भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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२०श्रीमद्देवीभागवत

मनोवांछित वर प्रदान कीजिये; आपको बार-बार प्रणाम है।

तत्पश्चात् ऋष्यादिका न्यासकर पाठ आरम्भ करे।

पाठ आरम्भ करनेके बाद फिर अध्यायके बीचमें नहीं रुकना चाहिये। रुक जानेपर पुनः उसी अध्यायको आरम्भसे पढ़ना चाहिये। मध्यम स्वरसे श्रद्धापूर्वक धीरे-धीरे स्पष्ट पाठ करना चाहिये। गीत गाना, जल्दी करना, सिर कँपाना, अशुद्ध या अस्पष्ट उच्चारण करना, बिना अर्थ समझे ही पाठ करना—ये पाठके दोष हैं। पाठमें यथासाध्य इन दोषोंसे बचे रहना चाहिये। क्रोध, मद, त्वरा बाधक हैं। मनकी पवित्रता, शरीरकी पवित्रता अधिक सहायक है। दोपहरके बाद एक घड़ी विश्रामकर तथा लघुशंका आदिसे निवृत्त होकर पुनः पाठ करना चाहिये।

कथारम्भमें सोम, बुध, गुरु, शुक्रवार; अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, अनुराधा, मूल तथा श्रवण नक्षत्र शुभ हैं। बृहस्पति जिस नक्षत्रमें हों, वहाँसे चौथे नक्षत्रतक कथा आरम्भ करनेसे धर्मप्राप्ति, ५ से ८ वेंतक लक्ष्मीप्राप्ति, पुनः ९ में सिद्धि, १० से १४ तक सुख प्राप्त होता है। गुर्वनिष्ठित नक्षत्रसे २० नक्षत्रोंतकमें कथारम्भ करनेसे पीड़ा, २४ वेंतक राजभय तथा २७ वेंतक ज्ञानकी प्राप्ति होती है। इस चक्रका ध्यान रखना आवश्यक है। (किंतु नवरात्रोंमें देवीभागवत-कथामें चक्र-विचार अपेक्षित नहीं है।) अनुष्ठानके समय ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, सत्यवचन तथा इन्द्रियसंयम अत्यन्त आवश्यक है। पत्तलमें भोजन करना चाहिये। बैगन, दाल, बहेड़ा, मधु, तैल, बासी तथा दूषित अन्न नहीं खाना चाहिये। रजस्वला आदिसे स्पृष्ट तथा मसूर, मूली, हींग, प्याज, गाजर, कुम्हड़ा तथा नलिका आदिका शाक भी नहीं खाना चाहिये। प्रतिदिन कुमारीपूजन करना चाहिये या प्रतिदिन क्रमशः दुगुनी, तिगुनी पूजा बढ़ाते जाय। एक वर्षकी कन्याकी पूजा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उसे गन्धादिका कोई भी ज्ञान नहीं होता। दोसे नौ वर्षोंतककी कन्याएँ पूज्य हैं। अन्तिम दिन गायत्रीसहस्रनामका पाठ करना चाहिये और सप्तशतीके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये अथवा गायत्री या नवार्णमन्त्रसे हवन किया जाय। यह संक्षेपमें देवीभागवतकी पाठविधि है।


श्रीमद्देवीभागवतकथा ( पारायण ) एवं अनुष्ठान-विधि

जो लोग विधि-विधानसे श्रीमद्देवीभागवतकी कथा अथवा पारायण-पाठ कराना चाहते हों, उनके लिये पूजन आदिकी विस्तृत विधि और क्रम नीचे लिखा जा रहा है—

स्नान-सन्ध्योपासनादि कृत्यसे निवृत्त होकर पवित्र आसनपर सपत्नीक पूर्वाभिमुख बैठ जाय और पत्नीको अपने दाहिनी ओर बैठाये। चन्दन आदिसे तिलक कर ले। दोनों हाथोंकी अनामिका अँगुलीमें पवित्री धारण कर ले। आचमन, प्राणायाम कर ले, शिखामें ग्रन्थि लगा ले। तदनन्तर ग्रन्थिबन्धन कर ले और भगवान् विष्णुका ध्यान कर ले। रक्षादीप जलाकर हाथ धो ले।

अधिकारप्राप्तिके लिये गोत्रयनिष्क्रयद्रव्यका संकल्प— श्रीमद्देवीभागवतश्रवणमें अधिकारप्राप्तिके लिये प्रायश्चित्तके रूपमें तीन गौओंके निष्क्रयद्रव्यका दान करे। देवद्रव्य तथा त्रिकूर्च, अक्षत, पुष्प, जल लेकर निम्न संकल्प करे—

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्धे विष्णुपर्वे श्रीश्वेतवाराहनाम्नि प्रथमकल्पे वैवस्वत-मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगस्य प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भूर्लोके भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे ....क्षेत्रे बौद्धावतारे ....नाम्नि संवत्सरे श्रीसूर्ये ....अयने ....ऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे ....मासे ....पक्षे ....तिथौ ....वासरे ....राशिस्थिते श्रीसूर्ये शेषेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ....गोत्रः ....शर्मा/वर्मा/गुप्तः सपत्नीकोऽहं मम कृच्छ्रत्रयात्मक-प्रायश्चित्तानुष्ठानसिद्ध्यर्थं गोत्रयनिष्क्रयद्रव्यं रजतं चन्द्रदैवतं ....गोत्राय ....शर्मणे ब्राह्मणाय भवते सम्प्रददे।

संकल्पजल तथा द्रव्य ब्राह्मणको दे दे। तदनन्तर