भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 889 में से

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पृष्ठ 232
अ० १० ]द्वितीय स्कन्ध२२३
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
तक्षक उवाच<br>अहं स पन्नगो ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम्।<br>निवर्त्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम्॥ ६तक्षकने कहा—हे ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षकनाग हूँ और मैं ही महाराज परीक्षित्‌को काटूँगा। मेरे काट लेनेपर आप चिकित्सा करनेमें समर्थ नहीं हो सकेंगे; अतएव आप लौट जाइये॥ ६॥
कश्यप उवाच<br>अहं दष्टं त्वया सर्प नृपं शप्तं द्विजेन वै।<br>जीवयिष्याम्यसन्देहं कामं मन्त्रबलेन वै॥ ७कश्यपने कहा—हे सर्प! ब्राह्मणके द्वारा शापित किये गये राजाको आपके काटनेके उपरान्त मैं उन्हें अपने मन्त्रबलसे निःसन्देह जीवित कर दूँगा॥ ७॥
तक्षक उवाच<br>यदि त्वं जीवितुं यासि मया दष्टं नृपोत्तमम्।<br>मन्त्रशक्तिबलं विप्र दर्शय त्वं ममानघ॥ ८<br>धक्ष्याम्येनं च न्यग्रोधं विषदंष्ट्राभिरद्य वै।तक्षकने कहा—हे विप्र! हे अनघ! यदि आप मेरे काटे हुए नृपश्रेष्ठ परीक्षित्‌को जीवित करनेके लिये जा रहे हैं तो आप अपनी मन्त्र-शक्तिका प्रभाव दिखाइये। मैं इसी समय इस वटवृक्षको अपने विषैले दाँतोंसे डँसता हूँ॥ ८ १/२ ॥
कश्यप उवाच<br>जीवयिष्ये त्वया दष्टं दग्धं वा पन्नगोत्तम॥ ९कश्यपने कहा—हे सर्पश्रेष्ठ! आप इसे काट लें अथवा इसे जलाकर भस्म कर दें तो भी मैं इसे पुनः जीवित कर दूँगा॥ ९॥
सूत उवाच<br>अदशत्पन्नगो वृक्षं भस्मसाच्च चकार तम्।<br>उवाच कश्यपं भूयो जीवयैनं द्विजोत्तम॥ १०सूतजी बोले—नागराज तक्षकने उस वृक्षको डँस लिया और उसे जलाकर भस्म कर दिया। तब उसने कश्यपसे कहा—‘हे द्विजश्रेष्ठ! अब आप इसे पुनः जीवित कीजिये’॥ १०॥
दृष्ट्वा भस्मीकृतं वृक्षं पन्नगेन विषाग्निना।<br>सर्वं भस्म समाहृत्य कश्यपो वाक्यमब्रवीत्॥ ११<br>पश्य मन्त्रबलं मेऽद्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तम।<br>जीवयाम्यद्य वृक्षं वै पश्यतस्ते महाविष॥ १२तक्षकनागकी विषाग्निसे भस्म हुए वृक्षके सम्पूर्ण भस्मको एकत्र करके कश्यपने यह बात कही—हे महाविषधर नागराज! अब आप मेरे मन्त्रका प्रभाव देखिये। मैं आपके देखते-देखते इस वटवृक्षको जीवन प्रदान करता हूँ॥ ११-१२॥
इत्युक्त्वा जलमादाय कश्यपो मन्त्रवित्तमः।<br>सिषेच भस्मराशिं तं मन्त्रितेनैव वारिणा॥ १३<br>तद्वारिसेचनाज्जातो न्यग्रोधः पूर्ववच्छुभः।<br>विस्मयं तक्षकः प्राप्तो दृष्ट्वा तं जीवितं नगम्॥ १४ऐसा कहकर हाथमें जल लेकर मन्त्रविद् कश्यपने उस जलको अभिमन्त्रित किया और उसे भस्मराशिपर छिड़क दिया। जलके पड़ते ही वह वटवृक्ष पुनः पहलेकी भाँति सुन्दर हो गया। उस वृक्षको इस प्रकार जीवित देखकर तक्षकको बड़ा आश्चर्य हुआ॥ १३-१४॥
तमाह कश्यपं नागः किमर्थं ते परिश्रमः।<br>सम्पादयामि तं कामं ब्रूहि वाडव वाञ्छितम्॥ १५उस नागराजने कश्यपसे कहा—हे विप्र! आप इतना परिश्रम किसलिये करेंगे? आपकी वह कामना मैं ही पूर्ण कर दूँगा। कहिये, आप क्या चाहते हैं?॥ १५॥
कश्यप उवाच<br>वित्तार्थी नृपतिं मत्वा शप्तं पन्नग निःसृतः।<br>गृहादहं चोपकर्तुं विद्यया नृपसत्तमम्॥ १६कश्यपने कहा—हे पन्नग! मैं धनका अभिलाषी हूँ; नृपश्रेष्ठ परीक्षित्‌को शापित जानकर अपनी मन्त्रविद्यासे उनका उपकार करनेके लिये मैं अपने घरसे निकला हुआ हूँ॥ १६॥
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