भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 889 में से

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पृष्ठ 226
अ० ८ ]द्वितीय स्कन्ध२१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दत्त्वार्धमायुषस्तेन मुनिना सा वराप्सराः।<br>भवितव्ये न विश्वासः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः ॥ ३५भाग देकर उस श्रेष्ठ अप्सराको जीवित कर दिया था। अतः बुद्धिमान् लोगोंको चाहिये कि वे भवितव्यतापर विश्वास न करें, उपाय भी करें ॥ ३१—३५ ॥
प्रत्यक्षं तत्र दृष्टान्तं पश्यन्तु सचिवाः किल।<br>दिवि कोऽपि पृथिव्यां वा दृश्यते पुरुषः क्वचित् ॥ ३६<br><br>दैवे मतिं समाधाय यस्तिष्ठेत्तु निरुद्यमः।<br>विरक्तस्तु यतिर्भूत्वा भिक्षार्थं याति सर्वथा ॥ ३७<br><br>गृहस्थानां गृहे काममाहूतो वाथवान्यथा।<br>यदृच्छयोपपन्नं च क्षिप्तं केनापि वा मुखे ॥ ३८<br><br>उद्यमेन विना चास्यादुदरे संविशेत्कथम्।<br>प्रयत्नश्चोद्यमे कार्यो यदा सिद्धिं न याति चेत् ॥ ३९<br><br>तदा दैवं स्थितं चेति चित्तमालम्बयेद् बुधः।हे सचिवो ! आपलोग यह दृष्टान्त प्रत्यक्ष देख लें। इस लोक या परलोकमें ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं दिखायी देता, जो केवल भाग्यके भरोसे रहकर उद्यम न करता हो। गृहस्थीसे विरक्त मनुष्य संन्यासी होकर जगह-जगह भिक्षाटनके लिये बुलानेपर अथवा बिना बुलाये भी गृहस्थोंके घर जाता ही है। दैवप्राप्त उस भोजनको भी क्या कोई मुखमें डाल देता है ? उद्यमके बिना वह भोजन मुखसे उदरमें कैसे प्रवेश कर सकता है ? अतः प्रयत्नपूर्वक उद्यम तो करना ही चाहिये, यदि सफलता न मिले तो बुद्धिमान् मनुष्य मनमें विश्वास कर ले कि दैव यहाँ प्रबल है ॥ ३६—३९ ½ ॥
मन्त्रिण ऊचुः<br>को मुनिर्येन दत्त्वार्धमायुषो जीविता प्रिया ॥ ४०<br>कथं मृता महाराज तन्नो ब्रूहि सविस्तरम्।मन्त्रियोंने कहा— हे महाराज ! वे कौन मुनि थे, जिन्होंने अपनी आधी आयु देकर अपनी प्रिय पत्नीको जीवित किया था ? वह कैसे मरी थी ? यह कथा विस्तारसे हमसे कहिये ॥ ४० ½ ॥
राजोवाच<br>भृगोर्भार्या वरारोहा पुलोमा नाम सुन्दरी ॥ ४१<br>तस्यां तु च्यवनो नाम मुनिर्जातोऽतिविश्रुतः।<br>च्यवनस्य च शर्यातेः सुकन्या नाम सुन्दरी ॥ ४२राजा बोले— महर्षि भृगुकी एक सुन्दर स्त्री थी, जिसका नाम पुलोमा था। उससे परम विख्यात च्यवनमुनिका जन्म हुआ। च्यवनकी पत्नीका नाम सुकन्या था, वह महाराज शर्यातिकी रूपवती कन्या थी ॥ ४१-४२ ॥
तस्यां जज्ञे सुतः श्रीमान्प्रमतिर्नाम विश्रुतः।<br>प्रमतेस्तु प्रिया भार्या प्रतापी नाम विश्रुता ॥ ४३<br>रुरुर्नाम सुतो जातस्तथा परमतापसः।उस सुकन्यासे श्रीमान् प्रमतिने जन्म लिया, जो बड़े यशस्वी थे। उस प्रमतिकी प्रिय पत्नीका नाम प्रतापी था। उन्हीं राजा प्रमतिके पुत्र परम तपस्वी 'रुरु' हुए ॥ ४३ ½ ॥
तस्मिंश्च समये कश्चित्स्थूलकेशश्च विश्रुतः ॥ ४४<br>बभूव तपसा युक्तो धर्मात्मा सत्यसम्मतः।<br>एतस्मिन्नन्तरे मान्या मेनका च वराप्सराः ॥ ४५<br>क्रीडां चक्रे नदीतीरे त्रिषु लोकेषु सुन्दरी।<br>गर्भं विश्वावसोः प्राप्य निर्गता वरवर्णिनी ॥ ४६उन्हीं दिनों स्थूलकेश नामक एक विख्यात ऋषि थे, जो बड़े ही तपस्वी, धर्मात्मा एवं सत्यनिष्ठ थे। इसी बीच त्रिलोकसुन्दरी मेनका नामकी श्रेष्ठ अप्सरा नदीके किनारे जलक्रीडा कर रही थी। वह अप्सरा विश्वावसुके द्वारा गर्भवती होकर वहाँसे निकल पड़ी ॥ ४४—४६ ॥
स्थूलकेशाश्रमे गत्वा विससर्ज वराप्सराः।<br>कन्यकां च नदीतीरे त्रिषु लोकेषु सुन्दरीम् ॥ ४७उस श्रेष्ठ अप्सराने स्थूलकेशके आश्रममें जाकर नदीतटपर एक त्रैलोक्यसुन्दरी कन्याको जन्म दिया और वह उसे छोड़कर चली गयी। तब उस नवजात शिशु