देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| २४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| देहान्निर्गत्य सा देवी गगने संस्थिता शिवा।<br>अवितर्क्यशरीरा सा दिव्याभरणमण्डिता॥ २७ | [मेरी स्तुतिसे] वे कल्याणी भगवती विष्णु-भगवान्के शरीरसे निकलकर आकाशमें विराजमान हुईं। उस समय दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत वे भगवती कल्पनाओंसे परे विग्रहवाली प्रतीत हो रही थीं॥ २७॥ |
| विष्णोर्देहं विहायाशु विरराज नभःस्थिता।<br>उदतिष्ठदमेयात्मा तया मुक्तो जनार्दनः॥ २८ | इस प्रकार विष्णुका शरीर तत्काल छोड़कर जब वे आकाशमें विराजित हो गयीं, तब उनके द्वारा मुक्त किये गये अनन्तात्मा वे जनार्दन उठ गये॥ २८॥ |
| पञ्चवर्षसहस्राणि कृतवान्युद्धमुत्तमम्।<br>तदा विलोकितौ दैत्यौ हरिणा विनिपातितौ॥ २९<br><br>उत्सङ्गं विपुलं कृत्वा तत्रैव निहतौ च तौ।<br>रुद्रस्तत्रैव सम्प्राप्तो यत्रावां संस्थितावुभौ॥ ३० | पश्चात् उन्होंने पाँच हजार वर्षोंतक उन दैत्योंके साथ घोर युद्ध किया। पुनः उन महामाया भगवतीके दृष्टिपातसे मोहित किये गये उन दोनों दैत्योंको भगवान् विष्णुने मार दिया। अपनी जाँघोंको विस्तृत करके भगवान् विष्णुने उसीपर उन दोनोंका वध किया। उसी समय जहाँ हम दोनों थे, वहींपर शंकरजी भी आ गये॥ २९-३०॥ |
| त्रिभिः संवीक्षितास्माभिः स्वस्था देवी मनोहरा।<br>संस्तुता परमा शक्तिरुवाचास्मानवस्थितान्॥ ३१<br><br>कृपावलोकनैः कृत्वा पावनैर्मुदितानथ। | तब हम तीनोंने गगन-मण्डलमें विराजमान उन मनोहर देवीको देखा। हमलोगोंके द्वारा उन परम शक्तिकी स्तुति किये जानेपर अपनी पवित्र कृपादृष्टिसे हमलोगोंको प्रसन्न करके उन्होंने वहाँ स्थित हमलोगोंसे कहा— ॥ ३१ ½ ॥ |
| देव्युवाच<br>काजेशाः स्वानि कार्याणि कुरुध्वं समतन्द्रिताः॥ ३२<br><br>सृष्टिस्थितिविशिष्टानि हतावेतौ महासुरौ।<br>कृत्वा स्वानि निकेतानि वसध्वं विगतज्वराः॥ ३३<br><br>प्रजाश्चतुर्विधाः सर्वाः सृजध्वं स्वविभूतिभिः। | देवी बोलीं— हे ब्रह्मा, विष्णु, महेश! अब आपलोग सृष्टि, पालन एवं संहारके अपने-अपने कार्य प्रमादरहित होकर कीजिये। अब आपलोग अपना-अपना निवास बनाकर निर्भीकतापूर्वक रहिये; क्योंकि उन दोनों महादैत्योंका संहार हो गया है। अतः आपलोग अपनी विभूतियोंसे अण्डज, पिण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज—चारों प्रकारकी सभी प्रजाओंका सृजन कीजिये॥ ३२-३३ ½ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः पेशलं सुखदं मृदु॥ ३४<br><br>अब्रूम तामशक्ताः स्मः कथं कुर्मस्त्विमाः प्रजाः।<br>न मही वितता मातः सर्वत्र विततं जलम्॥ ३५<br><br>न भूतानि गुणाश्चापि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च।<br>तदाकर्ण्य वचोऽस्माकं शिवा जाता स्मितानना॥ ३६ | ब्रह्माजी बोले— उन भगवतीका वह मनोहर, सुखकर तथा मधुर वचन सुनकर हमलोगोंने उनसे कहा— हे माता! हमलोग शक्तिहीन हैं, अतः इन प्रजाओंका सृजन कैसे करें? अभी विस्तृत पृथ्वी ही नहीं है और सभी ओर जल-ही-जल फैला हुआ है। सृष्टिकार्यके लिये आवश्यक पंचतत्त्व, गुण, तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ—ये कुछ भी नहीं हैं। हमलोगोंके ये वचन सुनकर भगवतीका मुखमण्डल मुसकानसे भर उठा॥ ३४—३६॥ |