भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २१


गोप्रार्थना करे—

गोप्रार्थना

गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश।
यस्मात्तस्माच्छिवं मे स्यादिहलोके परत्र च॥

प्रार्थनाके अनन्तर निम्न वाक्य बोले—अनेन गोदानेन पापापहा महाविष्णुः प्रीयताम्।

निम्न मन्त्रसे पंचगव्यप्राशन कर ले—

यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति मामके।
प्राशनात् पञ्चगव्यस्य दहत्यग्निरिवेन्धनम्॥

तदनन्तर हाथमें अक्षत-पुष्प लेकर ‘आ नो भद्रा०’ आदि मंगलमन्त्रोंका पाठ करे।

‘लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः’ आदि वाक्यों तथा ‘सुमुखश्चैकदन्तश्च’ इत्यादि गणपतिमन्त्रोंका पाठ करे। हाथके अक्षतपुष्प भगवान्‌को अर्पित कर दे। इसके बाद देवीभागवतश्रवणका तथा पूजनका प्रधान संकल्प करे—

प्रधान संकल्प

हाथमें त्रिकुश, अक्षत, पुष्प, जल, फल तथा द्रव्य लेकर निम्न संकल्प करे—

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्धे विष्णुपर्वे श्रीश्वेतवाराहनाम्नि प्रथमकल्पे वैवस्वत-मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगस्य प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भूर्लोके भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे ॰॰॰॰क्षेत्रे (यदि काशी हो तो अविमुक्तवाराणसीक्षेत्रे आनन्दवने महाश्मशाने गौरीमुखे त्रिकण्टकविराजिते भागीरथ्याः पश्चिमे तीरे बोले) बौद्धावतारे ॰॰॰॰नाम्नि संवत्सरे श्रीसूर्ये ॰॰॰॰अयने ॰॰॰॰ऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे ॰॰॰॰मासे ॰॰॰॰पक्षे ॰॰॰॰तिथौ ॰॰॰॰वासरे ॰॰॰॰नक्षत्रे ॰॰॰॰योगे ॰॰॰॰करणे ॰॰॰॰राशिस्थिते श्रीसूर्ये ॰॰॰॰राशिस्थिते चन्द्रे ॰॰॰॰राशिस्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तः सपत्नीकोऽहं अतीतानेकजन्मसंञ्चिताखिल-दुष्कृतनिवृत्तिपुरस्सरैहिकामुष्मिकाध्यात्मिकादिताप-त्रयोपशमनपूर्वककायिकादित्रिविधपापानां समूलोन्मूल-नार्थं मनोभिलषितफलप्राप्तिपूर्वकश्रीपराम्बाप्रीतया-विर्भावकामः ॰॰॰॰गोत्रोत्पन्न ॰॰॰॰शर्माब्राह्मणवदनार-विन्दात् अनेकश्रोतृश्रावणपूर्वकं श्रीमद्देवीभागवतं नवाह्वविधिना श्रोष्यामि। तदङ्गतया विहितं स्वस्ति-पुण्याहवाचनं मातृकापूजनं वसोर्धारापूजनं आयुष्य-मन्त्रजपं साङ्कल्पिकेन विधिना नान्दीश्राद्धमाचार्यादि-वरणानि च करिष्ये। तत्रादौ प्रारीप्सितसम्पूर्तिप्रति-बन्धकविघ्नव्यूहध्वंसकामः गणेशाम्बिकयोः यथोपचारैः पूजनमहं करिष्ये। संकल्पजल छोड़ दे।

तदनन्तर संक्षेपमें स्वस्तिवाचन, गणपतिपूजन, कलशस्थापन, पुण्याहवाचन, मातृकापूजन, वसोर्धारापूजन, आयुष्यमन्त्रजप तथा नान्दीमुखश्राद्ध करे। इसके बाद आचार्य आदिका वरण करे।

तदनन्तर सर्वतोभद्रमण्डलपर कलश स्थापितकर पराम्बा भगवतीका षोडशोपचारपूजन करे। इसके बाद सूर्यादि नवग्रहोंका स्थापन-पूजन, असंख्यात रुद्रकलशकी स्थापना और पूजा, कुमारीपूजन, बटुकपूजन, पुस्तकपूजन आदि सम्पन्नकर कथा प्रारम्भ करनी चाहिये। कथा एवं पाठके अन्तमें अन्तिम दिन हवन करनेकी विधि है। (यदि विस्तृत पूजा न करनी हो तो केवल गणेशाम्बिकाका पूजनकर आचार्यादि ब्राह्मणोंको वरण देकर कलशपर पराम्बा भगवतीका पूजन कर ले तथा पुस्तकपूजन एवं कथावाचकका पूजनकर पाठ अथवा कथा प्रारम्भ करनी चाहिये।) यहाँ आचार्य आदिका वरण, पराम्बा भगवती दुर्गादेवी, कुमारी एवं बटुक आदिका पूजन संक्षेपमें दिया जा रहा है—

आचार्यवरण

हाथमें कुशाक्षत, जल, वरण-द्रव्य एवं वरणसामग्री लेकर सर्वप्रथम आचार्यके वरणका संकल्प करे—

ॐ अद्य पूर्वोच्चारितग्रहगणगुणविशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं मम सर्वविधपापक्षयद्वारा ॰॰॰॰पूर्वोक्त-संकल्पितकार्यसिद्ध्यर्थं श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थञ्च श्रीम-द्देवीभागवतनवाह्नकथाश्रवणार्थं ॰॰॰॰गोत्रं ॰॰॰॰शर्माणं