भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 889 में से

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पृष्ठ 268

अ० ४] तृतीय स्कन्ध २५९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भृत्योऽयमस्ति सततं मयि भावनीयं<br>त्वां स्वामिनीति मनसा ननु चिन्तयामि।<br>एषावयोरविरता किल देवि भूया-<br>द्व्याप्तिः सदैव जननीसुतयोरिवार्ये॥ ३८हे माता! आपकी यह भावना हमारे प्रति सर्वदा बनी रहे कि ये सब हमारे सेवक हैं और हम भी सर्वथा आपको मनसे अपनी स्वामिनी समझते रहें। हे आर्ये! इस प्रकार हमारा और आपका माता-पुत्रका अनन्य सम्बन्ध सर्वदा बना रहे॥ ३८॥
त्वं वेत्सि सर्वमखिलं भुवनप्रपञ्चं<br>सर्वज्ञता परिसमाप्तिनितान्तभूमिः।<br>किं पामरेण जगदम्ब निवेदनीयं<br>यद्युक्तमाचर भवानि तवेङ्गितं स्यात्॥ ३९हे जगदम्बिके! आप समस्त ब्रह्माण्ड-प्रपंचको पूर्ण रूपसे जानती हैं; क्योंकि जहाँ सर्वज्ञताकी समाप्ति होती है, उसकी अन्तिम सीमा आप ही हैं। हे भवानि! मैं पामर कह ही क्या सकता हूँ? आपको जो उचित लगे, आप वह करें; क्योंकि सब कुछ तो आपहीके संकेतपर होता है॥ ३९॥
ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरुमापतिश्च<br>संहारकारक इयं तु जने प्रसिद्धिः।<br>किं सत्यमेतदपि देवि तवेच्छया वै<br>कर्तुं क्षमा वयमजे तव शक्तियुक्ताः॥ ४०जगत्में ऐसी प्रसिद्धि है कि ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और रुद्र संहार करते हैं, किंतु हे देवि! क्या यह बात सत्य है? हे अजे! सच्चाई तो यह है कि आपकी इच्छासे तथा आपसे शक्ति प्राप्तकर हम अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ हो पाते हैं॥ ४०॥
धात्री धराधरसुते न जगद् बिभर्ति<br>आधारशक्तिरखिलं तव वै बिभर्ति।<br>सूर्योऽपि भाति वरदे प्रभया युतस्ते<br>त्वं सर्वमेतदखिलं विरजा विभासि॥ ४१हे गिरिजे! यह पृथ्वी इस जगत्को धारण नहीं करती है अपितु आपकी आधारशक्ति ही इस समस्त जगत्को धारण करती है। हे वरदे! भगवान् सूर्य भी आपके ही आलोकसे युक्त होकर प्रकाशमान हैं। इस प्रकार आप विरजारूपसे इस सम्पूर्ण जगत्के रूपमें सुशोभित हो रही हैं॥ ४१॥
ब्रह्माहमीश्वरवरः किल ते प्रभावा-<br>त्सर्वे वयं जनियुता न यदा तु नित्याः।<br>केऽन्ये सुराः शतमखप्रमुखाश्च नित्या<br>नित्या त्वमेव जननी प्रकृतिः पुराणा॥ ४२ब्रह्मा, मैं (विष्णु) तथा शंकर हम सब आपके ही प्रभावसे उत्पन्न होते हैं। जब हम नित्य नहीं हैं तो फिर इन्द्र आदि प्रमुख देवता कैसे नित्य हो सकते हैं? समस्त चराचर जगत्की जननी तथा सनातन प्रकृतिरूपा आप ही नित्य हैं॥ ४२॥
त्वं चेद्भवानि दयसे पुरुषं पुराणं<br>जानेऽहमद्य तव सन्निधिगः सदैव।<br>नोचेदहं विभुरनादिरनीह ईशो<br>विश्वात्मधीरिरिति तमःप्रकृतिः सदैव॥ ४३हे भवानि! आपकी सन्निधिमें आनेपर आज मुझे ज्ञात हो गया कि आप मुझ पुराणपुरुषपर सर्वदा दयाभाव बनाये रखती हैं; अन्यथा मैं अपनेको सर्वव्यापी, आदिरहित, निष्काम, ईश्वर तथा विश्वात्मा मान बैठता और अहंकारयुक्त होकर सदाके लिये तमोगुणी प्रकृतिवाला हो जाता॥ ४३॥
विद्या त्वमेव ननु बुद्धिमतां नराणां<br>शक्तिस्त्वमेव किल शक्तिमतां सदैव।<br>त्वं कीर्तिकान्तिकमलामलतुष्टिरूपा<br>मुक्तिप्रदा विरतिरेव मनुष्यलोके॥ ४४आप निश्चय ही सदासे बुद्धिमान् पुरुषोंकी विद्या तथा शक्तिशाली पुरुषोंकी शक्ति हैं। आप इस मनुष्य-लोकमें कीर्ति, कान्ति, कमला, निर्मला तथा तुष्टिस्वरूपा हैं तथा प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली विरक्तिस्वरूपा हैं॥ ४४॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—9 C

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