देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 254, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 254
| अ० २ ] | तृतीय स्कन्ध | २४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एते सन्देहसन्दोहाः प्रभवन्ति तथापरे ॥ ४४<br><br>विकल्पोपहतं चेतः किं करोमि मुनीश्वर।<br>धर्माधर्मविवक्षायां न मनो मे स्थिरं भवेत् ॥ ४५ | हे मुनिनाथ! मेरे मनमें ये तथा अन्य प्रकारके और भी सन्देहपुंज उत्पन्न होते रहते हैं। नाना प्रकारकी कल्पनाओंसे उद्विग्न मनवाला मैं क्या करूँ ? धर्म तथा अधर्मके विषयमें मेरा मन स्थिर नहीं हो पाता है ॥ ४४-४५ ॥ |
| को धर्मः कीदृशोऽधर्मश्चिह्नं नैवोपलभ्यते।<br>देवाः सत्त्वगुणोत्पन्नाः सत्यधर्मव्यवस्थिताः ॥ ४६<br><br>पीड्यन्ते दानवैः पापैः कुत्र धर्मव्यवस्थितिः।<br>धर्मस्थिताः सदाचाराः पाण्डवा मम वंशजाः ॥ ४७<br><br>दुःखं बहुविधं प्राप्तास्तत्र धर्मस्य का स्थितिः।<br>अतो मे हृदयं तात वेपतेऽतीव संशये ॥ ४८ | क्या धर्म है और क्या अधर्म है; इसका कोई स्पष्ट लक्षण प्राप्त नहीं होता है। लोग कहते हैं कि देवता सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए हैं और वे सत्यधर्ममें स्थित रहते हैं फिर भी वे देवगण पापाचारी दानवोंद्वारा प्रताड़ित किये जाते हैं, तो फिर धर्मकी व्यवस्था कहाँ रह गयी ? धर्मनिष्ठ और सदाचारी मेरे वंशज पाण्डव भी नाना प्रकारके कष्ट सहनेको विवश हुए, ऐसी स्थितिमें धर्मकी क्या मर्यादा रह गयी ? अतः हे तात! इस संशयमें पड़ा हुआ मेरा मन अतीव चंचल रहता है ॥ ४६–४८ ॥ |
| कुरु मेऽसंशयं चेतः समर्थोऽसि महामुने।<br>त्राहि संसारवार्धेस्त्वं ज्ञानपोतेन मां मुने ॥ ४९<br><br>मज्जन्तं चोत्पतन्तं च मग्नं मोहजलाविले ॥ ५० | हे महामुने! आप सर्वसमर्थ हैं, अतः मेरे हृदयको संशयमुक्त कीजिये। हे मुने! संसार-सागरके मोहसे दूषित जलमें गिरे हुए तथा बार-बार डूबते-उतराते मुझ अज्ञानीकी अपने ज्ञानरूपी जहाजसे रक्षा कीजिये ॥ ४९-५० ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे भुवनेश्वरीवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः
भगवती आद्याशक्तिके प्रभावका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यास उवाच<br>यत्त्वया च महाबाहो पृष्टोऽहं कुरुसत्तम।<br>तान्प्रश्नान्नारदः प्राह मया पृष्टो मुनीश्वरः ॥ १ | व्यासजी बोले— हे महाबाहो! हे कुरुश्रेष्ठ! आपने मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उन्हीं प्रश्नोंको मेरेद्वारा मुनिराज नारदजीसे पूछे जानेपर उन्होंने इस विषयमें ऐसा कहा था ॥ १ ॥ |
| नारद उवाच<br>व्यास किं ते ब्रवीम्यद्य पुरायं संशयो मम।<br>उत्पन्नो हृदयेऽत्यर्थं सन्देहासारपीडितः ॥ २ | नारदजी बोले— हे व्यासजी! मैं आपसे इस समय क्या कहूँ? प्राचीन कालमें यही शंका मेरे भी मनमें उत्पन्न हुई थी और सन्देहकी बहुलतासे मेरा मन उद्वेलित हो गया था ॥ २ ॥ |
| गत्वाहं पितरं स्थाने ब्रह्माणममितौजसम्।<br>अपृच्छं यत्त्वया पृष्टं व्यासाद्य प्रश्नमुत्तमम् ॥ ३ | हे व्यासजी! तदनन्तर मैंने ब्रह्मलोकमें अपने अमित तेजस्वी पिता ब्रह्माजीके पास पहुँचकर यही प्रश्न पूछा था, जो उत्तम प्रश्न आपने आज मुझसे पूछा है ॥ ३ ॥ |