ ५८॥
विदारितं फलं राज्ञा तत्र कृमिरभूदणुः।<br>स कृष्णनयनस्ताम्रो दृष्टो भूपतिना स्वयम्॥ ५९<br>तं दृष्ट्वा नृपतिः प्राह सचिवान्विस्मितानथ।<br>अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम्॥ ६०<br>अङ्गीकरोमि तं शापं कृमिको मां दशत्वयम्।<br>एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संन्यवेशयत्॥ ६१<br>अस्तं याते दिनानाथे धृतः कण्ठेऽथ कीटकः।<br>तक्षकस्तु तदा जातः कालरूपी भयानकः॥ ६२जिस फलको राजाने चीरा, उसमें ताम्र वर्णवाला तथा काले नेत्रवाला एक छोटा-सा कीट राजाको दिखायी दिया। उसे देखकर राजाने अपने आश्चर्यचकित मन्त्रियोंसे कहा—सूर्य अस्त हो रहे हैं, अतः अब मुझे विषका भय नहीं है। मैं ब्राह्मणके उस शापको अंगीकार करता हूँ कि यह कीट मुझे काट ले। ऐसा कहकर महाराज परीक्षित्ने उसे अपने गलेपर रख लिया। सूर्यके अस्त होते ही गलेपर स्थित वह कीट साक्षात् कालस्वरूप भयानक तक्षकके रूपमें परिणत हो गया॥ ५९–६२॥
राजा संवेष्टितस्तेन दष्टश्चापि महीपतिः।<br>मन्त्रिणो विस्मयं प्राप्ता रुरुदुर्भृशदुःखिताः॥ ६३उस नागने तत्काल राजाको लपेट लिया तथा उन्हें डँस लिया। यह देखते ही सभी मन्त्री आश्चर्यमें पड़ गये और अत्यधिक दुःखित होकर विलाप करने लगे॥ ६३॥
घोररूपमहिं वीक्ष्य दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः।<br>चुक्रुशू रक्षकाः सर्वे हाहाकारो महानभूत्॥ ६४भयंकर रूपवाले उस सर्पको देखकर सभी सचिवगण भयभीत होकर वहाँसे भागने लगे और सभी रक्षकगण चिल्लाने लगे। इस प्रकार वहाँ महान् हाहाकार मच गया॥ ६४॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 C

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिन्मरणं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥

२२८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| वेष्टितो भोगिभोगेन विनष्टबहुपौरुषः।<br>नोवाच नृपतिः किञ्चिन्न चचालोत्तरासुतः॥ ६५ | उस सर्पके शरीरसे बद्ध हो जानेके कारण राजाका महान् बल प्रभावहीन हो गया, जिससे वे उत्तरापुत्र परीक्षित् कुछ भी बोल पाने तथा हिल-डुल सकनेमें असमर्थ हो गये॥ ६५॥ | | उत्थिताग्निशिखा घोरा विषजा तक्षकाननात्।<br>प्रजज्वाल नृपं त्वाशु गतप्राणं चकार ह॥ ६६ | तक्षकके मुखसे विषजनित भयंकर आगकी ज्वालाएँ उठने लगीं। उस भीषण ज्वालाने क्षणभरमें राजाको जला दिया और शीघ्र ही उन्हें निष्प्राण कर दिया॥ ६६॥ | | हत्वाशु जीवितं राज्ञस्तक्षको गगने गतः।<br>जगद्दग्धं तु कुर्वाणं ददृशुस्तं जना इह॥ ६७ | इस प्रकार क्षणमात्रमें ही राजाका प्राण हरकर वह तक्षकनाग आकाशमें चला गया। वहाँ लोगोंने संसारको भस्मसात् कर देनेकी सामर्थ्यवाले उस तक्षकको देखा॥ ६७॥ | | स पपात गतप्राणो राजा दग्ध इव द्रुमः।<br>चुक्रुशुश्च जनाः सर्वे मृतं दृष्ट्वा नराधिपम्॥ ६८ | वे राजा परीक्षित् प्राणहीन होकर जले हुए वृक्षकी भाँति गिर पड़े और राजाको मृत देखकर सभी लोग विलाप करने लगे॥ ६८॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिन्मरणं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥


अथैकादशोऽध्यायः

जनमेजयका राजा बनना और उत्तंककी प्रेरणासे सर्प-सत्र करना, आस्तीकके कहनेसे राजाद्वारा सर्प-सत्र रोकना

सूत उवाचसूतजी बोले—
गतप्राणं तु राजानं बालं पुत्रं समीक्ष्य च।<br>चक्रुश्च मन्त्रिणः सर्वे परलोकस्य सत्क्रियाः॥ १सभी मन्त्रियोंने राजा परीक्षित्‌को मृतक तथा उनके पुत्र जनमेजयको अबोध जानकर उनकी परलोक-सम्बन्धी क्रियाएँ सम्यक् प्रकारसे सम्पन्न कीं॥ १॥
गङ्गातीरे दग्धदेहं भस्मप्रायं महीपतिम्।<br>अगरुभिश्चाभियुक्तायां चितायामध्यरोपयन्॥ २शरीर दग्ध हो जानेसे भस्मीभूत हुए राजाको उन मन्त्रियोंने गंगाके किनारे अगरुसे बनायी गयी चितापर रखा॥ २॥
दुर्मरणे मृतस्यास्य चक्रुश्चैवोर्ध्वदैहिकीम्।<br>क्रियां पुरोहितास्तस्य वेदमन्त्रैर्विधानतः॥ ३अकालमृत्युको प्राप्त राजा परीक्षित्‌की और्ध्वदैहिक क्रिया राजाके पुरोहितोंद्वारा वैदिक मन्त्रोंके साथ विधिवत् सम्पन्न की गयी॥ ३॥
ददुर्दानानि विप्रेभ्यो गाः सुवर्णं यथोचितम्।<br>अन्नं बहुविधं तत्र वस्त्राणि विविधानि च॥ ४मन्त्रियोंने ब्राह्मणोंको गायें, सुवर्ण, अनेक प्रकारके अन्न तथा नाना प्रकारके वस्त्र यथोचित रूपसे दानमें दिये॥ ४॥
सुमुहूर्ते सुतं बालं प्रजानां प्रीतिवर्धनम्।<br>सिंहासने शुभे तत्र मन्त्रिणः संन्यवेशयन्॥ ५तत्पश्चात् मन्त्रियोंने प्रजाओंके प्रति प्रीति-सम्वर्धन करनेवाले राजपुत्र जनमेजयको शुभ मुहूर्तमें सुन्दर राजसिंहासनपर आसीन किया॥ ५॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 D

अ० ११]द्वितीय स्कन्ध२२९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पौरा जानपदा लोकाश्चक्रुस्तं नृपतिं शिशुम्।<br>जनमेजयनामानं राजलक्षणसंयुतम्॥ ६पुरवासी तथा जनपदवासी प्रजाओंने राजलक्षणोंसे सम्पन्न जनमेजय नामक उस बालकको अपने राजाके रूपमें स्वीकार किया॥ ६॥
धात्रेयी शिक्षयामास राजचिह्नानि सर्वशः।<br>दिने दिने वर्धमानः स बभूव महामतिः॥ ७राजकुमारकी धात्रीने उन्हें सब प्रकारके राजोचित गुणोंकी शिक्षा दी। इस प्रकार दिन-प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होते हुए वे महान् बुद्धिमान् हो गये॥ ७॥
प्राप्ते चैकादशे वर्षे तस्मै कुलपुरोहितः।<br>यथोचितां ददौ विद्यां जग्राह स यथोचिताम्॥ ८उनकी ग्यारह वर्षकी अवस्था होनेपर कुल-पुरोहितने उन्हें यथोचित शिक्षा प्रदान की और उन्होंने उसे सम्यक् रूपसे ग्रहण किया॥ ८॥
धनुर्वेदं कृपः पूर्णं ददावस्मै सुसंस्कृतम्।<br>अर्जुनाय यथा द्रोणः कर्णाय भार्गवो यथा॥ ९जिस प्रकार द्रोणाचार्यने अर्जुनको तथा भार्गव परशुरामने कर्णको धनुर्विद्यामें प्रशिक्षित किया, उसी प्रकार कृपाचार्यने जनमेजयको भलीभाँति परिष्कृत धनुर्विद्या प्रदान की॥ ९॥
सम्प्राप्तविद्यो बलवान्बभूव दुरतिक्रमः।<br>धनुर्वेदे तथा वेदे पारगः परमार्थवित्॥ १०इस प्रकार सम्पूर्ण विद्या प्राप्त करके वे जनमेजय वेद तथा धनुर्वेदमें पूर्ण पारंगत, बलशाली, अपराजेय तथा परमार्थवेत्ता हो गये॥ १०॥
धर्मशास्त्रार्थकुशलः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>चकार राज्यं धर्मात्मा पुरा धर्मसुतो यथा॥ ११वे धर्मशास्त्रके अर्थोंका विवेचन करनेमें कुशल, सत्यनिष्ठ, इन्द्रियजित् और धर्मात्मा थे। उन्होंने पूर्वमें धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरकी भाँति राज्य-शासन किया॥ ११॥
ततः सुवर्णवर्माख्यो राजा काशिपतिः किल।<br>वपुष्टमां शुभां कन्यां ददौ पारीक्षिताय च॥ १२इसके बाद सुवर्णवर्मा नामवाले काशिपति राजाने शुभ गुणोंवाली अपनी कन्या वपुष्टमाका पाणिग्रहण जनमेजयके साथ सम्पन्न कर दिया॥ १२॥
स तां प्राप्यासितापाङ्गीं मुमुदे जनमेजयः।<br>काशिराजसुतां कान्तां प्राप्य राजा यथा पुरा॥ १३<br><br>विचित्रवीर्यो मुमुदे सुभद्रां च यथार्जुनः।<br>विजहार महीपालो वनेषूपवनेषु च॥ १४<br><br>तया कमलपत्राक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा।<br>प्रजास्तस्य सुसन्तुष्टा बभूवुः सुखलालिताः॥ १५<br><br>मन्त्रिणः कर्मकुशलाश्चक्रुः कार्याणि सर्वशः।जिस प्रकार प्राचीन कालमें काशिराजकी पुत्रीको पाकर विचित्रवीर्य तथा सुभद्राको पाकर अर्जुन अत्यन्त आह्लादित हुए थे, उसी प्रकार उस श्याम नयनोंवालीको अपनी कान्ताके रूपमें पाकर जनमेजय अति प्रसन्न हुए। कमलपत्रके समान नेत्रोंवाली उस वपुष्टमाके साथ वनों और उपवनोंमें राजा जनमेजय उसी प्रकार विहार करने लगे जिस प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र। उनके द्वारा सुखपूर्वक रक्षित प्रजा अति सन्तुष्ट थी। जनमेजयके कार्यकुशल सभी मन्त्री समस्त कार्योंको सम्यक् प्रकारसे करते थे॥ १३-१५ १/२॥
२३०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| एतस्मिन्नेव काले तु मुनिरुत्तङ्कनामकः ॥ १६<br>तक्षकेण परिक्लिष्टो हस्तिनापुरमभ्यगात्।<br>वैरस्यापचितिं कोऽस्य प्रकुर्यादिति चिन्तयन् ॥ १७<br>परीक्षितसुतं मत्वा तं नृपं समुपागतः।<br>कार्याकार्यं न जानासि समये नृपसत्तम ॥ १८<br>अकर्तव्यं करोष्यद्य कर्तव्यं न करोषि वै।<br>किं त्वां सम्प्रार्थयाम्यद्य गतामर्षं निरुद्यमम् ॥ १९<br>अवैर्ज्ञमतन्त्रज्ञं बालचेष्टासमन्वितम्। | इसी समय तक्षकके द्वारा पीड़ित उतंक नामक मुनिका हस्तिनापुरमें आगमन हुआ। 'इस सर्पकी शत्रुताका बदला कौन ले सकता है'—ऐसा सोचते हुए वे परीक्षित्-पुत्र जनमेजयको यह कार्य कर सकनेवाला समझकर उनके पास आये और बोले—हे भूपवर! आपको यह ज्ञान नहीं है कि इस समय क्या करणीय है और क्या अकरणीय है? आप इस समय न करनेयोग्य कार्य कर रहे हैं और करनेयोग्य कार्य नहीं कर रहे हैं। आपसदृश रोषहीन, पुरुषार्थरहित, वैरभावके ज्ञानसे शून्य, प्रतीकार आदि उपायोंको न जाननेवाले तथा बालकोंके समान स्वभाववाले राजासे अब मैं क्या कहूँ? ॥ १६–१९ १/२ ॥ | | जनमेजय उवाच<br>किं वैरं न मया ज्ञातं न किं प्रतिकृतं मया ॥ २०<br>तद्वद त्वं महाभाग करोमि यदनन्तरम्। | जनमेजय बोले—मैंने किस शत्रुताको नहीं जाना और उसका प्रतीकार नहीं किया? हे महाभाग! आप मुझे वह बतायें, जिससे मैं उसे सम्पन्न कर सकूँ॥ २० १/२ ॥ | | उत्तङ्क उवाच<br>पिता ते निहतो भूप तक्षकेण दुरात्मना ॥ २१<br>मन्त्रिणस्त्वं समाहूय पृच्छ स्वपितृनाशनम्। | उत्तंक बोले—हे राजन्! आपके पिता परीक्षित् दुष्टात्मा तक्षकनागद्वारा मार डाले गये थे। आप मन्त्रियोंको बुलाकर अपने पिताकी मृत्युके विषयमें पूछिये॥ २१ १/२ ॥ | | सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राजा पप्रच्छ मन्त्रिसत्तमान् ॥ २२<br>ऊचुस्ते द्विजशापेन दष्टः सर्पेण वै मृतः। | सूतजी बोले—उतंकका वचन सुनकर राजाने मन्त्रिप्रवरोंसे पूछा। तब उन्होंने बताया कि ब्राह्मणद्वारा शापित होनेके कारण एक सर्पने उन्हें डँस लिया और वे मर गये॥ २२ १/२ ॥ | | जनमेजय उवाच<br>शापोऽत्र कारणं राज्ञः शप्तस्य मुनिना किल ॥ २३<br>तक्षकस्य तु को दोषो ब्रूहि मे मुनिसत्तम। | जनमेजय बोले—मेरे पिता राजा परीक्षित्की मृत्युका कारण तो मुनिद्वारा प्रदत्त शाप था। हे मुनिश्रेष्ठ! मुझे यह बताइये कि इसमें तक्षकका क्या दोष था?॥ २३ १/२ ॥ | | उत्तङ्क उवाच<br>तक्षकेण धनं दत्त्वा कश्यपः सन्निवारितः ॥ २४<br>न स किं तक्षको वैरी पितृहा तव भूपते।<br>भार्या रुरोः पुरा भूप दष्टा सर्पेण सा मृता ॥ २५<br>अविवाहिता तु मुनिना जीविता च पुनः प्रिया।<br>रुरुणापि कृता तत्र प्रतिज्ञा चातिदारुणा ॥ २६ | उत्तंक बोले—तक्षकने कश्यप नामक ब्राह्मणको धन देकर आपके पितातक पहुँचनेसे रोक दिया था। हे राजन्! आपके पिताका हन्ता वह तक्षक क्या आपका शत्रु नहीं है? हे भूप! प्राचीन कालमें मुनि रुरुकी भार्याको सर्पने डँस लिया था और वह मर गयी थी। वह अविवाहिता थी। मुनि रुरुने अपनी उस प्रियाको पुनः जीवित कर दिया और उन्होंने वहींपर |

अ० ११] द्वितीय स्कन्ध २३१

अ० ११] द्वितीय स्कन्ध २३१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यं यं सर्प प्रपश्यामि तं तं हन्यायुधेन वै।<br>एवं कृत्वा प्रतिज्ञां स शस्त्रपाणी रुरुस्तदा ॥ २७<br>व्यचरत्पृथिवीं राजन्निघ्नन्सर्पान्यतस्ततः।<br>एकदा स वने घोरं डुण्डुभं जरसान्वितम् ॥ २८<br>अपश्यद्दण्डमुद्यम्य हन्तुं तं समुपाययौ।<br>अभ्यहन् रुषितो विप्रस्तमुवाचाथ डुण्डुभः ॥ २९<br>नापराध्नोमि ते विप्र कस्मान्मामभिहंसि वै।अत्यन्त भीषण प्रतिज्ञा की कि मैं जिस किसी भी सर्पको देखूँगा, उसे तत्काल आयुधसे मार डालूँगा। हे राजन्! इस प्रकार प्रतिज्ञा करके हाथमें शस्त्र लेकर मुनि रुरु सर्पोंका वध करते हुए इधर-उधर घूमते रहे। एक बार उन्हें वनमें एक बूढ़ा डुंडुभ साँप दिखायी दिया। वे लाठी उठाकर रोषपूर्वक उसे मारनेके लिये तत्पर हुए, तब डुंडुभने उन ब्राह्मणसे कहा— हे विप्र! मैं आपके प्रति कोई अपराध नहीं कर रहा हूँ, तो फिर आप मुझे क्यों मार रहे हैं?॥ २४—२९ १/२ ॥
रुरुरुवाच<br>प्राणप्रिया मे दयिता दष्टा सर्पेण सा मृता॥ ३०<br>प्रतिज्ञेयं तदा सर्प दुःखितेन मया कृता।**रुरु बोले—**मेरी प्राणप्रिया भार्याको सर्पने डँस लिया था और उसकी मृत्यु हो गयी थी। अतः हे सर्प! उसी समयसे दुःखित होकर मैंने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली थी॥ ३० १/२ ॥
डुण्डुभ उवाच<br>नाहं दशामि तेऽन्ये वै ये दशन्ति भुजङ्गमाः ॥ ३१<br>शरीरसमयोगेन न मां हिंसितुमर्हसि।**डुंडुभ बोला—**मैं किसीको काटता नहीं। जो सर्प काटते हैं, वे दूसरे होते हैं। इसलिये सर्पसदृश शरीर होनेके कारण मुझे आप मत मारिये॥ ३१ १/२ ॥
उत्तङ्क उवाच<br>श्रुत्वा तां मानुषीं वाणीं सर्पेणोक्तां मनोहराम् ॥ ३२<br>रुरुः पप्रच्छ कोऽसि त्वं कस्माद् डुण्डुभतां गतः।**उत्तंक बोले—**मनुष्यके समान उसकी सुन्दर वाणी सुनकर रुरुने पूछा—तुम कौन हो? और डुंडुभयोनिको कैसे प्राप्त हो गये?॥ ३२ १/२ ॥
सर्प उवाच<br>ब्राह्मणोऽहं पुरा विप्र सखा मे खगमाभिधः ॥ ३३<br>विप्रो धर्मभृतां श्रेष्ठः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>स मया वञ्चितो मौर्ख्यात्सर्पं कृत्वा च तार्णकम् ॥ ३४**सर्प बोला—**हे विप्र! पहले मैं ब्राह्मण था और ‘खगम’ नामका मेरा एक ब्राह्मण मित्र था। वह धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय था। एक बार अपनी मूर्खतावश मैंने तृणका सर्प बनाकर उसे धोखेमें डाल दिया॥ ३३-३४॥
भयं च प्रापितोऽत्यर्थमग्निहोत्रगृहे स्थितः।<br>तेन भीतेन शप्तोऽहं विह्वलेनातिवेपिना ॥ ३५<br>भव सर्पो मन्दबुद्धे येनाहं धर्षितस्त्वया।<br>मया प्रसादितोऽत्यर्थं सर्पेणासौ द्विजोत्तमः ॥ ३६<br>मामुवाचाथ तत्क्रोधात्किञ्चिच्छान्तिमवाप्य च।<br>रुरुस्ते मोचिता शापस्यास्य सर्प भविष्यति ॥ ३७<br>प्रमतेस्तु सुतो नूनमिति मां सोऽब्रवीद्वचः।<br>सोऽहं सर्पो रुरुस्त्वं च शृणु मे परमं वचः ॥ ३८उस समय वह अग्निहोत्रगृहमें विद्यमान था, सर्पको देखकर अत्यन्त डर गया। भयसे थर-थर काँपते हुए उस ब्राह्मणने विह्वल होकर मुझे शाप दे दिया—हे मन्दबुद्धि! तुमने सर्प दिखाकर मुझे डराया है, अतः तुम सर्प हो जाओ। सर्परूपमें मैंने उस ब्राह्मणकी बड़ी प्रार्थना की। तब उस ब्राह्मणने क्रोधसे थोड़ा शान्त होनेपर मुझसे कहा—हे सर्प! प्रमतिपुत्र रुरु तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे। उन्होंने यह बात स्वयं मुझसे कही थी। मैं वही सर्प हूँ और आप रुरु हैं। आप मेरे वचनको ध्यानपूर्वक सुनिये—ब्राह्मणोंके
२३२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| अहिंसा परमो धर्मो विप्राणां नात्र संशयः।<br>दया सर्वत्र कर्तव्या ब्राह्मणेन विजानता॥ ३९<br>यज्ञादन्यत्र विप्रेन्द्र न हिंसा याज्ञिकी मता। | लिये अहिंसा परम धर्म है, इसमें सन्देह नहीं। अतः विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि वह सर्वत्र दया करे। हे विप्रवर! यज्ञसे अतिरिक्त कहीं भी की गयी हिंसा याज्ञिकी हिंसा नहीं कही गयी है॥ ३५-३९ १/२ ॥ | | उत्तङ्क उवाच | उत्तंक बोले— | | सर्पयोनेर्विनिर्मुक्तो ब्राह्मणोऽसौ रुरुस्ततः॥ ४०<br>कृत्वा तस्य च शापान्तं परित्यक्तं च हिंसनम्।<br>विवाहिता तेन बाला मृता सञ्जीविता पुनः॥ ४१ | तब वह ब्राह्मण सर्पयोनिसे मुक्त हो गया। इस प्रकार उस ब्राह्मणके शापका अन्त करके रुरुने भी हिंसा छोड़ दी। उन्होंने मरी हुई उस सुन्दरीको पुनः जीवित कर दिया और उसके साथ विवाह कर लिया॥ ४०-४१॥ | | कदनं सर्वसर्पाणां कृतं वैरमनुस्मरन्।<br>त्वं तु वैरं समुत्सृज्य वर्तसे पन्नगेष्वथ॥ ४२<br>विमन्युर्भरतश्रेष्ठ पितृघातकरेषु वै।<br>अन्तरिक्षे मृतस्तातः स्नानदानविवर्जितः॥ ४३<br>तस्योद्धारं च राजेन्द्र कुरु हत्वाथ पन्नगान्।<br>पितुर्वैरं न जानाति जीवन्नेव मृतो हि सः॥ ४४<br>दुर्गतिस्ते पितुस्तावद्यावत्तान्न हनिष्यसि।<br>अम्बामखमिशं कृत्वा कुरु यज्ञं नृपोत्तम॥ ४५<br>सर्पसत्रं महाराज पितुर्वैरमनुस्मरन्। | हे राजन्! उस मुनिने इस प्रकार शत्रुताका स्मरण करते हुए सभी सर्पोंका संहार किया था, परंतु हे भरतश्रेष्ठ! आप तो वैर भूलकर अपने पिताको मारनेवाले सर्पोंके प्रति क्रोधशून्य बने रहते हैं। आपके पिता स्नान-दान किये बिना अन्तरिक्षमें ही मर गये। इसलिये हे राजेन्द्र! सर्पोंका नाश करके आप उनका उद्धार कीजिये। जो पुत्र पिताके शत्रुओंसे बदला नहीं लेता, वह जीते हुए भी मृतकवत् है। हे नृपश्रेष्ठ! जबतक आप सर्पोंका विनाश नहीं करते, तबतक आपके पिताकी दुर्गति ही रहेगी। हे महाराज! आप देवीयज्ञके व्याजसे अपने पिताकी शत्रुताका स्मरण करते हुए सर्पसत्र नामक यज्ञ कीजिये॥ ४२—४५ १/२ ॥ | | सूत उवाच | सूतजी बोले— | | इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा जन्मेजयस्तदा॥ ४६<br>नेत्राभ्यामश्रुपातं च चकारातीव दुःखितः।<br>धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धेर्वृथा मानकरस्य वै॥ ४७<br>पिता यस्य गतिं घोरां प्राप्तः पन्नगपीडितः।<br>अद्याहं मखमारभ्य करोम्यपचितिं पितुः॥ ४८<br>हत्वा सर्पानसन्दिग्धो दीप्यमाने विभावसौ। | उत्तंकमुनिका यह वचन सुनकर राजा जनमेजय अत्यन्त दुःखी हुए और उनके नेत्रोंसे अश्रुपात होने लगा। [वे मनमें सोचने लगे] जिसके पिता सर्पसे दंशित होकर इस प्रकार गतिको प्राप्त हों, उस मुझ मिथ्याभिमानी तथा दुर्बुद्धिको धिक्कार है। मैं आज ही यज्ञ आरम्भ करके प्रज्वलित अग्निमें सर्पोंकी आहुति देकर अवश्य ही पिताकी मृत्युका बदला लूँगा॥ ४६—४८ १/२ ॥ | | आहूय मन्त्रिणः सर्वान् राजा वचनमब्रवीत्॥ ४९<br>कुर्वन्तु यज्ञसम्भारं यथार्हं मन्त्रिसत्तमाः।<br>गङ्गातीरे शुभां भूमिं मापयित्वा द्विजोत्तमैः॥ ५० | सभी मन्त्रियोंको बुलाकर राजाने यह वचन कहा—हे मन्त्रिप्रवरो! गंगाके किनारे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे उत्तम भूमिकी माप कराकर आपलोग यथोचित यज्ञसामग्रीका प्रबन्ध करें। हे मेरे बुद्धिमान् मन्त्रियो! सौ खंभोंवाले एक सुरम्य मण्डपका निर्माण कराकर |

अ० ११]द्वितीय स्कन्ध२३३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुर्वन्तु मण्डपं स्वस्थाः शतस्तम्भं मनोहरम्।<br>वेदी यज्ञस्य कर्तव्या ममाद्य सचिवाः खलु॥ ५१<br><br>तदङ्गत्वे विधेयो वै सर्पसत्रः सुविस्तरः।<br>तक्षकस्तु पशुस्तत्र होतोत्तङ्को महामुनिः॥ ५२<br><br>शीघ्रमाहूयतां विप्राः सर्वज्ञा वेदपारगाः।आपलोग उसमें आज ही यज्ञके लिये वेदीका भी निर्माण सम्पन्न करा लें। उस यज्ञके अंगरूपमें विस्तारसहित सर्पसत्र भी करना है। महामुनि उतंक उस यज्ञके होता होंगे और तक्षकनाग उसमें यज्ञपशु होगा। आपलोग शीघ्र ही सर्वज्ञाता एवं वेदपारगामी ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करें॥ ४९—५२ १/२॥
सूत उवाच<br>मन्त्रिणस्तु तदा चक्रुर्भूपवाक्यैर्विचक्षणाः॥ ५३<br><br>यज्ञस्य सर्वसम्भारं वेदीं यज्ञस्य विस्तृताम्।<br>हवने वर्तमाने तु सर्पाणां तक्षको गतः॥ ५४<br><br>इन्द्रं प्रति भयार्तोऽहं त्राहि मामिति चाब्रवीत्।<br>भयभीतं समाश्वास्य स्वासने सन्निवेश्य च॥ ५५**सूतजी बोले—**बुद्धिमान् मन्त्रियोंने राजाके कथनानुसार यज्ञसम्बन्धी समस्त सामग्रीका प्रबन्ध कर लिया और विस्तृत यज्ञवेदी भी निर्मित करायी। सर्पोंका हवन आरम्भ होनेपर तक्षक इन्द्रके यहाँ गया और उनसे बोला—मैं भयाकुल हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। तत्पश्चात् इन्द्रने उस भयभीत तक्षकको सान्त्वना देकर अपने आसनपर बैठाकर उसे अभय प्रदान किया और कहा—हे पन्नग! तुम निर्भय हो जाओ॥ ५३—५५ १/२॥
ददावभयमत्यर्थं निर्भयो भव पन्नग।<br>तमिन्द्रशरणं ज्ञात्वा मुनिर्दत्ताभयं तथा॥ ५६<br><br>उत्तङ्कोऽह्वयदुद्विग्नः सेन्द्रं कृत्वा निमन्त्रणम्।<br>स्मृतस्तदा तक्षकेण यायावरकुलोद्भवः॥ ५७<br><br>आस्तीको नाम धर्मात्मा जरत्कारुसुतो मुनिः।<br>तत्रागत्य मुनेर्बालस्तुष्टाव जनमेजयम्॥ ५८तदनन्तर उतंकमुनि उस तक्षकको इन्द्रका शरणागत और उनसे अभयदान पाया हुआ जानकर उद्विग्न हो उठे और उन्होंने मन्त्रप्रभावसे इन्द्रसहित तक्षकका आवाहन किया। तब तक्षकने यायावरवंशमें उत्पन्न जरत्कारुपुत्र धर्मनिष्ठ आस्तीक-नामक मुनिका स्मरण किया। वे मुनिबालक आस्तीक वहाँ आकर जनमेजयकी प्रशंसा करने लगे॥ ५६—५८॥
राजा तमर्चयामास दृष्ट्वा बालं सुपण्डितम्।<br>अर्चयित्वा नृपस्तं तु छन्दयामास वाञ्छितैः॥ ५९राजा जनमेजयने उस बालकको महान् पण्डित देखकर उसकी पूजा की। पूजन-अर्चन करके राजाने अपनी मनोवांछित वस्तु माँगनेके लिये उससे निवेदन किया॥ ५९॥
स तु वव्रे महाभाग यज्ञोऽयं विरमत्विति।<br>सत्यबद्धो नृपस्तेन प्रार्थितश्च पुनस्तथा॥ ६०तब आस्तीकने याचना की—हे महाभाग! इस यज्ञको समाप्त किया जाय। उसने सत्य वचनमें आबद्ध राजासे बार-बार ऐसी प्रार्थना की॥ ६०॥
होमं निवर्तयामास सर्पाणां मुनिवाक्यतः।<br>भारतं श्रावयामास वैशम्पायन विस्तरात्॥ ६१तत्पश्चात् मुनिके वचनानुसार राजाने सर्पोंका हवन बन्द कर दिया और फिर वैशम्पायनऋषिने उन्हें विस्तारपूर्वक महाभारतकी कथा सुनायी॥ ६१॥
श्रुत्वापि नृपतिः कामं न शान्तिमभिजग्मिवान्।<br>व्यासं पप्रच्छ भूपालो मम शान्तिः कथं भवेत्॥ ६२उस कथाको सुनकर भी राजाको विशेष शान्ति नहीं प्राप्त हुई तब राजाने व्यासजीसे पूछा—मुझे किस प्रकार शान्ति मिलेगी? मेरा मन अशान्तिकी

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे<br>सर्पसत्रवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

२३४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १२

| मनोऽतिदह्यते कामं किं करोमि वदस्व मे।<br>पिता मे दुर्भगस्यैव मृतः पार्थसुतात्मजः ॥ ६३<br><br>क्षत्रियाणां महाभाग सङ्ग्रामे मरणं वरम्।<br>रणे वा मरणं व्यास गृहे वा विधिपूर्वकम् ॥ ६४<br><br>मरणं न पितुर्मेऽभूदन्तरिक्षे मृतोऽवशः।<br>शान्त्युपायं वदस्वात्र त्वं च सत्यवतीसुत ॥ ६५<br>यथा स्वर्गं व्रजेदाशु पिता मे दुर्गतिं गतः ॥ ६६ | अग्निमें अत्यधिक दग्ध हो रहा है, मैं क्या करूँ ? मुझको बतलाइये। मुझ मन्दभाग्यके पिता और अर्जुनपौत्र परीक्षित् अकाल-मृत्युको प्राप्त हुए हैं। हे महाभाग ! युद्धमें होनेवाली मृत्यु ही क्षत्रियोंके लिये श्रेष्ठ होती है। हे व्यासजी ! रणमें अथवा घरमें विधिपूर्वक होनेवाली मृत्यु ही अच्छी मानी जाती है, किंतु मेरे पिताका वैसा मरण नहीं हुआ। वे तो असहाय अवस्थामें अन्तरिक्षमें मृत्युको प्राप्त हुए। हे सत्यवतीपुत्र ! आप उनकी शान्ति-प्राप्तिका कोई उपाय बतलाइये, जिससे दुर्गति को प्राप्त मेरे पिताजी शीघ्र ही स्वर्ग चले जायँ॥ ६२—६६॥ |

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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे<br>सर्पसत्रवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥


अथ द्वादशोऽध्यायः

आस्तीकमुनिके जन्मकी कथा, कद्रू और विनताद्वारा सूर्यके घोड़ेके रंगके विषयमें शर्त लगाना और विनताको दासीभावकी प्राप्ति, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप

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सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच वचनं तत्र सभायां नृपतिं च तम् ॥ १**सूतजी बोले—**राजा जनमेजयका वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासने सभामें उन राजासे कहा—॥ १॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुराणं गुह्यमद्भुतम्।<br>पुण्यं भागवतं नाम नानाख्यानयुतं शिवम् ॥ २**व्यासजी बोले—**हे राजन् ! सुनिये, मैं आपसे एक पुनीत, कल्याणकारक, रहस्यमय, अद्भुत तथा विविध कथानकोंसे युक्त देवीभागवत नामक पुराण कहूँगा॥ २॥
अध्यापितं मया पूर्वं शुकायात्मसुताय वै।<br>श्रावयामि नृप त्वां हि रहस्यं परमं मम ॥ ३मैंने पूर्वकालमें उसे अपने पुत्र शुकदेवको पढ़ाया था। हे राजन् ! मैं अपने परम रहस्यमय पुराणका श्रवण आपको कराऊँगा॥ ३॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं श्रवणात्किल।<br>शुभदं सुखदं नित्यं सर्वागमसमुद्धृतम् ॥ ४सभी वेदों एवं शास्त्रोंके सारस्वरूप तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके कारणभूत इस पुराणका श्रवण करनेसे यह मंगल तथा आनन्द प्रदान करनेवाला होता है॥ ४॥
जनमेजय उवाच<br>आस्तीकोऽयं सुतः कस्य विघ्नार्थं कथमागतः।<br>प्रयोजनं किमत्रास्य सर्पाणां रक्षणे प्रभो ॥ ५**जनमेजय बोले—**हे प्रभो ! यह आस्तीक किसका पुत्र था और यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये क्यों आया ? यज्ञमें सर्पोंकी रक्षा करनेके पीछे इसका क्या उद्देश्य था ? ॥ ५ ॥