देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| गायत्र्यसि प्रथमवेदकला त्वमेव<br>स्वाहा स्वधा भगवती सगुणार्धमात्रा।<br>आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्या<br>सञ्जीवनाय सततं सुरपूर्वजानाम्॥ ४५ | आप वेदोंकी प्रथम कला गायत्री हैं। आप ही स्वाहा, स्वधा, सगुणा तथा अर्धमात्रा भगवती हैं। आपने ही देवताओं और पूर्वजोंके संरक्षणके लिये आगम तथा निगमकी रचना की है॥ ४५॥ | | मोक्षार्थमेव रचयस्यखिलं प्रपञ्चं<br>तेषां गताः खलु यतो ननु जीवभावम्।<br>अंशा अनादिनिधनस्य कलानघस्य<br>पूर्णार्णवस्य वितता हि यथा तरङ्गाः॥ ४६ | जिस प्रकार पूर्ण महासमुद्रकी विस्तृत तरंगें उस समुद्रका ही अंश होती हैं, उसी प्रकार आदि-अन्तसे हीन निष्कलंक ब्रह्मके जीवरूपी अंशोंको मोक्ष प्राप्त करानेके उद्देश्यसे ही आपने सम्पूर्ण जगत्-प्रपंचका निर्माण किया है॥ ४६॥ | | जीवो यदा तु परिवेत्ति तवैव कृत्यं<br>त्वं संहरस्यखिलमेतदिति प्रसिद्धम्।<br>नाट्यं नटेन रचितं वितथेऽन्तरङ्गे<br>कार्ये कृते विरमसे प्रथितप्रभावा॥ ४७ | जीवको जब यह विदित हो जाता है कि सम्पूर्ण विश्वप्रपंच आपहीका कृत्य है, तब अमित प्रभाववाली आप उसका उपसंहार कर देती हैं और अपने द्वारा किये गये मिथ्या, किंतु रहस्यपूर्ण कार्यपर उसी प्रकार प्रमुदित होती हैं जिस प्रकार मनोहारी नाटककी रचनापर सफल नट सन्तुष्ट होता है॥ ४७॥ | | त्राता त्वमेव मम मोहमयाद्भवाब्धे-<br>स्त्वामम्बिके सततमैमि महार्तिदे च।<br>रागादिभिर्विरचिते वितथे किलान्ते<br>मामेव पाहि बहुदुःखकरे च काले॥ ४८ | हे अम्बिके! आप ही इस मोहमय भव-सागरसे मेरी रक्षा कर सकती हैं। राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंके कारण अत्यन्त कष्टदायक तथा दुःखप्रद मिथ्या अन्तकालमें मेरी रक्षा कीजियेगा, मैं आपके शरणागत हूँ॥ ४८॥ | | नमो देवि महाविद्ये नमामि चरणौ तव।<br>सदा ज्ञानप्रकाशं मे देहि सर्वार्थदे शिवे॥ ४९ | हे देवि! आपको नमस्कार है। हे महाविद्ये! मैं आपके चरणोंमें नमन करता हूँ। हे सर्वार्थदात्री शिवे! आप ज्ञानरूपी प्रकाशसे मेरे हृदयको आलोक प्रदान कीजिये॥ ४९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
विष्णुना कृतं देवीस्तोत्रं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
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अथ पञ्चमोऽध्यायः
ब्रह्मा और शिवजीका भगवतीकी स्तुति करना
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा विरते विष्णौ देवदेवे जनार्दने।<br>उवाच शंकरः शर्वः प्रणतः पुरतः स्थितः॥ १ | ब्रह्माजी बोले— [हे नारद!] इस प्रकार देवदेव जनार्दन भगवान् विष्णुके स्तुति कर लेनेके उपरान्त भगवान् शिवशंकर विनीतभावसे देवीके सम्मुख स्थित होकर कहने लगे॥ १॥ | | शिव उवाच<br>यदि हरिस्तव देवि विभावज-<br>स्तदनु पद्मज एव तवोद्भवः।<br>किमहमत्र तवापि न सद्गुणः<br>सकललोकविधौ चतुरा शिवे॥ २ | शिवजी बोले— हे देवि! यदि भगवान् विष्णु आपके प्रभावसे प्रादुर्भूत हुए तथा उनके बाद ब्रह्माजी भी आपसे उत्पन्न हुए तो क्या मुझ तमोगुणीकी आपसे उत्पत्ति नहीं हुई है? हे शिवे! आप तो समग्र लोककी रचनामें चतुर हैं॥ २॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—9 D