भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 253
२४४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १

| भवानीं केचनाचार्याः प्रवदन्त्यखिलार्थदाम्।<br>आदिमायां महाशक्तिं प्रकृतिं पुरुषानुगाम्॥ ३१<br>ब्रह्मैकतासमापन्नां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्।<br>मातरं सर्वभूतानां देवतानां तथैव च॥ ३२<br>अनादिनिधनां पूर्णां व्यापिकां सर्वजन्तुषु।<br>ईश्वरीं सर्वलोकानां निर्गुणां सगुणां शिवाम्॥ ३३ | कुछ आचार्य भवानीको ही सब कुछ देनेवाली, आदिमाया, महाशक्ति तथा पुरुषानुगामिनी परा प्रकृति कहते हैं। वे उनको ब्रह्मस्वरूपा, सृजन-पालन-संहार करनेवाली, सभी प्राणियों एवं देवताओंकी जननी, आदि-अन्तरहित, पूर्णा, सभी जीवोंमें व्याप्त, सभी लोकोंकी स्वामिनी, निर्गुणा, सगुणा तथा कल्याणस्वरूपा मानते हैं॥ ३१—३३॥ | | वैष्णवीं शाङ्करीं ब्राह्मीं वासवीं वारुणीं तथा।<br>वाराहीं नारसिंहीं च महालक्ष्मीं तथाद्भुताम्॥ ३४<br>वेदमातरमेकां च विद्यां भवतरोः स्थिराम्।<br>सर्वदुःखनिहन्त्रीं च स्मरणात्सर्वकामदाम्॥ ३५<br>मोक्षदां च मुमुक्षूणां कामदां च फलार्थिनाम्।<br>त्रिगुणातीतरूपां च गुणविस्तारकारकाम्॥ ३६<br>निर्गुणां सगुणां तस्मात्तां ध्यायन्ति फलार्थिनः। | फलकी आकांक्षा रखनेवाले उन भवानीका वैष्णवी, शांकरी, ब्राह्मी, वासवी, वारुणी, वाराही, नारसिंही, महालक्ष्मी, विचित्ररूपा, वेदमाता, एकेश्वरी, विद्यास्वरूपा, संसाररूपी वृक्षकी स्थिरताकी कारणरूपा, सभी कष्टोंका नाश करनेवाली और स्मरण करते ही सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली, मुक्ति चाहनेवालोंके लिये मोक्षदायिनी, फलकी अभिलाषा रखनेवालोंके लिये कामप्रदायिनी, त्रिगुणातीतस्वरूपा, गुणोंका विस्तार करनेवाली, निर्गुणा-सगुणा-रूपमें ध्यान करते हैं॥ ३४—३६ १/२॥ | | निरञ्जनं निराकारं निर्लेपं निर्गुणं किल॥ ३७<br>अरूपं व्यापकं ब्रह्म प्रवदन्ति मुनीश्वराः।<br>वेदोपनिषदि प्रोक्तस्तेजोमय इति क्वचित्॥ ३८<br>सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्रनयनस्तथा।<br>सहस्रकरकर्णश्च सहस्रास्यः सहस्रपात्॥ ३९ | कुछ मुनीश्वर निरंजन, निराकार, निर्लिप्त, गुणरहित, रूपरहित तथा सर्वव्यापक ब्रह्मको जगत्का कर्ता बतलाते हैं। वेदों तथा उपनिषदोंमें कहीं-कहीं उसे अनन्त सिर, नेत्र, हाथ, कान, मुख और चरणसे युक्त तेजोमय विराट् पुरुष कहा गया है॥ ३७—३९॥ | | विष्णोः पादमथाकाशं परमं समुदाहृतम्।<br>विराजं विरजं शान्तं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ४० | कुछ मनीषीगण आकाशको विष्णुके परम पादके रूपमें मानते हैं और उन्हें विराट्, निरंजन तथा शान्तस्वरूप कहते हैं॥ ४०॥ | | पुरुषोत्तमं तथा चान्ये प्रवदन्ति पुराविदः।<br>नैकोऽपीति वदन्त्यन्ये प्रभुरीशः कदाचन॥ ४१ | कुछ तत्त्वज्ञानी पुराणवेत्ता पुरुषोत्तमको सृष्टिका निर्माता कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इस अनन्त ब्रह्माण्डकी रचनामें केवल एक ईश्वर कदापि समर्थ नहीं हो सकता है॥ ४१॥ | | अनीश्वरमिदं सर्वं ब्रह्माण्डमिति केचन।<br>न कदापीशजन्यं यज्जगदेतदचिन्तितम्॥ ४२<br>सदैवेदमनीशं च स्वभावोत्थं सदेदृशम्।<br>अकर्तासौ पुमान्प्रोक्तः प्रकृतिस्तु तथा च सा॥ ४३<br>एवं वदन्ति सांख्याश्च मुनयः कपिलादयः। | कुछ लोग कहते हैं कि यह जगत् अचिन्त्य है, अतः यह ईश्वररचित कदापि नहीं हो सकता; उनके मतमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ईश्वररहित है। 'यह जगत् सदासे ही ईश्वरीय सत्तासे रहित रहा है और यह स्वभावसे उत्पन्न होता है तथा सदासे ऐसा ही है। यह पुरुष तो कर्तृत्वभावसे रहित कहा गया है और वह प्रकृति ही सर्वसंचालिका है'—कपिल आदि सांख्यशास्त्रके आचार्य ऐसा ही कहते हैं॥ ४२—४३ १/२॥ |