देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 252, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 252
अ० १] तृतीय स्कन्ध २४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति सन्देहसन्दोहे मग्नं मां तारयाधुना।<br>विकल्पकोटीः कुर्वाणं संसारेऽस्मिन् प्रविस्तरे॥ १९ | इस प्रकार इस विस्तृत ब्रह्माण्डके विषयमें विविध कल्पना करते हुए तथा सन्देहसागरमें डूबते हुए मुझ दुःखीका आप उद्धार कीजिये॥ १९॥ |
| ब्रुवन्ति शङ्करं केचिन्मत्वा कारणकारणम्।<br>सदाशिवं महादेवं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम्॥ २०<br>आत्मारामं सुरेशं च त्रिगुणं निर्मलं हरम्।<br>संसारतारकं नित्यं सृष्टिस्थित्यन्तकारणम्॥ २१ | कुछ लोग सदाशिव, महादेव, प्रलय तथा उत्पत्तिसे रहित, आत्माराम, देवेश, त्रिगुणात्मक, निर्मल, हर, संसारसे उद्धार करनेवाले, नित्य तथा सृष्टि-पालन-संहार करनेवाले भगवान् शंकरको ही मूल कारण मानकर उन्हें ही इस ब्रह्माण्डका रचयिता कहते हैं॥ २०-२१॥ |
| अन्ये विष्णुं स्तुवन्त्येनं सर्वेषां प्रभुमीश्वरम्।<br>परमात्मानमव्यक्तं सर्वशक्तिसमन्वितम्॥ २२<br>भुक्तिदं मुक्तिदं शान्तं सर्वादिं सर्वतोमुखम्।<br>व्यापकं विश्वशरणमनादिनिधनं हरिम्॥ २३ | दूसरे लोग श्रीहरि विष्णुको सबका प्रभु, ईश्वर, परमात्मा, अव्यक्त, सर्वशक्तिसम्पन्न, भोग तथा मोक्षप्रदाता, शान्त, सबका आदि, सर्वतोमुख, व्यापक, समग्र संसारको शरण देनेवाला तथा आदि-अन्तसे रहित जानकर उन्हींका स्तवन करते हैं॥ २२-२३॥ |
| धातारं च तथा चान्ये ब्रुवन्ति सृष्टिकारणम्।<br>तमेव सर्ववेत्तारं सर्वभूतप्रवर्तकम्॥ २४<br>चतुर्मुखं सुरेशानं नाभिपद्मभवं विभुम्।<br>स्रष्टारं सर्वलोकानां सत्यलोकनिवासिनम्॥ २५ | अन्य लोग ब्रह्माजीको सृष्टिका कारण, सर्वज्ञ, सभी प्राणियोंका प्रवर्तक, चार मुखोंवाला, सुरपति, विष्णुके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत, सर्वव्यापी, सभी लोकोंकी रचना करनेवाला तथा सत्यलोकमें निवास करनेवाला बताते हैं॥ २४-२५॥ |
| दिनेशं प्रवदन्त्यन्ये सर्वेशं वेदवादिनः।<br>स्तुवन्ति चैव गायन्ति सायं प्रातरतन्द्रिताः॥ २६ | कुछ वेदवेत्ता विद्वान् सर्वेश्वर भगवान् सूर्यको ब्रह्माण्डकर्ता मानते हैं और सावधान होकर सायं-प्रातः उन्हींकी स्तुति करते हैं तथा उन्हींका यशोगान करते हैं॥ २६॥ |
| यजन्ति च तथा यज्ञे वासवं च शतक्रतुम्।<br>सहस्राक्षं देवदेवं सर्वेषां प्रभुमुल्बणम्॥ २७<br>यज्ञाधीशं सुराधीशं त्रिलोकेशं शचीपतिम्।<br>यज्ञानां चैव भोक्तारं सोमपं सोमपप्रियम्॥ २८ | यज्ञमें निष्ठाभाव रखनेवाले लोग धनप्रदाता, शतक्रतु, सहस्राक्ष, देवाधिदेव, सबके स्वामी, बलशाली, यज्ञाधीश, सुरपति, त्रिलोकेश, यज्ञोंका भोग करनेवाले, सोमपान करनेवाले तथा सोमपायी लोगोंके प्रिय शचीपति इन्द्रको [सर्वश्रेष्ठ मानकर] यज्ञोंमें उन्हींका यजन करते हैं॥ २७-२८॥ |
| वरुणं च तथा सोमं पावकं पवनं तथा।<br>यमं कुबेरं धनदं गणाधीशं तथापरे॥ २९<br>हेरम्बं गजवक्त्रं च सर्वकार्यप्रसाधकम्।<br>स्मरणात्सिद्धिदं कामं कामदं कामगं परम्॥ ३० | कुछ लोग वरुण, सोम, अग्नि, पवन, यमराज, धनपति कुबेरकी तथा कुछ लोग हेरम्ब, गजमुख, सर्वकार्यसाधक, स्मरणमात्रसे सिद्धि प्रदान करनेवाले, कामस्वरूप, कामनाओंको प्रदान करनेवाले, स्वेच्छ विचरण करनेवाले, परम देव गणाधीश गणेशकी स्तुति करते हैं॥ २९-३०॥ |