भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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२३६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १२ ]

| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**कद्रूने अपने सभी आज्ञाकारी सर्पपुत्रोंसे कहा कि तुम सभी लिपटकर उस घोड़ेके शरीरमें जितने बाल हैं, उन्हें काला कर दो॥ १५॥ | | कद्रूश्च स्वसुतानाह सर्वान्सर्पान्वशे स्थितान्।<br>बालाञ्छ्यामान्प्रकुर्वन्तु यावतोऽश्वशरीरके॥ १५ | | | नेति केचन तत्राहुस्तानथासौ शशाप ह।<br>जनमेजयस्य यज्ञे वै गमिष्यथ हुताशनम्॥ १६ | उनमेंसे कुछ सर्पोंने कहा कि हम ऐसा नहीं करेंगे। उन सर्पोंको कद्रूने शाप दे दिया कि तुम लोग जनमेजयके यज्ञमें हवनकी अग्निमें गिर पड़ोगे॥ १६॥ | | अन्ये चक्रुर्हयं सर्पाः कर्बुरं वर्णभोगकैः।<br>वेष्टयित्वास्य पुच्छं तु मातुः प्रियचिकीर्षया॥ १७ | अन्य सर्पोंने माताको प्रसन्न करनेकी कामनासे उस घोड़ेकी पूँछमें लिपटकर अपने विभिन्न रंगोंसे घोड़ेको चितकबरा कर दिया॥ १७॥ | | भगिन्यौ च सुसंयुक्ते गत्वा ददृशतुर्हयम्।<br>कर्बुरं तं हयं दृष्ट्वा विनता चातिदुःखिता॥ १८ | तदनन्तर दोनों बहिनोंने साथ-साथ जाकर घोड़ेको देखा। उस घोड़ेको चितकबरा देखकर विनता बहुत दुःखी हुई॥ १८॥ | | तदाजगाम गरुडः सुतस्तस्या महाबलः।<br>स दृष्ट्वा मातरं दीनामपृच्छत्पन्नगाशनः॥ १९ | उसी समय सर्पोंका आहार करनेवाले महाबली विनतापुत्र गरुडजी वहाँ आ गये। उन्होंने अपनी माताको दुःखित देखकर उनसे पूछा—॥ १९॥ | | मातः कथं सुदीनासि रुदितेव विभासि मे।<br>जीवमाने मयि सुते तथान्ये रविसारथौ॥ २०<br><br>दुःखितासि ततो वां धिग्जीवितं चारुलोचने।<br>किं जातेन सुतेनाथ यदि माता सुदुःखिता॥ २१<br><br>शंस मे कारणं मातः करोमि विगतज्वराम्। | हे माता! आप बहुत उदास क्यों हैं? आप मुझे रोती हुई प्रतीत हो रही हैं। हे सुनयने! मेरे एवं सूर्यसारथि अरुणसदृश पुत्रोंके जीवित रहते यदि आप दुःखी हैं, तब हमारे जीवनको धिक्कार है! यदि माता ही परम दुःखी हों तो पुत्रके उत्पन्न होनेसे क्या लाभ? हे माता! आप मुझे अपने दुःखका कारण बताइये, मैं आपको दुःखसे मुक्त करूँगा॥ २०-२१ १/२॥ | | विनतोवाच<br>सपल्या दास्यहं पुत्र किं ब्रवीमि वृथा क्षता॥ २२<br><br>वह मां सा ब्रवीत्यद्य तेनास्मि दुःखिता सुत। | **विनता बोली—**हे पुत्र! मैं अपनी सौतकी दासी हो गयी हूँ। अब व्यर्थमें मारी गयी मैं क्या कहूँ? वह मुझसे अब कह रही है कि मैं उसे अपने कन्धेपर ढोऊँ। हे पुत्र! मैं इसीसे दुःखी हूँ॥ २२ १/२॥ | | गरुड उवाच<br>वहिष्येऽहं तत्र किल यत्र सा गन्तुमुत्सुका॥ २३<br><br>मा शोकं कुरु कल्याणि निश्चिन्तां त्वां करोम्यहम्। | **गरुडजी बोले—**वे जहाँ भी जानेकी कामना करेंगी, मैं उन्हें ढोकर वहाँ ले जाऊँगा। हे कल्याणि! आप शोक न करें, मैं आपको निश्चिन्त कर देता हूँ॥ २३ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा गता पार्श्वं कद्रोश्च विनता तदा॥ २४ | **व्यासजी बोले—**गरुडद्वारा ऐसा कहे जानेपर विनता उसी समय कद्रूके पास चली गयी। महाबली गरुड भी अपनी माता विनताको दास्य- |