देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| २५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वयं युवतयो जाताः सुरूपाश्चारुभूषणाः।<br>विस्मयं परमं प्राप्ता गतास्तत्सन्निधिं पुनः॥ ७ | हमलोग नाना प्रकारके भूषणोंसे अलंकृत रूपवती युवती बन गये और अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर उन महामाया भगवतीके पास पुनः गये॥ ७॥ |
| सा दृष्ट्वा नः स्थितांस्तत्र स्त्रीरूपांश्चरणान्तिके।<br>व्यलोकयत चार्वङ्गी प्रेमसम्पूर्णया दृशा॥ ८ | स्त्रीके वेषमें हमलोगोंको अपने चरणोंके निकट देखकर अत्यन्त मनोहर रूपवाली उन देवीने हमलोगोंके ऊपर कृपादृष्टि डाली॥ ८॥ |
| प्रणम्य तां महादेवीं पुरतः संस्थिता वयम्।<br>परस्परं लोकयन्तः स्त्रीरूपाश्चारुभूषणाः॥ ९ | उस समय महामाया भगवतीको प्रणाम करके स्त्री-वेषधारी तथा दिव्य वस्त्राभरण धारण किये हम तीनों परस्पर एक दूसरेको देखते हुए उनके सामने खड़े रहे॥ ९॥ |
| पादपीठं प्रेक्षमाणा नानामणिविभूषितम्।<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशं स्थितास्तत्र वयं त्रयः॥ १० | विविध प्रकारके मणिजटित एवं करोड़ों सूर्यके समान देदीप्यमान देवीके पादपीठको देखते हुए हम तीनों वहीं स्थित रहे॥ १०॥ |
| काश्चिद्रक्ताम्बरास्तत्र सहचर्यः सहस्रशः।<br>काश्चिन्नीलाम्बरा नार्यस्तथा पीताम्बराः शुभाः॥ ११ | उन महादेवीकी हजारों सेविकाओंमेंसे कुछने रक्त वस्त्र, कुछने नीले वस्त्र और कुछने सुन्दर पीत वस्त्र धारण कर रखे थे॥ ११॥ |
| देव्यः सर्वाः शुभाकारा विचित्राम्बरभूषणाः।<br>विरेजुः पार्श्वतस्तस्याः परिचर्यापराः किल॥ १२ | वहाँ उपस्थित सभी देवियाँ सुन्दर स्वरूपकी थीं और विचित्र वस्त्र एवं आभूषणोंसे सुसज्जित थीं। वे सब जगदम्बाकी विभिन्न सेवाओंमें तत्पर थीं॥ १२॥ |
| जगुश्च ननृतुश्चान्याः पर्युपासन्त ताः स्त्रियः।<br>वीणामारुतवाद्यानि वादयन्त्यो मुदान्विताः॥ १३ | उनमेंसे कुछ गा रही थीं, कुछ नाच रही थीं और कुछ स्त्रियाँ हर्षके साथ वीणा तथा मुखवाद्य बजाती हुई अन्य सेवाओंमें संलग्न थीं॥ १३॥ |
| शृणु नारद वक्ष्यामि यद् दृष्टं तत्र चाद्भुतम्।<br>नखदर्पणमध्ये वै देव्याश्चरणपङ्कजे॥ १४<br><br>ब्रह्माण्डमखिलं सर्वं तत्र स्थावरजङ्गमम्।<br>अहं विष्णुश्च रुद्रश्च वायुरग्निर्यमो रविः॥ १५<br><br>वरुणः शीतगुस्त्वष्टा कुबेरः पाकशासनः।<br>पर्वताः सागरा नद्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥ १६<br><br>विश्वावसुश्चित्रकेतुः श्वेतश्चित्राङ्गदस्तथा।<br>नारदस्तुम्बुरुश्चैव हाहाहूहूस्तथैव च॥ १७<br><br>अश्विनौ वसवः साध्याः सिद्धाश्च पितरस्तथा।<br>नागाः शेषादयः सर्वे किन्नरोरगराक्षसाः॥ १८ | हे नारदजी! वहाँ मैंने भगवतीके चरणकमलके नखरूपी दर्पणमें जो अद्भुत दृश्य देखा, उसे बताता हूँ, आप सुनें। वहाँ मुझे समस्त स्थावर-जंगमात्मक ब्रह्माण्ड, मैं (ब्रह्मा), विष्णु, शिव, वायु, अग्नि, यम, सूर्य, वरुण, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, कुबेर, इन्द्र, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, गन्धर्व, अप्सराएँ, विश्वावसु, चित्रकेतु, श्वेत, चित्रांगद, नारद, तुम्बुरु, हाहा-हूहू, दोनों अश्विनीकुमार, अष्टवसु, साध्य, सिद्धगण, पितर, शेष आदि नाग, सभी किन्नर, उरग और राक्षसगण दिखायी दे रहे थे॥ १४-१८॥ |
| वैकुण्ठो ब्रह्मलोकश्च कैलासः पर्वतोत्तमः।<br>सर्वं तदखिलं दृष्टं नखमध्यस्थितं च नः॥ १९<br><br>मज्जन्मपङ्कजं तत्र स्थितोऽहं चतुराननः।<br>शेषशायी जगन्नाथस्तथा च मधुकैटभौ॥ २० | वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक तथा पर्वतश्रेष्ठ कैलास—इन सबको हमने उनके पद-नखमें विराजमान देखा। उसीमें मेरा जन्मस्थान कमल भी था और मैं चतुरानन उस कमलकोशमें बैठा हुआ था। मधु-कैटभ नामके दोनों दानव तथा शेषशायी महाविष्णु भी उसीमें विराजमान थे॥ १९-२०॥ |