देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 225, कुल 889 में से
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| २१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| राजा घर्मेण सन्तप्तो ददर्श मुनिमन्तिके ।<br>ध्याने स्थितं मुनिं राजा जलं पप्रच्छ चातुरः ॥ २१ | धूपसे पीड़ित राजाने समीपमें ही एक ध्यानमग्न मुनिको विराजमान देखा और प्याससे व्याकुल उन्होंने मुनिसे जल माँगा ॥ २१ ॥ |
| नोवाच किञ्चिन्मौनस्थश्चुकोप नृपतिस्तदा ।<br>मृतं सर्पं तदादाय धनुष्कोट्या तृषातुरः ॥ २२<br>कलिनाविष्टचित्तस्तु कण्ठे तस्य न्यवेशयत् ।<br>आरोपिते तथा सर्पे नोवाच मुनिसत्तमः ॥ २३ | मौन व्रतमें स्थित वे मुनि कुछ भी नहीं बोले, जिससे राजा कुपित हो गये और प्याससे आकुल तथा कलिसे प्रभावित चित्तवाले राजाने अपने धनुषकी नोकसे एक मृत साँप उठाकर उनके गलेमें डाल दिया। गलेमें सर्प डाल दिये जानेके बाद भी वे मुनिश्रेष्ठ कुछ भी नहीं बोले ॥ २२-२३ ॥ |
| न चचाल समाधिस्थो राजापि स्वगृहं गतः ।<br>तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी गविजातो महातपाः ॥ २४ | वे थोड़ा भी विचलित नहीं हुए और समाधिमें स्थित रहे। राजा भी अपने घर चले गये। उन मुनिका पुत्र गविजात अत्यन्त तेजस्वी तथा महातपस्वी था ॥ २४ ॥ |
| महाशक्तोऽथ शुश्राव क्रीडमानो वनान्तिके ।<br>मित्राण्याहुश्च तत्पुत्रं पितुः कण्ठे तवाधुना ॥ २५<br>लम्बितोऽस्ति मृतः सर्पः केनापीति मुनीश्वर ।<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चुकोपातिशयं तदा ॥ २६<br>शशाप नृपतिं क्रुद्धो गृहीत्वाशु करे जलम् ।<br>पितुः कण्ठेऽद्य मे येन विनिक्षिप्तो मृतोरगः ॥ २७<br>तक्षकः सप्तरात्रेण तं दशेत्पापपूरुषम् ।<br>मुनेः शिष्योऽथ राजानं समुपेत्य गृहे स्थितम् ॥ २८<br>शापं निवेदयामास मुनिपुत्रेण चार्पितम् ।<br>अभिमन्युसुतः श्रुत्वा शापं दत्तं द्विजेन वै ॥ २९<br>अनिवार्यं च विज्ञाय मन्त्रिवृद्धानुवाच ह ।<br>शप्तोऽहं द्विजरूपेण मम द्वेषादसंशयम् ॥ ३० | पराशक्तिके आराधक उस गविजातने पासके वनमें खेलते हुए अपने मित्रोंको ऐसा कहते हुए सुना कि हे मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारे पिताके गलेमें किसीने मृत सर्प डाल दिया है। उनकी यह बात सुनकर वह अत्यन्त कुपित हुआ और शीघ्र ही हाथमें जल लेकर उसने कुपित होकर राजाको शाप दे दिया—जिस व्यक्तिने मेरे पिताजीके कण्ठमें मृत सर्प डाला है, उस पापी पुरुषको एक सप्ताहमें तक्षक डस लेगा। मुनिके शिष्यने महलमें स्थित राजा परीक्षित्के समीप जाकर मुनिपुत्रके द्वारा दिये गये शापकी बात कही। ब्राह्मणके द्वारा दिये गये शापको सुनकर अभिमन्युपुत्र परीक्षित्ने उसे अनिवार्य समझकर वृद्ध मन्त्रियोंसे कहा—अपने अपराधके कारण मैं मुनिपुत्रसे शापित हुआ हूँ ॥ २५-३० ॥ |
| किं विधेयं मयामात्या उपायश्चिन्त्यतामिह ।<br>मृत्युः किलानिवायोऽसौ वदन्ति वेदवादिनः ॥ ३१<br>यत्नस्तथापि शास्त्रोक्तः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः ।<br>उपायवादिनः केचित्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ३२<br>विज्ञोपायेन सिध्यन्ति कार्याणि नेतरस्य च ।<br>मणिमन्त्रौषधीनां वै प्रभावाः खलु दुर्विदः ॥ ३३<br>न भवेदिति किं तैस्तु मणिमद्भिः सुसाधितैः ।<br>सर्पदष्टा पुरा भार्या मुनेः सञ्जीविता मृता ॥ ३४ | हे मन्त्रियो! अब मुझे क्या करना चाहिये? आप लोग कोई उपाय सोचें। मृत्यु तो अनिवार्य है—ऐसा वेदवादी लोग कहते हैं, तथापि बुद्धिमान् पुरुषोंको शास्त्रोक्त रीतिसे सर्वथा प्रयत्न करना ही चाहिये। कुछ पुरुषार्थवादी विद्वान् ऐसा कहते हैं कि बुद्धिमानीके साथ उपाय करनेपर कार्य सिद्ध हो जाते हैं; न करनेपर नहीं। मणि, मन्त्र और औषधोंके प्रभाव अत्यन्त ही दुर्ज्ञेय होते हैं। मणि धारण करनेवाले सिद्धजनोंके द्वारा क्या नहीं सम्भव हो जाता? पूर्वकालमें किसी ऋषिपत्नीको सर्पने काट लिया था, जिससे वह मर गयी थी; उस समय उस मुनिने अपनी आयुका आधा |