भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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२५४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३

| दुराराध्याल्पभाग्यैश्च देवी विश्वेश्वरी शिवा।<br>वेदगर्भा विशालाक्षी सर्वेषामादिरीश्वरी॥ ५३ | ये विश्वेश्वरी कल्याणी भगवती अल्पभाग्यवाले प्राणियोंके लिये दुराराध्य हैं। ये वेदजननी विशालनयना जगदम्बा सबकी आदिरूपा ईश्वरी हैं॥ ५३॥ | | एषा संहृत्य सकलं विश्वं क्रीडति संक्षये।<br>लिङ्गानि सर्वजीवानां स्वशरीरे निवेश्य च॥ ५४ | ये भगवती प्रलयावस्थामें समग्र विश्वका संहार करके सभी प्राणियोंके लिंगरूप शरीरको अपने शरीरमें समाविष्ट करके विहार करती हैं॥ ५४॥ | | सर्वबीजमयी ह्येषा राजते साम्प्रतं सुरौ।<br>विभूतयः स्थिताः पार्श्वे पश्यतां कोटिशः क्रमात्॥ ५५ | हे देवो! ये भगवती इस समय सर्वबीजमयी देवीके रूपमें विराजमान हैं। देखिये, इनके समीप करोड़ों विभूतियाँ क्रमसे स्थित हैं॥ ५५॥ | | दिव्याभरणभूषाढ्या दिव्यगन्धानुलेपनाः।<br>परिचर्यापराः सर्वाः पश्यतां ब्रह्मशङ्करौ॥ ५६ | हे ब्रह्मा एवं शंकरजी! देखिये, दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत तथा दिव्य गन्धानुलेपसे युक्त ये सभी विभूतियाँ इन भगवतीकी सेवामें मनोयोगसे संलग्न हैं॥ ५६॥ | | धन्या वयं महाभागाः कृतकृत्याः स्म साम्प्रतम्।<br>यदत्र दर्शनं प्राप्तं भगवत्याः स्वयं त्विदम्॥ ५७ | हमलोग धन्य, सौभाग्यशाली तथा कृतकृत्य हैं, जो कि हमें इस समय यहाँ भगवतीका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ॥ ५७॥ | | तपस्तप्तं पुरा यत्नात्तस्येदं फलमुत्तमम्।<br>अन्यथा दर्शनं कुत्र भवेदस्माकमादरात्॥ ५८ | पूर्वकालमें हमलोगोंने बड़े प्रयत्नसे जो तपस्या की थी, उसीका यह उत्तम परिणाम है; अन्यथा भगवती हमलोगोंको स्नेहपूर्वक दर्शन कैसे देतीं?॥ ५८॥ | | पश्यन्ति पुण्यपुञ्जा ये ये वदान्यास्तपस्विनः।<br>रागिणो नैव पश्यन्ति देवीं भगवतीं शिवाम्॥ ५९ | जो उदार हृदयवाले पुण्यात्मा तथा तपस्वीलोग हैं, वे ही इनके दर्शन प्राप्त करते हैं, किंतु विषयासक्तलोग इन कल्याणमयी भगवतीके दर्शनसे सर्वथा वंचित रहते हैं॥ ५९॥ | | मूलप्रकृतिरेवैषा सदा पुरुषसङ्गता।<br>ब्रह्माण्डं दर्शयत्येषा कृत्वा वै परमात्मने॥ ६० | ये ही मूलप्रकृतिस्वरूपा भगवती परमपुरुषके सहयोगसे ब्रह्माण्डकी रचना करके परमात्माके समक्ष उसे उपस्थित करती हैं॥ ६०॥ | | द्रष्टासौ दृश्यमखिलं ब्रह्माण्डं देवताः सुरौ।<br>तस्यैषा कारणं सर्वा माया सर्वेश्वरी शिवा॥ ६१ | हे देवो! यह पुरुष द्रष्टामात्र है और समस्त ब्रह्माण्ड तथा देवतागण दृश्यस्वरूप हैं। महामाया, कल्याणमयी, सर्वव्यापिनी सर्वेश्वरी ये भगवती ही इन सबका मूल कारण हैं॥ ६१॥ | | क्वाहं वा क्व सुराः सर्वे रम्भाद्याः सुरयोषितः।<br>लक्षांशेन तुलामस्या न भवामः कथञ्चन॥ ६२ | कहाँ मैं, कहाँ सभी देवता और कहाँ रम्भा आदि देवांगनाएँ! हम सभी इन भगवतीकी तुलनामें उनके लक्षांशके बराबर भी नहीं हैं॥ ६२॥ | | सैषा वराङ्गना नाम वै दृष्टा या महार्णवे।<br>बालभावे महादेवी दोलयन्तीव मां मुदा॥ ६३ | ये वे ही महादेवी जगदम्बा हैं, जिन्हें हमलोगोंने प्रलयसागरमें देखा था और जो बाल्यावस्थामें मुझे प्रसन्नतापूर्वक पालनेमें झुला रही थीं॥ ६३॥ |