भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 889 में से

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पृष्ठ 267
२५८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४
Sanskrit ShlokaHindi Meaning
विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं<br>सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले।<br>तत्त्वैश्च षोडशभिरेव च सप्तभिश्च<br>भासीन्द्रजालमिव नः किल रञ्जनाय॥ ३१असत् सम्पूर्ण जगत्‌का विस्तार करके उस चिद्ब्रह्म पुरुषको यथासमय आप इसे समग्ररूपसे प्रस्तुत करती हैं। अपनी प्रसन्नताके लिये सोलह तत्त्वों तथा महदादि अन्य सात तत्त्वोंके साथ आप हमें इन्द्रजालके समान प्रतीत होती हैं॥ ३०-३१॥
न त्वामृते किमपि वस्तुगतं विभाति<br>व्याप्यैव सर्वमखिलं त्वमवस्थितासि।<br>शक्तिं विना व्यवहृतो पुरुषोऽप्यशक्तो<br>वम्भण्यते जननि बुद्धिमता जनेन॥ ३२हे जननि! आपसे रहित यहाँ कोई भी वस्तु दिखायी नहीं देती, आप ही समस्त जगत्‌को व्याप्त करके स्थित रहती हैं। बुद्धिमान् पुरुषोंका कथन है कि आपकी शक्तिके बिना वह परमपुरुष कुछ भी करनेमें असमर्थ है॥ ३२॥
प्रीणासि विश्वमखिलं सततं प्रभावैः<br>स्वैस्तेजसा च सकलं प्रकटीकरोषि।<br>अत्स्येव देवि तरसा किल कल्पकाले<br>को वेद देवि चरितं तव वैभवस्य॥ ३३आप अपने कृपाप्रभावसे संसारका कल्याण करती हैं। हे देवि! आप ही अपने तेजसे सृष्टिकालमें सम्पूर्ण जगत्‌को उत्पन्न करती हैं तथा प्रलयकालमें इसका शीघ्र ही संहार कर डालती हैं। हे देवि! आपके वैभवके लीला-चरित्रको भलीभाँति जाननेमें कौन समर्थ है?॥ ३३॥
त्राता वयं जननि ते मधुकैटभाभ्यां<br>लोकाश्च ते सुवितताः खलु दर्शिता वै।<br>नीताः सुखस्य भवने परमां च कोटिं<br>यद्दर्शनं तव भवानि महाप्रभावम्॥ ३४हे जननि! मधु-कैटभ नामक दोनों दानवोंसे आपने हमारी रक्षा की है, आपने ही हमलोगोंको अपने अनेक विस्तृत लोक दिखाये तथा अपने-अपने भवनमें हमें परमानन्दका अनुभव कराया। हे भवानि! यह आपके दर्शनका ही महान् प्रभाव है॥ ३४॥
नाहं भवो न च विरिञ्चि विवेद मातः<br>कोऽन्यो हि वेत्ति चरितं तव दुर्विभाव्यम्।<br>कानीह सन्ति भुवनानि महाप्रभावे<br>ह्यस्मिन्भवानि रचिते रचनाकलापे॥ ३५हे माता! जब मैं (विष्णु), शिव तथा ब्रह्मा भी आपके अपूर्व चरित्रको जाननेमें समर्थ नहीं हैं, तब अन्य कोई कैसे जान सकेगा? हे महिमामयी भवानि! आपके रचे हुए इस ब्रह्माण्ड-प्रपंचमें न जाने कितने ब्रह्माण्ड भरे पड़े हैं!॥ ३५॥
अस्माभिरत्र भुवने हरिरन्य एव<br>दृष्टः शिवः कमलजः प्रथितप्रभावः।<br>अन्येषु देवि भुवनेषु न सन्ति किं ते<br>किं विद्म देवि विततं तव सुप्रभावम्॥ ३६हमलोगोंने आपके इस लोकमें अद्भुत प्रभाववाले दूसरे विष्णु, शिव तथा ब्रह्माको देखा है। हे देवि! क्या वे देवता अन्यान्य लोकोंमें नहीं होंगे? हमलोग आपकी इस अद्भुत महिमाको कैसे जान सकते हैं?॥ ३६॥
याचेऽम्ब तेऽङ्घ्रिकमलं प्रणिपत्य कामं<br>चित्ते सदा वसतु रूपमिदं तवैतत्।<br>नामापि वक्त्रकुहरे सततं तवैव<br>संदर्शनं तव पदाम्बुजयोः सदैव॥ ३७हे जगदम्ब! हमलोग आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर यही याचना करते हैं कि आपका यह दिव्य स्वरूप हमारे हृदयमें सदा विराजमान रहे, हमारे मुखसे सदा आपका ही नाम निकले और हमारे नेत्र प्रतिदिन आपके चरणकमलोंके दर्शन पाते रहें॥ ३७॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]-9 B

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