देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० १०] द्वितीय स्कन्ध २२५
| चिन्ताविष्टस्तदा नागो विप्रशापभयाकुलः।<br>चिन्तयामास योगेन प्रविशेयं गृहं कथम्॥ २९<br><br>वञ्चयामि कथं चैनं राजानं पापकारिणम्।<br>विप्रशापादतं मूढं विप्रपीडाकरं शठम्॥ ३० | [यह जानकर] ब्राह्मणके शापसे भयभीत सर्पराज तक्षकको बड़ी चिन्ता हुई। वह सोचने लगा कि अब मैं किस उपायसे इस राजभवनमें प्रवेश करूँ? और इस पापी, मूढ, विप्रको पीड़ित करनेवाले तथा मुनिके शापसे आहत इस दुष्ट राजाको मैं कैसे छलूँ?॥ २९-३०॥ |
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| पाण्डवानां कुले जातः कोऽपि नैतादृशो भवेत्।<br>तापसस्य गले येन मृतः सर्पो निवेशितः॥ ३१ | पाण्डववंशमें ऐसा कोई नहीं हुआ, जिसने इस प्रकार किसी तपस्वी ब्राह्मणके गलेमें मृत सर्प डाल दिया हो॥ ३१॥ |
| कृत्वा विगर्हितं कर्म जानन्कालगतिं नृपः।<br>रक्षकान्भवने कृत्वा प्रासादमभिगम्य च॥ ३२<br><br>मृत्युं वञ्चयते राजा वर्ततेऽद्य निराकुलः।<br>तं कथं धक्ष्यिष्यामि विप्रवाक्येन चोदितः॥ ३३ | ऐसा निन्दित कर्म करके कालचक्रको जानते हुए भी यह राजा भवनमें रक्षकोंकी नियुक्ति करके राज-भवनमें छिपकर मृत्युकी वंचना कर रहा है और निश्चिन्त होकर पड़ा है। विप्रके शापानुसार मैं उस राजाको कैसे डसूँ?॥ ३२-३३॥ |
| न जानाति च मन्दात्मा मरणं ह्यनिवर्तनम्।<br>तेनासौ रक्षकान्स्थाप्य सौधारूढोऽद्य मोदते॥ ३४ | यह मन्दबुद्धि इतना भी नहीं जानता कि मृत्यु तो अनिवार्य है? इसी कारण यह रक्षकोंकी नियुक्ति करके स्वयं भवनपर चढ़कर आनन्द ले रहा है॥ ३४॥ |
| यदि वै विहितो मृत्युर्दैवेनामिततेजसा।<br>स कथं परिवर्तेत कृतैर्यत्नैस्तु कोटिभिः॥ ३५ | यदि अमित तेजवाले दैवने मृत्यु निश्चित कर दी है तो करोड़ों प्रकारके प्रयत्नोंसे भी उसे कैसे टाला जा सकता है?॥ ३५॥ |
| पाण्डवस्य च दायादो जानन्मृत्युं गतं नृपः।<br>जीवने मतिमास्थाय स्थितः स्थाने निराकुलः॥ ३६ | पाण्डववंशका उत्तराधिकारी यह राजा परीक्षित् अपनेको मृत्युके मुखमें गया हुआ जानते हुए भी जीवित रहनेकी अभिलाषा रखकर सुरक्षित स्थानमें निश्चिन्त होकर पड़ा हुआ है॥ ३६॥ |
| दानपुण्यादिकं राजा कर्तुमर्हति सर्वथा।<br>धर्मेण हन्यते व्याधिर्येनायुः शाश्वतं भवेत्॥ ३७ | यह यदि चाहता तो अनेक प्रकारके दान-पुण्य-द्वारा अपनी आयु बढ़ा सकता था; क्योंकि धर्माचरणसे व्याधि नष्ट होती है और उससे आयु स्थिर होती है॥ ३७॥ |
| नोचेन्मृत्युविधिं कृत्वा स्नानदानादिकाः क्रियाः।<br>मरणं स्वर्गलोकाय नरकायान्धथा भवेत्॥ ३८ | यदि ऐसा सम्भव नहीं था तो मृत्युके समय सम्पन्न की जानेवाली स्नान, दान आदि क्रियाएँ करके मृत्युके अनन्तर स्वर्गयात्रा कर सकता था, अन्यथा इसे नरक जाना होगा॥ ३८॥ |
| द्विजपीडाकृतं पापं पृथग्वास्य च भूपतेः।<br>विप्रशापस्तथा घोर आसन्ने मरणे किल॥ ३९ | मुनिको पीड़ा पहुँचानेका पाप इस राजाको था ही और ब्राह्मणका घोर शाप अलगसे है। अतः अब इसकी मृत्यु सन्निकट है॥ ३९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 A