देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० १० ] | द्वितीय स्कन्ध | २२३ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| तक्षक उवाच<br>अहं स पन्नगो ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम्।<br>निवर्त्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम्॥ ६ | तक्षकने कहा—हे ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षकनाग हूँ और मैं ही महाराज परीक्षित्को काटूँगा। मेरे काट लेनेपर आप चिकित्सा करनेमें समर्थ नहीं हो सकेंगे; अतएव आप लौट जाइये॥ ६॥ |
| कश्यप उवाच<br>अहं दष्टं त्वया सर्प नृपं शप्तं द्विजेन वै।<br>जीवयिष्याम्यसन्देहं कामं मन्त्रबलेन वै॥ ७ | कश्यपने कहा—हे सर्प! ब्राह्मणके द्वारा शापित किये गये राजाको आपके काटनेके उपरान्त मैं उन्हें अपने मन्त्रबलसे निःसन्देह जीवित कर दूँगा॥ ७॥ |
| तक्षक उवाच<br>यदि त्वं जीवितुं यासि मया दष्टं नृपोत्तमम्।<br>मन्त्रशक्तिबलं विप्र दर्शय त्वं ममानघ॥ ८<br>धक्ष्याम्येनं च न्यग्रोधं विषदंष्ट्राभिरद्य वै। | तक्षकने कहा—हे विप्र! हे अनघ! यदि आप मेरे काटे हुए नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को जीवित करनेके लिये जा रहे हैं तो आप अपनी मन्त्र-शक्तिका प्रभाव दिखाइये। मैं इसी समय इस वटवृक्षको अपने विषैले दाँतोंसे डँसता हूँ॥ ८ १/२ ॥ |
| कश्यप उवाच<br>जीवयिष्ये त्वया दष्टं दग्धं वा पन्नगोत्तम॥ ९ | कश्यपने कहा—हे सर्पश्रेष्ठ! आप इसे काट लें अथवा इसे जलाकर भस्म कर दें तो भी मैं इसे पुनः जीवित कर दूँगा॥ ९॥ |
| सूत उवाच<br>अदशत्पन्नगो वृक्षं भस्मसाच्च चकार तम्।<br>उवाच कश्यपं भूयो जीवयैनं द्विजोत्तम॥ १० | सूतजी बोले—नागराज तक्षकने उस वृक्षको डँस लिया और उसे जलाकर भस्म कर दिया। तब उसने कश्यपसे कहा—‘हे द्विजश्रेष्ठ! अब आप इसे पुनः जीवित कीजिये’॥ १०॥ |
| दृष्ट्वा भस्मीकृतं वृक्षं पन्नगेन विषाग्निना।<br>सर्वं भस्म समाहृत्य कश्यपो वाक्यमब्रवीत्॥ ११<br>पश्य मन्त्रबलं मेऽद्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तम।<br>जीवयाम्यद्य वृक्षं वै पश्यतस्ते महाविष॥ १२ | तक्षकनागकी विषाग्निसे भस्म हुए वृक्षके सम्पूर्ण भस्मको एकत्र करके कश्यपने यह बात कही—हे महाविषधर नागराज! अब आप मेरे मन्त्रका प्रभाव देखिये। मैं आपके देखते-देखते इस वटवृक्षको जीवन प्रदान करता हूँ॥ ११-१२॥ |
| इत्युक्त्वा जलमादाय कश्यपो मन्त्रवित्तमः।<br>सिषेच भस्मराशिं तं मन्त्रितेनैव वारिणा॥ १३<br>तद्वारिसेचनाज्जातो न्यग्रोधः पूर्ववच्छुभः।<br>विस्मयं तक्षकः प्राप्तो दृष्ट्वा तं जीवितं नगम्॥ १४ | ऐसा कहकर हाथमें जल लेकर मन्त्रविद् कश्यपने उस जलको अभिमन्त्रित किया और उसे भस्मराशिपर छिड़क दिया। जलके पड़ते ही वह वटवृक्ष पुनः पहलेकी भाँति सुन्दर हो गया। उस वृक्षको इस प्रकार जीवित देखकर तक्षकको बड़ा आश्चर्य हुआ॥ १३-१४॥ |
| तमाह कश्यपं नागः किमर्थं ते परिश्रमः।<br>सम्पादयामि तं कामं ब्रूहि वाडव वाञ्छितम्॥ १५ | उस नागराजने कश्यपसे कहा—हे विप्र! आप इतना परिश्रम किसलिये करेंगे? आपकी वह कामना मैं ही पूर्ण कर दूँगा। कहिये, आप क्या चाहते हैं?॥ १५॥ |
| कश्यप उवाच<br>वित्तार्थी नृपतिं मत्वा शप्तं पन्नग निःसृतः।<br>गृहादहं चोपकर्तुं विद्यया नृपसत्तमम्॥ १६ | कश्यपने कहा—हे पन्नग! मैं धनका अभिलाषी हूँ; नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को शापित जानकर अपनी मन्त्रविद्यासे उनका उपकार करनेके लिये मैं अपने घरसे निकला हुआ हूँ॥ १६॥ |
| २२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| तक्षक उवाच<br>वित्तं गृहाण विप्रेन्द्र यावदिच्छसि पार्थिवात्।<br>ददामि स्वगृहं याहि सकामोऽहं भवाम्यतः॥ १७ | तक्षकने कहा—हे विप्रवर ! राजासे जितना धन आप चाहते हैं, उतना धन मुझसे अभी ले लें और अपने घर लौट जायँ, जिससे मैं अपने कृत्यमें सफल हो सकूँ॥ १७॥ | | सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कश्यपः परमार्थवित्।<br>चिन्तयामास मनसा किं करोमि पुनः पुनः॥ १८<br><br>धनं गृहीत्वा स्वगृहं प्रयामि यद्यहं पुनः।<br>भविष्यति न मे कीर्तिर्लोके लोभसमाश्रयात्॥ १९<br><br>जीवितेऽथ नृपश्रेष्ठे कीर्तिः स्यादचला मम।<br>धनप्राप्तिश्च बहुधा भवेत्पुण्यं च जीवनात्॥ २० | सूतजी बोले—तक्षककी यह बात सुनकर परमार्थवेत्ता कश्यपजी मनमें बार-बार सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं धन लेकर अपने घर जाता हूँ तो धनलोलुप होनेके कारण संसारमें मेरी कीर्ति नहीं होगी। यदि राजा जीवित हो जाते हैं तो मेरी अचल कीर्ति होगी तथा धन-प्राप्तिके साथ-साथ पुण्य भी प्राप्त होगा॥ १८–२०॥ | | रक्षणीयं यशः कामं धिग्ध्नं यशसा विना।<br>सर्वस्वं रघुणा पूर्वं दत्तं विप्राय कीर्तये॥ २१<br><br>हरिश्चन्द्रेण कर्णेन कीर्त्यर्थं बहुविस्तरम्।<br>उपेक्ष्यं कथं भूपं दह्यमानं विषाग्निना॥ २२ | यश ही रक्षणीय है और बिना यशके धनको धिक्कार है; क्योंकि प्राचीन कालमें महाराज रघुने कीर्तिके लिये अपना सब कुछ ब्राह्मणको दे दिया था। सत्यवादी हरिश्चन्द्र तथा दानी कर्णने भी केवल कीर्तिके लिये बहुत कुछ किया था। अतः विषकी अग्निसे जलते हुए राजा परीक्षित्की उपेक्षा मैं कैसे करूँ?॥ २१-२२॥ | | जीवितेऽद्य मया राज्ञि सुखं सर्वजनस्य च।<br>अराजके प्रजानाशो भविता नात्र संशयः॥ २३ | यदि मैं महाराजको जिला दूँ तो सब लोगोंको अत्यन्त सुख मिलेगा और यदि राजा मर गये तो अराजकताके कारण सारी प्रजा नष्ट हो जायगी, इसमें सन्देह नहीं है॥ २३॥ | | प्रजानाशस्य पापं मे भविष्यति मृते नृपे।<br>अपकीर्तिश्च लोकेषु धनलोभाद्भविष्यति॥ २४ | राजाके मृत हो जाने पर मुझे प्रजानाशका पाप लगेगा तथा संसारमें धन-लोभके कारण मेरी अपकीर्ति भी होगी॥ २४॥ | | इति सञ्चिन्त्य मनसा ध्यानं कृत्वा स कश्यपः।<br>गतायुषं च नृपतिं ज्ञातवान्बुद्धिमत्तरः॥ २५ | मनमें ऐसा विचार करके परम बुद्धिमान् कश्यपने ध्यान करके जाना कि महाराज परीक्षित्की आयु अब समाप्त हो चुकी है॥ २५॥ | | आसन्नमृत्युं राजानं ज्ञात्वा ध्यानेन कश्यपः।<br>गृहं ययौ स धर्मात्मा धनमादाय तक्षकात्॥ २६ | इस प्रकार ध्यान-दृष्टिसे धर्मात्मा कश्यप राजाकी मृत्यु निकट जानकर तक्षकसे धन लेकर अपने घर लौट गये॥ २६॥ | | निवर्त्य कश्यपं सर्पः सप्तमे दिवसे नृपम्।<br>हन्तुकामो जगामाशु नगरं नागसाह्वयम्॥ २७ | कश्यपको लौटाकर वह नाग सातवें दिन राजाको डँसनेकी इच्छासे शीघ्र हस्तिनापुर चला गया॥ २७॥ | | शुश्राव नगरस्यान्ते प्रासादस्थं परीक्षितम्।<br>मणिमन्त्रौषधैः कामं रक्ष्यमाणमतन्द्रितम्॥ २८ | नगरमें पहुँचते ही उसने सुना कि मणि, मन्त्र तथा औषधियोंसे भलीभाँति सावधानीपूर्वक सुरक्षित होकर राजा परीक्षित् अपने महलमें रह रहे हैं॥ २८॥ |
अ० १०] द्वितीय स्कन्ध २२५
अ० १०] द्वितीय स्कन्ध २२५
| चिन्ताविष्टस्तदा नागो विप्रशापभयाकुलः।<br>चिन्तयामास योगेन प्रविशेयं गृहं कथम्॥ २९<br><br>वञ्चयामि कथं चैनं राजानं पापकारिणम्।<br>विप्रशापादतं मूढं विप्रपीडाकरं शठम्॥ ३० | [यह जानकर] ब्राह्मणके शापसे भयभीत सर्पराज तक्षकको बड़ी चिन्ता हुई। वह सोचने लगा कि अब मैं किस उपायसे इस राजभवनमें प्रवेश करूँ? और इस पापी, मूढ, विप्रको पीड़ित करनेवाले तथा मुनिके शापसे आहत इस दुष्ट राजाको मैं कैसे छलूँ?॥ २९-३०॥ |
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| पाण्डवानां कुले जातः कोऽपि नैतादृशो भवेत्।<br>तापसस्य गले येन मृतः सर्पो निवेशितः॥ ३१ | पाण्डववंशमें ऐसा कोई नहीं हुआ, जिसने इस प्रकार किसी तपस्वी ब्राह्मणके गलेमें मृत सर्प डाल दिया हो॥ ३१॥ |
| कृत्वा विगर्हितं कर्म जानन्कालगतिं नृपः।<br>रक्षकान्भवने कृत्वा प्रासादमभिगम्य च॥ ३२<br><br>मृत्युं वञ्चयते राजा वर्ततेऽद्य निराकुलः।<br>तं कथं धक्ष्यिष्यामि विप्रवाक्येन चोदितः॥ ३३ | ऐसा निन्दित कर्म करके कालचक्रको जानते हुए भी यह राजा भवनमें रक्षकोंकी नियुक्ति करके राज-भवनमें छिपकर मृत्युकी वंचना कर रहा है और निश्चिन्त होकर पड़ा है। विप्रके शापानुसार मैं उस राजाको कैसे डसूँ?॥ ३२-३३॥ |
| न जानाति च मन्दात्मा मरणं ह्यनिवर्तनम्।<br>तेनासौ रक्षकान्स्थाप्य सौधारूढोऽद्य मोदते॥ ३४ | यह मन्दबुद्धि इतना भी नहीं जानता कि मृत्यु तो अनिवार्य है? इसी कारण यह रक्षकोंकी नियुक्ति करके स्वयं भवनपर चढ़कर आनन्द ले रहा है॥ ३४॥ |
| यदि वै विहितो मृत्युर्दैवेनामिततेजसा।<br>स कथं परिवर्तेत कृतैर्यत्नैस्तु कोटिभिः॥ ३५ | यदि अमित तेजवाले दैवने मृत्यु निश्चित कर दी है तो करोड़ों प्रकारके प्रयत्नोंसे भी उसे कैसे टाला जा सकता है?॥ ३५॥ |
| पाण्डवस्य च दायादो जानन्मृत्युं गतं नृपः।<br>जीवने मतिमास्थाय स्थितः स्थाने निराकुलः॥ ३६ | पाण्डववंशका उत्तराधिकारी यह राजा परीक्षित् अपनेको मृत्युके मुखमें गया हुआ जानते हुए भी जीवित रहनेकी अभिलाषा रखकर सुरक्षित स्थानमें निश्चिन्त होकर पड़ा हुआ है॥ ३६॥ |
| दानपुण्यादिकं राजा कर्तुमर्हति सर्वथा।<br>धर्मेण हन्यते व्याधिर्येनायुः शाश्वतं भवेत्॥ ३७ | यह यदि चाहता तो अनेक प्रकारके दान-पुण्य-द्वारा अपनी आयु बढ़ा सकता था; क्योंकि धर्माचरणसे व्याधि नष्ट होती है और उससे आयु स्थिर होती है॥ ३७॥ |
| नोचेन्मृत्युविधिं कृत्वा स्नानदानादिकाः क्रियाः।<br>मरणं स्वर्गलोकाय नरकायान्धथा भवेत्॥ ३८ | यदि ऐसा सम्भव नहीं था तो मृत्युके समय सम्पन्न की जानेवाली स्नान, दान आदि क्रियाएँ करके मृत्युके अनन्तर स्वर्गयात्रा कर सकता था, अन्यथा इसे नरक जाना होगा॥ ३८॥ |
| द्विजपीडाकृतं पापं पृथग्वास्य च भूपतेः।<br>विप्रशापस्तथा घोर आसन्ने मरणे किल॥ ३९ | मुनिको पीड़ा पहुँचानेका पाप इस राजाको था ही और ब्राह्मणका घोर शाप अलगसे है। अतः अब इसकी मृत्यु सन्निकट है॥ ३९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 A
| २२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| न कोऽपि ब्राह्मणः पार्श्वे य एनं प्रतिबोधयेत्।<br>वेधसा विहितो मृत्युरनिवार्यस्तु सर्वथा॥ ४० | इस समय ऐसा कोई ब्राह्मण भी इसके पास नहीं है, जो इसे यह बता सके कि विधाताके द्वारा निर्धारित मृत्यु सर्वथा अनिवार्य है॥ ४०॥ | | इति सञ्चिन्त्य सर्पोऽसौ स्वानागानिकटे स्थितान्।<br>कृत्वा तापसवेषांस्तानग्राहिणोत्सुभुजङ्गमान्॥ ४१<br><br>फलमूलादिकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः।<br>स्वयं च कीटरूपेण फलमध्ये ससार ह॥ ४२ | ऐसा विचारकर तक्षकनागने अपने निकटवर्ती श्रेष्ठ नागोंको तपस्वी ब्राह्मणोंका वेष धारण कराकर राजाके पास भेजा। वे राजाको देनेके लिये फल-मूल आदि लेकर तैयार हो गये और तक्षकनाग भी एक छोटे-से कीटके रूपमें फलके बीचमें छिप गया॥ ४१-४२॥ | | निर्गतास्ते तदा नागाः फलान्यादाय सत्वराः।<br>ते राजभवनं प्राप्य स्थिताः प्रासादसन्निधौ॥ ४३ | तब वे नाग फल आदि लेकर शीघ्र ही निकल पड़े और राजभवनमें पहुँचकर महलके पास खड़े हो गये॥ ४३॥ | | रक्षकास्तापसान्दृष्ट्वा पप्रच्छुस्तच्चिकीर्षितम्।<br>ऊचुस्ते भूपतिं द्रष्टुं प्राप्ताः स्मोऽद्य तपोवनात्॥ ४४ | इस प्रकार तपस्वियोंको खड़े देखकर रक्षकोंने उनसे पूछा कि आपलोगोंकी क्या इच्छा है? तब उन्होंने कहा—हमलोग महाराजको देखनेके लिये तपोवनसे आये हैं॥ ४४॥ | | अभिमन्युसुतं वीरं कुलार्कं चारुदर्शनम्।<br>परिवर्धयितुं प्राप्ता मन्त्रैराथर्वणैस्तथा॥ ४५ | पाण्डवकुलके सूर्य, शुभदर्शन तथा पराक्रमी अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित्को अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे आशीर्वाद देनेहेतु हमलोग यहाँ आये हैं॥ ४५॥ | | निवेदयध्वं राजानं दर्शनार्थगतान्मुनीन्।<br>कृत्वाभिषेकान्यास्यामो दत्त्वा मिष्टफलानि च॥ ४६ | आप जाकर महाराजसे कहें कि कुछ मुनिजन उनसे मिलने आये हैं और वे महाराजका मन्त्राभिषेक करके उन्हें मधुर फल देकर लौट जायेंगे॥ ४६॥ | | भारतानां कुले क्वापि न दृष्टा द्वाररक्षकाः।<br>न श्रुतं तापसानां तु राज्ञोऽसन्दर्शनं किल॥ ४७<br><br>आरोहामो वयं तत्र यत्र राजा परीक्षितः।<br>आशीर्भिर्वर्धयित्वैनं दत्ताज्ञाः प्रव्रजामहे॥ ४८ | भरतवंशी राजाओंके कुलमें कभी भी द्वाररक्षक नहीं देखे गये। ऐसा भी कहीं सुना नहीं गया कि तपस्वियोंको राजाका दर्शन न मिले। जहाँ महाराज परीक्षित् विराजमान हैं, वहाँ हमलोग जायँगे और उन्हें अपने आशीर्वादसे दीर्घायुष्य बनाकर आज्ञा लेकर लौट जायँगे॥ ४७-४८॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तेषां तापसानां तु रक्षकाः।<br>प्रत्युचुस्तान् द्विजान्मत्वा निदेशं भूपतेर्यथा॥ ४९<br><br>नाद्य वो दर्शनं विप्रा राज्ञः स्यादिति नो मतिः।<br>श्वः सर्वतापसैरत्र त्वागन्तव्यं नृपालये॥ ५० | सूतजी बोले—उन तपस्वियोंका वचन सुनकर रक्षकोंने उन्हें ब्राह्मण समझकर महाराजका आदेश सुनाते हुए कहा—हे विप्रो! हमारे विचारमें आज आपलोगोंको राजाका दर्शन नहीं हो सकेगा। अतः आप समस्त तपस्वीजन राजभवनमें कल पधारें॥ ४९-५०॥ | | अनारोहस्तु प्रासादो विप्राणां मुनिसत्तमाः।<br>विप्रशापभयाद्राज्ञा विहितोऽस्ति न संशयः॥ ५१ | हे मुनिश्रेष्ठो! विप्रशापसे भयभीत होकर राजाने अपने महलमें ब्राह्मणोंका प्रवेश वर्जित कर रखा है; इसमें संशय नहीं है॥ ५१॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 B
| अ० १० ] | द्वितीय स्कन्ध | २२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तदोचुस्तानथो विप्राः फलमूलजलानि च।<br>विप्राशिषश्च राज्ञेऽथ ग्राहयन्तु सुरक्षकाः॥ ५२ | तब ब्राह्मणोंने उनसे कहा—हमलोगोंकी ओरसे ये फल-मूल तथा जल आप रक्षकगण राजाको दे दें और हमलोगोंका आशीर्वाद पहुँचा दें॥ ५२॥ |
| ते गत्वा नृपतिं प्रोचुस्तापसानागताञ्जनाः।<br>राजोवाचानयध्वं वै फलमूलादिकं च यत्॥ ५३<br>पृच्छध्वं तापसान्कार्यं प्रातरागमनं पुनः।<br>प्रणामं कथयध्वं मे नाद्य सन्दर्शनं मम॥ ५४ | उन्होंने राजाके पास जाकर तपस्वियोंके आगमनकी बात बता दी। इसपर राजाने आज्ञा दी कि वे लोग फल-मूल आदि जो कुछ दे रहे हैं, उन्हें यहाँ लाओ और उन तपस्वियोंके आनेका कारण पूछ लो और उन्हें पुनः कल प्रातः आनेको कह दो। साथ ही मेरी ओरसे उन्हें प्रणाम कहकर यह भी कह देना कि आज मेरा मिलना सम्भव नहीं है॥ ५३-५४॥ |
| ते गत्वाथ समादाय फलमूलादिकं च यत्।<br>राज्ञे समर्पयामासुर्बहुमानपुरःसरम्॥ ५५ | उन द्वारपालोंने तपस्वियोंके पास जाकर उनके दिये हुए फल-मूल आदि लाकर आदरपूर्वक राजाको अर्पित कर दिये॥ ५५॥ |
| गतेषु तेषु नागेषु विप्रवेषावृतेषु च।<br>फलान्यादाय राजासौ सचिवानिदमब्रवीत्॥ ५६<br>सुहृदो भक्षयन्त्वद्य फलान्येतानि सर्वशः।<br>अद्याहं चैकमेतद्वै फलं विप्रार्पितं महत्॥ ५७ | उन विप्रवेषमें आये नागोंके चले जानेपर महाराजने फलोंको लेकर मन्त्रियोंसे कहा—हे सचिवो! आपलोग भी इन फलोंका सम्यक् सेवन कीजिये। मैं तो तपस्वियोंद्वारा अर्पित यही एक बड़ा फल खाऊँगा॥ ५६-५७॥ |
| इत्युक्त्वा तत्फलं दत्त्वा सुहृद्भ्यश्चोत्तरासुतः।<br>करे कृत्वा फलं पक्वं ददार नृपतिः स्वयम्॥ ५८ | ऐसा कहकर उत्तरासुत राजा परीक्षित्ने सब फल अपने सुहृद् सचिवोंमें बाँट दिये और एक सुन्दर पका फल हाथमें लेकर उसे स्वयं विदीर्ण किया॥ ५८॥ |
| विदारितं फलं राज्ञा तत्र कृमिरभूदणुः।<br>स कृष्णनयनस्ताम्रो दृष्टो भूपतिना स्वयम्॥ ५९<br>तं दृष्ट्वा नृपतिः प्राह सचिवान्विस्मितानथ।<br>अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम्॥ ६०<br>अङ्गीकरोमि तं शापं कृमिको मां दशत्वयम्।<br>एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संन्यवेशयत्॥ ६१<br>अस्तं याते दिनानाथे धृतः कण्ठेऽथ कीटकः।<br>तक्षकस्तु तदा जातः कालरूपी भयानकः॥ ६२ | जिस फलको राजाने चीरा, उसमें ताम्र वर्णवाला तथा काले नेत्रवाला एक छोटा-सा कीट राजाको दिखायी दिया। उसे देखकर राजाने अपने आश्चर्यचकित मन्त्रियोंसे कहा—सूर्य अस्त हो रहे हैं, अतः अब मुझे विषका भय नहीं है। मैं ब्राह्मणके उस शापको अंगीकार करता हूँ कि यह कीट मुझे काट ले। ऐसा कहकर महाराज परीक्षित्ने उसे अपने गलेपर रख लिया। सूर्यके अस्त होते ही गलेपर स्थित वह कीट साक्षात् कालस्वरूप भयानक तक्षकके रूपमें परिणत हो गया॥ ५९–६२॥ |
| राजा संवेष्टितस्तेन दष्टश्चापि महीपतिः।<br>मन्त्रिणो विस्मयं प्राप्ता रुरुदुर्भृशदुःखिताः॥ ६३ | उस नागने तत्काल राजाको लपेट लिया तथा उन्हें डँस लिया। यह देखते ही सभी मन्त्री आश्चर्यमें पड़ गये और अत्यधिक दुःखित होकर विलाप करने लगे॥ ६३॥ |
| घोररूपमहिं वीक्ष्य दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः।<br>चुक्रुशू रक्षकाः सर्वे हाहाकारो महानभूत्॥ ६४ | भयंकर रूपवाले उस सर्पको देखकर सभी सचिवगण भयभीत होकर वहाँसे भागने लगे और सभी रक्षकगण चिल्लाने लगे। इस प्रकार वहाँ महान् हाहाकार मच गया॥ ६४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 C
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिन्मरणं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
| २२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| वेष्टितो भोगिभोगेन विनष्टबहुपौरुषः।<br>नोवाच नृपतिः किञ्चिन्न चचालोत्तरासुतः॥ ६५ | उस सर्पके शरीरसे बद्ध हो जानेके कारण राजाका महान् बल प्रभावहीन हो गया, जिससे वे उत्तरापुत्र परीक्षित् कुछ भी बोल पाने तथा हिल-डुल सकनेमें असमर्थ हो गये॥ ६५॥ | | उत्थिताग्निशिखा घोरा विषजा तक्षकाननात्।<br>प्रजज्वाल नृपं त्वाशु गतप्राणं चकार ह॥ ६६ | तक्षकके मुखसे विषजनित भयंकर आगकी ज्वालाएँ उठने लगीं। उस भीषण ज्वालाने क्षणभरमें राजाको जला दिया और शीघ्र ही उन्हें निष्प्राण कर दिया॥ ६६॥ | | हत्वाशु जीवितं राज्ञस्तक्षको गगने गतः।<br>जगद्दग्धं तु कुर्वाणं ददृशुस्तं जना इह॥ ६७ | इस प्रकार क्षणमात्रमें ही राजाका प्राण हरकर वह तक्षकनाग आकाशमें चला गया। वहाँ लोगोंने संसारको भस्मसात् कर देनेकी सामर्थ्यवाले उस तक्षकको देखा॥ ६७॥ | | स पपात गतप्राणो राजा दग्ध इव द्रुमः।<br>चुक्रुशुश्च जनाः सर्वे मृतं दृष्ट्वा नराधिपम्॥ ६८ | वे राजा परीक्षित् प्राणहीन होकर जले हुए वृक्षकी भाँति गिर पड़े और राजाको मृत देखकर सभी लोग विलाप करने लगे॥ ६८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिन्मरणं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
अथैकादशोऽध्यायः
जनमेजयका राजा बनना और उत्तंककी प्रेरणासे सर्प-सत्र करना, आस्तीकके कहनेसे राजाद्वारा सर्प-सत्र रोकना
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| गतप्राणं तु राजानं बालं पुत्रं समीक्ष्य च।<br>चक्रुश्च मन्त्रिणः सर्वे परलोकस्य सत्क्रियाः॥ १ | सभी मन्त्रियोंने राजा परीक्षित्को मृतक तथा उनके पुत्र जनमेजयको अबोध जानकर उनकी परलोक-सम्बन्धी क्रियाएँ सम्यक् प्रकारसे सम्पन्न कीं॥ १॥ |
| गङ्गातीरे दग्धदेहं भस्मप्रायं महीपतिम्।<br>अगरुभिश्चाभियुक्तायां चितायामध्यरोपयन्॥ २ | शरीर दग्ध हो जानेसे भस्मीभूत हुए राजाको उन मन्त्रियोंने गंगाके किनारे अगरुसे बनायी गयी चितापर रखा॥ २॥ |
| दुर्मरणे मृतस्यास्य चक्रुश्चैवोर्ध्वदैहिकीम्।<br>क्रियां पुरोहितास्तस्य वेदमन्त्रैर्विधानतः॥ ३ | अकालमृत्युको प्राप्त राजा परीक्षित्की और्ध्वदैहिक क्रिया राजाके पुरोहितोंद्वारा वैदिक मन्त्रोंके साथ विधिवत् सम्पन्न की गयी॥ ३॥ |
| ददुर्दानानि विप्रेभ्यो गाः सुवर्णं यथोचितम्।<br>अन्नं बहुविधं तत्र वस्त्राणि विविधानि च॥ ४ | मन्त्रियोंने ब्राह्मणोंको गायें, सुवर्ण, अनेक प्रकारके अन्न तथा नाना प्रकारके वस्त्र यथोचित रूपसे दानमें दिये॥ ४॥ |
| सुमुहूर्ते सुतं बालं प्रजानां प्रीतिवर्धनम्।<br>सिंहासने शुभे तत्र मन्त्रिणः संन्यवेशयन्॥ ५ | तत्पश्चात् मन्त्रियोंने प्रजाओंके प्रति प्रीति-सम्वर्धन करनेवाले राजपुत्र जनमेजयको शुभ मुहूर्तमें सुन्दर राजसिंहासनपर आसीन किया॥ ५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 D
| अ० ११] | द्वितीय स्कन्ध | २२९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पौरा जानपदा लोकाश्चक्रुस्तं नृपतिं शिशुम्।<br>जनमेजयनामानं राजलक्षणसंयुतम्॥ ६ | पुरवासी तथा जनपदवासी प्रजाओंने राजलक्षणोंसे सम्पन्न जनमेजय नामक उस बालकको अपने राजाके रूपमें स्वीकार किया॥ ६॥ |
| धात्रेयी शिक्षयामास राजचिह्नानि सर्वशः।<br>दिने दिने वर्धमानः स बभूव महामतिः॥ ७ | राजकुमारकी धात्रीने उन्हें सब प्रकारके राजोचित गुणोंकी शिक्षा दी। इस प्रकार दिन-प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होते हुए वे महान् बुद्धिमान् हो गये॥ ७॥ |
| प्राप्ते चैकादशे वर्षे तस्मै कुलपुरोहितः।<br>यथोचितां ददौ विद्यां जग्राह स यथोचिताम्॥ ८ | उनकी ग्यारह वर्षकी अवस्था होनेपर कुल-पुरोहितने उन्हें यथोचित शिक्षा प्रदान की और उन्होंने उसे सम्यक् रूपसे ग्रहण किया॥ ८॥ |
| धनुर्वेदं कृपः पूर्णं ददावस्मै सुसंस्कृतम्।<br>अर्जुनाय यथा द्रोणः कर्णाय भार्गवो यथा॥ ९ | जिस प्रकार द्रोणाचार्यने अर्जुनको तथा भार्गव परशुरामने कर्णको धनुर्विद्यामें प्रशिक्षित किया, उसी प्रकार कृपाचार्यने जनमेजयको भलीभाँति परिष्कृत धनुर्विद्या प्रदान की॥ ९॥ |
| सम्प्राप्तविद्यो बलवान्बभूव दुरतिक्रमः।<br>धनुर्वेदे तथा वेदे पारगः परमार्थवित्॥ १० | इस प्रकार सम्पूर्ण विद्या प्राप्त करके वे जनमेजय वेद तथा धनुर्वेदमें पूर्ण पारंगत, बलशाली, अपराजेय तथा परमार्थवेत्ता हो गये॥ १०॥ |
| धर्मशास्त्रार्थकुशलः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>चकार राज्यं धर्मात्मा पुरा धर्मसुतो यथा॥ ११ | वे धर्मशास्त्रके अर्थोंका विवेचन करनेमें कुशल, सत्यनिष्ठ, इन्द्रियजित् और धर्मात्मा थे। उन्होंने पूर्वमें धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरकी भाँति राज्य-शासन किया॥ ११॥ |
| ततः सुवर्णवर्माख्यो राजा काशिपतिः किल।<br>वपुष्टमां शुभां कन्यां ददौ पारीक्षिताय च॥ १२ | इसके बाद सुवर्णवर्मा नामवाले काशिपति राजाने शुभ गुणोंवाली अपनी कन्या वपुष्टमाका पाणिग्रहण जनमेजयके साथ सम्पन्न कर दिया॥ १२॥ |
| स तां प्राप्यासितापाङ्गीं मुमुदे जनमेजयः।<br>काशिराजसुतां कान्तां प्राप्य राजा यथा पुरा॥ १३<br><br>विचित्रवीर्यो मुमुदे सुभद्रां च यथार्जुनः।<br>विजहार महीपालो वनेषूपवनेषु च॥ १४<br><br>तया कमलपत्राक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा।<br>प्रजास्तस्य सुसन्तुष्टा बभूवुः सुखलालिताः॥ १५<br><br>मन्त्रिणः कर्मकुशलाश्चक्रुः कार्याणि सर्वशः। | जिस प्रकार प्राचीन कालमें काशिराजकी पुत्रीको पाकर विचित्रवीर्य तथा सुभद्राको पाकर अर्जुन अत्यन्त आह्लादित हुए थे, उसी प्रकार उस श्याम नयनोंवालीको अपनी कान्ताके रूपमें पाकर जनमेजय अति प्रसन्न हुए। कमलपत्रके समान नेत्रोंवाली उस वपुष्टमाके साथ वनों और उपवनोंमें राजा जनमेजय उसी प्रकार विहार करने लगे जिस प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र। उनके द्वारा सुखपूर्वक रक्षित प्रजा अति सन्तुष्ट थी। जनमेजयके कार्यकुशल सभी मन्त्री समस्त कार्योंको सम्यक् प्रकारसे करते थे॥ १३-१५ १/२॥ |
| २३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
|---|
| एतस्मिन्नेव काले तु मुनिरुत्तङ्कनामकः ॥ १६<br>तक्षकेण परिक्लिष्टो हस्तिनापुरमभ्यगात्।<br>वैरस्यापचितिं कोऽस्य प्रकुर्यादिति चिन्तयन् ॥ १७<br>परीक्षितसुतं मत्वा तं नृपं समुपागतः।<br>कार्याकार्यं न जानासि समये नृपसत्तम ॥ १८<br>अकर्तव्यं करोष्यद्य कर्तव्यं न करोषि वै।<br>किं त्वां सम्प्रार्थयाम्यद्य गतामर्षं निरुद्यमम् ॥ १९<br>अवैर्ज्ञमतन्त्रज्ञं बालचेष्टासमन्वितम्। | इसी समय तक्षकके द्वारा पीड़ित उतंक नामक मुनिका हस्तिनापुरमें आगमन हुआ। 'इस सर्पकी शत्रुताका बदला कौन ले सकता है'—ऐसा सोचते हुए वे परीक्षित्-पुत्र जनमेजयको यह कार्य कर सकनेवाला समझकर उनके पास आये और बोले—हे भूपवर! आपको यह ज्ञान नहीं है कि इस समय क्या करणीय है और क्या अकरणीय है? आप इस समय न करनेयोग्य कार्य कर रहे हैं और करनेयोग्य कार्य नहीं कर रहे हैं। आपसदृश रोषहीन, पुरुषार्थरहित, वैरभावके ज्ञानसे शून्य, प्रतीकार आदि उपायोंको न जाननेवाले तथा बालकोंके समान स्वभाववाले राजासे अब मैं क्या कहूँ? ॥ १६–१९ १/२ ॥ | | जनमेजय उवाच<br>किं वैरं न मया ज्ञातं न किं प्रतिकृतं मया ॥ २०<br>तद्वद त्वं महाभाग करोमि यदनन्तरम्। | जनमेजय बोले—मैंने किस शत्रुताको नहीं जाना और उसका प्रतीकार नहीं किया? हे महाभाग! आप मुझे वह बतायें, जिससे मैं उसे सम्पन्न कर सकूँ॥ २० १/२ ॥ | | उत्तङ्क उवाच<br>पिता ते निहतो भूप तक्षकेण दुरात्मना ॥ २१<br>मन्त्रिणस्त्वं समाहूय पृच्छ स्वपितृनाशनम्। | उत्तंक बोले—हे राजन्! आपके पिता परीक्षित् दुष्टात्मा तक्षकनागद्वारा मार डाले गये थे। आप मन्त्रियोंको बुलाकर अपने पिताकी मृत्युके विषयमें पूछिये॥ २१ १/२ ॥ | | सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राजा पप्रच्छ मन्त्रिसत्तमान् ॥ २२<br>ऊचुस्ते द्विजशापेन दष्टः सर्पेण वै मृतः। | सूतजी बोले—उतंकका वचन सुनकर राजाने मन्त्रिप्रवरोंसे पूछा। तब उन्होंने बताया कि ब्राह्मणद्वारा शापित होनेके कारण एक सर्पने उन्हें डँस लिया और वे मर गये॥ २२ १/२ ॥ | | जनमेजय उवाच<br>शापोऽत्र कारणं राज्ञः शप्तस्य मुनिना किल ॥ २३<br>तक्षकस्य तु को दोषो ब्रूहि मे मुनिसत्तम। | जनमेजय बोले—मेरे पिता राजा परीक्षित्की मृत्युका कारण तो मुनिद्वारा प्रदत्त शाप था। हे मुनिश्रेष्ठ! मुझे यह बताइये कि इसमें तक्षकका क्या दोष था?॥ २३ १/२ ॥ | | उत्तङ्क उवाच<br>तक्षकेण धनं दत्त्वा कश्यपः सन्निवारितः ॥ २४<br>न स किं तक्षको वैरी पितृहा तव भूपते।<br>भार्या रुरोः पुरा भूप दष्टा सर्पेण सा मृता ॥ २५<br>अविवाहिता तु मुनिना जीविता च पुनः प्रिया।<br>रुरुणापि कृता तत्र प्रतिज्ञा चातिदारुणा ॥ २६ | उत्तंक बोले—तक्षकने कश्यप नामक ब्राह्मणको धन देकर आपके पितातक पहुँचनेसे रोक दिया था। हे राजन्! आपके पिताका हन्ता वह तक्षक क्या आपका शत्रु नहीं है? हे भूप! प्राचीन कालमें मुनि रुरुकी भार्याको सर्पने डँस लिया था और वह मर गयी थी। वह अविवाहिता थी। मुनि रुरुने अपनी उस प्रियाको पुनः जीवित कर दिया और उन्होंने वहींपर |
अ० ११] द्वितीय स्कन्ध २३१
अ० ११] द्वितीय स्कन्ध २३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यं यं सर्प प्रपश्यामि तं तं हन्यायुधेन वै।<br>एवं कृत्वा प्रतिज्ञां स शस्त्रपाणी रुरुस्तदा ॥ २७<br>व्यचरत्पृथिवीं राजन्निघ्नन्सर्पान्यतस्ततः।<br>एकदा स वने घोरं डुण्डुभं जरसान्वितम् ॥ २८<br>अपश्यद्दण्डमुद्यम्य हन्तुं तं समुपाययौ।<br>अभ्यहन् रुषितो विप्रस्तमुवाचाथ डुण्डुभः ॥ २९<br>नापराध्नोमि ते विप्र कस्मान्मामभिहंसि वै। | अत्यन्त भीषण प्रतिज्ञा की कि मैं जिस किसी भी सर्पको देखूँगा, उसे तत्काल आयुधसे मार डालूँगा। हे राजन्! इस प्रकार प्रतिज्ञा करके हाथमें शस्त्र लेकर मुनि रुरु सर्पोंका वध करते हुए इधर-उधर घूमते रहे। एक बार उन्हें वनमें एक बूढ़ा डुंडुभ साँप दिखायी दिया। वे लाठी उठाकर रोषपूर्वक उसे मारनेके लिये तत्पर हुए, तब डुंडुभने उन ब्राह्मणसे कहा— हे विप्र! मैं आपके प्रति कोई अपराध नहीं कर रहा हूँ, तो फिर आप मुझे क्यों मार रहे हैं?॥ २४—२९ १/२ ॥ |
| रुरुरुवाच<br>प्राणप्रिया मे दयिता दष्टा सर्पेण सा मृता॥ ३०<br>प्रतिज्ञेयं तदा सर्प दुःखितेन मया कृता। | **रुरु बोले—**मेरी प्राणप्रिया भार्याको सर्पने डँस लिया था और उसकी मृत्यु हो गयी थी। अतः हे सर्प! उसी समयसे दुःखित होकर मैंने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली थी॥ ३० १/२ ॥ |
| डुण्डुभ उवाच<br>नाहं दशामि तेऽन्ये वै ये दशन्ति भुजङ्गमाः ॥ ३१<br>शरीरसमयोगेन न मां हिंसितुमर्हसि। | **डुंडुभ बोला—**मैं किसीको काटता नहीं। जो सर्प काटते हैं, वे दूसरे होते हैं। इसलिये सर्पसदृश शरीर होनेके कारण मुझे आप मत मारिये॥ ३१ १/२ ॥ |
| उत्तङ्क उवाच<br>श्रुत्वा तां मानुषीं वाणीं सर्पेणोक्तां मनोहराम् ॥ ३२<br>रुरुः पप्रच्छ कोऽसि त्वं कस्माद् डुण्डुभतां गतः। | **उत्तंक बोले—**मनुष्यके समान उसकी सुन्दर वाणी सुनकर रुरुने पूछा—तुम कौन हो? और डुंडुभयोनिको कैसे प्राप्त हो गये?॥ ३२ १/२ ॥ |
| सर्प उवाच<br>ब्राह्मणोऽहं पुरा विप्र सखा मे खगमाभिधः ॥ ३३<br>विप्रो धर्मभृतां श्रेष्ठः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>स मया वञ्चितो मौर्ख्यात्सर्पं कृत्वा च तार्णकम् ॥ ३४ | **सर्प बोला—**हे विप्र! पहले मैं ब्राह्मण था और ‘खगम’ नामका मेरा एक ब्राह्मण मित्र था। वह धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय था। एक बार अपनी मूर्खतावश मैंने तृणका सर्प बनाकर उसे धोखेमें डाल दिया॥ ३३-३४॥ |
| भयं च प्रापितोऽत्यर्थमग्निहोत्रगृहे स्थितः।<br>तेन भीतेन शप्तोऽहं विह्वलेनातिवेपिना ॥ ३५<br>भव सर्पो मन्दबुद्धे येनाहं धर्षितस्त्वया।<br>मया प्रसादितोऽत्यर्थं सर्पेणासौ द्विजोत्तमः ॥ ३६<br>मामुवाचाथ तत्क्रोधात्किञ्चिच्छान्तिमवाप्य च।<br>रुरुस्ते मोचिता शापस्यास्य सर्प भविष्यति ॥ ३७<br>प्रमतेस्तु सुतो नूनमिति मां सोऽब्रवीद्वचः।<br>सोऽहं सर्पो रुरुस्त्वं च शृणु मे परमं वचः ॥ ३८ | उस समय वह अग्निहोत्रगृहमें विद्यमान था, सर्पको देखकर अत्यन्त डर गया। भयसे थर-थर काँपते हुए उस ब्राह्मणने विह्वल होकर मुझे शाप दे दिया—हे मन्दबुद्धि! तुमने सर्प दिखाकर मुझे डराया है, अतः तुम सर्प हो जाओ। सर्परूपमें मैंने उस ब्राह्मणकी बड़ी प्रार्थना की। तब उस ब्राह्मणने क्रोधसे थोड़ा शान्त होनेपर मुझसे कहा—हे सर्प! प्रमतिपुत्र रुरु तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे। उन्होंने यह बात स्वयं मुझसे कही थी। मैं वही सर्प हूँ और आप रुरु हैं। आप मेरे वचनको ध्यानपूर्वक सुनिये—ब्राह्मणोंके |
| २३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
|---|
| अहिंसा परमो धर्मो विप्राणां नात्र संशयः।<br>दया सर्वत्र कर्तव्या ब्राह्मणेन विजानता॥ ३९<br>यज्ञादन्यत्र विप्रेन्द्र न हिंसा याज्ञिकी मता। | लिये अहिंसा परम धर्म है, इसमें सन्देह नहीं। अतः विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि वह सर्वत्र दया करे। हे विप्रवर! यज्ञसे अतिरिक्त कहीं भी की गयी हिंसा याज्ञिकी हिंसा नहीं कही गयी है॥ ३५-३९ १/२ ॥ | | उत्तङ्क उवाच | उत्तंक बोले— | | सर्पयोनेर्विनिर्मुक्तो ब्राह्मणोऽसौ रुरुस्ततः॥ ४०<br>कृत्वा तस्य च शापान्तं परित्यक्तं च हिंसनम्।<br>विवाहिता तेन बाला मृता सञ्जीविता पुनः॥ ४१ | तब वह ब्राह्मण सर्पयोनिसे मुक्त हो गया। इस प्रकार उस ब्राह्मणके शापका अन्त करके रुरुने भी हिंसा छोड़ दी। उन्होंने मरी हुई उस सुन्दरीको पुनः जीवित कर दिया और उसके साथ विवाह कर लिया॥ ४०-४१॥ | | कदनं सर्वसर्पाणां कृतं वैरमनुस्मरन्।<br>त्वं तु वैरं समुत्सृज्य वर्तसे पन्नगेष्वथ॥ ४२<br>विमन्युर्भरतश्रेष्ठ पितृघातकरेषु वै।<br>अन्तरिक्षे मृतस्तातः स्नानदानविवर्जितः॥ ४३<br>तस्योद्धारं च राजेन्द्र कुरु हत्वाथ पन्नगान्।<br>पितुर्वैरं न जानाति जीवन्नेव मृतो हि सः॥ ४४<br>दुर्गतिस्ते पितुस्तावद्यावत्तान्न हनिष्यसि।<br>अम्बामखमिशं कृत्वा कुरु यज्ञं नृपोत्तम॥ ४५<br>सर्पसत्रं महाराज पितुर्वैरमनुस्मरन्। | हे राजन्! उस मुनिने इस प्रकार शत्रुताका स्मरण करते हुए सभी सर्पोंका संहार किया था, परंतु हे भरतश्रेष्ठ! आप तो वैर भूलकर अपने पिताको मारनेवाले सर्पोंके प्रति क्रोधशून्य बने रहते हैं। आपके पिता स्नान-दान किये बिना अन्तरिक्षमें ही मर गये। इसलिये हे राजेन्द्र! सर्पोंका नाश करके आप उनका उद्धार कीजिये। जो पुत्र पिताके शत्रुओंसे बदला नहीं लेता, वह जीते हुए भी मृतकवत् है। हे नृपश्रेष्ठ! जबतक आप सर्पोंका विनाश नहीं करते, तबतक आपके पिताकी दुर्गति ही रहेगी। हे महाराज! आप देवीयज्ञके व्याजसे अपने पिताकी शत्रुताका स्मरण करते हुए सर्पसत्र नामक यज्ञ कीजिये॥ ४२—४५ १/२ ॥ | | सूत उवाच | सूतजी बोले— | | इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा जन्मेजयस्तदा॥ ४६<br>नेत्राभ्यामश्रुपातं च चकारातीव दुःखितः।<br>धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धेर्वृथा मानकरस्य वै॥ ४७<br>पिता यस्य गतिं घोरां प्राप्तः पन्नगपीडितः।<br>अद्याहं मखमारभ्य करोम्यपचितिं पितुः॥ ४८<br>हत्वा सर्पानसन्दिग्धो दीप्यमाने विभावसौ। | उत्तंकमुनिका यह वचन सुनकर राजा जनमेजय अत्यन्त दुःखी हुए और उनके नेत्रोंसे अश्रुपात होने लगा। [वे मनमें सोचने लगे] जिसके पिता सर्पसे दंशित होकर इस प्रकार गतिको प्राप्त हों, उस मुझ मिथ्याभिमानी तथा दुर्बुद्धिको धिक्कार है। मैं आज ही यज्ञ आरम्भ करके प्रज्वलित अग्निमें सर्पोंकी आहुति देकर अवश्य ही पिताकी मृत्युका बदला लूँगा॥ ४६—४८ १/२ ॥ | | आहूय मन्त्रिणः सर्वान् राजा वचनमब्रवीत्॥ ४९<br>कुर्वन्तु यज्ञसम्भारं यथार्हं मन्त्रिसत्तमाः।<br>गङ्गातीरे शुभां भूमिं मापयित्वा द्विजोत्तमैः॥ ५० | सभी मन्त्रियोंको बुलाकर राजाने यह वचन कहा—हे मन्त्रिप्रवरो! गंगाके किनारे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे उत्तम भूमिकी माप कराकर आपलोग यथोचित यज्ञसामग्रीका प्रबन्ध करें। हे मेरे बुद्धिमान् मन्त्रियो! सौ खंभोंवाले एक सुरम्य मण्डपका निर्माण कराकर |
| अ० ११] | द्वितीय स्कन्ध | २३३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुर्वन्तु मण्डपं स्वस्थाः शतस्तम्भं मनोहरम्।<br>वेदी यज्ञस्य कर्तव्या ममाद्य सचिवाः खलु॥ ५१<br><br>तदङ्गत्वे विधेयो वै सर्पसत्रः सुविस्तरः।<br>तक्षकस्तु पशुस्तत्र होतोत्तङ्को महामुनिः॥ ५२<br><br>शीघ्रमाहूयतां विप्राः सर्वज्ञा वेदपारगाः। | आपलोग उसमें आज ही यज्ञके लिये वेदीका भी निर्माण सम्पन्न करा लें। उस यज्ञके अंगरूपमें विस्तारसहित सर्पसत्र भी करना है। महामुनि उतंक उस यज्ञके होता होंगे और तक्षकनाग उसमें यज्ञपशु होगा। आपलोग शीघ्र ही सर्वज्ञाता एवं वेदपारगामी ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करें॥ ४९—५२ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>मन्त्रिणस्तु तदा चक्रुर्भूपवाक्यैर्विचक्षणाः॥ ५३<br><br>यज्ञस्य सर्वसम्भारं वेदीं यज्ञस्य विस्तृताम्।<br>हवने वर्तमाने तु सर्पाणां तक्षको गतः॥ ५४<br><br>इन्द्रं प्रति भयार्तोऽहं त्राहि मामिति चाब्रवीत्।<br>भयभीतं समाश्वास्य स्वासने सन्निवेश्य च॥ ५५ | **सूतजी बोले—**बुद्धिमान् मन्त्रियोंने राजाके कथनानुसार यज्ञसम्बन्धी समस्त सामग्रीका प्रबन्ध कर लिया और विस्तृत यज्ञवेदी भी निर्मित करायी। सर्पोंका हवन आरम्भ होनेपर तक्षक इन्द्रके यहाँ गया और उनसे बोला—मैं भयाकुल हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। तत्पश्चात् इन्द्रने उस भयभीत तक्षकको सान्त्वना देकर अपने आसनपर बैठाकर उसे अभय प्रदान किया और कहा—हे पन्नग! तुम निर्भय हो जाओ॥ ५३—५५ १/२॥ |
| ददावभयमत्यर्थं निर्भयो भव पन्नग।<br>तमिन्द्रशरणं ज्ञात्वा मुनिर्दत्ताभयं तथा॥ ५६<br><br>उत्तङ्कोऽह्वयदुद्विग्नः सेन्द्रं कृत्वा निमन्त्रणम्।<br>स्मृतस्तदा तक्षकेण यायावरकुलोद्भवः॥ ५७<br><br>आस्तीको नाम धर्मात्मा जरत्कारुसुतो मुनिः।<br>तत्रागत्य मुनेर्बालस्तुष्टाव जनमेजयम्॥ ५८ | तदनन्तर उतंकमुनि उस तक्षकको इन्द्रका शरणागत और उनसे अभयदान पाया हुआ जानकर उद्विग्न हो उठे और उन्होंने मन्त्रप्रभावसे इन्द्रसहित तक्षकका आवाहन किया। तब तक्षकने यायावरवंशमें उत्पन्न जरत्कारुपुत्र धर्मनिष्ठ आस्तीक-नामक मुनिका स्मरण किया। वे मुनिबालक आस्तीक वहाँ आकर जनमेजयकी प्रशंसा करने लगे॥ ५६—५८॥ |
| राजा तमर्चयामास दृष्ट्वा बालं सुपण्डितम्।<br>अर्चयित्वा नृपस्तं तु छन्दयामास वाञ्छितैः॥ ५९ | राजा जनमेजयने उस बालकको महान् पण्डित देखकर उसकी पूजा की। पूजन-अर्चन करके राजाने अपनी मनोवांछित वस्तु माँगनेके लिये उससे निवेदन किया॥ ५९॥ |
| स तु वव्रे महाभाग यज्ञोऽयं विरमत्विति।<br>सत्यबद्धो नृपस्तेन प्रार्थितश्च पुनस्तथा॥ ६० | तब आस्तीकने याचना की—हे महाभाग! इस यज्ञको समाप्त किया जाय। उसने सत्य वचनमें आबद्ध राजासे बार-बार ऐसी प्रार्थना की॥ ६०॥ |
| होमं निवर्तयामास सर्पाणां मुनिवाक्यतः।<br>भारतं श्रावयामास वैशम्पायन विस्तरात्॥ ६१ | तत्पश्चात् मुनिके वचनानुसार राजाने सर्पोंका हवन बन्द कर दिया और फिर वैशम्पायनऋषिने उन्हें विस्तारपूर्वक महाभारतकी कथा सुनायी॥ ६१॥ |
| श्रुत्वापि नृपतिः कामं न शान्तिमभिजग्मिवान्।<br>व्यासं पप्रच्छ भूपालो मम शान्तिः कथं भवेत्॥ ६२ | उस कथाको सुनकर भी राजाको विशेष शान्ति नहीं प्राप्त हुई तब राजाने व्यासजीसे पूछा—मुझे किस प्रकार शान्ति मिलेगी? मेरा मन अशान्तिकी |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे<br>सर्पसत्रवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
| २३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
|---|
| मनोऽतिदह्यते कामं किं करोमि वदस्व मे।<br>पिता मे दुर्भगस्यैव मृतः पार्थसुतात्मजः ॥ ६३<br><br>क्षत्रियाणां महाभाग सङ्ग्रामे मरणं वरम्।<br>रणे वा मरणं व्यास गृहे वा विधिपूर्वकम् ॥ ६४<br><br>मरणं न पितुर्मेऽभूदन्तरिक्षे मृतोऽवशः।<br>शान्त्युपायं वदस्वात्र त्वं च सत्यवतीसुत ॥ ६५<br>यथा स्वर्गं व्रजेदाशु पिता मे दुर्गतिं गतः ॥ ६६ | अग्निमें अत्यधिक दग्ध हो रहा है, मैं क्या करूँ ? मुझको बतलाइये। मुझ मन्दभाग्यके पिता और अर्जुनपौत्र परीक्षित् अकाल-मृत्युको प्राप्त हुए हैं। हे महाभाग ! युद्धमें होनेवाली मृत्यु ही क्षत्रियोंके लिये श्रेष्ठ होती है। हे व्यासजी ! रणमें अथवा घरमें विधिपूर्वक होनेवाली मृत्यु ही अच्छी मानी जाती है, किंतु मेरे पिताका वैसा मरण नहीं हुआ। वे तो असहाय अवस्थामें अन्तरिक्षमें मृत्युको प्राप्त हुए। हे सत्यवतीपुत्र ! आप उनकी शान्ति-प्राप्तिका कोई उपाय बतलाइये, जिससे दुर्गति को प्राप्त मेरे पिताजी शीघ्र ही स्वर्ग चले जायँ॥ ६२—६६॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे<br>सर्पसत्रवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
आस्तीकमुनिके जन्मकी कथा, कद्रू और विनताद्वारा सूर्यके घोड़ेके रंगके विषयमें शर्त लगाना और विनताको दासीभावकी प्राप्ति, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप
</div>| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच वचनं तत्र सभायां नृपतिं च तम् ॥ १ | **सूतजी बोले—**राजा जनमेजयका वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासने सभामें उन राजासे कहा—॥ १॥ |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुराणं गुह्यमद्भुतम्।<br>पुण्यं भागवतं नाम नानाख्यानयुतं शिवम् ॥ २ | **व्यासजी बोले—**हे राजन् ! सुनिये, मैं आपसे एक पुनीत, कल्याणकारक, रहस्यमय, अद्भुत तथा विविध कथानकोंसे युक्त देवीभागवत नामक पुराण कहूँगा॥ २॥ |
| अध्यापितं मया पूर्वं शुकायात्मसुताय वै।<br>श्रावयामि नृप त्वां हि रहस्यं परमं मम ॥ ३ | मैंने पूर्वकालमें उसे अपने पुत्र शुकदेवको पढ़ाया था। हे राजन् ! मैं अपने परम रहस्यमय पुराणका श्रवण आपको कराऊँगा॥ ३॥ |
| धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं श्रवणात्किल।<br>शुभदं सुखदं नित्यं सर्वागमसमुद्धृतम् ॥ ४ | सभी वेदों एवं शास्त्रोंके सारस्वरूप तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके कारणभूत इस पुराणका श्रवण करनेसे यह मंगल तथा आनन्द प्रदान करनेवाला होता है॥ ४॥ |
| जनमेजय उवाच<br>आस्तीकोऽयं सुतः कस्य विघ्नार्थं कथमागतः।<br>प्रयोजनं किमत्रास्य सर्पाणां रक्षणे प्रभो ॥ ५ | **जनमेजय बोले—**हे प्रभो ! यह आस्तीक किसका पुत्र था और यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये क्यों आया ? यज्ञमें सर्पोंकी रक्षा करनेके पीछे इसका क्या उद्देश्य था ? ॥ ५ ॥ |
| अ० १२ ] | द्वितीय स्कन्ध | २३५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कथयैतन्महाभाग विस्तरेण कथानकम्।<br>पुराणं च तथा सर्वं विस्तराद्वद सुव्रत ॥ ६ | हे महाभाग ! उस आख्यानको विस्तारपूर्वक बताइये। हे सुव्रत ! उस सम्पूर्ण पुराणको भी विस्तारके साथ कहिये ॥ ६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>जरत्कारुर्मुनिः शान्तो न चकार गृहाश्रमम्।<br>तेन दृष्टा वने गर्ते लम्बमानाः स्वपूर्वजाः ॥ ७ | व्यासजी बोले— जरत्कारु एक शान्त स्वभाववाले ऋषि थे, उन्होंने गार्हस्थ्य-जीवन अंगीकार नहीं किया था। उन्होंने एक बार वनमें एक गड्ढेके भीतर अपने पूर्वजोंको लटकते हुए देखा ॥ ७ ॥ |
| ततस्तमाहुः कुरु पुत्र दारा-<br>न्यथा च नः स्यात्परमा हि तृप्तिः।<br>स्वर्गे व्रजामः खलु दुःखमुक्ता<br>वयं सदाचारयुते सुते वै ॥ ८ | तदनन्तर पूर्वजोंने उनसे कहा—हे पुत्र! तुम विवाह कर लो, जिससे हमारी परम तृप्ति हो सके। तुझ सदाचारी पुत्रके ऐसा करनेपर हम-लोग निश्चितरूपसे दुःखमुक्त होकर स्वर्गकी प्राप्ति कर लेंगे ॥ ८ ॥ |
| स तानुवाचाथ लभे समाना-<br>मयाचितां चातिवशानुगां च।<br>तदा गृहारम्भमहं करोमि<br>ब्रवीमि तथ्यं मम पूर्वजा वै ॥ ९ | तब उन जरत्कारुने उनसे कहा—हे मेरे पूर्वजो ! जब मुझे अपने समान नामवाली तथा अत्यन्त वशवर्तिनी कन्या बिना माँगे ही मिलेगी तभी मैं विवाह करके गृहस्थी बसाऊँगा, मैं यह सत्य कह रहा हूँ ॥ ९ ॥ |
| इत्युक्त्वा ताञ्जरत्कारुर्गतस्तीर्थान्प्रति द्विजः।<br>तदैव पन्नगाः शप्ता मात्राग्नौ निपतन्त्विति ॥ १० | उनसे ऐसा कहकर ब्राह्मण जरत्कारु तीर्थाटनके लिये चल पड़े। उसी समय सर्पोंको उनकी माताने शाप दे दिया कि वे अग्निमें गिर जायँ ॥ १० ॥ |
| कश्यपस्य मुनेः पत्न्यौ कद्रूश्च विनता तथा।<br>दृष्ट्वादित्यरथे चाश्वमूचतुश्च परस्परम् ॥ ११ | कश्यपऋषिकी कद्रू और विनता नामक दो पत्नियाँ थीं। सूर्यके रथमें जुते हुए घोड़ेको देखकर वे आपसमें वार्तालाप करने लगीं ॥ ११ ॥ |
| तं दृष्ट्वा च तदा कद्रूर्विनतामिदमब्रवीत्।<br>किंवर्णोऽयं हयो भद्रे सत्यं प्रब्रूहि माचिरम् ॥ १२ | उस घोड़ेको देखकर कद्रूने विनतासे यह कहा—हे कल्याणि ! यह घोड़ा किस रंगका है ? यह मुझे शीघ्र ही सही-सही बताओ ॥ १२ ॥ |
| विनतोवाच<br>श्वेत एवाश्वराजोऽयं किं वा त्वं मन्यसे शुभे।<br>ब्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततस्तु विपणावहे ॥ १३ | विनता बोली— यह अश्वराज श्वेत रंगका है। हे शुभे ! तुम इसे किस रंगका मानती हो ? तुम भी इसका रंग बता दो। तब हम दोनों आपसमें इसपर शर्त लगायें ॥ १३ ॥ |
| कद्रुरुवाच<br>कृष्णवर्णमहं मन्ये हयमेनं शुचिस्मिते।<br>एहि सार्धं मया दिव्यं दासीभावाय भामिनि ॥ १४ | कद्रू बोली— हे शुभ मुसकानवाली ! मैं तो इस घोड़ेको कृष्णवर्णका समझती हूँ। हे भामिनि ! आओ, मेरे साथ शर्त लगाओ कि जो हारेगी, वह दूसरेकी दासी होना स्वीकार करेगी ॥ १४ ॥ |
| २३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ ] |
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| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**कद्रूने अपने सभी आज्ञाकारी सर्पपुत्रोंसे कहा कि तुम सभी लिपटकर उस घोड़ेके शरीरमें जितने बाल हैं, उन्हें काला कर दो॥ १५॥ | | कद्रूश्च स्वसुतानाह सर्वान्सर्पान्वशे स्थितान्।<br>बालाञ्छ्यामान्प्रकुर्वन्तु यावतोऽश्वशरीरके॥ १५ | | | नेति केचन तत्राहुस्तानथासौ शशाप ह।<br>जनमेजयस्य यज्ञे वै गमिष्यथ हुताशनम्॥ १६ | उनमेंसे कुछ सर्पोंने कहा कि हम ऐसा नहीं करेंगे। उन सर्पोंको कद्रूने शाप दे दिया कि तुम लोग जनमेजयके यज्ञमें हवनकी अग्निमें गिर पड़ोगे॥ १६॥ | | अन्ये चक्रुर्हयं सर्पाः कर्बुरं वर्णभोगकैः।<br>वेष्टयित्वास्य पुच्छं तु मातुः प्रियचिकीर्षया॥ १७ | अन्य सर्पोंने माताको प्रसन्न करनेकी कामनासे उस घोड़ेकी पूँछमें लिपटकर अपने विभिन्न रंगोंसे घोड़ेको चितकबरा कर दिया॥ १७॥ | | भगिन्यौ च सुसंयुक्ते गत्वा ददृशतुर्हयम्।<br>कर्बुरं तं हयं दृष्ट्वा विनता चातिदुःखिता॥ १८ | तदनन्तर दोनों बहिनोंने साथ-साथ जाकर घोड़ेको देखा। उस घोड़ेको चितकबरा देखकर विनता बहुत दुःखी हुई॥ १८॥ | | तदाजगाम गरुडः सुतस्तस्या महाबलः।<br>स दृष्ट्वा मातरं दीनामपृच्छत्पन्नगाशनः॥ १९ | उसी समय सर्पोंका आहार करनेवाले महाबली विनतापुत्र गरुडजी वहाँ आ गये। उन्होंने अपनी माताको दुःखित देखकर उनसे पूछा—॥ १९॥ | | मातः कथं सुदीनासि रुदितेव विभासि मे।<br>जीवमाने मयि सुते तथान्ये रविसारथौ॥ २०<br><br>दुःखितासि ततो वां धिग्जीवितं चारुलोचने।<br>किं जातेन सुतेनाथ यदि माता सुदुःखिता॥ २१<br><br>शंस मे कारणं मातः करोमि विगतज्वराम्। | हे माता! आप बहुत उदास क्यों हैं? आप मुझे रोती हुई प्रतीत हो रही हैं। हे सुनयने! मेरे एवं सूर्यसारथि अरुणसदृश पुत्रोंके जीवित रहते यदि आप दुःखी हैं, तब हमारे जीवनको धिक्कार है! यदि माता ही परम दुःखी हों तो पुत्रके उत्पन्न होनेसे क्या लाभ? हे माता! आप मुझे अपने दुःखका कारण बताइये, मैं आपको दुःखसे मुक्त करूँगा॥ २०-२१ १/२॥ | | विनतोवाच<br>सपल्या दास्यहं पुत्र किं ब्रवीमि वृथा क्षता॥ २२<br><br>वह मां सा ब्रवीत्यद्य तेनास्मि दुःखिता सुत। | **विनता बोली—**हे पुत्र! मैं अपनी सौतकी दासी हो गयी हूँ। अब व्यर्थमें मारी गयी मैं क्या कहूँ? वह मुझसे अब कह रही है कि मैं उसे अपने कन्धेपर ढोऊँ। हे पुत्र! मैं इसीसे दुःखी हूँ॥ २२ १/२॥ | | गरुड उवाच<br>वहिष्येऽहं तत्र किल यत्र सा गन्तुमुत्सुका॥ २३<br><br>मा शोकं कुरु कल्याणि निश्चिन्तां त्वां करोम्यहम्। | **गरुडजी बोले—**वे जहाँ भी जानेकी कामना करेंगी, मैं उन्हें ढोकर वहाँ ले जाऊँगा। हे कल्याणि! आप शोक न करें, मैं आपको निश्चिन्त कर देता हूँ॥ २३ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा गता पार्श्वं कद्रोश्च विनता तदा॥ २४ | **व्यासजी बोले—**गरुडद्वारा ऐसा कहे जानेपर विनता उसी समय कद्रूके पास चली गयी। महाबली गरुड भी अपनी माता विनताको दास्य- |
अ० १२] द्वितीय स्कन्ध २३७
अ० १२] द्वितीय स्कन्ध २३७
| दासीभावमपाकर्तुं गरुडोऽपि महाबलः।<br>उवाह तां सपुत्रां वै सिन्धोः पारं जगाम ह॥ २५ | भावसे मुक्ति दिलानेके उद्देश्यसे कद्रूको उसके पुत्रोंसहित अपनी पीठपर बैठाकर सागरके उस पार ले गये॥ २४-२५॥ |
| गत्वा तां गरुडः प्राह ब्रूहि मातर्नमोऽस्तु ते।<br>कथं मुच्येत मे माता दासीभावादसंशयम्॥ २६ | वहाँ जाकर गरुडने कद्रूसे कहा—हे जननि! आपको बार-बार प्रणाम है। अब आप मुझे यह बतायें कि मेरी माता दासीभावसे निश्चित ही कैसे मुक्त होंगी ?॥ २६॥ |
| कद्रुरुवाच<br>अमृतं देवलोकात्त्वं बलादानीय मे सुतान्।<br>समर्पय सुताद्याशु मातरं मोचयाबलाम्॥ २७ | कद्रू बोली—हे पुत्र! तुम स्वर्गलोकसे बलपूर्वक अमृत लाकर मेरे पुत्रोंको दे दो और शीघ्र ही अपनी अबला माताको मुक्त करा लो॥ २७॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्तः प्रययौ शीघ्रमिन्द्रलोकं महाबलः।<br>कृत्वा युद्धं जहाराशु सुधाकुम्भं खगोत्तमः॥ २८ | व्यासजी बोले—कद्रूके ऐसा कहनेपर पक्षिश्रेष्ठ महाबली गरुड उसी समय इन्द्रलोक गये और देवताओंसे युद्ध करके उन्होंने सुधा-कलश छीन लिया। अमृत लाकर उन्होंने उसे अपनी विमाता कद्रूको अर्पण कर दिया और उन्होंने विनताको दासीभावसे निःसन्देह मुक्त करा लिया॥ २८-२९॥ |
| समानीयामृतं मात्रे वैनतेयः समर्पयत्।<br>मोचिता विनता तेन दासीभावादसंशयम्॥ २९ | |
| अमृतं सञ्जहारेन्द्रः स्नातुं सर्पा यदा गताः।<br>दासीभावाद्धिनिर्मुक्ता विनता विपतेर्बलात्॥ ३० | जब सभी सर्प स्नान करनेके लिये चले गये, तब इन्द्रने अमृत चुरा लिया। इस प्रकार गरुडके प्रतापसे विनता दासीभावसे छूट गयी॥ ३०॥ |
| तत्रास्तीर्णाः कुशास्तैस्तु लीढाः पन्नगनामकैः।<br>द्विजिव्हास्ते सुसम्पन्नाः कुशाग्रस्पर्शमात्रतः॥ ३१ | अमृतघटके पास कुश बिछे हुए थे, जिन्हें सर्प अपनी जिह्वासे चाटने लगे। तब कुशके अग्रभागके स्पर्शमात्रसे ही वे दो जीभवाले हो गये॥ ३१॥ |
| मात्रा शप्ताश्च ये नागा वासुकिप्रमुखाः शुचा।<br>ब्रह्माणं शरणं गत्वा ते होचुः शापजं भयम्॥ ३२ | जिन सर्पोंको उनकी माताने शाप दिया था, वे वासुकिआदि नाग चिन्तित होकर ब्रह्माजीके पास गये और उन्होंने अपने शाप-जनित भयकी बात बतायी। ब्रह्माजीने उनसे कहा—जरत्कारु नामके एक महामुनि हैं, तुमलोग उन्हींके नामवाली वासुकिनागकी बहन जरत्कारुको उन्हें अर्पित कर दो। उस कन्यासे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तुमलोगोंका रक्षक होगा। वह ‘आस्तीक’—इस नामवाला होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३२–३४॥ |
| तानाह भगवान्ब्रह्मा जरत्कारुर्महामुनिः।<br>वासुकेर्भगिनीं तस्मै अर्पयध्वं सनामिकाम्॥ ३३ | |
| तस्यां यो जायते पुत्रः स वस्त्राता भविष्यति।<br>आस्तीक इति नामासौ भविता नात्र संशयः॥ ३४ | |
| वासुकिस्तु तदाकर्ण्य वचनं ब्रह्मणः शिवम्।<br>वनं गत्वा सुतां तस्मै ददौ विनयपूर्वकम्॥ ३५ | ब्रह्माजीका वह कल्याणकारी वचन सुनकर वासुकिने वनमें जाकर अपनी बहन उन्हें विनयपूर्वक समर्पित कर दी॥ ३५॥ |
| २३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनामां तां मुनिर्ज्ञात्वा जरत्कारुरुवाच तम्।<br>अप्रियं मे यदा कुर्यात्तदा तां सन्त्यजाम्यहम्॥ ३६ | जरत्कारुमुनिने उसे अपने ही समान नामवाली जानकर उनसे कहा—जब भी यह मेरा अप्रिय करेगी, तब मैं इसका परित्याग कर दूँगा॥ ३६॥ |
| वाग्बन्धं तादृशं कृत्वा मुनिर्जग्राह तां स्वयं।<br>दत्त्वा च वासुकिः कामं भवनं स्वं जगाम ह॥ ३७ | वैसी प्रतिज्ञा करके जरत्कारुमुनिने उस जरत्कारुको पत्नीरूपसे ग्रहण कर लिया। वासुकिनाग भी अपनी बहन उन्हें प्रदानकर आनन्दपूर्वक अपने घर लौट गये॥ ३७॥ |
| कृत्वा पर्णकुटीं शुभ्रां जरत्कारुर्महावने।<br>तया सह सुखं प्राप रममाणः परन्तप॥ ३८ | हे परन्तप! मुनि जरत्कारु उस महावनमें सुन्दर पर्णकुटी बनाकर उसके साथ रमण करते हुए सुख भोगने लगे॥ ३८॥ |
| एकदा भोजनं कृत्वा सुप्तोऽसौ मुनिसत्तमः।<br>भगिनी वासुकेस्तत्र संस्थिता वरवर्णिनी॥ ३९<br><br>न सम्बोधयितव्योऽहं त्वया कान्ते कथञ्चन।<br>इत्युक्त्वा तु गतो निद्रां मुनिस्तां सुदतीं तदा॥ ४० | एक समय मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु भोजन करके विश्राम कर रहे थे, वासुकिकी बहन सुन्दरी जरत्कारु भी वहीं बैठी हुई थी। [मुनिने उससे कहा] हे कान्ते! तुम मुझे किसी भी प्रकार जगाना मत—उस सुन्दर दाँतोंवालीसे ऐसा कहकर वे मुनि सो गये॥ ३९-४०॥ |
| रविरस्तगिरिं प्राप्तः सन्ध्याकाल उपस्थिते।<br>किं करोमि न मे शान्तिस्त्यजेन्मां बोधितः पुनः॥ ४१<br><br>धर्मलोपभयाद्भीता जरत्कारुरचिन्तयत्।<br>नोचेत्प्रबोधयाम्येनं सन्ध्याकालो वृथा व्रजेत्॥ ४२ | सूर्य अस्ताचलको प्राप्त हो गये थे। सन्ध्या-वन्दनका समय उपस्थित हो जानेपर धर्मलोपके भयसे डरी हुई जरत्कारु सोचने लगी—मैं क्या करूँ? मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। यदि मैं इन्हें जगाती हूँ तो ये मेरा परित्याग कर देंगे और यदि नहीं जगाती हूँ तो यह सन्ध्याकाल व्यर्थ ही चला जायगा॥ ४१-४२॥ |
| धर्मनाशाद्वरं त्यागस्तथापि मरणं ध्रुवम्।<br>धर्महानिर्नराणां हि नरकाय भवेत्पुनः॥ ४३<br><br>इति सञ्चिन्त्य सा बाला तं मुनिं प्रत्यबोधयत्।<br>सन्ध्याकालोऽपि सञ्जात उत्तिष्ठोत्तिष्ठ सुव्रत॥ ४४ | धर्मनाशकी अपेक्षा त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि मृत्यु तो निश्चित है ही। धर्मके नष्ट होनेपर मनुष्योंको निश्चित ही नरकमें जाना पड़ता है—ऐसा निश्चय करके उस स्त्रीने उन मुनिको जगाया और कहा—हे सुव्रत! उठिये, उठिये, अब सन्ध्याकाल भी उपस्थित हो गया है॥ ४३-४४॥ |
| उत्थितोऽसौ मुनिः कोपात्तामुवाच व्रजाम्यहम्।<br>त्वं तु भ्रातृगृहं याहि निद्राविच्छेदकारिणी॥ ४५ | जगनेपर मुनि जरत्कारुने क्रोधित होकर उससे कहा—अब मैं जा रहा हूँ और मेरी निद्रामें विघ्न डालनेवाली तुम अपने भाई वासुकिके घर चली जाओ॥ ४५॥ |
| अ० १२ ] | द्वितीय स्कन्ध | २३९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वेपमानाब्रवीद्वाक्यमित्युक्ता मुनिना तदा।<br>भ्रात्रा दत्ता यदर्थं तत्कथं स्यादमितप्रभ॥ ४६ | मुनिके ऐसा कहनेपर भयसे काँपती हुई उसने कहा—हे महातेजस्वी! मेरे भाईने जिस प्रयोजनसे मुझे आपको सौंपा था, वह प्रयोजन अब कैसे सिद्ध होगा?॥ ४६॥ |
| मुनिः प्राह जरत्कारुं तदस्तीति निराकुलः।<br>गता सा मुनिना त्यक्ता वासुकेः सदनं तदा॥ ४७ | तदनन्तर मुनिने शान्तचित्त होकर जरत्कारुसे कहा—‘वह तो है ही।’ इसके बाद मुनिके द्वारा परित्यक्त वह कन्या वासुकिके घर चली गयी॥ ४७॥ |
| पृष्टा भ्रात्राब्रवीद्वाक्यं यथोक्तं पतिना तदा।<br>अस्तीत्युक्त्वा च हित्वा मां गतोऽसौ मुनिसत्तमः॥ ४८ | भाई वासुकिके पूछनेपर उसने पतिद्वारा कही गयी बात उनसे यथावत् कह दी और [वह यह भी बोली कि] ‘अस्ति’—ऐसा कहकर वे मुनिश्रेष्ठ मुझको छोड़कर चले गये॥ ४८॥ |
| वासुकिस्तु तदाकर्ण्य सत्यावाङ्मुनिरित्युत।<br>विश्वासं च परं कृत्वा भगिनीं तां समाश्रयत्॥ ४९ | यह सुनकर वासुकिने सोचा कि मुनि सत्यवादी हैं; तत्पश्चात् पूर्ण विश्वास करके उन्होंने अपनी उस बहनको अपने यहाँ आश्रय प्रदान किया॥ ४९॥ |
| ततः कालेन कियता जातोऽसौ मुनिबालकः।<br>आस्तीक इति नामासौ विख्यातः कुरुसत्तम॥ ५० | हे कुरुश्रेष्ठ! कुछ समय बाद मुनिबालक उत्पन्न हुआ और वह आस्तीक नामसे विख्यात हुआ॥ ५०॥ |
| तेनायं रक्षितो यज्ञस्तव पार्थिवसत्तम।<br>मातृपक्षस्य रक्षार्थं मुनिना भावितात्मना॥ ५१ | हे नृपश्रेष्ठ! पवित्र आत्मावाले उन्हीं आस्तीक-मुनिने अपने मातृ-पक्षकी रक्षाके लिये आपका सर्पयज्ञ रुकवाया है॥ ५१॥ |
| भव्यं कृतं महाराज मानितोऽयं त्वया मुनिः।<br>यायावरकुलोत्पन्नो वासुकेर्भगिनीसुतः॥ ५२ | हे महाराज! यायावर वंशमें उत्पन्न और वासुकिकी बहनके पुत्र आस्तीकका आपने सम्मान किया, यह तो बड़ा ही उत्तम कार्य किया है॥ ५२॥ |
| स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो भारतं सकलं श्रुतम्।<br>दानानि बहु दत्तानि पूजिता मुनयस्तथा॥ ५३<br><br>कृतेन सुकृतेनापि न पिता स्वर्गतिं गतः।<br>पावितं न कुलं कृत्स्नं त्वया भूपतिसत्तम॥ ५४<br><br>देव्याश्चायतनं भूप विस्तीर्णं कुरु भक्तितः।<br>येन वै सकला सिद्धिस्तव स्याज्जनमेजय॥ ५५ | हे महाबाहो! आपका कल्याण हो। आपने सम्पूर्ण महाभारत सुना, नानाविध दान दिये और मुनिजनोंकी पूजा की। हे भूपश्रेष्ठ! आपके द्वारा इतना महान् पुण्यकार्य किये जानेपर भी आपके पिता स्वर्गको प्राप्त नहीं हुए और न आपका सम्पूर्ण कुल ही पवित्र हो सका। अतः हे महाराज जनमेजय! आप भक्तिभावसे युक्त होकर देवी भगवतीके एक विशाल मन्दिरका निर्माण कराइये, जिसके द्वारा आप समस्त सिद्धिको प्राप्त कर लेंगे॥ ५३—५५॥ |
| पूजिता परया भक्त्या शिवा सकलदा सदा।<br>कुलवृद्धिं करोत्येव राज्यं च सुस्थिरं सदा॥ ५६ | सर्वस्व प्रदान करनेवाली भगवती दुर्गा परम श्रद्धापूर्वक पूजित होनेपर सदा वंश-वृद्धि करती हैं तथा राज्यको सदा स्थिरता प्रदान करती हैं॥ ५६॥ |
| २४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| देवीमखं विधानेन कृत्वा पार्थिवसत्तम।<br>श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं परमं शृणु॥ ५७ | हे भूपश्रेष्ठ! विधि-विधानके साथ देवीयज्ञ करके आप श्रीमद्देवीभागवत नामक महापुराणका श्रवण कीजिये॥ ५७॥ | | त्वामहं श्रावयिष्यामि कथां परमपावनीम्।<br>संसारतारिणीं दिव्यां नानारससमाहृताम्॥ ५८ | अत्यन्त पुनीत, भवसागरसे पार उतारनेवाली, अलौकिक तथा विविध रसोंसे सम्पृक्त उस कथाको मैं आपको सुनाऊँगा॥ ५८॥ | | न श्रोतव्यं परं चास्मात्पुराणाद्विद्यते भुवि।<br>नाराध्यं विद्यते राजन्देवीपादाम्बुजादृते॥ ५९ | हे राजन्! सम्पूर्ण संसारमें इस पुराणसे बढ़कर अन्य कुछ भी श्रवणीय नहीं है और भगवतीके चरणारविन्दके अतिरिक्त अन्य कुछ भी आराधनीय नहीं है॥ ५९॥ | | ते सभाग्याः कृतप्रज्ञा धन्यास्ते नृपसत्तम।<br>येषां चित्ते सदा देवी वसति प्रेमसंकुले॥ ६० | हे नृपश्रेष्ठ! जिनके प्रेमपूरित हृदयमें सदा भगवती विराजमान रहती हैं; वे ही सौभाग्यशाली, ज्ञानवान् एवं धन्य हैं॥ ६०॥ | | सुदुःखितास्ते दृश्यन्ते भुवि भारत भारते।<br>नाराधिता महामाया यैर्जनैश्च सदाम्बिका॥ ६१ | हे भारत! इस भारतभूमिपर वे ही लोग सदा दुःखी दिखायी देते हैं, जिन्होंने कभी भी महामाया अम्बिकाकी आराधना नहीं की है॥ ६१॥ | | ब्रह्मादयः सुराः सर्वे यदाराधनतत्पराः।<br>वर्तन्ते सर्वदा राजंस्तां न सेवेत को जनः॥ ६२ | हे राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता भी जिन भगवतीकी आराधनामें सर्वदा लीन रहते हैं, उनकी आराधना भला कौन मनुष्य नहीं करेगा?॥ ६२॥ | | य इदं शृणुयान्नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात्।<br>भगवत्या समाख्यातं विष्णवे यदनुत्तमम्॥ ६३ | जो मनुष्य इस पुराणका नित्य श्रवण करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। स्वयं भगवतीने भगवान् विष्णुके समक्ष इस अतिश्रेष्ठ पुराणका वर्णन किया था॥ ६३॥ | | तेन श्रुतेन ते राजंश्चित्ते शान्तिर्भविष्यति।<br>पितॄणां चाक्षयः स्वर्गः पुराणश्रवणाद्भवेत्॥ ६४ | हे राजन्! इस पुराणके श्रवणसे आपके चित्तको परम शान्ति प्राप्त होगी और आपके पितरोंको अक्षय स्वर्ग प्राप्त होगा॥ ६४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे श्रोतॄप्रवक्तृप्रसङ्गो नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
॥ द्वितीयः स्कन्धः समाप्तः ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
तृतीयः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
राजा जनमेजयका ब्रह्माण्डोत्पत्तिविषयक प्रश्न तथा इसके उत्तरमें व्यासजीका पूर्वकालमें नारदजीके साथ हुआ संवाद सुनाना
| जनमेजय उवाच<br>भगवन् भवता प्रोक्तं यज्ञमम्बाभिधं महत्।<br>सा का कथं समुत्पन्ना कुत्र कस्माच्च किंगुणा॥ १ | जनमेजय बोले—हे भगवन्! आपने महान् अम्बा-यज्ञके विषयमें कहा है। वे अम्बा कौन हैं, वे कैसे, कहाँ और किसलिये उत्पन्न हुई हैं और वे कौन-कौनसे गुणोंवाली हैं?॥ १॥ |
|---|---|
| कीदृशश्च मखस्तस्याः स्वरूपं कीदृशं तथा।<br>विधानं विधिवद् ब्रूहि सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ २ | उनका यह यज्ञ कैसा है और उसका क्या स्वरूप है? हे दयानिधान! आप सब कुछ जाननेवाले हैं; उस यज्ञका विधान सम्यक् रूपसे बताइये॥ २॥ |
| ब्रह्माण्डस्य तथोत्पत्तिं वद विस्तरतस्तथा।<br>यथोक्तं यादृशं ब्रह्मन्नखिलं वेत्सि भूसुर॥ ३ | हे ब्रह्मन्! आप विस्तारपूर्वक ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका भी वर्णन कीजिये। हे भूसुर! इस विषयमें अन्य ज्ञानियोंने जैसा कहा है, वह सब कुछ भी आप भलीभाँति जानते हैं॥ ३॥ |
| ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवा मया श्रुताः।<br>सृष्टिपालनसंहारकारकाः सगुणास्त्वमी॥ ४ | मैंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनों देवताओंके विषयमें सुना है कि ये सगुण रूपमें सम्पूर्ण जगत्का सृजन, पालन एवं संहार करते हैं॥ ४॥ |
| स्वतन्त्रास्ते महात्मानः पाराशर्य वदस्व मे।<br>आहोस्वित्परतन्त्रास्ते श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम्॥ ५ | हे पराशरसुत व्यासजी! वे तीनों देवश्रेष्ठ स्वाधीन हैं अथवा पराधीन; आप मुझे बताइये, मैं इस समय सुनना चाहता हूँ॥ ५॥ |
| मृत्युधर्मांश्च ते नो वा सच्चिदानन्दरूपिणः।<br>अधिभूतादिभिर्युक्ता न वा दुःखैस्त्रिधात्मकैः॥ ६ | वे सच्चिदानन्दस्वरूप देवगण मरणधर्मा हैं अथवा नहीं; और वे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक—इन तीन प्रकारके दुःखोंसे युक्त हैं अथवा नहीं?॥ ६॥ |
| कालस्य वशगा नो वा ते सुरेन्द्रा महाबलाः।<br>कथं ते वै समुत्पन्नाः कस्मादिति च संशयः॥ ७ | वे तीनों महाबली देवेश कालके वशवर्ती हैं अथवा नहीं; और वे कैसे तथा किससे आविर्भूत हुए, मेरी यह भी एक शंका है॥ ७॥ |
| २४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| हर्षशोकयुतास्ते वै निद्रालस्यसमन्विताः।<br>सप्तधातुमयास्तेषां देहाः किं वान्यथा मुने॥ ८ | हे मुने! क्या वे हर्ष, शोक आदि द्वन्द्वोंसे युक्त हैं, क्या वे निद्रा एवं प्रमाद आदिसे प्रभावित हैं तथा क्या उनके शरीर सप्त धातुओं (अन्नरस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य)-से निर्मित हैं अथवा नहीं?॥ ८॥ | | कैर्द्रव्यैर्निर्मितास्ते वै कैर्गुणैरिन्द्रियैस्तथा।<br>भोगश्च कीदृशस्तेषां प्रमाणमायुषस्तथा॥ ९ | वे किन द्रव्योंसे निर्मित हैं, वे किन-किन गुणोंको धारण करते हैं, उनमें कौन-कौन-सी इन्द्रियाँ अवस्थित हैं, उनका भोग कैसा होता है तथा उनकी आयुका परिमाण क्या है?॥ ९॥ | | निवासस्थानमप्येषां विभूतिं च वदस्व मे।<br>श्रोतुमिच्छाम्यहं ब्रह्मन् विस्तरेण कथामिमाम्॥ १० | इनके निवास-स्थान एवं विभूतियोंके भी विषयमें मुझको बतलाइये। हे ब्रह्मन्! इस कथाको विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी अभिलाषा है॥ १०॥ | | व्यास उवाच<br>दुर्गमः प्रश्नभारोऽयं कृतो राजंस्त्वयाधुना।<br>ब्रह्मादीनां समुत्पत्तिः कस्मादिति महामते॥ ११ | व्यासजी बोले—हे महामति राजन्! ब्रह्मादि देवोंकी उत्पत्ति किससे हुई, इस समय आपने यह बड़ा दुर्गम प्रश्न किया है॥ ११॥ | | एतदेव मया पूर्वं पृष्टोऽसौ नारदो मुनिः।<br>विस्मितः प्रत्युवाचेदमुत्थितः शृणु भूपते॥ १२ | हे राजन्! पूर्वमें मैंने यही प्रश्न देवर्षि नारदजीसे पूछा था। तब विस्मित होकर वे उठ खड़े हुए और उन्होंने जो उत्तर दिया था, उसे आप सुनें॥ १२॥ | | कस्मिंश्च समये चाहं गङ्गातीरे स्थितं मुनिम्।<br>अपश्यं नारदं शान्तं सर्वज्ञं वेदवित्तमम्॥ १३ | किसी समय मैंने शान्त, सर्ववेत्ता तथा वेद-विद्वानोंमें श्रेष्ठ नारदमुनिको गंगाके किनारे विद्यमान देखा॥ १३॥ | | दृष्ट्वाहं मुदितो भूत्वा पादयोरपतं मुनेः।<br>तेनाज्ञप्तः समीपेऽस्य संविष्टश्च वरासने॥ १४ | मुनिको देखकर तथा प्रसन्न होकर मैं उनके चरणोंपर गिर पड़ा। तदनन्तर उनके द्वारा आज्ञा देनेपर मैं उनके पासमें ही एक सुन्दर आसनपर बैठ गया॥ १४॥ | | श्रुत्वा कुशलवार्तां वै तमपृच्छं विधेः सुतम्।<br>निविष्टं जाह्नवीतीरे निर्जने सूक्ष्मवालुके॥ १५ | कुशल-क्षेमकी वार्ता सुन करके सूक्ष्म बालूवाले गंगा-तटके निर्जन स्थानपर बैठे हुए ब्रह्मापुत्र देवर्षि नारदसे मैंने पूछा—॥ १५॥ | | मुनेऽतिविततस्यास्य ब्रह्माण्डस्य महामते।<br>कः कर्ता परमः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि विधानतः॥ १६ | हे महामति मुनिदेव! इस अति विस्तीर्ण ब्रह्माण्डका प्रधान कर्ता कौन कहा गया है? उसे आप मुझे सम्यक् रूपसे बताइये॥ १६॥ | | कस्मादेतत्त्समुत्पन्नं ब्रह्माण्डं मुनिसत्तम।<br>अनित्यं वा तथा नित्यं तदाचक्ष्व द्विजोत्तम॥ १७ | हे मुनिश्रेष्ठ! इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति किससे हुई है? हे विप्रवर! आप मुझे यह भी बताइये कि यह ब्रह्माण्ड नित्य है अथवा अनित्य?॥ १७॥ | | एककर्तृकमेतद्वा बहुकर्तृकमन्यथा।<br>अकर्तृकं न कार्यं स्याद्विरोधोऽयं विभाति मे॥ १८ | यह ब्रह्माण्ड किसी एकके द्वारा विरचित है अथवा अनेक कर्ताओंद्वारा मिलकर इसका निर्माण किया गया है? किसी कर्ताके बिना कार्यकी सत्ता सम्भव नहीं है। इस विषयमें मुझे अत्यन्त सन्देह हो रहा है॥ १८॥ |