भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262
अ० ३ ]तृतीय स्कन्ध२५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ह्रींकारजपनिष्ठैस्तु पक्षिवृन्दैर्निषेविता।<br>अरुणा करुणामूर्तिः कुमारी नवयौवना॥ ४१ह्रींकार बीजमन्त्रका जप करनेवाले पक्षियोंका समुदाय उनकी सेवामें निरन्तर रत था। नवयौवनसे सम्पन्न तथा अरुण आभावाली वे कुमारी साक्षात् करुणाकी मूर्ति थीं॥ ४१॥
सर्वशृङ्गारवेषाढ्या मन्दस्मितमुखाम्बुजा।<br>उद्यत्पीनकुचद्वन्द्वनिर्जिताम्भोजकुङ्मला ॥ ४२<br><br>नानामणिगणाकीर्णभूषणैरुपशोभिता ।<br>कनकाङ्गदकेयूरकिरीटपरिशोभिता ॥ ४३<br><br>कनकच्छ्रीचक्रताटङ्कविटङ्कवदनाम्बुजा ।<br>हृल्लेखा भुवनेशीति नामजापपरायणैः॥ ४४<br><br>सखीवृन्दैः स्तुता नित्यं भुवनेशी महेश्वरी।<br>हृल्लेखाद्याभिरमरकन्याभिः परिवेष्टिता॥ ४५<br><br>अनङ्गकुसुमाद्याभिर्देवीभिः परिवेष्टिता।<br>देवी षट्कोणमध्यस्था यन्त्रराजोपरि स्थिता॥ ४६वे सभी प्रकारके शृंगार एवं परिधानोंसे सुसज्जित थीं और उनके मुखारविन्दपर मन्द मुसकान विराजमान थी। उनके उन्नत वक्षःस्थल कमलकी कलियोंसे भी बढ़कर शोभायमान हो रहे थे। नानाविध मणियोंसे जटिल आभूषणोंसे वे अलंकृत थीं। स्वर्णनिर्मित कंकण, केयूर और मुकुट आदिसे वे सुशोभित थीं। स्वर्णनिर्मित श्रीचक्राकार कर्णफूलसे सुशोभित उनका मुखारविन्द अतीव दीप्तिमान् था। उनकी सखियोंका समुदाय 'हृल्लेखा' तथा 'भुवनेशी' नामोंका सतत जप कर रहा था और अन्य सखियाँ उन भुवनेशी महेश्वरीकी अनवरत स्तुति कर रही थीं। 'हृल्लेखा' आदि देवकन्याओं तथा 'अनंगकुसुमा' आदि देवियोंसे वे घिरी हुई थीं। वे षट्कोणके मध्यमें यन्त्रराजके ऊपर विराजमान थीं॥ ४२-४६॥
दृष्ट्वा तां विस्मिताः सर्वे वयं तत्र स्थिताभवन्।<br>केयं कान्ता च किं नाम न जानीमोऽत्र संस्थिताः॥ ४७उन भगवतीको देखकर वहाँ स्थित हम सभी आश्चर्यचकित हो गये और कुछ देरतक वहीं ठहरे रहे। हमलोग यह नहीं जान पाये कि वे सुन्दरी कौन हैं और उनका क्या नाम है?॥ ४७॥
सहस्रनयना रामा सहस्रकरसंयुता।<br>सहस्रवदना रम्या भाति दूरादसंशयम्॥ ४८दूरसे देखनेपर वे भगवती हजार नेत्र, हजार मुख और हजार हाथोंसे युक्त अति सुन्दर लग रही थीं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है॥ ४८॥
नाप्सरा नापि गन्धर्वी नेयं देवाङ्गना किल।<br>इति संशयमापन्नास्तत्र नारद संस्थिताः॥ ४९हे नारद! हम सोचने लगे कि ये न तो अप्सरा, न गन्धर्वी और न देवांगना ही दीखती हैं, तो फिर ये कौन हो सकती हैं? हम इसी संशयमें पड़कर वहाँ खड़े रहे॥ ४९॥
तदासौ भगवान्विष्णुर्दृष्ट्वा तां चारुहासिनीम्।<br>उवाचाम्बां स्वविज्ञानात्कृत्वा मनसि निश्चयम्॥ ५०<br><br>एषा भगवती देवी सर्वेषां कारणं हि नः।<br>महाविद्या महामाया पूर्णा प्रकृतिरव्यया॥ ५१तब उन सुन्दर हासवाली देवीको देखकर भगवान् विष्णुने अपने अनुभवसे मनमें निश्चित करके हमसे कहा—ये साक्षात् भगवती जगदम्बा हम सबकी कारणस्वरूपा हैं। ये ही महाविद्या, महामाया, पूर्णा तथा शाश्वत प्रकृतिरूपा हैं॥ ५०-५१॥
दुर्ज्ञेयाल्पधियां देवी योगगम्या दुराशया।<br>इच्छा परात्मनः कामं नित्यानित्यस्वरूपिणी॥ ५२अल्प बुद्धिवाले गम्भीर आशयवाली इन भगवतीको सम्यक् रूपसे नहीं जान सकते, केवल योगमार्गसे ही ये ज्ञेय हैं। ये देवी परमात्माकी इच्छास्वरूपा तथा नित्यानित्य-स्वरूपिणी हैं॥ ५२॥
देवी भागवत महापुराण · पृष्ठ 262, कुल 889 में से · BharatKosha