देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 256
अ० २ ] तृतीय स्कन्ध २४७
| कस्मादहं समुद्भूतः सलिलेऽस्मिन्महार्णवे।<br>को मे त्राता प्रभुः कर्ता संहर्ता वा युगान्तये॥ १५ | इस महासागरके जलमें मेरा प्रादुर्भाव किससे हुआ? मेरा निर्माण करनेवाला, रक्षा करनेवाला तथा युगान्तके समय संहार करनेवाला प्रभु कौन है? ॥ १५ ॥ |
| न च भूर्विद्यते स्पष्टा यदाधारं जलं त्विदम्।<br>पङ्कजं कथमुत्पन्नं प्रसिद्धं रूढियोगयोः॥ १६ | कहीं भूमि भी स्पष्ट दिखायी नहीं दे रही है, जिसके आधारपर यह जल टिका है तो फिर यह कमल कैसे उत्पन्न हुआ, जिसकी उत्पत्ति जल और पृथ्वीके संयोगसे ही प्रसिद्ध है? ॥ १६ ॥ |
| पश्याम्यद्यास्य पङ्कं तं मूलं वै पङ्कजस्य च।<br>भविष्यति धरा तत्र मूलं नास्त्यत्र संशयः॥ १७ | आज मैं इस कमलका मूल आधार पंक अवश्य देखूँगा; और फिर उस पंककी आधारस्वरूपा भूमि भी अवश्य मिल जायगी, इसमें सन्देह नहीं है॥ १७॥ |
| उत्तरन्सलिले तत्र यावद्वर्षसहस्रकम्।<br>अन्वेषमाणो धरणीं नावाप तां यदा तदा॥ १८<br><br>तपस्तपेति चाकाशे वाग्भूदशरीरिणी।<br>ततो मया तपस्तप्तं पद्मे वर्षसहस्रकम्॥ १९ | तदनन्तर मैं जलमें नीचे उतरकर हजार वर्षोंतक पृथ्वीको खोजता रहा, किंतु जब उसे नहीं पाया तब आकाशवाणी हुई कि 'तपस्या करो'। तत्पश्चात् मैं उसी कमलपर आसीन होकर हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करता रहा॥ १८-१९॥ |
| सृजेति पुनरुद्भूता वाणी तत्र श्रुता मया।<br>विमूढोऽहं तदाकर्ण्य कं सृजामि करोमि किम्॥ २० | इसके बाद पुनः एक अन्य वाणी उत्पन्न हुई—'सृष्टि करो', इसे मैंने साफ-साफ सुना। उसे सुनकर व्याकुल चित्तवाला मैं सोचने लगा, किसका सृजन करूँ और किस प्रकार करूँ?॥ २०॥ |
| तदा दैत्यावपि प्राप्तौ दारुणौ मधुकैटभौ।<br>ताभ्यां विभीषितश्चाहं युद्धाय मकरालये॥ २१ | उसी समय मधु-कैटभ नामवाले दो भयानक दैत्य मेरे सम्मुख आ गये। उस महासागरमें युद्धके लिये तत्पर उन दोनों दैत्योंसे मैं अत्यधिक भयभीत हो गया ॥ २१ ॥ |
| ततोऽहं नालमालम्ब्य वारिमध्यमवातरम्।<br>तदा तत्र मया दृष्टः पुरुषः परमाद्भुतः॥ २२ | तत्पश्चात् मैं उसी कमलकी नालका आश्रय लेकर जलके भीतर उतरा और वहाँ एक अत्यन्त अद्भुत पुरुषको मैंने देखा ॥ २२॥ |
| मेघश्यामशरीरस्तु पीतवासाश्चतुर्भुजः।<br>शेषशायी जगन्नाथो वनमालाविभूषितः॥ २३ | उनका शरीर मेघके समान श्याम वर्णवाला था। वे पीत वस्त्र धारण किये हुए थे और उनकी चार भुजाएँ थीं। वे जगत्पति वनमालासे अलंकृत थे तथा शेषशय्यापर सो रहे थे ॥ २३॥ |
| शङ्खचक्रगदापद्माद्यायुधैः सुविराजितः।<br>तमद्राक्षं महाविष्णुं शेषपर्यङ्कशायिनम्॥ २४ | वे शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुध धारण किये हुए थे। इस प्रकार मैंने शेषनागकी शय्यापर शयन करते हुए उन महाविष्णुको देखा ॥ २४॥ |
| योगनिद्रासमाक्रान्तमविस्पन्दिनमच्युतम् ।<br>शयानं तं समालोक्य भोगिभोगोपरि स्थितम् ॥ २५<br><br>चिन्ता ममाद्भुता जाता किं करोमीति नारद।<br>मया स्मृता तदा देवी स्तुता निद्रास्वरूपिणी ॥ २६ | हे नारदजी! योगनिद्राके वशीभूत होनेके कारण निष्पन्द पड़े उन भगवान् अच्युतको शेषनागके ऊपर सोया हुआ देखकर मुझे अद्भुत चिन्ता हुई और मैं सोचने लगा कि अब क्या करूँ? तब मैंने निद्रास्वरूपा भगवतीका स्मरण किया और मैं उनकी स्तुति करने लगा॥ २५-२६॥ |