देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
॥ श्रीहरिः ॥
1897
महर्षि वेदव्यासप्रणीत
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
[ प्रथम खण्ड ]
( सचित्र, सरल हिन्दी-व्याख्यासहित )
स्कन्ध १ से ६ तक
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—1 A
सं० २०६७ प्रथम संस्करण १०,०००
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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—1 B
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—1 C
निवेदन
पुराणवाङ्मयमें ‘श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण’ का अत्यन्त महिमामय स्थान है। पुराणोंकी परिगणनामें वेदतुल्य, पवित्र और सभी लक्षणोंसे युक्त यह पुराण पाँचवाँ है। शक्तिके उपासक इस पुराणको ‘शाक्तभागवत’ कहते हैं। इस ग्रन्थके आदि, मध्य और अन्तमें—सर्वत्र भगवती आद्याशक्तिकी महिमाका प्रतिपादन किया गया है। इस पुराणमें मुख्य रूपसे परब्रह्म परमात्माके मातृरूप और उनकी उपासनाका वर्णन है। भगवती आद्याशक्तिकी लीलाएँ अनन्त हैं, उन लीलाकथाओंका प्रतिपादन ही इस ग्रन्थका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है, जिसके सम्यक् अवगाहनसे साधकों तथा भक्तोंका मन देवीके पद्मपरागका भ्रमर बनकर भक्तिमार्गका पथिक बन जाता है।
संसारमें सभी प्राणियोंके लिये मातृभावकी महती महिमा है। मानव अपनी सबसे अधिक श्रद्धा स्वाभाविक रूपसे माताके ही चरणोंमें अर्पित करता है; क्योंकि सर्वप्रथम माताकी ही गोदमें उसे लोक-दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होता है, इसलिये माता ही सभी प्राणियोंकी आदिगुरुके रूपमें प्रतिष्ठित है। उसकी करुणा और कृपा बालकोंके लौकिक तथा पारलौकिक कल्याणका आधार है; इसीलिये ‘मातृदेवो भव पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव’—इन श्रुतिवाक्योंमें सबसे पहले माताका ही स्थान है। जो भगवती महाशक्तिस्वरूपिणी देवी तथा समष्टिस्वरूपिणी सम्पूर्ण जगत्की माता हैं, वे ही सम्पूर्ण लोकोंको कल्याणका मार्ग प्रदर्शित करनेवाली ज्ञानगुरुस्वरूपा भी हैं।
वास्तवमें महाशक्ति ही परब्रह्मके रूपमें प्रतिष्ठित हैं, जो विभिन्न रूपोंमें अनेकविध लीलाएँ करती रहती हैं। उन्हींकी शक्तिसे ब्रह्मा विश्वका सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं, अतः ये ही जगत्का सृजन-पालन-संहार करनेवाली आदिनारायणी शक्ति हैं। ये ही महाशक्ति नौ दुर्गाओं तथा दस महाविद्याओंके रूपमें प्रतिष्ठित हैं और ये ही महाशक्ति देवी अन्नपूर्णा, जगद्धात्री, कात्यायनी, ललिता तथा अम्बा हैं। गायत्री, भुवनेश्वरी, काली, तारा, बगला, षोडशी, त्रिपुरा, धूमावती, मातंगी, कमला, पद्मावती, दुर्गा आदि देवियाँ इन्हीं भगवतीके ही रूप हैं। ये ही शक्तिमती हैं और शक्ति हैं; नर हैं और नारी भी हैं; ये ही माता-धाता-पितामह आदि रूपसे अधिष्ठित हैं।
अभिप्राय यह है कि परमात्मस्वरूपिणी महाशक्ति ही विविध शक्तियोंके रूपमें सर्वत्र क्रीडा करती हैं—‘शक्तिक्रीडा जगत् सर्वम्’ सम्पूर्ण जगत् शक्तिकी क्रीडा (लीला) है। शक्तिसे रहित हो जाना ही शून्यता है।
शक्तिहीन मनुष्यका कहीं भी आदर नहीं किया जाता है। ध्रुव तथा प्रह्लाद भक्ति-शक्तिके कारण ही पूजित हैं। गोपिकाएँ प्रेमशक्तिके कारण ही जगत्में पूजनीय हुईं। हनुमान् तथा भीष्मकी ब्रह्मचर्यशक्ति; वाल्मीकि तथा व्यासकी कवित्वशक्ति; भीम तथा अर्जुनकी पराक्रमशक्ति; हरिश्चन्द्र तथा युधिष्ठिरकी सत्यशक्ति और शिवाजी तथा राणाप्रतापकी वीरशक्ति ही इन महात्माओंके प्रति श्रद्धा-समादर अर्पित करनेके लिये सभी लोगोंको प्रेरणा प्रदान करती है। सभी जगह शक्तिकी ही प्रधानता है। इसलिये प्रकारान्तरसे कहा जा सकता है कि ‘सम्पूर्ण विश्व महाशक्तिका ही विलास है।’ श्रीमद्देवीभागवतमें
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—1 C
| ४ | श्रीमद्देवीभागवत |
|---|
भगवती स्वयं उद्घोष करती हैं 'सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्।' अर्थात् समस्त जगत् मैं ही हूँ, मेरे अतिरिक्त अन्य कुछ भी सनातन तत्त्व नहीं है।
वास्तवमें श्रीमद्देवीभागवतकी समस्त कथाओं और उपदेशोंका सार यह है कि हमें आसक्तिका त्यागकर वैराग्यकी ओर प्रवृत्त होना चाहिये तथा सांसारिक बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिये एकमात्र पराम्बा भगवतीकी शरणमें जाना चाहिये। मनुष्य अपने ऐहिक जीवनको किस प्रकार सुख-समृद्धि एवं शान्तिसे सम्पन्न कर सकता है और उसी जीवनसे जीवमात्रके कल्याणमें सहायक होता हुआ कैसे अपने परम ध्येय पराम्बा भगवतीकी करुणामयी कृपाको प्राप्त कर सकता है—इसके विधिवत् साधनोंको उपदेशपूर्ण इतिवृत्तों, कथानकोंके साथ इस पुराणमें प्रस्तुत किया गया है।
'श्रीमद्देवीभागवत' एवं 'श्रीमद्भागवत'—इन दोनोंमें महापुराणकी गणनामें किसे माना जाय? कभी-कभी यह प्रश्न उठता है। शास्त्रोंके अनुसार कल्पभेद कथाभेदका सुन्दर समाधान माना जाता है। इस कल्पभेदमें क्या होता है? देश, काल और अवस्थाका भेद है—ये तीनों भेद जड़प्रकृतिके हैं, चेतन संवित्में नहीं। कल्पभेदका एक अर्थ दर्शनभेद भी होता है। श्रीमद्भागवतका अपना दर्शन है और श्रीमद्देवीभागवतका अपना। दोनों ही दर्शन अपने-अपने स्थानपर सुप्रतिष्ठित हैं। श्रीमद्देवीभागवतका सम्बन्ध सारस्वतकल्पसे तथा श्रीमद्भागवतका सम्बन्ध पाद्मकल्पसे है।
'श्रीमद्देवीभागवतपुराण' के श्रवण और पठनसे स्वाभाविक ही पुण्यलाभ तथा अन्तःकरणकी परिशुद्धि, पराम्बा भगवतीमें रति और विषयोंमें विरति तो होती ही है, साथ ही मनुष्योंको ऐहिक और पारलौकिक हानि-लाभका यथार्थ ज्ञान भी हो जाता है, तदनुसार जीवनमें कर्तव्यका निश्चय करनेकी अनुभूत शिक्षा मिलती है, साथ ही जो जिज्ञासु शास्त्रमर्यादाके अनुसार अपना जीवनयापन करना चाहते हैं, उन्हें इस पुराणसे कल्याणकारी ज्ञान, साधन, सुन्दर एवं पवित्र जीवनयापनकी शिक्षा भी प्राप्त होती है। इस प्रकार यह पुराण जिज्ञासुओंके लिये अत्यधिक उपादेय, ज्ञानवर्धक, सरस तथा उनके यथार्थ अभ्युदयमें पूर्णतः सहायक है।
संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत सन् १९६० ई०में कल्याणके विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित हुआ था। सुधीजनोंकी यह भावना थी कि भाषा-टीकासहित मूल श्रीमद्देवीभागवतका प्रकाशन किया जाय। इस दृष्टिसे पिछले दो वर्षों (सन् २००८ तथा २००९ ई०)-में सम्पूर्ण देवीभागवतमहापुराणका अनुवाद श्लोकसंख्यासहित कल्याणके विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित किया गया, इसके साथ ही मूल देवीभागवत भी पुस्तकरूपमें प्रकाशित की गयी। इस महापुराणका कलेवर बड़ा होनेके कारण विशेषाङ्कमें मूल और अर्थ—दोनों देना सम्भव नहीं था। अतः अब पुस्तकरूपमें भाषा-टीकासहित श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण दो भागोंमें प्रकाशित किया जा रहा है।
भक्तजनोंमें श्रीमद्देवीभागवतकी कथा एवं पारायणके अनुष्ठानकी परम्परा भी है। इस दृष्टिसे श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि तथा सांगोपांग पूजा-अर्चन-हवनका विधान प्रस्तुत किया गया है। साथ ही नवाह्न-पारायणके तिथिक्रमका भी उल्लेख किया गया है। आशा है साधकगण इससे लाभान्वित होंगे।
—राधेश्याम खेमका
189^ श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— * D
॥ श्रीहरिः ॥
विषय-सूची
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| १ | निवेदन............................................... | ३ | देवीका प्रसन्न होना, भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी कथा......................... | ८५ | |
| २ | श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य ....................... | १३ | ६ | शेषशायी भगवान् विष्णुके कर्णमलसे मधु-कैटभकी उत्पत्ति तथा उन दोनोंका ब्रह्माजीसे युद्धके लिये तत्पर होना...... | ९६ |
| ३ | अर्धश्लोकी देवीभागवत ........................ | १५ | ७ | ब्रह्माजीका भगवान् विष्णु तथा भगवती योगनिद्राकी स्तुति करना ................. | १०० |
| ४ | भवान्यष्टकम् .................................... | १७ | ८ | भगवान् विष्णु योगमायाके अधीन क्यों हो गये—ऋषियोंके इस प्रश्नके उत्तरमें सूतजीद्वारा उन्हें आद्याशक्ति भगवतीकी महिमा सुनाना................................. | १०६ |
| ५ | श्रीश्रीजगद्धात्री [चित्र] .................... | १८ | ९ | भगवान् विष्णुका मधु-कैटभसे पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध करना, विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा मोहित मधु-कैटभका विष्णुद्वारा वध ............. | ११० |
| ६ | श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि ............. | १९ | १० | व्यासजीकी तपस्या और वर-प्राप्ति ..... | ११८ |
| माहात्म्य | ११ | बुधके जन्मकी कथा .......................... | १२१ | ||
| १ | सूतजीके द्वारा ऋषियोंके प्रति श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणकी महिमाका कथन ............................................... | ३३ | १२ | राजा सुद्युम्नकी इला नामक स्त्रीके रूपमें परिणति, इलाका बुधसे विवाह और पुरूरवाकी उत्पत्ति, भगवतीकी स्तुति करनेसे इलारूपधारी राजा सुद्युम्नकी सायुज्यमुक्ति ................ | १२८ |
| २ | श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें स्यमन्तमणिकी कथा ........................... | ३८ | १३ | राजा पुरूरवा और उर्वशीकी कथा ..... | १३३ |
| ३ | श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुद्युम्नकी कथा ......................... | ४५ | १४ | व्यासपुत्र शुकदेवके अरणिसे उत्पन्न होनेकी कथा तथा व्यासजीद्वारा उनसे गृहस्थधर्मका वर्णन ........................... | १३६ |
| ४ | श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें रेवती नक्षत्रके पतन और पुनः स्थापनकी कथा तथा श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणसे राजा दुर्दमको मन्वन्तराधिप-पुत्रकी प्राप्ति..... | ५१ | १५ | शुकदेवजीका विवाहके लिये अस्वीकार करना तथा व्यासजीका उनसे श्रीमद्देवी-भागवत पढ़नेके लिये कहना ............ | १४२ |
| ५ | श्रीमद्देवीभागवतपुराणकी श्रवण-विधि, श्रवणकर्ताके लिये पालनीय नियम, श्रवणके फल तथा माहात्म्यका वर्णन . | ५९ | १६ | बालरूपधारी भगवान् विष्णुसे महा-लक्ष्मीका संवाद, व्यासजीका शुकदेवजीसे देवीभागवतप्राप्तिकी परम्परा बताना तथा शुकदेवजीका मिथिला जानेका निश्चय करना ................................. | १४८ |
| प्रथम स्कन्ध | |||||
| १ | महर्षि शौनकका सूतजीसे श्रीमद्देवी-भागवतपुराण सुनानेकी प्रार्थना करना... | ६९ | |||
| २ | सूतजीद्वारा श्रीमद्देवीभागवतके स्कन्ध, अध्याय तथा श्लोकसंख्याका निरूपण और उसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन. | ७१ | |||
| ३ | सूतजीद्वारा पुराणोंके नाम तथा उनकी श्लोकसंख्याका कथन, उपपुराणों तथा प्रत्येक द्वापरयुगके व्यासोंका नाम ....... | ७५ | |||
| ४ | नारदजीद्वारा व्यासजीको देवीकी महिमा बताना ................................. | ७९ | |||
| ५ | भगवती लक्ष्मीके शापसे विष्णुका मस्तक कट जाना, वेदोंद्वारा स्तुति करनेपर |
[ ६ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| १७- | शुकदेवजीका राजा जनकसे मिलनेके लिये मिथिलापुरीको प्रस्थान तथा राजभवनमें प्रवेश ..................................... | १५४ |
| १८- | शुकदेवजीके प्रति राजा जनकका उपदेश | १६० |
| १९- | शुकदेवजीका व्यासजीके आश्रममें वापस आना, विवाह करके सन्तानोत्पत्ति करना तथा परम सिद्धिकी प्राप्ति करना ........ | १६५ |
| २०- | सत्यवतीका राजा शान्तनुसे विवाह तथा दो पुत्रोंका जन्म, राजा शान्तनुकी मृत्यु, चित्रांगदका राजा बनना तथा उसकी मृत्यु, विचित्रवीर्यका काशिराजकी कन्याओंसे विवाह और क्षयरोगसे मृत्यु, व्यासजीद्वारा धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति ............. | १७० |
| द्वितीय स्कन्ध | ||
| १- | ब्राह्मणके शापसे अद्रिका अप्सराका मछली होना और उससे राजा मत्स्य तथा मत्स्यगन्धाकी उत्पत्ति ..................... | १७७ |
| २- | व्यासजीकी उत्पत्ति और उनका तपस्याके लिये जाना ................................. | १८१ |
| ३- | राजा शान्तनु, गंगा और भीष्मके पूर्वजन्मकी कथा ......................................... | १८४ |
| ४- | गंगाजीद्वारा राजा शान्तनुका पतिरूपमें वरण, सात पुत्रोंका जन्म तथा गंगाका उन्हें अपने जलमें प्रवाहित करना, आठवें पुत्रके रूपमें भीष्मका जन्म तथा उनकी शिक्षा-दीक्षा | १९० |
| ५- | मत्स्यगन्धा (सत्यवती)-को देखकर राजा शान्तनुका मोहित होना, भीष्मद्वारा आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करनेकी प्रतिज्ञा करना और शान्तनुका सत्यवतीसे विवाह ....... | १९५ |
| ६- | दुर्वासाका कुन्तीको अमोघ कामद मन्त्र देना, मन्त्रके प्रभावसे कान्यावस्थामें ही कर्णका जन्म, कुन्तीका राजा पाण्डुसे विवाह, शापके कारण पाण्डुका सन्तानोत्पादनमें असमर्थ होना, मन्त्र-प्रयोगसे कुन्ती और माद्रीका पुत्रवती होना, पाण्डुकी मृत्यु और पाँचों पुत्रोंको लेकर कुन्तीका हस्तिनापुर आना | २०१ |
| ७- | धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरसे दुर्योधनके पिण्डदानहेतु धन माँगना, भीमसेनका प्रतिरोध; धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती, विदुर और संजयका वनके लिये प्रस्थान, वनवासी धृतराष्ट्र तथा माता कुन्तीसे मिलनेके लिये युधिष्ठिरका भाइयोंके साथ वनगमन, विदुरका महाप्रयाण, धृतराष्ट्रसहित पाण्डवोंका व्यासजीके आश्रमपर आना, देवीकी कृपासे व्यासजीद्वारा महाभारतयुद्धमें मरे कौरवों-पाण्डवोंके परिजनोंको बुला देना..................... | २०८ |
| ८- | धृतराष्ट्र आदिका दावाग्निमें जल जाना, प्रभासक्षेत्रमें यादवोंका परस्पर युद्ध और संहार, कृष्ण और बलरामका परमधामगमन, परीक्षित्को राजा बनाकर पाण्डवोंका हिमालयपर्वतपर जाना, परीक्षित्को शापकी प्राप्ति, प्रमद्वरा और रुरुका वृत्तान्त ...... | २१४ |
| ९- | सर्पके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु, रुरुद्वारा अपनी आधी आयु देकर उसे जीवित कराना, मणि-मन्त्र-औषधिद्वारा सुरक्षित राजापरीक्षित्का सात तलवाले भवनमें निवास करना ........ | २१८ |
| १०- | महाराज परीक्षित्को डँसनेके लिये तक्षकका प्रस्थान, मार्गमें मन्त्रवेत्ता कश्यपसे भेंट, तक्षकका एक वटवृक्षको डँसकर भस्म कर देना और कश्यपका उसे पुनः हरा-भरा कर देना, तक्षकद्वारा धन देकर कश्यपको वापस कर देना, सर्पदंशसे राजा परीक्षित्की मृत्यु....................... | २२२ |
| ११- | जनमेजयका राजा बनना और उत्तंककी प्रेरणासे सर्प-सत्र करना, आस्तीकके कहनेसे राजाद्वारा सर्प-सत्र रोकना ...... | २२८ |
| १२- | आस्तीकमुनिके जन्मकी कथा, कद्रू और विनताद्वारा सूर्यके घोड़ेके रंगके विषयमें शर्त लगाना और विनताको दासीभावकी प्राप्ति, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप ..... | २३४ |
[ ७ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| तृतीय स्कन्ध | प्रेरित करना..................................... | २९९ | |||
| १- | राजा जनमेजयका ब्रह्माण्डोत्पत्तिविषयक प्रश्न तथा इसके उत्तरमें व्यासजीका पूर्वकालमें नारदजीके साथ हुआ संवाद सुनाना .................................... | २४१ | १३- | देवीकी आधारशक्तिसे पृथ्वीका अचल होना तथा उसपर सुमेरु आदि पर्वतोंकी रचना, ब्रह्माजीद्वारा मरीचि आदिकी मानसी सृष्टि करना, काश्यपी सृष्टिका वर्णन; ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास और स्वर्ग आदिका निर्माण; भगवान् विष्णुद्वारा अम्बायज्ञ करना और प्रसन्न होकर भगवती आद्याशक्तिद्वारा आकाशवाणीके माध्यमसे उन्हें वरदान देना........................... | ३०६ |
| २- | भगवती आद्याशक्तिके प्रभावका वर्णन . | २४५ | १४- | देवीमाहात्म्यसे सम्बन्धित राजा ध्रुवसन्धिकी कथा, ध्रुवसन्धिकी मृत्युके बाद राजा युधाजित् और वीरसेनका अपने-अपने दौहित्रोंके पक्षमें विवाद ... | ३११ |
| ३- | ब्रह्मा, विष्णु और महेशका विभिन्न लोकोंमें जाना तथा अपने ही सदृश अन्य ब्रह्मा, विष्णु और महेशको देखकर आश्चर्यचकित होना, देवीलोकका दर्शन | २४९ | १५- | राजा युधाजित् और वीरसेनका युद्ध, वीरसेनकी मृत्यु, राजा ध्रुवसन्धिकी रानी मनोरमाका अपने पुत्र सुदर्शनको लेकर भारद्वाजमुनिके आश्रममें जाना तथा वहीं निवास करना............................... | ३१६ |
| ४- | भगवतीके चरणनखमें त्रिदेवोंको सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन होना, भगवान् विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति करना ........................ | २५५ | १६- | युधाजित्का भारद्वाजमुनिके आश्रमपर आना और उनसे मनोरमाको भेजनेका आग्रह करना, प्रत्युत्तरमें मुनिका 'शक्ति हो तो ले जाओ'-ऐसा कहना.......................... | ३२२ |
| ५- | ब्रह्मा और शिवजीका भगवतीकी स्तुति करना ........................................ | २६० | १७- | युधाजित्का अपने प्रधान अमात्यसे परामर्श करना, प्रधान अमात्यका इस सन्दर्भमें वसिष्ठ-विश्वामित्र-प्रसंग सुनाना और परामर्श मानकर युधाजित्का वापस लौट जाना, बालक सुदर्शनको दैवयोगसे कामराज नामक बीजमन्त्रकी प्राप्ति, भगवतीकी आराधनासे सुदर्शनको उनका प्रत्यक्ष दर्शन होना तथा काशिराजकी कन्या शशिकलाको स्वप्नमें भगवतीद्वारा सुदर्शनका वरण करनेका आदेश देना................................... | ३२८ |
| ६- | भगवती जगदम्बिकाद्वारा अपने स्वरूपका वर्णन तथा 'महासरस्वती', 'महालक्ष्मी' और 'महाकाली' नामक अपनी शक्तियोंको क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिवको प्रदान करना ........................................ | २६६ | १८- | राजकुमारी शशिकलाद्वारा मन-ही-मन सुदर्शनका वरण करना, काशिराजद्वारा स्वयंवरकी घोषणा, शशिकलाका सखीके माध्यमसे अपना निश्चय माताको बताना | ३३३ |
| ७- | ब्रह्माजीके द्वारा परमात्माके स्थूल और सूक्ष्म स्वरूपका वर्णन; सात्त्विक, राजस और तामस शक्तिका वर्णन; पंचतन्मात्राओं, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा पंचीकरण-क्रियाद्वारा सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन .... | २७४ | |||
| ८- | सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणका वर्णन | २७८ | |||
| ९- | गुणोंके परस्पर मिश्रीभावका वर्णन, देवीके बीजमन्त्रकी महिमा............. | २८३ | |||
| १०- | देवीके बीजमन्त्रकी महिमाके प्रसंगमें सत्यव्रतका आख्यान ..................... | २८७ | |||
| ११- | सत्यव्रतद्वारा बिन्दुरहित सारस्वत बीजमन्त्र 'ऐ-ऐ' का उच्चारण तथा उससे प्रसन्न होकर भगवतीका सत्यव्रतको समस्त विद्याएँ प्रदान करना ..................... | २९३ | |||
| १२- | सात्त्विक, राजस और तामस यज्ञोंका वर्णन; मानसयज्ञकी महिमा और व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको देवी-यज्ञके लिये |
[ ८ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| १९- | माताका शशिकलाको समझाना, शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना, सुदर्शन तथा अन्य राजाओंका स्वयंवरमें आगमन, युधाजित्द्वारा सुदर्शनको मार डालनेकी बात कहनेपर केरलनरेशका उन्हें समझाना .. | ३३८ | २६- | नवरात्रव्रत-विधान, कुमारीपूजामें प्रशस्त कन्याओंका वर्णन ........................ | ३७५ |
| २०- | राजाओंका सुदर्शनसे स्वयंवरमें आनेका कारण पूछना और सुदर्शनका उन्हें स्वप्नमें भगवतीद्वारा दिया गया आदेश बताना, राजा सुबाहुका शशिकलाको समझाना, परंतु उसका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना | ३४४ | २७- | कुमारीपूजामें निषिद्ध कन्याओंका वर्णन, नवरात्रव्रतके माहात्म्यके प्रसंगमें सुशील नामक वणिक्की कथा ................... | ३८० |
| २१- | राजा सुबाहुका राजाओंसे अपनी कन्याकी इच्छा बताना, युधाजित्का क्रोधित होकर सुबाहुको फटकारना तथा अपने दौहित्रसे शशिकलाका विवाह करनेको कहना, माताद्वारा शशिकलाको पुनः समझाना, किंतु शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना | ३५० | २८- | श्रीरामचरित्रवर्णन .......................... | ३८६ |
| २२- | शशिकलाका गुप्त स्थानमें सुदर्शनके साथ विवाह, विवाहकी बात जानकर राजाओंका सुबाहुके प्रति क्रोध प्रकट करना तथा सुदर्शनका मार्ग रोकनेका निश्चय करना | ३५६ | २९- | सीताहरण, रामका शोक और लक्ष्मणद्वारा उन्हें सान्त्वना देना ........................... | ३९२ |
| २३- | सुदर्शनका शशिकलाके साथ भारद्वाज-आश्रमके लिये प्रस्थान, युधाजित् तथा अन्य राजाओंसे सुदर्शनका घोर संग्राम, भगवती सिंहवाहिनी दुर्गाका प्राकट्य, भगवतीद्वारा युधाजित् और शत्रुजित्का वध, सुबाहुद्वारा भगवतीकी स्तुति ....... | ३६१ | ३०- | श्रीराम और लक्ष्मणके पास नारदजीका आना और उन्हें नवरात्रव्रत करनेका परामर्श देना, श्रीरामके पूछनेपर नारदजीका उनसे देवीकी महिमा और नवरात्रव्रतकी विधि बतलाना, श्रीरामद्वारा देवीका पूजन और देवीद्वारा उन्हें विजयका वरदान देना ... | ३९७ |
| २४- | सुबाहुद्वारा भगवती दुर्गासे सदा काशीमें रहनेका वरदान माँगना तथा देवीका वरदान देना, सुदर्शनद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीका उसे अयोध्या जाकर राज्य करनेका आदेश देना, राजाओंका सुदर्शनसे अनुमति लेकर अपने-अपने राज्योंको प्रस्थान ... | ३६७ | चतुर्थ स्कन्ध | ||
| २५- | सुदर्शनका शत्रुजित्की माताको सान्त्वना देना, सुदर्शनद्वारा अयोध्यामें तथा राजा सुबाहुद्वारा काशीमें देवी दुर्गाकी स्थापना | ३७१ | १- | वसुदेव, देवकी आदिके कष्टोंके कारणके सम्बन्धमें जनमेजयका प्रश्न ............. | ४०३ |
| २- | व्यासजीका जनमेजयको कर्मकी प्रधानता समझाना ................................. | ४०७ | |||
| ३- | वसुदेव और देवकीके पूर्वजन्मकी कथा | ४१२ | |||
| ४- | व्यासजीद्वारा जनमेजयको मायाकी प्रबलता समझाना .......................... | ४१७ | |||
| ५- | नर-नारायणकी तपस्यासे चिन्तित होकर इन्द्रका उनके पास जाना और मोहिनी माया प्रकट करना तथा उससे भी अप्रभावित रहनेपर कामदेव, वसन्त और अप्सराओंको भेजना........................................ | ४२१ | |||
| ६- | कामदेवद्वारा नर-नारायणके समीप वसन्त ऋतुकी सृष्टि, नारायणद्वारा उर्वशीकी उत्पत्ति, अप्सराओंद्वारा नारायणसे स्वयंको अंगीकार करनेकी प्रार्थना .................. | ४२५ | |||
| ७- | अप्सराओंके प्रस्तावसे नारायणके मनमें ऊहापोह और नरका उन्हें समझाना तथा अहंकारके कारण प्रह्लादके साथ हुए युद्धका स्मरण कराना .................... | ४३१ |
[ ९ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| ८- | व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको प्रह्लादकी कथा सुनाना और इस प्रसंगमें च्यवनऋषिके पाताललोक जानेका वर्णन ............. | ४३६ |
| ९- | प्रह्लादजीका तीर्थयात्राके क्रममें नैमिषारण्य पहुँचना और वहाँ नर-नारायणसे उनका घोर युद्ध, भगवान् विष्णुका आगमन और उनके द्वारा प्रह्लादको नर-नारायणका परिचय देना ................................. | ४४० |
| १०- | राजा जनमेजयद्वारा प्रह्लादके साथ नर-नारायणके युद्धका कारण पूछना, व्यासजीद्वारा उत्तरमें संसारके मूल कारण अहंकारका निरूपण करना तथा महर्षि भृगुद्वारा भगवान् विष्णुको शाप देनेकी कथा ................... | ४४५ |
| ११- | मन्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये शुक्राचार्यका तपस्यारत होना, देवताओंद्वारा दैत्योंपर आक्रमण, शुक्राचार्यकी माताद्वारा दैत्योंकी रक्षा और इन्द्र तथा विष्णुको संज्ञाशून्य कर देना, विष्णुद्वारा शुक्रमाताका वध.. | ४५० |
| १२- | महात्मा भृगुद्वारा विष्णुको मानवयोनिमें जन्म लेनेका शाप देना, इन्द्रद्वारा अपनी पुत्री जयन्तीको शुक्राचार्यके लिये अर्पित करना, देवगुरु बृहस्पतिद्वारा शुक्राचार्यका रूप धारणकर दैत्योंका पुरोहित बनना | ४५५ |
| १३- | शुक्राचार्यरूपधारी बृहस्पतिका दैत्योंको उपदेश देना............................... | ४६० |
| १४- | शुक्राचार्यद्वारा दैत्योंको बृहस्पतिका पाखण्ड-पूर्ण कृत्य बताना, बृहस्पतिकी मायासे मोहित दैत्योंका उन्हें फटकारना, क्रुद्ध शुक्राचार्यका दैत्योंको शाप देना, बृहस्पतिका अन्तर्धान हो जाना, प्रह्लादका शुक्राचार्यजीसे क्षमा माँगना और शुक्राचार्यका उन्हें प्रारब्धकी बलबत्ता समझाना ........... | ४६६ |
| १५- | देवता और दैत्योंके युद्धमें दैत्योंकी विजय, इन्द्रद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीका प्रकट होकर दैत्योंके पास जाना, प्रह्लादद्वारा |
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| भगवतीकी स्तुति, देवीके आदेशसे दैत्योंका पातालगमन........................ | ४७१ | |
| १६- | भगवान् श्रीहरिके विविध अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन ............................. | ४७८ |
| १७- | श्रीनारायणद्वारा अप्सराओंको वरदान देना, राजा जनमेजयद्वारा व्यासजीसे श्रीकृष्णावतारका चरित सुनानेका निवेदन करना ................................. | ४८१ |
| १८- | पापभारसे व्यथित पृथ्वीका देवलोक जाना, इन्द्रका देवताओं और पृथ्वीके साथ ब्रह्मलोक जाना, ब्रह्माजीका पृथ्वी तथा इन्द्रादि देवताओंसहित विष्णुलोक जाकर विष्णुकी स्तुति करना, विष्णुद्वारा अपनेको भगवतीके अधीन बताना....... | ४८५ |
| १९- | देवताओंद्वारा भगवतीका स्तवन, भगवतीद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनको निमित्त बनाकर अपनी शक्तिसे पृथ्वीका भार दूर करनेका आश्वासन देना .......................... | ४९० |
| २०- | व्यासजीद्वारा जनमेजयको भगवतीकी महिमा सुनाना तथा कृष्णावतारकी कथाका उपक्रम | ४९५ |
| २१- | देवकीके प्रथम पुत्रका जन्म, वसुदेवद्वारा प्रतिज्ञानुसार उसे कंसको अर्पित करना और कंसद्वारा उस नवजात शिशुका वध | ५०३ |
| २२- | देवकीके छः पुत्रोंके पूर्वजन्मकी कथा, सातवें पुत्रके रूपमें भगवान् संकर्षणका अवतार, देवताओं तथा दानवोंके अंशावतारोंका वर्णन ................. | ५०७ |
| २३- | कंसके कारागारमें भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, वसुदेवजीका उन्हें गोकुल पहुँचाना और वहाँसे योगमायास्वरूपा कन्याको लेकर आना, कंसद्वारा कन्याके वधका प्रयास, योगमायाद्वारा आकाशवाणी करनेपर कंसका अपने सेवकोंद्वारा नवजात शिशुओंका वध कराना ................. | ५१२ |
| २४- | श्रीकृष्णावतारकी संक्षिप्त कथा, कृष्णपुत्रका |
[ १० ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रसूतिगृहसे हरण, कृष्णद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवती चण्डिकाद्वारा सोलह वर्षके बाद पुनः पुत्रप्राप्तिका वर देना ......... | ५१७ | सुनकर महिषासुरका उद्विग्न होकर अपने प्रधान अमात्यको देवीके पास भेजना... | ५७३ | ||
| २५- | व्यासजीद्वारा शाम्भवी मायाकी बलवत्ताका वर्णन, श्रीकृष्णद्वारा शिवजीकी प्रसन्नताके लिये तप करना और शिवजीद्वारा उन्हें वरदान देना....................................... | ५२३ | १०- | देवीद्वारा महिषासुरके अमात्यको अपना उद्देश्य बताना तथा अमात्यका वापस लौटकर देवीद्वारा कही गयी बातें महिषासुरको बताना.............................. | ५७९ |
| पंचम स्कन्ध | ११- | महिषासुरका अपने मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करना और ताम्रको भगवतीके पास भेजना................................... | ५८५ | ||
| १- | व्यासजीद्वारा त्रिदेवोंकी तुलनामें भगवतीकी उत्तमताका वर्णन ................................. | ५३१ | १२- | देवीके अट्टहाससे भयभीत होकर ताम्रका महिषासुरके पास भाग आना, महिषासुरका अपने मन्त्रियोंके साथ पुनः विचार-विमर्श तथा दुर्धर, दुर्मुख और बाष्कलकी गर्वोक्ति ........................... | ५९१ |
| २- | महिषासुरके जन्म, तप और वरदान-प्राप्तिकी कथा ..................................... | ५३६ | १३- | बाष्कल और दुर्मुखका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध............................. | ५९७ |
| ३- | महिषासुरका दूत भेजकर इन्द्रको स्वर्ग खाली करनेका आदेश देना, दूतद्वारा इन्द्रका युद्धहेतु आमन्त्रण प्राप्तकर महिषासुरका दानववीरोंको युद्धके लिये सुसज्जित होनेका आदेश देना ........... | ५४१ | १४- | चिक्षुर और ताम्रका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध ............................. | ६०२ |
| ४- | इन्द्रका देवताओं तथा गुरु बृहस्पतिसे परामर्श करना तथा बृहस्पतिद्वारा जय-पराजयमें दैवकी प्रधानता बतलाना...... | ५४६ | १५- | बिडालाख्य और असिलोमाका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध ...................... | ६०७ |
| ५- | इन्द्रका ब्रह्मा, शिव और विष्णुके पास जाना; तीनों देवताओंसहित इन्द्रका युद्धस्थलमें आना तथा चिक्षुर, बिडाल और ताम्रको पराजित करना ................................. | ५५१ | १६- | महिषासुरका रणभूमिमें आना तथा देवीसे प्रणय-याचना करना ............. | ६१२ |
| ६- | भगवान् विष्णु और शिवके साथ महिषासुरका भयानक युद्ध............. | ५५६ | १७- | महिषासुरका देवीको मन्दोदरी नामक राजकुमारीका आख्यान सुनाना.......... | ६१८ |
| ७- | महिषासुरको अवध्य जानकर त्रिदेवोंका अपने-अपने लोक लौट जाना, देवताओंकी पराजय तथा महिषासुरका स्वर्गपर आधिपत्य, इन्द्रका ब्रह्मा और शिवजीके साथ विष्णुलोकके लिये प्रस्थान ........ | ५६१ | १८- | दुर्धर, त्रिनेत्र, अन्धक और महिषासुरका वध | ६२३ |
| १९- | देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति ........... | ६२९ | |||
| २०- | देवीका मणिद्वीप पधारना तथा राजा शत्रुघ्नका भूमण्डलाधिपति बनना ........ | ६३५ | |||
| ८- | ब्रह्माप्रभृति समस्त देवताओंके शरीरसे तेजःपुंजका निकलना और उस तेजोराशिसे भगवतीका प्राकट्य ........................... | ५६६ | २१- | शुम्भ और निशुम्भको ब्रह्माजीके द्वारा वरदान, देवताओंके साथ उनका युद्ध और देवताओंकी पराजय .................... | ६४० |
| ९- | देवताओंद्वारा भगवतीको आयुध और आभूषण समर्पित करना तथा उनकी स्तुति करना, देवीका प्रचण्ड अट्टहास करना, जिसे | २२- | देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति और उनका प्राकट्य ............................. | ६४६ | |
| २३- | भगवतीके श्रीविग्रहसे कौशिकीका प्राकट्य, |
[ ११ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| देवीकी कालिकारूपमें परिणति, चण्ड-मुण्डसे देवीके अद्भुत सौन्दर्यको सुनकर शुम्भका सुग्रीवको दूत बनाकर भेजना, जगदम्बाका विवाहके विषयमें अपनी शर्त बताना .............................. | ६५२ | भगवतीका प्रकट होना और उन्हें इच्छित वरदान देना........................... | ७१८ | ||
| षष्ठ स्कन्ध | |||||
| २४- | शुम्भका धूम्रलोचनको देवीके पास भेजना और धूम्रलोचनका देवीको समझानेका प्रयास करना .................................. | ६५७ | १- | त्रिशिराकी तपस्यासे चिन्तित इन्द्रद्वारा तपभंगहेतु अप्सराओंको भेजना .......... | ७२३ |
| २५- | भगवती काली और धूम्रलोचनका संवाद, कालीके हुंकारसे धूम्रलोचनका भस्म होना तथा शुम्भका चण्ड-मुण्डको युद्धहेतु प्रस्थानका आदेश देना .................... | ६६३ | २- | इन्द्रद्वारा त्रिशिराका वध, क्रुद्ध त्वष्टाद्वारा अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे हवन करके वृत्रासुरको उत्पन्न करना और उसे इन्द्रके वधके लिये प्रेरित करना ............. | ७२८ |
| २६- | भगवती अम्बिकासे चण्ड-मुण्डका संवाद और युद्ध, देवी कालिकाद्वारा चण्ड-मुण्डका वध .......................... | ६६८ | ३- | वृत्रासुरका देवलोकपर आक्रमण, बृहस्पतिद्वारा इन्द्रकी भर्त्सना करना और वृत्रासुरको अजेय बतलाना, इन्द्रकी पराजय, त्वष्टाके निर्देशसे वृत्रासुरका ब्रह्माजीको प्रसन्न करनेके लिये तपस्यारत होना......... | ७३२ |
| २७- | शुम्भका रक्तबीजको भगवती अम्बिकाके पास भेजना और उसका देवीसे वार्तालाप | ६७४ | ४- | तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीका वृत्रासुरको वरदान देना, त्वष्टाकी प्रेरणासे वृत्रासुरका स्वर्गपर आक्रमण करके अपने अधिकारमें कर लेना, इन्द्रका पितामह ब्रह्मा और भगवान् शंकरके साथ वैकुण्ठधाम जाना | ७३७ |
| २८- | देवीके साथ रक्तबीजका युद्ध, विभिन्न शक्तियोंके साथ भगवान् शिवका रणस्थलमें आना तथा भगवतीका उन्हें दूत बनाकर शुम्भके पास भेजना, भगवान् शिवके सन्देशसे दानवोंका क्रुद्ध होकर युद्धके लिये आना ................................... | ६८० | ५- | भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे देवताओंका भगवतीकी स्तुति करना और प्रसन्न होकर भगवतीका वरदान देना ............. | ७४३ |
| २९- | रक्तबीजका वध और निशुम्भका युद्धक्षेत्रके लिये प्रस्थान .................. | ६८५ | ६- | भगवान् विष्णुका इन्द्रको वृत्रासुरसे सन्धिका परामर्श देना, ऋषियोंकी मध्यस्थतासे इन्द्र और वृत्रासुरमें सन्धि, इन्द्रद्वारा छलपूर्वक वृत्रासुरका वध ...... | ७४९ |
| ३०- | देवीद्वारा निशुम्भका वध ................ | ६९१ | ७- | त्वष्टाका वृत्रासुरकी पारलौकिक क्रिया करके इन्द्रको शाप देना, इन्द्रको ब्रह्महत्या लगना, नहुषका स्वर्गाधिपति बनना और इन्द्राणीपर आसक्त होना .................... | ७५४ |
| ३१- | शुम्भका रणभूमिमें आना और देवीसे वार्तालाप करना, भगवती कालिकाद्वारा उसका वध, देवीके इस उत्तम चरित्रके पठन और श्रवणका फल ................. | ६९७ | ८- | इन्द्राणीको बृहस्पतिकी शरणमें जानकर नहुषका क्रुद्ध होना, देवताओंका नहुषको समझाना, बृहस्पतिके परामर्शसे इन्द्राणीका नहुषसे समय माँगना, देवताओंका भगवान् विष्णुके पास जाना और विष्णुका उन्हें देवीको प्रसन्न करनेके लिये अश्वमेधयज्ञ करनेको कहना, बृहस्पतिका शचीको | |
| ३२- | देवीमाहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुरथ और समाधि वैश्यकी कथा ................... | ७०३ | |||
| ३३- | मुनि सुमेधाका सुरथ और समाधिको देवीकी महिमा बताना ..................... | ७०९ | |||
| ३४- | मुनि सुमेधाद्वारा देवीकी पूजा-विधिका वर्णन .......................................... | ७१४ | |||
| ३५- | सुरथ और समाधिकी तपस्यासे प्रसन्न |
[ १२ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| भगवतीकी आराधना करनेको कहना, शचीकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवीका प्रकट होना और शचीको इन्द्रका दर्शन होना ....... | ७५९ | १९- | भगवती लक्ष्मीको अश्वरूपधारी भगवान् विष्णुके दर्शन और उनका वैकुण्ठगमन | ८१४ | |
| ९- | शचीका इन्द्रसे अपना दुःख कहना, इन्द्रका शचीको सलाह देना कि वह नहुषसे ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें आनेको कहे, नहुषका ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें सवार होना और शापित होकर सर्प होना तथा इन्द्रका पुनः स्वर्गाधिपति बनना.................. | ७६५ | २०- | राजा हरिवर्माको भगवान् विष्णुद्वारा अपना हैहयसंज्ञक पुत्र देना, राजाद्वारा उसका 'एकवीर' नाम रखना ........... | ८१९ |
| २१- | आखेटके लिये वनमें गये राजासे एकावलीकी सखी यशोवतीकी भेंट, एकावलीके जन्मकी कथा .................................. | ८२४ | |||
| १०- | कर्मकी गहन गतिका वर्णन तथा इस सम्बन्धमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका उदाहरण ...................................... | ७७१ | २२- | यशोवतीका एकवीरसे कालकेतुद्वारा एकावलीके अपहृत होनेकी बात बताना | ८२९ |
| २३- | भगवतीके सिद्धिप्रदायक मन्त्रसे दीक्षितएकवीर-कालकेतुका वध, एकवीर और एकावलीका विवाह तथा हैहयवंशकीपरम्परा .......... | ८३५ | |||
| ११- | युगधर्म एवं तत्सम्बन्धी व्यवस्थाका वर्णन | ७७४ | २४- | धृतराष्ट्रके जन्मकी कथा ................... | ८४१ |
| १२- | पवित्र तीर्थोंका वर्णन, चित्तशुद्धिकी प्रधानता तथा इस सम्बन्धमें विश्वामित्र और वसिष्ठके परस्पर वैरकी कथा, राजा हरिश्चन्द्रका वरुणदेवके शापसे जलोदरग्रस्त होना ............................. | ७७९ | २५- | पाण्डु और विदुरके जन्मकी कथा, पाण्डवोंका जन्म, पाण्डुकी मृत्यु, द्रौपदीस्वयंवर, राजसूययज्ञ, कपटद्यूत तथा वनवास और व्यासजीके मोहका वर्णन .................. | ८४६ |
| १३- | राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करना, विश्वामित्रसे प्राप्त वरुणमन्त्रके जपसे शुनःशेपका मुक्त होना, परस्पर शापसे विश्वामित्र और वसिष्ठका बक तथा आडी होना | ७८४ | २६- | देवर्षि नारद और पर्वतमुनिका एक-दूसरेको शाप देना, राजकुमारी दमयन्तीका नारदसे विवाह करनेका निश्चय ........ | ८५१ |
| २७- | वानरमुख नारदसे दमयन्तीका विवाह, नारद तथा पर्वतका परस्पर शापमोचन | ८५६ | |||
| १४- | राजा निमि और वसिष्ठका एक-दूसरेको शाप देना, वसिष्ठका मित्रावरुणके पुत्रके रूपमें जन्म लेना .................... | ७८९ | २८- | भगवान् विष्णुका नारदजीसे मायाकी अजेयताका वर्णन करना, मुनि नारदको मायावश स्त्रीरूपकी प्राप्ति तथा राजा तालध्वजका उनसे प्रणय-निवेदन करना | ८६१ |
| १५- | भगवतीकी कृपासे निमिको मनुष्योंके नेत्र-पलकोंमें वासस्थान मिलना तथा संसारी प्राणियोंकी त्रिगुणात्मकताका वर्णन...... | ७९४ | २९- | राजा तालध्वजसे स्त्रीरूपधारी नारदजीका विवाह, अनेक पुत्र-पौत्रोंकी उत्पत्ति और युद्धमें उन सबकी मृत्यु, नारदजीका शोक और भगवान् विष्णुकी कृपासे पुनः स्वरूपबोध | ८६६ |
| १६- | हैहयवंशी क्षत्रियोंद्वारा भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार.......................................... | ७९९ | ३०- | राजा तालध्वजका विलाप और ब्राह्मण-वेशधारी भगवान् विष्णुके प्रबोधनसे उन्हें वैराग्य होना, भगवान् विष्णुका नारदसे मायाके प्रभावका वर्णन करना .......... | ८७१ |
| १७- | भगवतीकी कृपासे भार्गव-ब्राह्मणीकी जंघासे तेजस्वी बालककी उत्पत्ति, हैहयवंशी क्षत्रियोंकी उत्पत्तिकी कथा .. | ८०३ | ३१- | व्यासजीका राजा जनमेजयसे भगवतीकी महिमाका वर्णन करना ..................... | ८७६ |
| १८- | भगवती लक्ष्मीद्वारा घोड़ीका रूप धारणकर तपस्या करना .................... | ८०९ |
श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य १३
श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य १३
श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम्।<br>त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती॥ | श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है। |
| श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि।<br>श्लोकार्धं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम्॥ | जो श्रीमद्देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। |
| पूजितं यद्गृहे नित्यं श्रीभागवतपुस्तकम्।<br>तद्गृहं तीर्थभूतं हि वसतां पापनाशकम्॥ | जिस घरमें नित्य श्रीमद्देवीभागवतग्रन्थका पूजन किया जाता है, वह घर तीर्थस्वरूप हो जाता है तथा उसमें निवास करनेवाले लोगोंके पापोंका नाश हो जाता है। |
| यस्तु भागवतं देव्याः पठेद् भक्त्या शृणोति वा।<br>धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं च लभते नरः॥ | जो व्यक्ति भक्ति-भावसे देवीके इस भागवतपुराणका पाठ अथवा श्रवण करता है; वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त कर लेता है। |
| सुधां पिबन्नेक एव नरः स्यादजरामरः।<br>देव्याः कथामृतं कुर्यात् कुलमेवाजरामरम्॥ | अमृतके पानसे तो केवल एक ही मनुष्य अजर-अमर होता है, किंतु भगवतीका कथारूप अमृत सम्पूर्ण कुलको ही अजर-अमर बना देता है। |
| अष्टादशपुराणानां मध्ये सर्वोत्तमं परम्।<br>देवीभागवतं नाम धर्मकामार्थमोक्षदम्॥ | सभी अठारह पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको प्रदान करनेवाला है। |
| ये शृण्वन्ति सदा भक्त्या देव्या भागवतीं कथाम्।<br>तेषां सिद्धिर्न दूरस्था तस्मात् सेव्या सदा नृभिः॥ | जो लोग सदा भक्ति-श्रद्धापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतकी कथा सुनते हैं, उन्हें सिद्धि प्राप्त होनेमें रंचमात्र भी विलम्ब नहीं होता, इसलिये मनुष्योंको इस पुराणका सदा पठन-श्रवण करना चाहिये। |
| दिनमर्धं तदर्धं वा मुहूर्तं क्षणमेव वा।<br>ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषां दुर्गतिः क्वचित्॥ | पूरे दिन, दिनके आधे समयतक, चौथाई समयतक, मुहूर्तभर अथवा एक क्षण भी जो लोग भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करते हैं, उनकी कभी भी दुर्गति नहीं होती। |
| तावद् गर्जन्ति तीर्थानि पुराणानि व्रतानि च।<br>यावन्न श्रूयते सम्यग् देवीभागवतं नरैः॥ | समस्त तीर्थ, पुराण और व्रत [अपनी श्रेष्ठताका वर्णन करते हुए] तभीतक गर्जना करते हैं, जबतक मनुष्य श्रीमद्देवीभागवतका सम्यक् रूपसे श्रवण नहीं कर लेते। |
| तावत् पापाटवी नृणां क्लेशदादभ्रकण्टका।<br>यावन्न परशुः प्राप्तो देवीभागवताभिधः॥ | मनुष्योंके लिये पापरूपी अरण्य तभीतक दुःखप्रद एवं कंटकमय रहता है, जबतक श्रीमद्देवीभागवतरूपी परशु (कुठार) उपलब्ध नहीं हो जाता। |
| तावत् क्लेशावहं नृणामुपसर्गमहातमः।<br>यावन्नैवोदयं प्राप्तो देवीभागवतोष्णगुः॥ | मनुष्योंको उपसर्ग (ग्रहण)-रूपी घोर अन्धकार तभीतक कष्ट पहुँचाता है, जबतक श्रीमद्देवीभागवतरूपी सूर्य उनके सम्मुख उदित नहीं हो जाता। |
| इदमखिलकथानां सारभूतं पुराणं<br>निखिलनिगमतुल्यं सप्रमाणानुविद्धम्।<br>पठति परमभावाद्यः शृणोतीह भक्त्या<br>स भवति धनवान्वै ज्ञानवान्मानवोऽत्र॥ | इस संसारमें जो मनुष्य विशेष श्रद्धाके साथ उच्च विचारोंसे युक्त होकर सम्पूर्ण पुराणोंके सारस्वरूप, समस्त वेदोंकी तुलना करनेवाले तथा नानाविध प्रमाणोंसे परिपूर्ण इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणका पाठ करता है तथा इसका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह ऐश्वर्य तथा ज्ञानसे सम्पन्न हो जाता है। |
| १४ | श्रीमद्देवीभागवत |
|---|
| श्रुत्वैतत्तु महादेव्याः पुराणं परमाद्भुतम्।<br>कृतकृत्यो भवेन्मर्त्यो देव्याः प्रियतमो हि सः॥ | [ महर्षि व्यासने राजा जनमेजयसे कहा— ]<br>महादेवीका यह परम अद्भुत पुराण सुनकर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और वह भगवतीका प्रियतम हो जाता है। हे | | मूलप्रकृतिरेवैषा यत्र तु प्रतिपाद्यते।<br>समं तेन पुराणं स्यात्कथमन्यन्नृपोत्तम॥ | नृपश्रेष्ठ! जिस देवीभागवतमें साक्षात् मूलप्रकृतिका ही प्रतिपादन किया गया है, उसके समान अन्य कोई पुराण भला कैसे हो सकता है? हे जनमेजय! जिस | | पाठे वेदसमं पुण्यं यस्य स्याज्जनमेजय।<br>पठितव्यं प्रयत्नेन तदेव विबुधोत्तमैः॥ | देवीभागवतपुराणका पाठ करनेसे वेद-पाठके समान पुण्य प्राप्त होता है, उसका पाठ श्रेष्ठ विद्वानोंको प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। [ श्रीसूतजी मुनियोंसे बोले— ] जो इस | | नित्यं यः शृणुयाद्भक्त्या देवीभागवतं परम्।<br>न तस्य दुर्लभं किञ्चित्कदाचित्क्वचिदस्ति हि॥ | श्रेष्ठ श्रीमद्देवीभागवतका नित्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसके लिये कुछ भी कहीं और कभी दुर्लभ नहीं है। | | अपुत्रो लभते पुत्रान्धनार्थी धनमाप्नुयात्।<br>विद्यार्थी प्राप्नुयाद्विद्यां कीर्तिमण्डितभूतलः॥ | इसके श्रवणसे पुत्रहीन व्यक्तिको पुत्र, धन चाहनेवालेको धन और विद्याके अभिलाषीको विद्याकी प्राप्ति हो जाती है, साथ ही सम्पूर्ण पृथ्वीलोकमें वह कीर्तिमान् हो जाता | | वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवन्ध्या च याङ्गना।<br>श्रवणादस्य तद्दोषान्निवर्तेत न संशयः॥ | है। जो स्त्री वन्ध्या, काकवन्ध्या अथवा मृतवन्ध्या हो; वह इस पुराणके श्रवणसे उस दोषसे मुक्त हो जाती है; इसमें सन्देह नहीं है। यह पुराण जिस घरमें विधिपूर्वक पूजित | | यद्गेहे पुस्तकं चैतत्पूजितं यदि तिष्ठति।<br>तद्गेहं न त्यजेन्नित्यं रमा चैव सरस्वती॥ | होकर स्थित रहता है, उस घरको लक्ष्मी तथा सरस्वती कभी नहीं छोड़तीं और वेताल, डाकिनी तथा राक्षस आदि | | नेक्षन्ते तत्र वेतालडाकिनीराक्षसादयः।<br>ज्वरितं तु नरं स्पृष्ट्वा पठेदेतत्समाहितः॥ | वहाँ झाँकतेतक नहीं। यदि ज्वरग्रस्त मनुष्यको स्पर्श करके एकाग्रचित्त होकर इस पुराणका पाठ किया जाय तो दाहक | | मण्डलान्नाशमाप्नोति ज्वरो दाहसमन्वितः।<br>शतावृत्त्यास्य पठनात्क्षयरोगो विनश्यति॥ | ज्वर उसके मण्डलको छोड़कर भाग जाता है। इसकी एक सौ आवृत्तिके पाठसे क्षयरोग समाप्त हो जाता है। जो मनुष्य | | प्रतिसन्ध्यं पठेद्यस्तु सन्ध्यां कृत्वा समाहितः।<br>एकैकमस्य चाध्यायं स नरो ज्ञानवान्भवेत्॥ | प्रत्येक सन्ध्याके अवसरपर दत्तचित्त होकर सन्ध्या-विधि सम्पन्न करके इस पुराणके एक-एक अध्यायका पाठ करता है, वह ज्ञानवान् हो जाता है। शारदीय नवरात्रमें परम भक्तिसे | | नवरात्रे पठेन्नित्यं शारदीयेऽतिभक्तितः।<br>तस्याम्बिका तु सन्तुष्टा ददातीच्छाधिकं फलम्॥ | इस पुराणका नित्य पाठ करना चाहिये। इससे जगदम्बा उस व्यक्तिपर प्रसन्न होकर उसकी अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करती हैं। वैष्णव, शैव, सौर तथा गाणपत्यजनोंको | | वैष्णवैश्चैव शैवैश्च रमोमा प्रीयते सदा।<br>सौरैश्च गाणपत्यैश्च स्वेष्टशक्तेश्च तुष्टये॥ | अपने-अपने इष्टदेवकी शक्तिकी सन्तुष्टिके लिये चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ—इन मासोंके चारों नवरात्रोंमें इस पुराणका प्रयत्नपूर्वक पाठ करना चाहिये; इससे रमा, | | पठितव्यं प्रयत्नेन नवरात्रचतुष्टये।<br>वैदिकैर्निजगायत्रीप्रीतये नित्यशो मुने॥ | उमा आदि शक्तियाँ उसपर सदा प्रसन्न रहती हैं। हे मुने! इसी प्रकार वैदिकोंको भी अपनी गायत्रीकी प्रसन्नताके लिये इसका नित्य पाठ करना चाहिये। हे श्रेष्ठ | | वेदसारमिदं पुण्यं पुराणं द्विजसत्तमाः।<br>वेदपाठसमं पाठे श्रवणे च तथैव हि॥ | मुनियो! यह पुराण परम पवित्र तथा वेदोंका सारस्वरूप है। इसके पढ़ने तथा सुननेसे वेदपाठके समान फल प्राप्त होता है। [ श्रीमद्देवीभागवत ] |
अर्धश्लोकी देवीभागवत १५
अर्धश्लोकी देवीभागवत १५
अर्धश्लोकी देवीभागवत
जिस प्रकार सप्तश्लोकी दुर्गा^१, सप्तश्लोकी गीता^२, पंचश्लोकी गणेशपुराण,^३ चतुःश्लोकी भागवत,^४ एकश्लोकी भागवत^५, एकश्लोकी रामायण^६, एकश्लोकी योगवासिष्ठ^७, सार्धश्लोकी दुर्गा^८ तथा एकश्लोकी महाभारत^९ प्राप्त होता है; उसी प्रकार अर्धश्लोकी देवीभागवत भी प्राप्त होता है, जो तात्त्विक दृष्टिसे बड़े ही महत्त्वका है। पुराण-वाङ्मयमें देवीभागवतका अत्यन्त महनीय स्थान है। इसमें भगवती जगदम्बाका पराशक्तिके रूपमें निरूपण हुआ है। इस पुराणके प्राकट्यके विषयमें इसी पुराणमें बताया गया है कि जब भगवान् वेदव्यासने अपने पुत्र श्रीशुकदेवजीको गृहस्थाश्रम ग्रहण करनेका परामर्श दिया तो ज्ञानमार्गके उपासक श्रीशुकदेवजीने प्रवृत्तिमार्गको स्वीकार नहीं किया, तब वेदव्यासजीने मोक्षमार्गाभिलाषी अपने पुत्रसे कहा— हे महाभाग! तुम मेरे द्वारा रचित वेदतुल्य श्रीमद्देवी-भागवतपुराणको पढ़ो, इसमें बारह स्कन्ध हैं, यह पुराण सभी पुराणोंका आभूषण है और इसके सुननेमात्रसे सत् और असत् वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान हो जाता है— ‘सदसज्ज्ञानविज्ञानं श्रुतमात्रेण जायते।’ (श्रीमद्देवीभा० १।१५।४९) व्यासजीने इस पुराणके प्राकट्यकी कथा बताते हुए आगे कहा— हे महामते! एक समयकी बात है, जब महाप्रलयावस्थामें एकार्णवके मध्य वटपत्रपर भगवान् विष्णु बालरूपमें शयन कर रहे थे और बड़े ही विचारमग्न थे कि किस चिदात्मा शक्तिने मुझे इस बालरूपमें उत्पन्न किया है, मैं उन्हें कैसे जानूँ? उसी समय आदिशक्ति भगवतीने आकाशवाणीके रूपमें आधे श्लोकमें ही सम्पूर्ण अर्थको प्रदान करनेवाले ज्ञानको बताते हुए कहा—
‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्॥’ (श्रीमद्देवीभा० १।१५।५२)
अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा कोई भी सनातन नहीं है।
भगवान् बालमुकुन्द सोचने लगे कि इस सत्य वचनका उच्चारण किसने किया, उस कहनेवालेको मैं कैसे जानूँ, वह स्त्री है या पुरुष? तब उन्होंने उस श्लोकार्धरूपी भागवतको अपने हृदयमें धारण कर लिया। वे उसके अर्थपर चिन्तन करने लगे और बार-बार उसका उच्चारण करने लगे। बालमुकुन्दको चिन्तातुर देखकर उसी समय भगवती पराशक्ति शंख, चक्र धारण किये चतुर्भुजा महादेवीके रूपमें अपनी सखियोंसहित
१. ‘ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि०’ इत्यादि सात श्लोक।
२. ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म०’ इत्यादि सात श्लोक।
३. श्रीविघ्नेशपुराणसारमुदितम्० इत्यादि पाँच श्लोक।
४. अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः॥
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः। अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥
(श्रीमद्भा० २।९।३२—३५)
५. आदौ देवकिदेवगर्भजननं गोपीगृहे वर्धनम् मायापूतनजीवतापहरणं गोवर्धनोद्धारणम्।
कंसच्छेदनकौरवादिहननं कुन्तीसुतापालनम् एतद् भागवतं पुराणकथितं श्रीकृष्णलीलामृतम्॥
६. आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्।
वालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनं पश्चाद् रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम्॥
७. तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः। स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति॥
८. मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्। शक्रादिस्तुतिकं चैव दूतसंवाद एव च॥
शुम्भराजवधश्चैव नारायणीस्तुतिस्तथा। सार्धपाठमिदं प्रोक्तं नवपाठफलप्रदम्॥
९. आदौ पाण्डवधार्तराष्ट्रजननं लाक्षागृहे दाहनं द्यूते श्रीहरणं वने विचरणं मत्स्यालये वर्तनम्।
लीलागोग्रहणं रणे विहरणं सन्धिक्रियाजृम्भणं पश्चाद् भीष्मसुयोधनादिहननं चैतन्महाभारतम्॥
१६ श्रीमद्देवीभागवत
वहाँ प्रकट हो गयीं, वे दिव्य वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत थीं और उनका स्वरूप बड़ा ही शान्त था। वे मन्द-मन्द मुस्करा रही थीं।
उनका दर्शनकर भगवान् विष्णु बड़े ही विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने पूछा हे देवि! कुछ समय पूर्व मैंने जो आधा श्लोक सुना, वह परम रहस्यमय वचन किसने कहा था, मुझे बतानेकी कृपा करें। इसपर देवीने कहा—मैं सगुणरूपा चतुर्भुजा भगवती हूँ। सब गुणोंका आलय होते हुए मैं निर्गुणा भी हूँ। वह आधा श्लोक निर्गुणा पराशक्तिने ही कहा था, आप इसे सब वेदोंका तत्त्वस्वरूप, कल्याणकारी और पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत समझिये। 'पुण्यं भागवतं विद्धि वेदसारं शुभावहम्।' (श्रीमद्देवीभा० १।१६।१५) आप इसे सदा अपने चित्तमें रखिये और कभी विस्मृत न कीजिये। यह सब शास्त्रोंका सार है तथा भगवती महाविद्याके द्वारा प्रकाशित किया गया है। तीनों लोकोंमें इससे बढ़कर अन्य कुछ भी ज्ञातव्य नहीं है। ऐसा कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं और भगवान् विष्णुने वह श्लोकार्ध—देवीभागवतरूपी मन्त्र अपने हृदयदेशमें सदाके लिये धारण कर लिया। कुछ समय बाद जब ब्रह्माजी दैत्योंके भयसे डरकर भगवान् विष्णुकी शरणमें गये तो भगवान्को ध्यानमें स्थित होकर मन्त्र-जप करते हुए देखकर ब्रह्माजी बोले—हे देवेश! आप किस देवताका जप कर रहे हैं, आपसे भी बढ़कर कोई है क्या? तब विष्णुजी बोले—हे महाभाग! हम सभीमें जो कार्यकारणरूपा शक्ति विद्यमान है, जिनके द्वारा यह संसार पालित-पोषित और तिरोहित किया जाता है, वे ही सनातनी पराविद्या हैं, वे ही सभी ईश्वरोंकी भी स्वामिनी हैं। उन भगवतीने आधे श्लोकमें जो कहा, वही वास्तविक श्रीमद्देवीभागवत है। प्रत्येक द्वापरयुगमें उसीका विस्तार होगा—
श्लोकार्थेन तया प्रोक्तं तद्वै भागवतं किल।
विस्तरो भविता तस्य द्वापरादौ युगे तथा॥
(श्रीमद्देवीभा० १।१६।२९)
इतना कहनेके अनन्तर व्यासजीने शुकदेवजीसे फिर कहा—हे महाभाग! तब ब्रह्माजीने उस भागवतका संग्रह किया और उन्होंने इसे अपने पुत्र नारदजीको सुनाया। पूर्वकालमें वही भागवत देवर्षि नारदजीने मुझे दिया और फिर मैंने इसे बारह स्कन्धोंमें विस्तृत किया। हे पुत्र! यह पुराण वेदतुल्य है; सर्ग, प्रतिसर्ग आदि पाँच लक्षणोंसे युक्त है तथा भगवतीके उत्तम चरित्रोंसे ओत-प्रोत है। यह तत्त्वज्ञानके रससे परिपूर्ण, वेदार्थका उपबृंहण करनेवाला, ब्रह्मविद्याका निधान एवं भवसागरसे पार करनेवाला है। यह पुराण अत्यन्त पुण्यप्रद है। तुम इसके अठारह हजार श्लोकोंको हृदयंगम कर लो। यह पुराण पाठ तथा श्रवण करनेवालेके लिये अज्ञानका नाश करनेवाला, दिव्य, ज्ञानरूपी सूर्यका बोध करानेवाला, सुखप्रद, शान्तिदायक, धन्य, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाला, कल्याणकारी तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है—
गृहाण त्वं महाभाग योग्योऽसि मतिमत्तरः।
पुण्यं भागवतं नाम पुराणं पुरुषर्षभ॥
अष्टादशसहस्त्राणां श्लोकानां कुरु संग्रहम्।
अज्ञाननाशनं दिव्यं ज्ञानभास्करबोधकम्॥
सुखदं शान्तिदं धन्यं दीर्घायुष्यकरं शिवम्।
शृण्वतां पठतां चेदं पुत्रपौत्रविवर्धनम्॥
(श्रीमद्देवीभा० १।१६।३५—३७)
इस प्रकार वेदव्यासजीके द्वारा प्रेरित किये जानेपर व्यासजीके शिष्य सूतजीने तथा श्रीशुकदेवजीने श्लोकार्धसे विस्तृत हुए श्रीमद्देवीभागवतपुराणका अध्ययन किया।
भगवतीकी कृपासे भगवान् बालमुकुन्दको जो आधे श्लोकमें देवीभागवत प्राप्त हुआ, उसे ब्रह्माजीने ग्रहण किया और फिर उसीको व्यासजीने बारह स्कन्धोंमें विस्तृत किया,* वही देवीभागवत हम सबको प्राप्त हुआ। यह भगवती आदिशक्ति तथा भगवान् वेदव्यासजीका जीवोंपर महान् अनुग्रह है।
* अर्धश्लोकात्मकं यन्नु देवीवक्त्राब्जनिर्गतम्। श्रीमद्भागवतं नाम वेदसिद्धान्तबोधकम्॥
उपदिष्टं विष्णवे यद्वटपत्रनिवासिने। शतकोटिप्रविस्तीर्णं तत्कृतं ब्रह्मणा पुरा॥
तत्सारमेकतः कृत्वा व्यासेन शुकहेतवे। अष्टादशसहस्रं तु द्वादशस्कन्धसंयुतम्॥ (श्रीमद्देवीभा० १२।१४।१—३)
भवान्यष्टकम् १७
भवान्यष्टकम्
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न तातो न माता न बन्धुर्न दाता<br>न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।<br>न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव<br>गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ १॥ | हे भवानि! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, भृत्य, स्वामी, स्त्री, विद्या और वृत्ति—इनमेंसे कोई भी मेरा नहीं है, हे देवि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ १॥ |
| भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः<br>पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।<br>कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं। गतिस्त्वं० ॥ २ ॥ | मैं अपार भवसागरमें पड़ा हुआ हूँ, महान् दुःखोंसे भयभीत हूँ; कामी, लोभी, मतवाला तथा संसारके घृणित बन्धनोंमें बँधा हुआ हूँ, हे भवानि! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ २॥ |
| न जानामि दानं न च ध्यानयोगं<br>न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्।<br>न जानामि पूजां न च न्यासयोगं। गतिस्त्वं० ॥ ३ ॥ | हे भवानि! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यानमार्गका ही मुझे पता है, तन्त्र और स्तोत्र-मन्त्रोंका भी मुझे ज्ञान नहीं है, पूजा तथा न्यास आदिकी क्रियाओंसे तो मैं एकदम कोरा हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ३ ॥ |
| न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं<br>न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।<br>न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं० ॥ ४॥ | न मैं पुण्य जानता हूँ न तीर्थ, न मुक्तिका पता है न लयका। हे मातः! भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं है, हे भवानि! अब केवल तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ४॥ |
| कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः<br>कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।<br>कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं। गतिस्त्वं० ॥ ५ ॥ | मैं कुकर्मी, बुरी संगतिमें रहनेवाला, दुर्बुद्धि, दुष्टदास, कुलोचित सदाचारसे हीन, दुराचारपरायण, कुत्सित दृष्टि रखनेवाला और सदा दुर्वचन बोलनेवाला हूँ, हे भवानि! मुझ अधमकी एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ५ ॥ |
| प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं<br>दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।<br>न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये। गतिस्त्वं० ॥ ६॥ | मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य किसी भी देवताको नहीं जानता, हे शरण देनेवाली भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ६ ॥ |
| विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे<br>जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।<br>अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि। गतिस्त्वं० ॥ ७॥ | हे शरण्ये! तुम विवाद, विषाद, प्रमाद, परदेश, जल, अनल, पर्वत, वन तथा शत्रुओंके मध्यमें सदा ही मेरी रक्षा करो, हे भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ७॥ |
| अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो<br>महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।<br>विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं । गतिस्त्वं० ॥ ८ ॥ | हे भवानि! मैं सदासे ही अनाथ, दरिद्र, जरा-जीर्ण, रोगी, अत्यन्त दुर्बल, दीन, गूँगा, विपद्ग्रस्त और नष्टप्राय हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ८॥ |
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं भवान्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥
॥ इस प्रकार श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत भवान्यष्टक सम्पूर्ण हुआ ॥
सिंहस्कन्धाधिरूढां नानालङ्कारभूषिताम्। चतुर्भुजां महादेवीं नागयज्ञोपवीतिनीम्॥
ॐ श्रीश्रीजगद्धात्री ॐ
सिंहस्कन्धाधिरूढां नानालङ्कारभूषिताम्। चतुर्भुजां महादेवीं नागयज्ञोपवीतिनीम्॥
शङ्खशार्ङ्गसमायुक्तवामपाणिद्वयान्विताम् । चक्रं च पञ्चबाणांश्च धारयन्तीं च दक्षिणे॥
रत्नद्वीपे महाद्वीपे सिंहासनसमन्विते। प्रफुल्लकमलारूढां ध्यायेत्तां भवसुन्दरीम्॥
| श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि | ११ |
|---|
श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि
देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम्।
त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती॥
श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि।
श्लोकार्थं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम्॥
श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है। जो श्रीमद्देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।
श्रीमद्देवीभागवतके नवाह्नकी विधि है। दोनों नवरात्रोंमें तथा आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, कार्तिक, मार्गशीर्ष, माघ एवं फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदासे नवमीतक इसके अनुष्ठानका विधान है। इसे 'नवाहयज्ञ' कहा जाता है। एतदर्थ कथा-स्थानकी भूमि का संशोधन, मार्जन-लेपनादिकर कदली-स्तम्भादिसे मण्डित मण्डप बनाना चाहिये। मण्डपका स्थान शुभ तथा बराबर होना चाहिये। उसका मान १६ हाथ लम्बा-चौड़ा हो तथा उसे तोरण, विमान एवं ध्वजा-पताकासे मण्डित किया जाय। मण्डपके बीचमें चार हाथ लम्बी-चौड़ी तथा एक हाथ ऊँची वेदी होनी चाहिये। फिर प्रतिपद्को प्रातः उठकर हृदय या शिरोदेशमें उज्ज्वल-पद्मके अन्तर्गत गुरुका ध्यान करना चाहिये। फिर शिखाके बीच इस रूपमें देवीका ध्यान करना चाहिये—
प्रकाशमानां प्रथमे प्रयाणे
प्रतिप्रयाणेऽप्यमृतायमानाम् ।
अन्तःपदव्यामनुसंचरन्ती-
मानन्दरूपामबलां प्रपद्ये ॥
(श्रीमद्देवीभा० ७।४०।३)
प्रथम प्रयाणमें अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रमें संचरण करनेपर प्रकाश-पुंजरूपवाली, प्रतिप्रयाणमें अर्थात् मूलाधारमें संचरण करनेपर अमृतमयस्वरूपवाली तथा अन्तःपदमें अर्थात् सुषुम्णा नाड़ीमें विराजनेपर आनन्दमयी स्त्रीरूपिणी देवी कुण्डलिनीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
तत्पश्चात् किसी नदी, तड़ाग, सरोवर या पहाड़ी झील, झरने आदिमें स्नानकर नित्यकृत्य करना चाहिये। फिर भूतशुद्धि, मातृकान्यास एवं हृल्लेखा-मातृकान्यास करना चाहिये। इसकी विधि यह है कि मूलाधारमें 'ह' कार, हृदयमें 'र'कार, भ्रूमध्यमें 'ई'कार और मस्तकमें 'ह्रीं'कारका न्यास करे। फिर उपयुक्त ब्राह्मणोंका वरणकर वेदीपर सिंहासन रखकर उसपर क्षौम (रेशमी) वस्त्र-युक्त चार हाथोंवाली जगदम्बिकाकी प्रतिमा स्थापित करे। उन्हें रत्नाभूषण तथा मुक्ताहारादिसे विभूषित करे। चार हाथोंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कराये या अठारह भुजावाली प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाके अभावमें 'नवार्ण मन्त्र' का यन्त्र ही रख दे। फिर पंचपल्लवादिसंयुक्त एक कलश वेद-मन्त्रोंसे संस्कृतकर श्रेष्ठ तीर्थके जलसे भरकर पास ही स्थापित करे। तत्पश्चात् गणपति-पूजन, बटुक, क्षेत्रपाल, योगिनी, मातृका, नवग्रह, तुलसी, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, लोकपाल, दिक्पाल आदिकी पूजाकर षोडशोपचार तथा श्रीसूक्त या नवार्णमन्त्रसे भगवती महाशक्तिकी पूजा करे। देवी-पूजनमें चन्दन, अगर या अष्टगन्ध* तथा अशोक, चम्पा, करवीर, मालती, मन्दार आदिके पुष्पों, बिल्व तथा तुलसी आदिका प्रयोग श्रेष्ठ है। फलोंमें नारियल, नारंगी, अनार, केला, आम शुभ हैं। तत्पश्चात् १६ उपचारोंसे देवीभागवत-ग्रन्थकी भी पूजा करे। अन्तमें फिर इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये—
कात्यायनि महामाये भवानि भुवनेश्वरि॥
संसारसागरे मग्नं मामुद्धर कृपामये।
ब्रह्मविष्णुशिवाराध्ये प्रसीद जगदम्बिके॥
मनोऽभिलषितं देवि वरं देहि नमोऽस्तु ते।
(श्रीमद्देवीभा० माहात्म्य ५।३१-३३)
हे कात्यायनि! हे महामाये! हे भुवनेश्वरि! हे कृपामये! हे भवानि! मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ; मेरा उद्धार कीजिये तथा हे ब्रह्मा, विष्णु, महेशसे पूजनीया माता जगदम्बिके! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। हे देवि! आप मुझे
* चन्दनागुरुकर्पूरचौरकुङ्कुमरोचनाः। जटामांसी कपियुता शक्तेर्गन्धाष्टकं विदुः॥ (तन्त्रसार—कलावती दीक्षा ५।१)
अर्थात् चन्दन, अगुरु, कपूर, कृष्णशुंठी, कुंकुम (केसर), गोरोचन, जटामांसी तथा गांठना (एक प्रकारका करंज) मिलाकर शक्तिका अष्टगन्ध बनता है।
श्रीमद्देवीभागवतकथा ( पारायण ) एवं अनुष्ठान-विधि
| २० | श्रीमद्देवीभागवत |
|---|
मनोवांछित वर प्रदान कीजिये; आपको बार-बार प्रणाम है।
तत्पश्चात् ऋष्यादिका न्यासकर पाठ आरम्भ करे।
पाठ आरम्भ करनेके बाद फिर अध्यायके बीचमें नहीं रुकना चाहिये। रुक जानेपर पुनः उसी अध्यायको आरम्भसे पढ़ना चाहिये। मध्यम स्वरसे श्रद्धापूर्वक धीरे-धीरे स्पष्ट पाठ करना चाहिये। गीत गाना, जल्दी करना, सिर कँपाना, अशुद्ध या अस्पष्ट उच्चारण करना, बिना अर्थ समझे ही पाठ करना—ये पाठके दोष हैं। पाठमें यथासाध्य इन दोषोंसे बचे रहना चाहिये। क्रोध, मद, त्वरा बाधक हैं। मनकी पवित्रता, शरीरकी पवित्रता अधिक सहायक है। दोपहरके बाद एक घड़ी विश्रामकर तथा लघुशंका आदिसे निवृत्त होकर पुनः पाठ करना चाहिये।
कथारम्भमें सोम, बुध, गुरु, शुक्रवार; अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, अनुराधा, मूल तथा श्रवण नक्षत्र शुभ हैं। बृहस्पति जिस नक्षत्रमें हों, वहाँसे चौथे नक्षत्रतक कथा आरम्भ करनेसे धर्मप्राप्ति, ५ से ८ वेंतक लक्ष्मीप्राप्ति, पुनः ९ में सिद्धि, १० से १४ तक सुख प्राप्त होता है। गुर्वनिष्ठित नक्षत्रसे २० नक्षत्रोंतकमें कथारम्भ करनेसे पीड़ा, २४ वेंतक राजभय तथा २७ वेंतक ज्ञानकी प्राप्ति होती है। इस चक्रका ध्यान रखना आवश्यक है। (किंतु नवरात्रोंमें देवीभागवत-कथामें चक्र-विचार अपेक्षित नहीं है।) अनुष्ठानके समय ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, सत्यवचन तथा इन्द्रियसंयम अत्यन्त आवश्यक है। पत्तलमें भोजन करना चाहिये। बैगन, दाल, बहेड़ा, मधु, तैल, बासी तथा दूषित अन्न नहीं खाना चाहिये। रजस्वला आदिसे स्पृष्ट तथा मसूर, मूली, हींग, प्याज, गाजर, कुम्हड़ा तथा नलिका आदिका शाक भी नहीं खाना चाहिये। प्रतिदिन कुमारीपूजन करना चाहिये या प्रतिदिन क्रमशः दुगुनी, तिगुनी पूजा बढ़ाते जाय। एक वर्षकी कन्याकी पूजा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उसे गन्धादिका कोई भी ज्ञान नहीं होता। दोसे नौ वर्षोंतककी कन्याएँ पूज्य हैं। अन्तिम दिन गायत्रीसहस्रनामका पाठ करना चाहिये और सप्तशतीके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये अथवा गायत्री या नवार्णमन्त्रसे हवन किया जाय। यह संक्षेपमें देवीभागवतकी पाठविधि है।
श्रीमद्देवीभागवतकथा ( पारायण ) एवं अनुष्ठान-विधि
जो लोग विधि-विधानसे श्रीमद्देवीभागवतकी कथा अथवा पारायण-पाठ कराना चाहते हों, उनके लिये पूजन आदिकी विस्तृत विधि और क्रम नीचे लिखा जा रहा है—
स्नान-सन्ध्योपासनादि कृत्यसे निवृत्त होकर पवित्र आसनपर सपत्नीक पूर्वाभिमुख बैठ जाय और पत्नीको अपने दाहिनी ओर बैठाये। चन्दन आदिसे तिलक कर ले। दोनों हाथोंकी अनामिका अँगुलीमें पवित्री धारण कर ले। आचमन, प्राणायाम कर ले, शिखामें ग्रन्थि लगा ले। तदनन्तर ग्रन्थिबन्धन कर ले और भगवान् विष्णुका ध्यान कर ले। रक्षादीप जलाकर हाथ धो ले।
अधिकारप्राप्तिके लिये गोत्रयनिष्क्रयद्रव्यका संकल्प— श्रीमद्देवीभागवतश्रवणमें अधिकारप्राप्तिके लिये प्रायश्चित्तके रूपमें तीन गौओंके निष्क्रयद्रव्यका दान करे। देवद्रव्य तथा त्रिकूर्च, अक्षत, पुष्प, जल लेकर निम्न संकल्प करे—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्धे विष्णुपर्वे श्रीश्वेतवाराहनाम्नि प्रथमकल्पे वैवस्वत-मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगस्य प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भूर्लोके भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे ....क्षेत्रे बौद्धावतारे ....नाम्नि संवत्सरे श्रीसूर्ये ....अयने ....ऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे ....मासे ....पक्षे ....तिथौ ....वासरे ....राशिस्थिते श्रीसूर्ये शेषेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ....गोत्रः ....शर्मा/वर्मा/गुप्तः सपत्नीकोऽहं मम कृच्छ्रत्रयात्मक-प्रायश्चित्तानुष्ठानसिद्ध्यर्थं गोत्रयनिष्क्रयद्रव्यं रजतं चन्द्रदैवतं ....गोत्राय ....शर्मणे ब्राह्मणाय भवते सम्प्रददे।
संकल्पजल तथा द्रव्य ब्राह्मणको दे दे। तदनन्तर