देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 230, कुल 889 में से
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| अ० ९ ] | द्वितीय स्कन्ध | २२१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ज्ञात्वा पुत्रीं मृतां चाशु स्वर्गलोकात्प्रमद्वराम्।<br>ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमः॥ ३४<br><br>धर्मराजमुपेत्येदं वचनं प्रत्यभाषताम्।<br>धर्मराज रुरोः पत्नी सुता विश्वावसोस्तथा॥ ३५<br><br>मृता प्रमद्वरा कन्या दष्टा सर्पेण चाधुना।<br>सा रुरोरायुषोऽर्धेन मर्तुकामस्य सूर्यज॥ ३६<br><br>समुत्तिष्ठतु तन्वङ्गी व्रतचर्याप्रभावतः। | जान करके स्वर्गलोकसे विमानद्वारा शीघ्र ही वहाँ आ गये। तत्पश्चात् गन्धर्वराज विश्वावसु तथा उस श्रेष्ठ देवदूतने धर्मराजके पास पहुँचकर यह वचन कहा— हे धर्मराज! रुरुकी पत्नी तथा विश्वावसुकी पुत्री इस प्रमद्वरा नामक कन्याकी सर्पदंशके कारण इस समय मृत्यु हो गयी है। हे सूर्यतनय! इसके वियोगमें मरणके लिये उद्यत मुनि रुरुकी आधी आयु तथा उनकी तपस्याके प्रभावसे यह कोमलांगी जीवित हो जाय॥ ३२—३६ १/२॥ |
| धर्म उवाच<br>विश्वावसुसुतां कन्यां देवदूत यदीच्छसि॥ ३७<br><br>उत्तिष्ठत्वायुषोऽर्धेन रुरुं गत्वा त्वमर्पय। | धर्मराजने कहा— हे देवदूत! यदि तुम ऐसा चाहते हो तो उसकी आधी आयुसे विश्वावसुकी यह कन्या जीवित होकर उठ जाय और तुम जाकर इसे रुरुको समर्पित कर दो॥ ३७ १/२॥ |
| राजोवाच<br>एवमुक्तस्ततो गत्वा जीवयित्वा प्रमद्वराम्॥ ३८<br><br>रुरोः समर्पयामास देवदूतस्त्वरान्वितः।<br>ततः शुभेऽह्नि विधिना रुरुणापि विवाहिता॥ ३९ | राजा बोले— धर्मराजके ऐसा कहनेपर देवदूतने जाकर प्रमद्वराको जीवित करके शीघ्र ही रुरुको समर्पित कर दिया और तत्पश्चात् रुरुने किसी शुभ दिन उसके साथ विधानपूर्वक विवाह कर लिया॥ ३८-३९॥ |
| इत्थं चोपाययोगेन मृताप्युज्जीविता तदा।<br>उपायस्तु प्रकर्तव्यः सर्वथा शास्त्रसम्मतः॥ ४० | इस प्रकार उपायका आश्रय लेकर मृत प्रमद्वराको भी जीवित कर लिया गया था। अतः मणि, मन्त्र तथा औषधियोंके विधिवत् प्रयोगद्वारा प्राणरक्षाके लिये शास्त्र-सम्मत उपाय अवश्य किया जाना चाहिये॥ ४० १/२॥ |
| मणिमन्त्रौषधीभिश्च विधिवत्प्राणरक्षणे।<br>इत्युक्त्वा सचिवान् राजा कल्पयित्वा सुरक्षकान्॥ ४१<br><br>कार्यित्वाथ प्रासादं सप्तभूमिकमुत्तमम्।<br>आरुरोहोत्तरासूनुः सचिवैः सह तत्क्षणम्॥ ४२ | मन्त्रियोंसे यह कहकर उत्तम रक्षकोंकी व्यवस्था करके एक सात तलवाला उत्तम राजभवन बनवाकर उसी क्षण उत्तरापुत्र परीक्षित् अपने मन्त्रियोंके साथ उसपर चढ़ गये॥ ४१-४२॥ |
| मणिमन्त्रधराः शूराः स्थापितास्तत्र रक्षणे।<br>प्रेषयामास भूपालो मुनिं गौरमुखं ततः॥ ४३<br><br>प्रसादार्थं सेवकस्य क्षमस्वेति पुनः पुनः।<br>ब्राह्मणान्सिद्धमन्त्रज्ञान् रक्षणार्थमितस्ततः॥ ४४ | उस भवनकी सम्यक् सुरक्षाके लिये मणि-मन्त्र-धारी वीरोंको नियुक्त किया गया और इसके बाद राजाने गौरमुखमुनिको [गविजातके पास उन्हें] प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे भेजा और कहलाया कि मुझ सेवकका अपराध वे बार-बार क्षमा करें। तत्पश्चात् राजाने मन्त्र-प्रयोगमें निपुण ब्राह्मणोंको रक्षा-कार्यके निमित्त चारों ओर नियुक्त कर दिया॥ ४३-४४॥ |
| मन्त्रिपुत्रः स्थितस्तत्र स्थापयामास दन्तिनः।<br>न कश्चिदारुहेत्तत्र प्रासादे चातिरक्षिते॥ ४५ | एक मन्त्रिपुत्र वहाँ नियुक्त किया गया, जिसने महलके चारों ओर हाथियोंका घेरा स्थापित कराया ताकि विशेषरूपसे रक्षित उस महलपर कोई चढ़ न सके॥ ४५॥ |