भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

| २४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

| पितः कुतः समुत्पन्नं ब्रह्माण्डमखिलं विभो।<br>भवत्कृतेन वा सम्यक् किं वा विष्णुकृतं त्विदम्॥ ४<br><br>रुद्रकृतं वा विश्वात्मन् ब्रूहि सत्यं जगत्पते।<br>आराधनीयः कः कामं सर्वोत्कृष्टश्च कः प्रभुः॥ ५ | [मैंने पूछा—] हे पिताजी! इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका आविर्भाव कैसे हुआ? हे विभो! इसका निर्माण आपने किया है अथवा विष्णुने अथवा शिवने इसकी रचना की है? हे विश्वात्मन्! मुझे सही-सही बताइये। हे जगत्पते! सर्वश्रेष्ठ ईश्वर कौन है और किसकी आराधना की जानी चाहिये?॥ ४-५॥ | | तत्सर्वं वद मे ब्रह्मन्सन्देहांश्छिन्धि चानघ।<br>निमग्नो ह्यस्मि संसारे दुःखरूपेऽनृतोपमे॥ ६ | हे ब्रह्मन्! वह सब कुछ बताइए और मेरे सन्देहोंको दूर कीजिये। हे निष्पाप! मैं असत्य तथा दुःखरूप संसारमें डूबा हुआ हूँ॥ ६॥ | | सन्देहान्दोलितं चेतो न प्रशाम्यति कुत्रचित्।<br>न तीर्थेषु न देवेषु साधनेष्वितरेषु च॥ ७ | सन्देहोंसे दोलायमान मेरा मन तीर्थोंमें, देवताओंमें तथा अन्य साधनोंमें—कहीं भी शान्त नहीं हो पा रहा है॥ ७॥ | | अविज्ञाय परं तत्त्वं कुतः शान्तिः परन्तप।<br>विकीर्णं बहुधा चित्तं नैकत्र स्थिरतां व्रजेत्॥ ८ | हे परन्तप! परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त किये बिना शान्ति मिल भी कैसे सकती है? अनेक प्रकारसे उलझा हुआ मेरा मन एक जगह स्थिर नहीं हो पा रहा है॥ ८॥ | | कं स्मरामि यजे कं वा कं व्रजाम्यर्चयामि कम्।<br>स्तौमि कं नाभिजानामि देवं सर्वेश्वरेश्वरम्॥ ९ | मैं किसका स्मरण करूँ, किसका यजन करूँ, कहाँ जाऊँ, किसकी अर्चना करूँ और किसकी स्तुति करूँ? हे देव! मैं तो उस सर्वेश्वर परमात्माको जानता भी नहीं हूँ॥ ९॥ | | ततो तां प्रत्युवाचेदं ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>मया सत्यवतीसूनो कृते प्रश्ने सुदुस्तरे॥ १० | हे सत्यवतीतनय व्यासजी! मेरे द्वारा किये गये दुरूह प्रश्नोंको सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने तब मुझसे ऐसा कहा—॥ १०॥ | | ब्रह्मोवाच<br>किं ब्रवीमि सुताद्याहं दुर्बोधं प्रश्नमुत्तमम्।<br>त्वयाशक्यं महाभाग विष्णोरपि सुनिश्चयात्॥ ११ | ब्रह्माजी बोले—हे पुत्र! तुमने आज एक दुरूह तथा उत्तम प्रश्न किया है, उसके विषयमें मैं क्या कहूँ? हे महाभाग! साक्षात् विष्णुद्वारा भी इन प्रश्नोंका निश्चित उत्तर दिया जाना सम्भव नहीं है॥ ११॥ | | रागी कोऽपि न जानाति संसारेऽस्मिन्महामते।<br>विरक्तश्च विजानाति निरीहो यो विमत्सरः॥ १२ | हे महामते! इस संसारके क्रियाकलापोंमें आसक्त कोई भी ऐसा नहीं है, जो इस तत्त्वका ज्ञान रखता हो। कोई विरक्त, निःस्पृह तथा विद्वेषरहित ही इसे जान सकता है॥ १२॥ | | एकार्णवे पुरा जाते नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>भूतमात्रे समुत्पन्ने सञ्जज्ञे कमलादहम्॥ १३ | प्राचीन कालमें जल-प्रलयके होनेपर स्थावर-जंगमादिक प्राणियोंके नष्ट हो जाने तथा मात्र पंचमहाभूतोंकी उत्पत्ति होनेपर मैं कमलसे आविर्भूत हुआ॥ १३॥ | | नापश्यं तरणिं सोमं न वृक्षान्न च पर्वतान्।<br>कर्णिकायां समाविष्टश्चिन्तामकरवं तदा॥ १४ | उस समय मैंने सूर्य, चन्द्र, वृक्षों तथा पर्वतोंको नहीं देखा और कमलकर्णिकापर बैठा हुआ मैं विचार करने लगा—॥ १४॥ |