भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 889 में से

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पृष्ठ 228

अ० ९] द्वितीय स्कन्ध २१९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रुरोद विगतप्राणां दीप्यमानां सुतेजसा।<br>रुरुः श्रुत्वा तदाक्रन्दं दर्शनार्थं समागतः॥ ९<br><br>ददर्श पतितां तत्र सजीवामिव कामिनीम्।<br>रुदन्तं स्थूलकेशं च दृष्ट्वान्यानृषिसत्तमान्॥ १०<br><br>रुरुः स्थानाद् बहिर्गत्वा रुरोद विरहाकुलः।स्थूलकेश अत्यन्त दुःखित होकर रुदन करने लगे। उस समय करुण क्रन्दन सुनकर रुरु भी उसे देखनेके लिये आये। उन्होंने उस मृत पड़ी सुन्दरीको सजीव-जैसी देखा। स्थूलकेश तथा अन्य श्रेष्ठ मुनियोंको रुदन करते देखकर रुरुमुनि उस स्थानसे बाहर आ करके विरहाकुल होकर रोने लगे॥ ८—१० १/२॥
अहो दैवेन सर्पोऽयं प्रेषितः परमाद्भूतः॥ ११<br><br>मम शर्मविघाताय दुःखहेतुरयं किल।<br>किं करोमि क्व गच्छामि मृता मे प्राणवल्लभा॥ १२<br><br>न वै जीवितुमिच्छामि वियुक्तः प्रिययानया।<br>नालिङ्गिता वरारोहा न मया चुम्बिता मुखे॥ १३<br><br>न पाणिग्रहणं प्राप्तं मन्दभाग्येन सर्वथा।<br>लाजाहोमस्तथा चाग्नौ न कृतस्त्वनया सह॥ १४<br><br>मानुष्यं धिगिदं कामं गच्छन्त्वद्य ममासवः।<br>दुःखितस्य न वा मृत्युर्वाञ्छितः समुपैति हि॥ १५<br><br>सुखं तर्हि कथं दिव्यमाप्यते भुवि वाञ्छितम्।<br>प्रपतामि ह्रदे घोरे पावके प्रपताम्यहम्॥ १६<br><br>विषमद्य गले पाशं कृत्वा प्राणांस्त्यजाम्यहम्।[वे कहने लगे—] अहो! प्रारब्धने ही मेरे सुखके विनाशके लिये ही यह अत्यन्त विचित्र सर्प भेजा था। यह निश्चित ही मेरे दुःखका कारण है। अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मेरी प्राणप्रिया तो मर गयी। अब मैं अपनी इस प्रियासे विलग होकर जीना नहीं चाहता। अभीतक मैंने उस सुन्दरीका आलिंगन आदि कोई सांसारिक सुख भी नहीं प्राप्त किया था। मैं ऐसा अभागा हूँ कि उसका पाणिग्रहण नहीं कर सका और न तो उसके साथ अग्निमें लाजाहोम ही कर पाया। मेरे इस मनुष्य-जीवनको धिक्कार है। अब तो मेरे प्राण निकल जायँ तो अच्छा है, जब दुःखित मनुष्यको चाहनेपर भी मृत्यु नहीं मिलती, तब इस संसारमें वांछित उत्तम सुख कैसे मिल सकता है? अब मैं या तो कहीं किसी भयानक तालाबमें डूब जाऊँ, अग्निमें कूद पडूँ, विष खा लूँ अथवा गलेमें फाँसी लगाकर प्राण त्याग दूँ॥ ११—१६ १/२॥
विलप्यैवं रुरुस्तत्र विचार्य मनसा पुनः॥ १७<br><br>उपायं चिन्तयामास स्थितस्तस्मिन्नदीतटे।<br>मरणात्किं फलं मे स्यादात्महत्या दुरत्यया॥ १८<br><br>दुःखितश्च पिता मे स्याज्जननी चातिदुःखिता।<br>दैवस्तुष्टो भवेत्कामं दृष्ट्वा मां त्यक्तजीवितम्॥ १९<br><br>सर्वः प्रमुदितश्च स्यान्मत्क्षये नात्र संशयः।<br>उपकारः प्रियायाः कः परलोके भवेदपि॥ २०<br><br>मृते मय्यात्मघातेन विरहात्पीडितेऽपि च।<br>परलोके प्रिया सापि न मे स्यादात्मघातिनः॥ २१<br><br>एतदर्थं मृते दोषा मयि नैवामृते पुनः।इस प्रकार विलाप करके रुरु अपने मनमें विचारकर उस नदीके तटपर स्थित रहते हुए उपाय सोचने लगे। प्राण त्यागनेसे मुझे क्या लाभ होगा? आत्महत्याका फल तो अत्यन्त दुर्निवार्य होता है। [मेरी मृत्यु सुनकर] पिताजी दुःखी होंगे, माताजीको भी महान् कष्ट होगा। हाँ, हो सकता है कि मुझे मरा हुआ देखकर प्रारब्ध सन्तुष्ट हो जाय? मेरे मर जानेपर मेरे सभी शत्रु भी प्रसन्न होंगे, इसमें सन्देह नहीं है, किंतु इससे परलोकमें मेरी प्रियाका क्या उपकार होगा? इस प्रकार विरहसे सन्तप्त होकर आत्महत्या करके मेरे मर जानेपर भी परलोकमें मुझ आत्मघातीको मेरी वह प्रिया नहीं मिलेगी। इसलिये मेरे मरनेमें बहुत दोष हैं और न मरनेपर मुझे कोई दोष नहीं होगा॥ १७—२१ १/२॥