देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि | ११ |
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श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि
देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम्।
त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती॥
श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि।
श्लोकार्थं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम्॥
श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है। जो श्रीमद्देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।
श्रीमद्देवीभागवतके नवाह्नकी विधि है। दोनों नवरात्रोंमें तथा आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, कार्तिक, मार्गशीर्ष, माघ एवं फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदासे नवमीतक इसके अनुष्ठानका विधान है। इसे 'नवाहयज्ञ' कहा जाता है। एतदर्थ कथा-स्थानकी भूमि का संशोधन, मार्जन-लेपनादिकर कदली-स्तम्भादिसे मण्डित मण्डप बनाना चाहिये। मण्डपका स्थान शुभ तथा बराबर होना चाहिये। उसका मान १६ हाथ लम्बा-चौड़ा हो तथा उसे तोरण, विमान एवं ध्वजा-पताकासे मण्डित किया जाय। मण्डपके बीचमें चार हाथ लम्बी-चौड़ी तथा एक हाथ ऊँची वेदी होनी चाहिये। फिर प्रतिपद्को प्रातः उठकर हृदय या शिरोदेशमें उज्ज्वल-पद्मके अन्तर्गत गुरुका ध्यान करना चाहिये। फिर शिखाके बीच इस रूपमें देवीका ध्यान करना चाहिये—
प्रकाशमानां प्रथमे प्रयाणे
प्रतिप्रयाणेऽप्यमृतायमानाम् ।
अन्तःपदव्यामनुसंचरन्ती-
मानन्दरूपामबलां प्रपद्ये ॥
(श्रीमद्देवीभा० ७।४०।३)
प्रथम प्रयाणमें अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रमें संचरण करनेपर प्रकाश-पुंजरूपवाली, प्रतिप्रयाणमें अर्थात् मूलाधारमें संचरण करनेपर अमृतमयस्वरूपवाली तथा अन्तःपदमें अर्थात् सुषुम्णा नाड़ीमें विराजनेपर आनन्दमयी स्त्रीरूपिणी देवी कुण्डलिनीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
तत्पश्चात् किसी नदी, तड़ाग, सरोवर या पहाड़ी झील, झरने आदिमें स्नानकर नित्यकृत्य करना चाहिये। फिर भूतशुद्धि, मातृकान्यास एवं हृल्लेखा-मातृकान्यास करना चाहिये। इसकी विधि यह है कि मूलाधारमें 'ह' कार, हृदयमें 'र'कार, भ्रूमध्यमें 'ई'कार और मस्तकमें 'ह्रीं'कारका न्यास करे। फिर उपयुक्त ब्राह्मणोंका वरणकर वेदीपर सिंहासन रखकर उसपर क्षौम (रेशमी) वस्त्र-युक्त चार हाथोंवाली जगदम्बिकाकी प्रतिमा स्थापित करे। उन्हें रत्नाभूषण तथा मुक्ताहारादिसे विभूषित करे। चार हाथोंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कराये या अठारह भुजावाली प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाके अभावमें 'नवार्ण मन्त्र' का यन्त्र ही रख दे। फिर पंचपल्लवादिसंयुक्त एक कलश वेद-मन्त्रोंसे संस्कृतकर श्रेष्ठ तीर्थके जलसे भरकर पास ही स्थापित करे। तत्पश्चात् गणपति-पूजन, बटुक, क्षेत्रपाल, योगिनी, मातृका, नवग्रह, तुलसी, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, लोकपाल, दिक्पाल आदिकी पूजाकर षोडशोपचार तथा श्रीसूक्त या नवार्णमन्त्रसे भगवती महाशक्तिकी पूजा करे। देवी-पूजनमें चन्दन, अगर या अष्टगन्ध* तथा अशोक, चम्पा, करवीर, मालती, मन्दार आदिके पुष्पों, बिल्व तथा तुलसी आदिका प्रयोग श्रेष्ठ है। फलोंमें नारियल, नारंगी, अनार, केला, आम शुभ हैं। तत्पश्चात् १६ उपचारोंसे देवीभागवत-ग्रन्थकी भी पूजा करे। अन्तमें फिर इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये—
कात्यायनि महामाये भवानि भुवनेश्वरि॥
संसारसागरे मग्नं मामुद्धर कृपामये।
ब्रह्मविष्णुशिवाराध्ये प्रसीद जगदम्बिके॥
मनोऽभिलषितं देवि वरं देहि नमोऽस्तु ते।
(श्रीमद्देवीभा० माहात्म्य ५।३१-३३)
हे कात्यायनि! हे महामाये! हे भुवनेश्वरि! हे कृपामये! हे भवानि! मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ; मेरा उद्धार कीजिये तथा हे ब्रह्मा, विष्णु, महेशसे पूजनीया माता जगदम्बिके! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। हे देवि! आप मुझे
* चन्दनागुरुकर्पूरचौरकुङ्कुमरोचनाः। जटामांसी कपियुता शक्तेर्गन्धाष्टकं विदुः॥ (तन्त्रसार—कलावती दीक्षा ५।१)
अर्थात् चन्दन, अगुरु, कपूर, कृष्णशुंठी, कुंकुम (केसर), गोरोचन, जटामांसी तथा गांठना (एक प्रकारका करंज) मिलाकर शक्तिका अष्टगन्ध बनता है।