देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ४ ] तृतीय स्कन्ध २५५
| शयानं वटपत्रे च पर्यङ्के सुस्थिरे दृढे।<br>पादाङ्गुष्ठं करे कृत्वा निवेश्य मुखपङ्कजे ॥ ६४<br><br>लेलिहन्तञ्च क्रीडन्तमनैकैर्बालचेष्टितैः।<br>रममाणं कोमलाङ्गं वटपत्रपुटे स्थितम् ॥ ६५ | उस समय मैं एक सुस्थिर तथा दृढ़ वटपत्ररूपी पलंगपर सोया हुआ था और अपने पैरका अँगूठा अपने मुखारविन्दमें डालकर चूस रहा था। अत्यन्त कोमल अंगोंवाला मैं उस समय अनेक बालसुलभ चेष्टाएँ करता हुआ उसी वटपत्रके दोनेमें पड़े-पड़े खेल रहा था॥ ६४-६५॥ |
| गायन्ती दोलयन्ती च बालभावान्मयि स्थिते।<br>सेयं सुनिश्चितं ज्ञानं जातं मे दर्शनादिव ॥ ६६ | उस समय गाती हुई ये भगवती बालभावमें स्थित मुझे झूला झुलाती थीं। इन्हें देखकर मुझे यह सुनिश्चित ज्ञान हो गया है कि वे ही यहाँ विराजमान हैं॥ ६६॥ |
| कामं नो जननी सैषा शृणु तं प्रवदाम्यहम्।<br>अनुभूतं मया पूर्वं प्रत्यभिज्ञा समुत्थिता ॥ ६७ | निश्चितरूपसे ये भगवती मेरी जननी हैं। आप सुनें, मुझे पूर्व अनुभवकी स्मृति जग गयी है, जो मैं आपसे कहता हूँ॥ ६७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विमानस्थैर्हरादिभिर्देवीदर्शनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
भगवतीके चरणनखमें त्रिदेवोंको सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन होना, भगवान् विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति करना
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः पुनराह जनार्दनः।<br>वयं गच्छेम पार्श्वेऽस्याः प्रणमन्तः पुनः पुनः॥ १<br><br>सेयं वरा महामाया दास्यत्येषा वरान् हि नः।<br>स्तुवामः सन्निधिं प्राप्य निर्भयाश्चरणान्तिके॥ २<br><br>यदि नो वारयिष्यन्ति द्वारस्थाः परिचारकाः।<br>पठिष्यामश्च तत्रस्थाः स्तुतिं देव्याः समाहिताः ॥ ३ | ब्रह्माजी बोले—हे नारद! ऐसा कहकर जनार्दन भगवान् विष्णुने पुनः कहा—हमलोग बार-बार प्रणाम करते हुए उनके पास चलें। वे वरदायिनी महामाया हमें अवश्य वरदान देंगी। अतः निर्भय होकर हमें उनके चरणोंके निकट चलकर उनकी स्तुति करनी चाहिये। यदि उनके द्वारपाल हमें वहाँ रोकेंगे तो हमलोग ध्यानपूर्वक वहीं बैठकर देवीकी स्तुति करने लगेंगे॥ १—३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्ते हरिणा वाक्ये सुप्रहृष्टौ सुसंस्थितौ।<br>जातौ प्रमुदितौ कामं निकटे गमनाय च ॥ ४<br><br>ओमित्युक्त्वा हरिं सर्वे विमानात्त्वरितास्त्रयः।<br>उत्तीर्य निर्गता द्वारि शङ्कमाना मनस्यलम् ॥ ५<br><br>द्वारस्थान् वीक्ष्य तान्सर्वान्देवी भगवती तदा।<br>स्मितं कृत्वा चकाराशु तांस्त्रीन्स्त्रीरूपधारिणः ॥ ६ | ब्रह्माजी बोले—भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर मैं तथा शिव—हम दोनों प्रसन्नतासे गद्गद होकर शीघ्र उनके निकट जानेको उत्सुक हो गये। विष्णुसे ‘ठीक है’—ऐसा कहकर हम तीनों शीघ्रतापूर्वक विमानसे उतरकर मन-ही-मन अनेक तर्क-वितर्क करते हुए भगवतीके द्वारपर ज्यों ही पहुँचे, त्यों ही द्वारपर स्थित हम सभीको देखकर मन्द मुसकान करके उन भगवतीने हम तीनोंको स्त्रीरूपमें परिणत कर दिया॥ ४—६॥ |