भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

| अ० ४ ] | तृतीय स्कन्ध | २५७ | | :--- | :--- |

| ब्रह्मोवाच | **ब्रह्माजी बोले—**इस प्रकार परमेश्वरीके चरण- | | एवं दृष्टं मया तत्र पादपद्मनखे स्थितम्।<br>विस्मितोऽहं ततो वीक्ष्य किमेतदिति शङ्कितः॥ २१ | कमलके नखमें स्थित यह सारा दृश्य मुझे दिखायी दिया, जिसे देखकर मैं चकित रह गया और मन-ही-मन सोचने लगा—‘यह क्या है?’॥ २१॥ | | विष्णुश्च विस्मयाविष्टः शङ्करश्च तथा स्थितः।<br>तां तदा मेनिरे देवीं वयं विश्वस्य मातरम्॥ २२ | मेरे ही समान विष्णु और शिव भी वहाँ आश्चर्य-चकित होकर खड़े थे। उस समय हम तीनोंने समझ लिया कि समस्त जगत्‌की जननी ये ही महादेवी हैं॥ २२॥ | | ततो वर्षशतं पूर्णं व्यतिक्रान्तं प्रपश्यतः।<br>सुधामये शिवे द्वीपे विहारं विविधं तदा॥ २३ | इस प्रकार अमृतमय एवं कल्याणमय उस द्वीपमें अनेक प्रकारके अद्भुत दृश्य देखते हुए हमारे सौ वर्ष व्यतीत हो गये॥ २३॥ | | सख्य इव तदा तत्र मेनिरेऽस्मानवस्थितान्।<br>देव्यः प्रमुदिताकारा नानाभरणमण्डिताः॥ २४<br><br>वयमप्यतिरम्यत्वाद् बभूविम विमोहिताः।<br>प्रहृष्टमनसः सर्वे पश्यन्भावान्मनोरमान्॥ २५ | वहाँकी प्रसन्नवदना एवं विचित्र अलंकारोंसे अलंकृत देवियाँ हम तीनोंको अपनी सखियाँ समझती थीं और हमलोग भी उनके स्नेहपूर्ण सद्व्यवहारसे मुग्ध थे तथा उनके मनोरम भावोंको देखकर अतीव प्रसन्न थे॥ २४-२५॥ | | एकदा तां महादेवीं देवीं श्रीभुवनेश्वरीम्।<br>तुष्टाव भगवान्विष्णुर्युवतीभावसंस्थितः॥ २६ | एक बार नारीरूपमें स्थित भगवान् विष्णु महादेवी भगवती श्रीभुवनेश्वरीकी स्तुति करने लगे—॥ २६॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नमः।<br>कल्याण्यै कामदायै च वृद्ध्यै सिद्ध्यै नमो नमः॥ २७<br><br>सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणये नमः।<br>पञ्चकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नमः॥ २८ | **श्रीभगवान् बोले—**प्रकृति एवं विधात्रीदेवीको मेरा निरन्तर नमस्कार है। कल्याणी, कामप्रदा, वृद्धि तथा सिद्धिदेवीको बार-बार नमस्कार है। सच्चिदानन्द-रूपिणी तथा संसारकी योनिसस्वरूपा देवीको नमस्कार है। आप पंचकृत्य* विधात्री तथा श्रीभुवनेश्वरीदेवीको बार-बार नमस्कार है॥ २७-२८॥ | | सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नमः।<br>अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नमः॥ २९ | समस्त संसारकी एकमात्र अधिष्ठात्री तथा कूटस्थरूपा देवीको बार-बार नमस्कार है। अर्धमात्राकी अर्थभूता एवं हृल्लेखादेवीको बार-बार नमस्कार है॥ २९॥ | | ज्ञातं मयाखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं<br>त्वत्तोऽस्य सम्भवलयावपि मातरद्य।<br>शक्तिश्च तेऽस्य करणे विततप्रभावा<br>ज्ञाताधुना सकललोकमयीति नूनम्॥ ३० | हे जननि! आज मैंने जान लिया कि यह समस्त विश्व आपमें समाहित है तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी सृष्टि एवं संहार भी आप ही करती हैं। इस ब्रह्माण्डके निर्माणमें आपकी विस्तृत प्रभाववाली शक्ति ही मुख्य हेतु है, अतः मुझे यह ज्ञात हो गया कि आप ही सम्पूर्ण लोकमें व्याप्त हैं। इस सत् एवं |


* सृष्टि, स्थिति, संहार, निग्रह, अनुग्रह।

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—9 A