भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 233
२२४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १०

| तक्षक उवाच<br>वित्तं गृहाण विप्रेन्द्र यावदिच्छसि पार्थिवात्।<br>ददामि स्वगृहं याहि सकामोऽहं भवाम्यतः॥ १७ | तक्षकने कहा—हे विप्रवर ! राजासे जितना धन आप चाहते हैं, उतना धन मुझसे अभी ले लें और अपने घर लौट जायँ, जिससे मैं अपने कृत्यमें सफल हो सकूँ॥ १७॥ | | सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कश्यपः परमार्थवित्।<br>चिन्तयामास मनसा किं करोमि पुनः पुनः॥ १८<br><br>धनं गृहीत्वा स्वगृहं प्रयामि यद्यहं पुनः।<br>भविष्यति न मे कीर्तिर्लोके लोभसमाश्रयात्॥ १९<br><br>जीवितेऽथ नृपश्रेष्ठे कीर्तिः स्यादचला मम।<br>धनप्राप्तिश्च बहुधा भवेत्पुण्यं च जीवनात्॥ २० | सूतजी बोले—तक्षककी यह बात सुनकर परमार्थवेत्ता कश्यपजी मनमें बार-बार सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं धन लेकर अपने घर जाता हूँ तो धनलोलुप होनेके कारण संसारमें मेरी कीर्ति नहीं होगी। यदि राजा जीवित हो जाते हैं तो मेरी अचल कीर्ति होगी तथा धन-प्राप्तिके साथ-साथ पुण्य भी प्राप्त होगा॥ १८–२०॥ | | रक्षणीयं यशः कामं धिग्ध्नं यशसा विना।<br>सर्वस्वं रघुणा पूर्वं दत्तं विप्राय कीर्तये॥ २१<br><br>हरिश्चन्द्रेण कर्णेन कीर्त्यर्थं बहुविस्तरम्।<br>उपेक्ष्यं कथं भूपं दह्यमानं विषाग्निना॥ २२ | यश ही रक्षणीय है और बिना यशके धनको धिक्कार है; क्योंकि प्राचीन कालमें महाराज रघुने कीर्तिके लिये अपना सब कुछ ब्राह्मणको दे दिया था। सत्यवादी हरिश्चन्द्र तथा दानी कर्णने भी केवल कीर्तिके लिये बहुत कुछ किया था। अतः विषकी अग्निसे जलते हुए राजा परीक्षित्की उपेक्षा मैं कैसे करूँ?॥ २१-२२॥ | | जीवितेऽद्य मया राज्ञि सुखं सर्वजनस्य च।<br>अराजके प्रजानाशो भविता नात्र संशयः॥ २३ | यदि मैं महाराजको जिला दूँ तो सब लोगोंको अत्यन्त सुख मिलेगा और यदि राजा मर गये तो अराजकताके कारण सारी प्रजा नष्ट हो जायगी, इसमें सन्देह नहीं है॥ २३॥ | | प्रजानाशस्य पापं मे भविष्यति मृते नृपे।<br>अपकीर्तिश्च लोकेषु धनलोभाद्भविष्यति॥ २४ | राजाके मृत हो जाने पर मुझे प्रजानाशका पाप लगेगा तथा संसारमें धन-लोभके कारण मेरी अपकीर्ति भी होगी॥ २४॥ | | इति सञ्चिन्त्य मनसा ध्यानं कृत्वा स कश्यपः।<br>गतायुषं च नृपतिं ज्ञातवान्बुद्धिमत्तरः॥ २५ | मनमें ऐसा विचार करके परम बुद्धिमान् कश्यपने ध्यान करके जाना कि महाराज परीक्षित्की आयु अब समाप्त हो चुकी है॥ २५॥ | | आसन्नमृत्युं राजानं ज्ञात्वा ध्यानेन कश्यपः।<br>गृहं ययौ स धर्मात्मा धनमादाय तक्षकात्॥ २६ | इस प्रकार ध्यान-दृष्टिसे धर्मात्मा कश्यप राजाकी मृत्यु निकट जानकर तक्षकसे धन लेकर अपने घर लौट गये॥ २६॥ | | निवर्त्य कश्यपं सर्पः सप्तमे दिवसे नृपम्।<br>हन्तुकामो जगामाशु नगरं नागसाह्वयम्॥ २७ | कश्यपको लौटाकर वह नाग सातवें दिन राजाको डँसनेकी इच्छासे शीघ्र हस्तिनापुर चला गया॥ २७॥ | | शुश्राव नगरस्यान्ते प्रासादस्थं परीक्षितम्।<br>मणिमन्त्रौषधैः कामं रक्ष्यमाणमतन्द्रितम्॥ २८ | नगरमें पहुँचते ही उसने सुना कि मणि, मन्त्र तथा औषधियोंसे भलीभाँति सावधानीपूर्वक सुरक्षित होकर राजा परीक्षित् अपने महलमें रह रहे हैं॥ २८॥ |