भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 236
अ० १० ]द्वितीय स्कन्ध२२७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदोचुस्तानथो विप्राः फलमूलजलानि च।<br>विप्राशिषश्च राज्ञेऽथ ग्राहयन्तु सुरक्षकाः॥ ५२तब ब्राह्मणोंने उनसे कहा—हमलोगोंकी ओरसे ये फल-मूल तथा जल आप रक्षकगण राजाको दे दें और हमलोगोंका आशीर्वाद पहुँचा दें॥ ५२॥
ते गत्वा नृपतिं प्रोचुस्तापसानागताञ्जनाः।<br>राजोवाचानयध्वं वै फलमूलादिकं च यत्॥ ५३<br>पृच्छध्वं तापसान्कार्यं प्रातरागमनं पुनः।<br>प्रणामं कथयध्वं मे नाद्य सन्दर्शनं मम॥ ५४उन्होंने राजाके पास जाकर तपस्वियोंके आगमनकी बात बता दी। इसपर राजाने आज्ञा दी कि वे लोग फल-मूल आदि जो कुछ दे रहे हैं, उन्हें यहाँ लाओ और उन तपस्वियोंके आनेका कारण पूछ लो और उन्हें पुनः कल प्रातः आनेको कह दो। साथ ही मेरी ओरसे उन्हें प्रणाम कहकर यह भी कह देना कि आज मेरा मिलना सम्भव नहीं है॥ ५३-५४॥
ते गत्वाथ समादाय फलमूलादिकं च यत्।<br>राज्ञे समर्पयामासुर्बहुमानपुरःसरम्॥ ५५उन द्वारपालोंने तपस्वियोंके पास जाकर उनके दिये हुए फल-मूल आदि लाकर आदरपूर्वक राजाको अर्पित कर दिये॥ ५५॥
गतेषु तेषु नागेषु विप्रवेषावृतेषु च।<br>फलान्यादाय राजासौ सचिवानिदमब्रवीत्॥ ५६<br>सुहृदो भक्षयन्त्वद्य फलान्येतानि सर्वशः।<br>अद्याहं चैकमेतद्वै फलं विप्रार्पितं महत्॥ ५७उन विप्रवेषमें आये नागोंके चले जानेपर महाराजने फलोंको लेकर मन्त्रियोंसे कहा—हे सचिवो! आपलोग भी इन फलोंका सम्यक् सेवन कीजिये। मैं तो तपस्वियोंद्वारा अर्पित यही एक बड़ा फल खाऊँगा॥ ५६-५७॥
इत्युक्त्वा तत्फलं दत्त्वा सुहृद्भ्यश्चोत्तरासुतः।<br>करे कृत्वा फलं पक्वं ददार नृपतिः स्वयम्॥ ५८ऐसा कहकर उत्तरासुत राजा परीक्षित्ने सब फल अपने सुहृद् सचिवोंमें बाँट दिये और एक सुन्दर पका फल हाथमें लेकर उसे स्वयं विदीर्ण किया॥ ५८॥
विदारितं फलं राज्ञा तत्र कृमिरभूदणुः।<br>स कृष्णनयनस्ताम्रो दृष्टो भूपतिना स्वयम्॥ ५९<br>तं दृष्ट्वा नृपतिः प्राह सचिवान्विस्मितानथ।<br>अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम्॥ ६०<br>अङ्गीकरोमि तं शापं कृमिको मां दशत्वयम्।<br>एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संन्यवेशयत्॥ ६१<br>अस्तं याते दिनानाथे धृतः कण्ठेऽथ कीटकः।<br>तक्षकस्तु तदा जातः कालरूपी भयानकः॥ ६२जिस फलको राजाने चीरा, उसमें ताम्र वर्णवाला तथा काले नेत्रवाला एक छोटा-सा कीट राजाको दिखायी दिया। उसे देखकर राजाने अपने आश्चर्यचकित मन्त्रियोंसे कहा—सूर्य अस्त हो रहे हैं, अतः अब मुझे विषका भय नहीं है। मैं ब्राह्मणके उस शापको अंगीकार करता हूँ कि यह कीट मुझे काट ले। ऐसा कहकर महाराज परीक्षित्ने उसे अपने गलेपर रख लिया। सूर्यके अस्त होते ही गलेपर स्थित वह कीट साक्षात् कालस्वरूप भयानक तक्षकके रूपमें परिणत हो गया॥ ५९–६२॥
राजा संवेष्टितस्तेन दष्टश्चापि महीपतिः।<br>मन्त्रिणो विस्मयं प्राप्ता रुरुदुर्भृशदुःखिताः॥ ६३उस नागने तत्काल राजाको लपेट लिया तथा उन्हें डँस लिया। यह देखते ही सभी मन्त्री आश्चर्यमें पड़ गये और अत्यधिक दुःखित होकर विलाप करने लगे॥ ६३॥
घोररूपमहिं वीक्ष्य दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः।<br>चुक्रुशू रक्षकाः सर्वे हाहाकारो महानभूत्॥ ६४भयंकर रूपवाले उस सर्पको देखकर सभी सचिवगण भयभीत होकर वहाँसे भागने लगे और सभी रक्षकगण चिल्लाने लगे। इस प्रकार वहाँ महान् हाहाकार मच गया॥ ६४॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 C

देवी भागवत महापुराण · पृष्ठ 236, कुल 889 में से · BharatKosha