देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
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| विमृश्यैवं रुरुस्तत्र स्नात्वाचम्य शुचिः स्थितः॥ २२<br>अब्रवीद्वचनं कृत्वा जलं पाणावसौ मुनिः।<br>यन्मया सुकृतं किञ्चित्कृतं देवार्चनादिकम्॥ २३<br>गुरवः पूजिता भक्त्या हुतं जप्तं तपः कृतम्।<br>अधीतास्त्वखिला वेदा गायत्री संस्कृता यदि॥ २४<br>रविराराधितस्तेन सञ्जीवतु मम प्रिया।<br>यदि जीवेन्न मे कान्ता त्यजे प्राणानहं ततः॥ २५<br>इत्युक्त्वा तज्जलं भूमौ चिक्षेपाराध्य देवताः। | ऐसा सोचकर रुरु स्नान तथा आचमन करके पवित्र होकर वहींपर बैठ गये। इसके बाद उन मुनिने हाथमें जल लेकर यह वचन कहा—यदि मेरे द्वारा देवाराधन आदि कुछ भी पुण्य कर्म सम्पादित किया गया हो, यदि मैंने श्रद्धापूर्वक गुरुओंकी पूजा की हो; हवन, जप एवं तप किया हो, समस्त वेदोंका अध्ययन किया हो, गायत्रीकी उपासना की हो और सूर्यकी आराधना की हो तो उस पुण्यके प्रभावसे मेरी प्रिया जीवित हो जाय। यदि मेरी प्रिया जीवित नहीं होगी तो मैं प्राण त्याग दूँगा। ऐसा कहकर देवताओंका ध्यान करके उन्होंने वह जल जमीनपर छोड़ दिया॥ २२—२५ १/२॥ | | राजोवाच<br>एवं विलपतस्तस्य भार्यया दुःखितस्य च॥ २६<br>देवदूतस्तदाभ्येत्य वाक्यमाह रुरुं ततः। | राजा बोले—तदनन्तर इस प्रकार अपनी भार्याके लिये विलाप कर रहे उन दुःखित रुरुके पास एक देवदूत आकर यह वाक्य बोला॥ २६ १/२॥ | | देवदूत उवाच<br>माकार्षीः साहसं ब्रह्मन्कथं जीवेन्मृता प्रिया॥ २७<br>गतायुरेशा सुश्रोणी गन्धर्वाप्सरसोः सुता।<br>अन्यां कामय चार्वङ्गीं मृतेयं चाविवाहिता॥ २८<br>किं रोदिषि सुदुर्बुद्धे का प्रीतिस्तेऽनया सह। | देवदूत बोला—हे ब्रह्मन्! ऐसा साहस मत कीजिये। आपकी मरी हुई प्रियतमा भला कैसे जीवित हो सकेगी? गन्धर्व और अप्सराकी इस सुन्दर कन्याकी आयु समाप्त हो चुकी थी, जिससे यह अविवाहिता ही मर गयी; अतः अब आप किसी अन्य शुभ अंगोंवाली कन्याका वरण कर लीजिये। हे हतबुद्धि! आप क्यों रो रहे हैं? इसके साथ आपका कैसा प्रेम है?॥ २७-२८ १/२॥ | | रुरुरुवाच<br>देवदूत न चान्यां वै वरिष्याम्यहमङ्गनाम्॥ २९<br>यदि जीवेन्न जीवेद्वा मर्तव्यं चाधुना मया। | रुरु बोले—हे देवदूत! मैं किसी अन्य सुन्दरीका वरण नहीं करूँगा। यदि यह जीवित हो जाती है तो ठीक है, अन्यथा मैं इसी समय अपने प्राण त्याग दूँगा॥ २९ १/२॥ | | राजोवाच<br>विदित्वेति हठं तस्य देवदूतो मुदान्वितः॥ ३०<br>उवाच वचनं तथ्यं सत्यं चातिमनोहरम्।<br>उपायं शृणु विप्रेन्द्र विहितं यत्सुरैः पुरा॥ ३१<br>आयुषोऽर्धप्रदानेन जीवयाशु प्रमद्वराम्। | राजा बोले—उन मुनिका यह हठ देखकर देवदूतने प्रसन्न होकर तथ्यपूर्ण, सत्य तथा मनोहर वचन कहा—हे विप्रेन्द्र! देवताओंके द्वारा इसका पूर्वविहित उपाय मुझसे सुनिये। आप अपनी आयुका आधा भाग देकर अपनी प्रमद्वराको शीघ्र ही जीवित कर लीजिये॥ ३०-३१ १/२॥ | | रुरुरुवाच<br>आयुषोऽर्धं प्रयच्छामि कन्यायै नात्र संशयः॥ ३२<br>अद्य प्रत्यावृतप्राणा प्रोत्तिष्ठतु मम प्रिया।<br>विश्वावसुस्तदा तत्र विमानेन समागतः॥ ३३ | रुरु बोले—मैं निःसन्देह अपनी आयुका आधा भाग इस कन्याको दे रहा हूँ। अब मेरी प्रियतमाके प्राण वापस आ जायें और यह उठकर बैठ जाय। उसी समय विश्वावसु अपनी पुत्री प्रमद्वराकी मृत्यु |