भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २१


गोप्रार्थना करे—

गोप्रार्थना

गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश।
यस्मात्तस्माच्छिवं मे स्यादिहलोके परत्र च॥

प्रार्थनाके अनन्तर निम्न वाक्य बोले—अनेन गोदानेन पापापहा महाविष्णुः प्रीयताम्।

निम्न मन्त्रसे पंचगव्यप्राशन कर ले—

यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति मामके।
प्राशनात् पञ्चगव्यस्य दहत्यग्निरिवेन्धनम्॥

तदनन्तर हाथमें अक्षत-पुष्प लेकर ‘आ नो भद्रा०’ आदि मंगलमन्त्रोंका पाठ करे।

‘लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः’ आदि वाक्यों तथा ‘सुमुखश्चैकदन्तश्च’ इत्यादि गणपतिमन्त्रोंका पाठ करे। हाथके अक्षतपुष्प भगवान्‌को अर्पित कर दे। इसके बाद देवीभागवतश्रवणका तथा पूजनका प्रधान संकल्प करे—

प्रधान संकल्प

हाथमें त्रिकुश, अक्षत, पुष्प, जल, फल तथा द्रव्य लेकर निम्न संकल्प करे—

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्धे विष्णुपर्वे श्रीश्वेतवाराहनाम्नि प्रथमकल्पे वैवस्वत-मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगस्य प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भूर्लोके भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे ॰॰॰॰क्षेत्रे (यदि काशी हो तो अविमुक्तवाराणसीक्षेत्रे आनन्दवने महाश्मशाने गौरीमुखे त्रिकण्टकविराजिते भागीरथ्याः पश्चिमे तीरे बोले) बौद्धावतारे ॰॰॰॰नाम्नि संवत्सरे श्रीसूर्ये ॰॰॰॰अयने ॰॰॰॰ऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे ॰॰॰॰मासे ॰॰॰॰पक्षे ॰॰॰॰तिथौ ॰॰॰॰वासरे ॰॰॰॰नक्षत्रे ॰॰॰॰योगे ॰॰॰॰करणे ॰॰॰॰राशिस्थिते श्रीसूर्ये ॰॰॰॰राशिस्थिते चन्द्रे ॰॰॰॰राशिस्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तः सपत्नीकोऽहं अतीतानेकजन्मसंञ्चिताखिल-दुष्कृतनिवृत्तिपुरस्सरैहिकामुष्मिकाध्यात्मिकादिताप-त्रयोपशमनपूर्वककायिकादित्रिविधपापानां समूलोन्मूल-नार्थं मनोभिलषितफलप्राप्तिपूर्वकश्रीपराम्बाप्रीतया-विर्भावकामः ॰॰॰॰गोत्रोत्पन्न ॰॰॰॰शर्माब्राह्मणवदनार-विन्दात् अनेकश्रोतृश्रावणपूर्वकं श्रीमद्देवीभागवतं नवाह्वविधिना श्रोष्यामि। तदङ्गतया विहितं स्वस्ति-पुण्याहवाचनं मातृकापूजनं वसोर्धारापूजनं आयुष्य-मन्त्रजपं साङ्कल्पिकेन विधिना नान्दीश्राद्धमाचार्यादि-वरणानि च करिष्ये। तत्रादौ प्रारीप्सितसम्पूर्तिप्रति-बन्धकविघ्नव्यूहध्वंसकामः गणेशाम्बिकयोः यथोपचारैः पूजनमहं करिष्ये। संकल्पजल छोड़ दे।

तदनन्तर संक्षेपमें स्वस्तिवाचन, गणपतिपूजन, कलशस्थापन, पुण्याहवाचन, मातृकापूजन, वसोर्धारापूजन, आयुष्यमन्त्रजप तथा नान्दीमुखश्राद्ध करे। इसके बाद आचार्य आदिका वरण करे।

तदनन्तर सर्वतोभद्रमण्डलपर कलश स्थापितकर पराम्बा भगवतीका षोडशोपचारपूजन करे। इसके बाद सूर्यादि नवग्रहोंका स्थापन-पूजन, असंख्यात रुद्रकलशकी स्थापना और पूजा, कुमारीपूजन, बटुकपूजन, पुस्तकपूजन आदि सम्पन्नकर कथा प्रारम्भ करनी चाहिये। कथा एवं पाठके अन्तमें अन्तिम दिन हवन करनेकी विधि है। (यदि विस्तृत पूजा न करनी हो तो केवल गणेशाम्बिकाका पूजनकर आचार्यादि ब्राह्मणोंको वरण देकर कलशपर पराम्बा भगवतीका पूजन कर ले तथा पुस्तकपूजन एवं कथावाचकका पूजनकर पाठ अथवा कथा प्रारम्भ करनी चाहिये।) यहाँ आचार्य आदिका वरण, पराम्बा भगवती दुर्गादेवी, कुमारी एवं बटुक आदिका पूजन संक्षेपमें दिया जा रहा है—

आचार्यवरण

हाथमें कुशाक्षत, जल, वरण-द्रव्य एवं वरणसामग्री लेकर सर्वप्रथम आचार्यके वरणका संकल्प करे—

ॐ अद्य पूर्वोच्चारितग्रहगणगुणविशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं मम सर्वविधपापक्षयद्वारा ॰॰॰॰पूर्वोक्त-संकल्पितकार्यसिद्ध्यर्थं श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थञ्च श्रीम-द्देवीभागवतनवाह्नकथाश्रवणार्थं ॰॰॰॰गोत्रं ॰॰॰॰शर्माणं

२२ श्रीमद्देवीभागवत

२२ श्रीमद्देवीभागवत

नवाहकथाश्रावयितारं ब्राह्मणं एभिर्वरणद्रव्यैः भवन्तमहं वृणे। संकल्पजल छोड़ दे और वरणसामग्री आचार्यको प्रदान करे।

आचार्य बोले—ॐ वृतोऽस्मि।

उपवाचकका वरण

इसके बाद उपवाचकके वरणका निम्न संकल्प करे—ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुणविशिष्टतिथ्यादौ <sup>....</sup>गोत्रः <sup>....</sup>शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं मम सकलपापक्षयद्वारा पूर्वोक्तसङ्कल्पितकार्यसिद्धयर्थं <sup>....</sup>गोत्रं <sup>....</sup>शर्माणं उपवाचयितारं ब्राह्मणं एभिर्वरणद्रव्यैः भवन्तमहं वृणे। संकल्पजल छोड़ दे तथा वरणसामग्री दे दे।

मन्त्रजप तथा दुर्गापाठके लिये ब्राह्मणोंका वरण

तदनन्तर गायत्री, गणेश आदिके मन्त्रजप तथा सप्तशतीपाठके लिये निम्न संकल्पसे ब्राह्मणोंका वरण करे—

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुणविशिष्टतिथ्यादौ <sup>....</sup>गोत्रः <sup>....</sup>शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं मम सर्वविधपातकनिवृत्तिद्वारा श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं करिष्यमाणश्रीमद्देवीभागवतनवाहकथायज्ञकर्मणि एभिर्वरणद्रव्यैः नानागोत्रान् नानाशर्मणो ब्राह्मणान् गायत्रीगणेशादिमन्त्रजापकान् श्रीसूक्तसप्तशत्यादिपाठाकांश्च तत्तत्कर्मकर्तृत्वेन भवतोऽहं वृणे। संकल्पजल छोड़ दे। वरण-सामग्री ब्राह्मणोंको दे दे।

ऋत्विज बोलें—वृताः स्मः।

ब्राह्मण निम्न मन्त्रका पाठ करे—

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥

**प्रार्थना—**निम्न मन्त्रसे ब्राह्मणोंकी प्रार्थना करे—

अक्रोधनाः शौचपराः सततं ब्रह्मचारिणः।
देवध्यानरता नित्यं प्रसन्नमनसः सदा॥
अदुष्टभाषणाः सन्तु मा सन्तु परनिन्दकाः।
ममापि नियमा ह्येते भवन्तु भवतामपि॥
ऋत्विजश्च यथा पूर्वं शक्रादीनां मखेऽभवन्।
यूयं तथा मे भवत ऋत्विजो द्विजसत्तमाः॥
अस्मिन् कर्मणि ये विप्राः वृता गुरुमुखादयः।
सावधानाः प्रकुर्वन्तु स्वं स्वं कर्म यथोदितम्॥
अस्य यागस्य निष्पत्तौ भवन्तोऽभ्यर्थिता मया।
सुप्रसन्नैः प्रकर्तव्यं कर्मेदं विधिपूर्वकम्॥

तदनन्तर दिग्रक्षण, पंचगव्यप्रोक्षण करके सर्वतोभद्रमण्डलमें देवताओंका आवाहन-पूजन करे।

कलशके ऊपर देवीकी प्रतिमाका स्थापन

सर्वतोभद्रमण्डलके मध्यमें प्रधान कलशकी स्थापना करे। कलशके ऊपर अगन्युत्तारणपूर्वक स्वर्णनिर्मित देवीकी प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाकी प्रतिष्ठा कर ले और श्रीसूक्तसे षोडशोपचारपूजन करे। प्रतिमाके ऊपर पंचरंगा वितान बाँधे।

सपत्नीक यजमान श्रीभगवतीदुर्गादेवीके समीपमें बैठकर अपने दक्षिण भागमें पूजनकी सामग्री स्थापित करे। तत्त्वशुद्धिके लिये निम्न रीतिसे आचमन करे—

ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।

प्राणायाम

पूरक-कुम्भक-रेचकके क्रमसे प्राणायाम करे।

पवित्रीकरण

निम्न मन्त्रसे अपने ऊपर तथा पूजन-सामग्रीपर जल छिड़के—

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु।

आसन-पवित्रीकरण

पहले निम्न रीतिसे विनियोग करे—

पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसनपवित्रकरणे विनियोगः।

तदनन्तर निम्न मन्त्र बोले—

ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २३


शिखाबन्धन

निम्न मन्त्रसे शिखाका स्पर्श करे—

ॐ ऊर्ध्वकेशि विरूपाक्षि मांसशोणितभोजने।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये चामुण्डे चापराजिते॥

भैरवनमस्कार

निम्न मन्त्रसे भैरवजीको नमस्कार करे—

ॐ तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पान्तदहनोपम।
भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुमर्हसि॥

दुर्गापूजनका संकल्प

हाथमें जल, अक्षत, पुष्प लेकर बोले—

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुण-विशिष्टतिथ्यादौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहम् अस्मिन् श्रीमद्देवीभागवतनवाह्नकथायज्ञकर्मणि मम आत्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीभगवत्या जगदम्बिकायाः त्रिगुणात्मिकायाः श्रीदुर्गादेव्याः पूजनं करिष्ये। पूजनकर्मणि आत्मनोऽधिकारपूर्वकयोग्यता-सम्पादनार्थं नवार्णेन न्यासान् करिष्ये। संकल्पजल छोड़ दे।

नवार्णमन्त्रके न्यासका संकल्प

अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि श्रीमहाकालीमहालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः ऐं बीजं ह्रीं शक्तिः क्लीं कीलकम् श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे न्यासे पूजायां च विनियोगः।

विनियोग पढ़कर जल गिराये। नीचे लिखे न्यासवाक्योंमेंसे एक-एकका उच्चारण करके दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे क्रमशः सिर, मुख, हृदय, गुदा, दोनों चरण और नाभि—इन अंगोंका स्पर्श करे।

ऋष्यादिन्यास

ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः शिरसि (सिरका स्पर्श करे)।

गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दोभ्यो नमः मुखे (मुखका स्पर्श करे)।

महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः हृदि (हृदयका स्पर्श करे)।

ऐं बीजाय नमः गुह्ये (गुह्यस्थानका स्पर्श करे)।

ह्रीं शक्तये नमः पादयोः (दोनों पैरोंको छुए)।

क्लीं कीलकाय नमः नाभौ (नाभिका स्पर्श करे)।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे—इस मूल मन्त्रसे हाथोंकी शुद्धि करके करन्यास करे।

करन्यास

ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। (दोनों हाथोंकी तर्जनी अँगुलियोंसे दोनों अँगूठोंका स्पर्श करे)।

ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। (दोनों हाथोंके अँगूठोंसे दोनों तर्जनी अँगुलियोंका स्पर्श करे)।

ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठोंसे मध्यमा अँगुलियोंका स्पर्श करे)।

ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठोंसे अनामिका अँगुलियोंका स्पर्श करे)।

ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (कनिष्ठिका अँगुलियोंका स्पर्श करे)।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः। (हथेलियों और उनके पृष्ठभागोंका परस्पर स्पर्श करे)।

हृदयादिन्यास

ॐ ऐं हृदयाय नमः (दाहिने हाथकी पाँचों अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे)।

ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा (सिरका स्पर्श करे)।

ॐ क्लीं शिखायै वषट् (शिखाका स्पर्श करे)।

ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अँगुलियोंसे दाहिने कंधेका एक साथ स्पर्श करे)।

ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंके अग्रभागसे दोनों नेत्रों और ललाटके मध्यभागका स्पर्श करे)।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट् (दाहिने हाथकी तर्जनी तथा मध्यमा अँगुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये)।

तदनन्तर अपने वामभागमें स्थापित पूजा-कलशमें गन्धाक्षत, पुष्प आदिसे वरुणकी पूजा करे।

२४श्रीमद्देवीभागवत

दीपप्रज्वलन तथा प्रार्थना

न्यासके अनन्तर देवीके दक्षिणभागमें घीका दीपक तथा बायें भागमें तिलके तेलका दीपक जलाकर निम्न मन्त्रसे दीपककी प्रार्थना करे—

भो दीप देवीरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत्।
यावत्कर्मसमाप्तिः स्यात् तावत्त्वं सुस्थिरो भव॥

तदनन्तर अपने वामभागमें स्थापित पूजा-कलशमें गन्धाक्षत, पुष्प आदिसे वरुणकी पूजा करे।

प्रोक्षण

कलशके जलसे अपना तथा सभी सामग्रियोंका प्रोक्षण करे।

शंखपूजन

कलशके जलसे शंखको पूरित करके देवीके वामभागमें त्रिपादुकाधारमें स्थापितकर निम्न मन्त्रसे गन्धाक्षतसे उसका पूजन करे—

ॐ अग्निर्ऋषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः। तमीमहे महागयम्॥

तदनन्तर निम्न मन्त्रसे प्रार्थना करे—

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे।
निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते॥

घण्टापूजन

घण्टा प्रक्षालितकर उसे अपने वामभागमें स्थापित करके निम्न मन्त्रसे गन्धाक्षतसे उसका पूजन करे—

ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्मांस्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रं चक्षुर्-बृहद्रथन्तरे पक्षौ। स्तोम आत्मा छन्दाँस्यङ्गानि यजूंषि नाम। साम ते तनूर्वामदेव्यं यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः। सुपर्णोऽसि गरुत्मान्दिवं गच्छ स्वः पत॥

तदनन्तर निम्न मन्त्रसे प्रार्थना करे—

ॐ आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम्।
घण्टानादं प्रकुर्वीत सर्वकामार्थसिद्धये॥

घण्टाध्वनि करके उसे यथास्थान रख दे।

॥ श्रीदुर्गादेवी-पूजनविधि ॥

ध्यान

हाथमें पुष्प लेकर निम्न मन्त्रोंसे दुर्गादेवीका ध्यान करे—

खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥
अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुः कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥
घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन।
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्॥
ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्निषाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण॥
ॐ पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती।
यज्ञं वष्टु धियावसुः॥

श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः श्रीदुर्गां ध्यायामि। ध्यानार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। हाथके फूल चढ़ा दे।

आवाहन

हाथमें पुष्प लेकर श्रीदुर्गादेवीका आवाहन करे—

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः श्रीदुर्गां आवाहयामि। आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। पुष्प चढ़ाये।

आसन

हाथमें पुष्प लेकर श्रीदुर्गादेवीको आसन प्रदान करे—

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। पुष्प चढ़ाये।

श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २५


पाद्य

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि। जल चढ़ाये।

अर्घ्य

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि। अर्घ्यका जल चढ़ाये।

आचमनीय

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, आचमनीयं जलं समर्पयामि। जल चढ़ाये।

स्नान

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, स्थानीयं जलं समर्पयामि। जल चढ़ाये।

पञ्चामृतस्नान

पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः।
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, पंचामृतस्नानं समर्पयामि। पंचामृतसे स्नान कराये।

शुद्धोदकस्नान

शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त आश्विनाः श्येतः श्येताक्षोऽरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णा यामा अवलप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। जलसे स्नान कराये।

महाभिषेकस्नान

श्रीसूक्तके मन्त्रोंद्वारा जलसे स्नान कराये।
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, महाभिषेकस्नानं समर्पयामि।

वस्त्रोपवस्त्र

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि। तदन्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। वस्त्र तथा उपवस्त्र चढ़ाये। एक आचमनी जल छोड़े।

यज्ञोपवीत

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः यज्ञोपवीते समर्पयामि। तदन्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। यज्ञोपवीत चढ़ाये। एक आचमनी जल छोड़े।

चन्दन

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः विलेपनार्थे चन्दनं समर्पयामि। भगवती दुर्गादेवीको चन्दन लगाये।

अक्षत

अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत। अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः चन्दनोपरि अक्षतान् समर्पयामि। भगवती दुर्गादेवीको चन्दनके ऊपर अक्षत लगाये।

पुष्प तथा पुष्पमाला

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पुष्पमालां समर्पयामि।

सौभाग्यद्रव्य

२६श्रीमद्देवीभागवत

भगवती दुर्गादेवीको पुष्पमाला चढ़ाये।

सौभाग्यद्रव्य

अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः।
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमांसं परि पातु विश्वतः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः सौभाग्यद्रव्याणि समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको हल्दी-रोरी आदि सौभाग्यद्रव्य चढ़ाये।

सिन्दूर

सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वात प्रमियः पतयन्ति यह्वाः।
घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः सिन्दूरं समर्पयामि। भगवती दुर्गादेवीको सिन्दूर चढ़ाये।

धूप

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः धूपमाघ्रापयामि। भगवती दुर्गादेवीको धूप निवेदित करे।

दीप

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः दीपं दर्शयामि। भगवती दुर्गादेवीको दीप निवेदित करे।

नैवेद्य

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः नैवेद्यं निवेदयामि। भगवती दुर्गादेवीको नैवेद्य निवेदित करे।

करोद्वर्तन

अꣳशुनाते अꣳशुः पृच्यतां परुषा परुः।
गन्धस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः करोद्वर्तनकं समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको इत्र निवेदित करे।

ऋतुफल

याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।
बृहस्पति प्रसूतास्तानो मुञ्चन्त्वꣳहसः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः ऋतुफलानि समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको ऋतुफल निवेदित करे।

पूगीफल-ताम्बूल

आर्द्रा यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पूगीफलताम्बूलं समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको सुपारी तथा ताम्बूल निवेदित करे।

दक्षिणा

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः दक्षिणां समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको दक्षिणा चढ़ाये।

नीराजन

इदं हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीरꣳ सर्वगणꣳ स्वस्तये।
आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि। अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः नीराजनं दर्शयामि। भगवती दुर्गादेवीकी आरती करे।

प्रदक्षिणा

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीननपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः प्रदक्षिणां समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीकी प्रदक्षिणा करे।

पुष्पाञ्जलि

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥

श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि२७

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥
राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे। स मे कामान् कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु॥ कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः॥
ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमारि धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको पुष्पांजलि समर्पित करे।

स्तुतिपाठ

निम्न स्तोत्रसे प्रार्थना करे—
नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे
नमस्ते जगद्व्यापिके विश्वरूपे।
नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे
नमस्ते महायोगिनि ज्ञानरूपे।
नमस्ते नमस्ते सदानन्दरूपे
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य
भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्ये-
ऽनले सागरे प्रान्तरे राजगेहे।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
अपारे महादुस्तरेऽत्यन्तघोरे
विपत्सगारे मज्जतां देहभाजाम्।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारहेतु-
र्नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
नमश्चण्डिके चण्डदुर्दण्डलीला-
समुत्खण्डिता खण्डिताशेषशत्रो।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारबीजं
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
त्वमेवाघभावाधृता सत्यवादी-
र्न जाता जितक्रोधनात् क्रोधनिष्ठा।
इडा पिङ्गला त्वं सुषुम्णा च नाडी
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे
सरस्वत्यरुन्धत्यमोघस्वरूपे ।
विभूतिः शची कालरात्रिः सती त्वं
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
शरणमसि सुराणां सिद्धविद्याधराणां
मुनिमनुजपशूनां दस्युभिस्त्रासितानाम्।
नृपतिगृहगतानां व्याधिभिः पीडितानां
त्वमसि शरणमेका देवि दुर्गे प्रसीद॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः स्तुतिपाठं निवेदयामि।
अनया पूजया त्रिगुणात्मिका दुर्गा प्रीयताम् न मम। एक आचमनी जल छोड़े।

॥ सूर्यादि ग्रहोंका स्थापन एवं पूजन ॥

तदनन्तर ग्रहपीठके समीप बैठकर नवग्रहोंका स्थापन एवं पूजन करे। अपने दाहिने हाथमें जल, अक्षत तथा पुष्प लेकर पूजनका संकल्प करे—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुण-विशिष्टतिथ्यादौ शुभपुण्यतिथौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं ॰॰॰॰कर्मणि निर्विघ्नतासंसिद्ध्यर्थं तथा च सूर्यादिग्रहाणां प्रीतये आदित्यादिनवग्रहाणां स्थापनं पूजनञ्च करिष्ये। हाथका जल आदि तष्टामें छोड़ दे तथा गन्धाक्षत-पुष्प लेकर निम्न मन्त्रोंसे नवग्रहोंका आवाहन तथा स्थापन करे—

सूर्य

ॐ आ कृष्णोन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सूर्याय नमः सूर्यमावाहयामि स्थापयामि।

चन्द्रमा

ॐ इमं देवा असपत्नꣳ सुवध्वं महते क्षत्राय महते

२८श्रीमद्देवीभागवत

ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय । इमममुष्य
पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं
ब्राह्मणानां राजा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्रमसे नमः चन्द्रमसमावाहयामि
स्थापयामि।

भौम ( मंगल )

ॐ अग्निमूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां
रेतांसि जिन्वति ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भौमाय नमः भौममावाहयामि
स्थापयामि।

बुध

ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते संसृजेथा मयं च।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बुधाय नमः बुधमावाहयामि
स्थापयामि।

बृहस्पति

ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बृहस्पतये नमः
बृहस्पतिमावाहयामि स्थापयामि।

शुक्र

ॐ अन्नात्परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत्क्षत्रं पयः सोमं
प्रजापतिः। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस
इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शुक्राय नमः शुक्रमावाहयामि
स्थापयामि।

शनि

ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शं योरभि स्रवन्तु नः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शनैश्चराय नमः शनैश्चर-
मावाहयामि स्थापयामि।

राहु

ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा।
कया शचिष्ठया वृता ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः राहवे नमः राहुमावाहयामि
स्थापयामि।


केतु

ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे।
समुषद्भिरजायथाः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः केतवे नमः केतुमावाहयामि
स्थापयामि।

निम्न मन्त्रसे सभीपर अक्षत चढ़ाकर ग्रहोंकी प्रतिष्ठा करे।

ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं
तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह
मादयन्तामो३म्प्रतिष्ठ ॥

सूर्यादिनवग्रहेभ्यो नमः कहकर गन्धाक्षतपुष्प आदि उपचारोंसे पूजन करे। तदनन्तर निम्न प्रार्थना करे—
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु ॥
सूर्यादिनवग्रहेभ्यो नमः मन्त्रपुष्पाञ्जलिं
समर्पयामि। मन्त्रपुष्पांजलि अर्पित करे।
अनया पूजया सूर्यादिनवग्रहाः प्रीयन्तां न मम।
कहकर एक आचमनी जल छोड़े।

॥ असंख्यात रुद्रकलशकी स्थापना ॥

तदनन्तर ग्रहपीठके ईशानकोणमें निम्न मन्त्रसे रुद्रकलशकी स्थापना करे—
ॐ असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्।
तेषां सहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि ॥

निम्न मन्त्रसे कलशपर अक्षत छोड़कर प्रतिष्ठा करे—
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं
तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह
मादयन्तामो३म्प्रतिष्ठ ॥

प्रतिष्ठाके अनन्तर गन्धादि उपचारोंसे कलश एवं वरुणका पूजन करे।

प्रार्थना—निम्न मन्त्रसे भगवान् रुद्रकी प्रार्थना करे—
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥
अनेन पूजनाख्येन कर्मणा रुद्रवरुणौ प्रीयेताम्।

श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि२९

कहकर एक आचमनी जल छोड़े।

कुमारीपूजन ( नवकन्यापूजन ) *

जगत्पूज्यां जगद्वन्द्यां सर्वशक्तिस्वरूपिणीम्।
नवदुर्गात्मिकां देवीं कुमारीं पूजयाम्यहम्॥ १॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कुमार्यै नमः कुमारीमावाहयामि पूजयामि। कुमारीरूप कन्याका पूजन करे।

त्रिपुरां त्रिपुराधारां त्रिवर्गज्ञानरूपिणीम्।
त्रैलोक्यवन्दितां देवीं त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम्॥ २॥
ॐ भूर्भुवः स्वः त्रिमूर्त्यै नमः त्रिमूर्तिमावाहयामि पूजयामि। त्रिमूर्तिरूप कन्याका पूजन करे।

कलात्मिकां कलातीतां कारुण्यहृदयां शिवाम्।
कल्याणजननीं देवीं कल्याणीं पूजयाम्यहम्॥ ३॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कल्याण्यै नमः कल्याणीमावाहयामि पूजयामि। कल्याणीरूप कन्याका पूजन करे।

अणिमादिगुणोपेतामकाराद्यक्षरात्मिकाम् ।
अनन्तां शक्तिसम्पन्नां रोहिणीं पूजयाम्यहम्॥ ४॥
ॐ भूर्भुवः स्वः रोहिण्यै नमः रोहिणीमावाहयामि पूजयामि। रोहिणीरूप कन्याका पूजन करे।

कामचारां शुभां कान्तां कालचक्रस्वरूपिणीम्।
कामदां करुणोपेतां कालिकां पूजयाम्यहम्॥ ५॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कालिकायै नमः कालिकामावाहयामि पूजयामि। कालिकारूप कन्याका पूजन करे।

चण्डवीरां चण्डमायां चण्डमुण्डप्रभञ्जिनीम्।
पूजयामि सदा देवीं चण्डिकां चण्डविक्रमाम्॥ ६॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चण्डिकायै नमः चण्डिकामावाहयामि पूजयामि। चण्डिकारूप कन्याका पूजन करे।

सदानन्दकरीं शान्तां सर्वदेवनमस्कृताम्।
सर्वभूतात्मिकां देवीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम्॥ ७॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शाम्भव्यै नमः शाम्भवीमावाहयामि पूजयामि। शाम्भवीरूप कन्याका पूजन करे।

दुर्गमे दुस्तरे कार्ये भवदुःखविनाशिनीम्।
पूजयामि सदा भक्त्या दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्॥ ८॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दुर्गायै नमः दुर्गामावाहयामि पूजयामि। दुर्गरूप कन्याका पूजन करे।

सुन्दरीं स्वर्णवर्णाभां सुखसौभाग्यदायिनीम्।
सुभ्रदजननीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम्॥ ९॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सुभद्रायै नमः सुभद्रामावाहयामि पूजयामि। सुभद्रारूप कन्याका पूजन करे।

इस प्रकार पाद्य, अर्घ्य, आचमन, वस्त्र, अलंकार, गन्ध, अक्षत, माला आदिसे नौ कुमारियोंका पूजन करे, भोजन कराये तथा दक्षिणा प्रदानकर निम्न मन्त्रसे प्रार्थनापूर्वक प्रणाम करे—

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥

बटुकपूजन

निम्न मन्त्रसे बटुकका ध्यान करे—

ॐ करकलितकपालः कुण्डली दण्डपाणि-
स्तरुणतिमिरनीलव्यालयज्ञोपवीती।
ऋतुसमयसपर्याविघ्नविच्छेदहेतु-
र्जयति बटुकनाथः सिद्धिदः साधकानाम्॥

'ॐ बं बटुकाय नमः' इस मन्त्रसे पाद्य, अर्घ्य, आचमन, वस्त्र, अलंकार, गन्ध, अक्षत, माला आदिसे पूजन करे, भोजन कराये तथा दक्षिणा प्रदानकर प्रणाम करे।

पायसबलि

नर्वाणमन्त्रका उच्चारण करके 'ॐ महालक्ष्म्यै नमः' पायसबलिं समर्पयामि। कहकर जल छोड़ दे।

पुस्तकपूजन

निम्न मन्त्रसे गन्धाक्षतपुष्पसे श्रीमद्देवीभागवत-पुस्तकका ध्यान एवं पूजन करे—

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
ॐ यदाकूतात्समुस्रुत्रोद्धो वा मनसो वा सम्भृतं चक्षुषो वा।
तदनु प्रेत सुकृतामु लोक यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः॥

कथावाचकका पूजन

कथावाचकका पैर धोकर गन्ध, अक्षत, पुष्पमाला


* (क) कुमार्यश्च प्रतिदिनं अष्टोत्तरशतं नव एका वा यथासम्भवं पूज्याः। (ख) कुमारीपूजने द्विवर्षदारभ्य दशवर्षपर्यन्ता कन्या ग्राह्या। द्विवर्षाद्या दशाब्दाद्याः कुमारीः परिपूजयेत्। एकाब्दायाः प्रीत्यभावो रुद्राब्दा तु विवर्जिता॥

३० श्रीमद्देवीभागवत

३० श्रीमद्देवीभागवत

तथा वस्त्र देकर निम्न मन्त्रसे उनकी प्रार्थना करे—
बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्॥
व्यासरूपप्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय॥

महाध्वजका पूजन

तदनन्तर ईशानकोणमें आकर निम्न मन्त्रसे महाध्वजका पूजन करे—
आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढा- नड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रियोंषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्॥
ॐ महाध्वजाय नमः सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि कहकर महाध्वजका पूजन करे तथा निम्न मन्त्रसे प्रार्थना करे—
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः।
स बुध्निया उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनि मसतश्च वि वः॥
अनया पूजया महाध्वजस्थब्रह्मा प्रीयताम्। एक आचमनी जल छोड़े।

आरती

सभी स्थापित देवोंकी आरती करे—
इदग्ं हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीरग्ं सर्वगणग्ं स्वस्तये। आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि। अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त॥ आ रात्रि पार्थिवग्ं रजः पितुरप्रायि धामभिः। दिवः सदाग्ंसि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः॥
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
गणपत्याद्यावाहितदेवताभ्यो नमः कर्पूरनीराजनम् समर्पयामि।
जलेन शीतलीकरणम्। आरतीके चारों ओर घुमाकर जल छोड़े। पुष्पैर्देवताभिवन्दनम्। देवताओंको पुष्पद्वारा प्रणाम करे। आत्माभिवन्दनम्। हस्तप्रक्षालनम्। हाथ धोकर पुष्प लेकर निम्न प्रार्थना करे—
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥
राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे। स मे कामान् कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु॥ कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः॥
ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्तपर्यायी स्यात् सार्वभौमः सार्वायुषान्तादापरार्धात्। पृथिव्यै समुद्र- पर्यन्ताया एकराडिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे। आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति।
ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः॥
ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमारि धीमहि।
तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च।
पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वरि॥
प्रधानपीठस्थित भगवतीके चरणकमलोंमें पुष्पांजलि निवेदितकर प्रदक्षिणा करे तथा निम्न मन्त्रसे नमस्कार करे।
नमः सर्वहितार्थायै जगदाधारहेतवे।
साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रणयेन मया कृतः॥
स्तुतिपाठ—यदि समय हो तो निम्न स्तुतिपाठ करे—
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो०

श्रीमद्देवीभागवतपाठका विनियोग

ॐ अस्य श्रीमद्देवीभागवताख्यस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीकृष्णद्वैपायन ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमन्मणिद्वीपाधि- वासिनी भगवती महाशक्तिः देवता, ब्रह्म बीजम्, गायत्री शक्तिः, भुक्तिमुक्तिके कीलकम्, पुरुषार्थ- चतुष्टयसिद्ध्यर्थं पाठे विनियोगः।
फिर इस प्रकार भगवतीका ध्यान करे—
बालाकार्कयुततेजसां त्रिनयनां रक्ताम्बरोल्लासिनीं
नानालङ्कृतराजमानवपुषां बालोडुराट्शेखराम्।
हस्तैरिक्षुधनुःसृणिं सुमशरं पाशं मुदा बिभ्रतीं
श्रीचक्रस्थितसुन्दरीं त्रिजगतामाधारभूतां स्मरेत्॥
अथवा
सुधाकूपारान्तस्त्रिदशतरुवाटीविलसिते

श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि ३१


मणिद्वीपे चिन्तामणिमयगृहे चित्ररुचिरे।
विराजन्तीमम्बां परशिवहृदि स्मेरवदनां
नरो ध्यात्वा भोगं भजति खलु मोक्षञ्च लभते॥
ब्रह्मेशाच्युतशक्राद्यैर्महर्षिभिरुपासिता ।
जगतां श्रेयसे सास्तु मणिद्वीपाधिदेवता॥
(श्रीमद्देवीभा० माहात्म्य ५।१०१-१०२)

अमृतसागरके तटपर कल्पवृक्षकी वाटिकासे सुशोभित मणिद्वीपमें स्थित बहुवर्णचित्रित चिन्तामणिमय भवनमें तथा परम शिवके हृदयमें विराजमान रहनेवाली और मन्द-मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली जगदम्बाका ध्यान करके मनुष्य सांसारिक सुखोंका उपभोग करता है और अन्तमें निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र—आदि देवताओं एवं समस्त महर्षियोंद्वारा पूजित मणिद्वीपनिवासिनी वे भगवती संसारका कल्याण करती रहें।

ध्यानके अनन्तर पाठ आरम्भ करे।

नवाह्न-पारायणके विश्रामस्थल

प्रतिदिन क्रमशः निम्नलिखित स्थलोंपर विश्राम करना चाहिये—

प्रथम दिनतृतीयस्कन्धके तृतीय अध्यायकी समाप्तिपर( ३५ )
द्वितीय ,,चतुर्थ ,, अष्टम ,, ,,( ३५ )
तृतीय ,,पंचम ,, अष्टादश ,, ,,( ३५ )
चतुर्थ ,,षष्ठ ,, अष्टादश ,, ,,( ३५ )
पंचम ,,सप्तम ,, अष्टादश ,, ,,( ३१ )
षष्ठ ,,अष्टम ,, सप्तदश ,, ,,( ३१ )
सप्तम ,,नवम ,, अट्ठाईसवें ,, ,,( ३५ )
अष्टम ,,दशम ,, त्रयोदश ,, ,,( ३५ )
नवम ,,द्वादश स्कन्धकी समाप्तिपर ,, ,,( ३८ )

हवनविधान

श्रीमद्देवीभागवतके कथा-श्रवणके अनन्तर हवनका भी विधान है। सपत्नीक यजमान हवनकुण्ड या स्थण्डिलके समीप पूर्वाभिमुख बैठ जाय। कुशोदकके द्वारा अपना तथा हवन-सामग्रीका प्रोक्षण करके स्वस्तिवाचनपूर्वक श्रीगणपति आदि आवाहित देवोंका संक्षेपमें पूजन करके हवनका निम्न संकल्प करे—

संकल्प—हाथमें त्रिकुश, अक्षत, जल लेकर बोले—ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य पूर्वोच्चारित ग्रहगणगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं कृतस्य श्रीमद्देवीभागवत-कथाश्रवणस्य फलप्राप्त्यर्थं यज्ञाङ्गोहमकर्मणि नवग्रह-होमपूर्वकं प्रधानभूतश्रीदुर्गादेवतानिमित्तं पायसाज्येन तथा श्रीदेवीव्याः वैदिकमन्त्रेण नवार्णेन सप्तशतीमन्त्रैश्च यथासम्भवं सम्पादितैराज्यादिहवनद्रव्यैः यथासंख्येन होमं करिष्ये। इस प्रकार संकल्पकर जल छोड़ दे, हवनके लिये ब्राह्मणोंका वरण कर ले।

तदनन्तर पंचभूसंस्कार करके अपने सम्मुख अग्नि स्थापित करके संक्षेपमें ग्रहोंका पूजन करे। तदनन्तर असंख्यातरुद्रका पूजन करके कुशखण्डिका करे। कुण्डस्थ देवताओं तथा अग्निका पूजन करके अग्निकी प्रार्थना करे—

अग्ने त्वमैश्वरं तेजः पावनं परमं हितम्।
तस्मात्त्वदीयहृत्पद्मे श्रीदुर्गां तर्पयाम्यहम्॥
अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम्।
हिरण्यवर्णममलं समृद्धं विश्वतोमुखम्॥

तदनन्तर आघाराज्यहोम करते समय प्रत्येक आहुतिके अनन्तर स्रुवामें स्थित हुतशेष घृतको प्रोक्षणीपात्रमें डालता जाय।

फिर हाथमें त्रिकुश, अक्षत, जल लेकर द्रव्य समर्पणके लिये बोले—इमानि सम्पादितहवनीयद्रव्याणि या या यक्ष्यमाणदेवतास्ताभ्यस्ताभ्यो मया परित्यक्तानि न ममेति—कहकर जल भूमिपर छोड़ दे और बोले—यथा दैवतानि सन्तु।

तदनन्तर गणेशाम्बिकाके लिये आहुति देकर नवग्रहोंका हवन करे। प्रधान देवके लिये आहुति दे।

ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन।
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्॥

आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदनमातरं पुरः।
पितरं च प्रयन्त्स्वः॥

३२ | श्रीमद्देवीभागवत


तथा नवार्णमन्त्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे)-से १००८ या १०८ बार हवन करके सप्तशती-मन्त्रोंसे आहुतियाँ दे। तदनन्तर आवाहित देवताओंका हवन करे, फिर अग्निका पूजनकर स्विष्टकृत् होम करके भूरादि नवाहुति प्रदान करे।

तदनन्तर दशदिक्पाल, नवग्रहों और क्षेत्रपालके लिये बलि निवेदित करे। अन्तमें पूर्णाहुति करे। वसोर्धाराके मन्त्रोंसे घृतसे आहुति दे। तदनन्तर अग्निकी प्रदक्षिणा करे, हवनीय कुण्डसे भस्म धारण करे, फिर संस्रवप्राशन करके प्रणीतोदकसे मार्जन कर ले और ब्रह्माको पूर्णपात्र प्रदान करे। आचार्यादिको दक्षिणा प्रदान करे। आचार्य यजमानको श्रेयोदान प्रदान करे। इसके बाद उत्तर पूजन करके कर्पूरनीराजन करे और मन्त्र-पुष्पांजलि चढ़ाये।

तदनन्तर आचार्य यजमानके वामभागमें पत्नीको बैठाकर रुद्रकलशके जल तथा प्रधान कलशके जलसे अभिषेक करके भूयसी दक्षिणा तथा ब्राह्मण-भोजनका संकल्प करे और यजमानको तिलकाशीर्वाद दे। अन्तमें क्षमा-प्रार्थना करे तथा आवाहित देवोंका विसर्जन करे और निम्न मन्त्रोंको पढ़ते हुए समस्त कर्म भगवान्‌को समर्पित कर दे—

प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥
यत्पादपङ्कजस्मरणाद् यस्य नामजपादपि।
न्यूनं कर्म भवेत् पूर्णं तं वन्दे साम्बमीश्वरम्॥


श्रीदेवीभागवतकी आरती

आरति जग-पावन पुरानकी।
मातृ-चरित्र-विचित्र-खानकी ॥
देवि-भागवत अतिशय सुन्दर।
परमहंस मुनि-जन-मन-सुखकर।
विमल ज्ञान-रवि मोह-तिमिर-हर॥
परम मधुर सुषमा-वितानकी ॥ १॥

कलि-कल्मष-विष-विषम-निवारिणि ।
युगपत् भोग-सुयोग प्रसारिणि।
परमानन्द-सुधा विस्तारिणि॥
सुमहौषध अज्ञान-हानकी ॥ २॥

संतत सकल सुमङ्गलदायिनि।
सन्मति सद्गति मुक्ति-प्रदायिनि।
नूतन नित्य विभूति-विधायिनि॥
परमप्रभा परतत्त्व-ज्ञानकी ॥ ३॥

आर्ति-अशान्ति, भ्रान्ति-भय-भंजनि।
पाप-ताप माया-मद-गंजनि।
शुचि सेवक-मन-मानस-रंजनि॥
लीला-रस मधुमय निधानकी ॥ ४॥

J. N. Prasad

गीताप्रेस, गोरखपुर

राजराजेश्वरी श्रीललिताम्बा

देवताओंद्वारा सिंहवाहिनी श्रीदुर्गाकी स्तुति


[गीताप्रेस, गोरखपुर]

गीताप्रेस, गोरखपुर


विदेहराज जनक तथा परम विरक्त श्रीशुकदेवजी

परीक्षित्-पुत्र महाराज जनमेजयके सर्पयज्ञमें आस्तीकका प्रवेश

गीताप्रेस, गोरखपुर

गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् हयग्रीवद्वारा वेदोंका उद्धारकर ब्रह्माजीको प्रदान करना

श्रीजगदम्बाका देवताओंको दर्शन देना

(चित्र)

गीताप्रेस, गोरखपुर


नमः शिवायै कल्याण्यै शान्त्यै पुष्ट्यै नमो नमः। भगवत्यै नमो देव्यै रुद्राण्यै सततं नमः ॥
कालरात्र्यै तथाम्बायै इन्द्राण्यै ते नमो नमः। सिद्ध्यै बुद्ध्यै तथा वृद्ध्यै वैष्णव्यै ते नमो नमः ॥

गीताप्रेस, गोरखपुर

शुम्भासुरके दूत सुग्रीवका भगवती कौशिकीके पास पहुँचना

शिव-पार्वतीद्वारा श्रीकृष्णको वरदान

गीताप्रेस, गोरखपुर