देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 244, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 244
| अ० १२ ] | द्वितीय स्कन्ध | २३५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कथयैतन्महाभाग विस्तरेण कथानकम्।<br>पुराणं च तथा सर्वं विस्तराद्वद सुव्रत ॥ ६ | हे महाभाग ! उस आख्यानको विस्तारपूर्वक बताइये। हे सुव्रत ! उस सम्पूर्ण पुराणको भी विस्तारके साथ कहिये ॥ ६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>जरत्कारुर्मुनिः शान्तो न चकार गृहाश्रमम्।<br>तेन दृष्टा वने गर्ते लम्बमानाः स्वपूर्वजाः ॥ ७ | व्यासजी बोले— जरत्कारु एक शान्त स्वभाववाले ऋषि थे, उन्होंने गार्हस्थ्य-जीवन अंगीकार नहीं किया था। उन्होंने एक बार वनमें एक गड्ढेके भीतर अपने पूर्वजोंको लटकते हुए देखा ॥ ७ ॥ |
| ततस्तमाहुः कुरु पुत्र दारा-<br>न्यथा च नः स्यात्परमा हि तृप्तिः।<br>स्वर्गे व्रजामः खलु दुःखमुक्ता<br>वयं सदाचारयुते सुते वै ॥ ८ | तदनन्तर पूर्वजोंने उनसे कहा—हे पुत्र! तुम विवाह कर लो, जिससे हमारी परम तृप्ति हो सके। तुझ सदाचारी पुत्रके ऐसा करनेपर हम-लोग निश्चितरूपसे दुःखमुक्त होकर स्वर्गकी प्राप्ति कर लेंगे ॥ ८ ॥ |
| स तानुवाचाथ लभे समाना-<br>मयाचितां चातिवशानुगां च।<br>तदा गृहारम्भमहं करोमि<br>ब्रवीमि तथ्यं मम पूर्वजा वै ॥ ९ | तब उन जरत्कारुने उनसे कहा—हे मेरे पूर्वजो ! जब मुझे अपने समान नामवाली तथा अत्यन्त वशवर्तिनी कन्या बिना माँगे ही मिलेगी तभी मैं विवाह करके गृहस्थी बसाऊँगा, मैं यह सत्य कह रहा हूँ ॥ ९ ॥ |
| इत्युक्त्वा ताञ्जरत्कारुर्गतस्तीर्थान्प्रति द्विजः।<br>तदैव पन्नगाः शप्ता मात्राग्नौ निपतन्त्विति ॥ १० | उनसे ऐसा कहकर ब्राह्मण जरत्कारु तीर्थाटनके लिये चल पड़े। उसी समय सर्पोंको उनकी माताने शाप दे दिया कि वे अग्निमें गिर जायँ ॥ १० ॥ |
| कश्यपस्य मुनेः पत्न्यौ कद्रूश्च विनता तथा।<br>दृष्ट्वादित्यरथे चाश्वमूचतुश्च परस्परम् ॥ ११ | कश्यपऋषिकी कद्रू और विनता नामक दो पत्नियाँ थीं। सूर्यके रथमें जुते हुए घोड़ेको देखकर वे आपसमें वार्तालाप करने लगीं ॥ ११ ॥ |
| तं दृष्ट्वा च तदा कद्रूर्विनतामिदमब्रवीत्।<br>किंवर्णोऽयं हयो भद्रे सत्यं प्रब्रूहि माचिरम् ॥ १२ | उस घोड़ेको देखकर कद्रूने विनतासे यह कहा—हे कल्याणि ! यह घोड़ा किस रंगका है ? यह मुझे शीघ्र ही सही-सही बताओ ॥ १२ ॥ |
| विनतोवाच<br>श्वेत एवाश्वराजोऽयं किं वा त्वं मन्यसे शुभे।<br>ब्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततस्तु विपणावहे ॥ १३ | विनता बोली— यह अश्वराज श्वेत रंगका है। हे शुभे ! तुम इसे किस रंगका मानती हो ? तुम भी इसका रंग बता दो। तब हम दोनों आपसमें इसपर शर्त लगायें ॥ १३ ॥ |
| कद्रुरुवाच<br>कृष्णवर्णमहं मन्ये हयमेनं शुचिस्मिते।<br>एहि सार्धं मया दिव्यं दासीभावाय भामिनि ॥ १४ | कद्रू बोली— हे शुभ मुसकानवाली ! मैं तो इस घोड़ेको कृष्णवर्णका समझती हूँ। हे भामिनि ! आओ, मेरे साथ शर्त लगाओ कि जो हारेगी, वह दूसरेकी दासी होना स्वीकार करेगी ॥ १४ ॥ |