देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| न कोऽपि ब्राह्मणः पार्श्वे य एनं प्रतिबोधयेत्।<br>वेधसा विहितो मृत्युरनिवार्यस्तु सर्वथा॥ ४० | इस समय ऐसा कोई ब्राह्मण भी इसके पास नहीं है, जो इसे यह बता सके कि विधाताके द्वारा निर्धारित मृत्यु सर्वथा अनिवार्य है॥ ४०॥ | | इति सञ्चिन्त्य सर्पोऽसौ स्वानागानिकटे स्थितान्।<br>कृत्वा तापसवेषांस्तानग्राहिणोत्सुभुजङ्गमान्॥ ४१<br><br>फलमूलादिकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः।<br>स्वयं च कीटरूपेण फलमध्ये ससार ह॥ ४२ | ऐसा विचारकर तक्षकनागने अपने निकटवर्ती श्रेष्ठ नागोंको तपस्वी ब्राह्मणोंका वेष धारण कराकर राजाके पास भेजा। वे राजाको देनेके लिये फल-मूल आदि लेकर तैयार हो गये और तक्षकनाग भी एक छोटे-से कीटके रूपमें फलके बीचमें छिप गया॥ ४१-४२॥ | | निर्गतास्ते तदा नागाः फलान्यादाय सत्वराः।<br>ते राजभवनं प्राप्य स्थिताः प्रासादसन्निधौ॥ ४३ | तब वे नाग फल आदि लेकर शीघ्र ही निकल पड़े और राजभवनमें पहुँचकर महलके पास खड़े हो गये॥ ४३॥ | | रक्षकास्तापसान्दृष्ट्वा पप्रच्छुस्तच्चिकीर्षितम्।<br>ऊचुस्ते भूपतिं द्रष्टुं प्राप्ताः स्मोऽद्य तपोवनात्॥ ४४ | इस प्रकार तपस्वियोंको खड़े देखकर रक्षकोंने उनसे पूछा कि आपलोगोंकी क्या इच्छा है? तब उन्होंने कहा—हमलोग महाराजको देखनेके लिये तपोवनसे आये हैं॥ ४४॥ | | अभिमन्युसुतं वीरं कुलार्कं चारुदर्शनम्।<br>परिवर्धयितुं प्राप्ता मन्त्रैराथर्वणैस्तथा॥ ४५ | पाण्डवकुलके सूर्य, शुभदर्शन तथा पराक्रमी अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित्को अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे आशीर्वाद देनेहेतु हमलोग यहाँ आये हैं॥ ४५॥ | | निवेदयध्वं राजानं दर्शनार्थगतान्मुनीन्।<br>कृत्वाभिषेकान्यास्यामो दत्त्वा मिष्टफलानि च॥ ४६ | आप जाकर महाराजसे कहें कि कुछ मुनिजन उनसे मिलने आये हैं और वे महाराजका मन्त्राभिषेक करके उन्हें मधुर फल देकर लौट जायेंगे॥ ४६॥ | | भारतानां कुले क्वापि न दृष्टा द्वाररक्षकाः।<br>न श्रुतं तापसानां तु राज्ञोऽसन्दर्शनं किल॥ ४७<br><br>आरोहामो वयं तत्र यत्र राजा परीक्षितः।<br>आशीर्भिर्वर्धयित्वैनं दत्ताज्ञाः प्रव्रजामहे॥ ४८ | भरतवंशी राजाओंके कुलमें कभी भी द्वाररक्षक नहीं देखे गये। ऐसा भी कहीं सुना नहीं गया कि तपस्वियोंको राजाका दर्शन न मिले। जहाँ महाराज परीक्षित् विराजमान हैं, वहाँ हमलोग जायँगे और उन्हें अपने आशीर्वादसे दीर्घायुष्य बनाकर आज्ञा लेकर लौट जायँगे॥ ४७-४८॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तेषां तापसानां तु रक्षकाः।<br>प्रत्युचुस्तान् द्विजान्मत्वा निदेशं भूपतेर्यथा॥ ४९<br><br>नाद्य वो दर्शनं विप्रा राज्ञः स्यादिति नो मतिः।<br>श्वः सर्वतापसैरत्र त्वागन्तव्यं नृपालये॥ ५० | सूतजी बोले—उन तपस्वियोंका वचन सुनकर रक्षकोंने उन्हें ब्राह्मण समझकर महाराजका आदेश सुनाते हुए कहा—हे विप्रो! हमारे विचारमें आज आपलोगोंको राजाका दर्शन नहीं हो सकेगा। अतः आप समस्त तपस्वीजन राजभवनमें कल पधारें॥ ४९-५०॥ | | अनारोहस्तु प्रासादो विप्राणां मुनिसत्तमाः।<br>विप्रशापभयाद्राज्ञा विहितोऽस्ति न संशयः॥ ५१ | हे मुनिश्रेष्ठो! विप्रशापसे भयभीत होकर राजाने अपने महलमें ब्राह्मणोंका प्रवेश वर्जित कर रखा है; इसमें संशय नहीं है॥ ५१॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 B