देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| २६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| गायत्र्यसि प्रथमवेदकला त्वमेव<br>स्वाहा स्वधा भगवती सगुणार्धमात्रा।<br>आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्या<br>सञ्जीवनाय सततं सुरपूर्वजानाम्॥ ४५ | आप वेदोंकी प्रथम कला गायत्री हैं। आप ही स्वाहा, स्वधा, सगुणा तथा अर्धमात्रा भगवती हैं। आपने ही देवताओं और पूर्वजोंके संरक्षणके लिये आगम तथा निगमकी रचना की है॥ ४५॥ | | मोक्षार्थमेव रचयस्यखिलं प्रपञ्चं<br>तेषां गताः खलु यतो ननु जीवभावम्।<br>अंशा अनादिनिधनस्य कलानघस्य<br>पूर्णार्णवस्य वितता हि यथा तरङ्गाः॥ ४६ | जिस प्रकार पूर्ण महासमुद्रकी विस्तृत तरंगें उस समुद्रका ही अंश होती हैं, उसी प्रकार आदि-अन्तसे हीन निष्कलंक ब्रह्मके जीवरूपी अंशोंको मोक्ष प्राप्त करानेके उद्देश्यसे ही आपने सम्पूर्ण जगत्-प्रपंचका निर्माण किया है॥ ४६॥ | | जीवो यदा तु परिवेत्ति तवैव कृत्यं<br>त्वं संहरस्यखिलमेतदिति प्रसिद्धम्।<br>नाट्यं नटेन रचितं वितथेऽन्तरङ्गे<br>कार्ये कृते विरमसे प्रथितप्रभावा॥ ४७ | जीवको जब यह विदित हो जाता है कि सम्पूर्ण विश्वप्रपंच आपहीका कृत्य है, तब अमित प्रभाववाली आप उसका उपसंहार कर देती हैं और अपने द्वारा किये गये मिथ्या, किंतु रहस्यपूर्ण कार्यपर उसी प्रकार प्रमुदित होती हैं जिस प्रकार मनोहारी नाटककी रचनापर सफल नट सन्तुष्ट होता है॥ ४७॥ | | त्राता त्वमेव मम मोहमयाद्भवाब्धे-<br>स्त्वामम्बिके सततमैमि महार्तिदे च।<br>रागादिभिर्विरचिते वितथे किलान्ते<br>मामेव पाहि बहुदुःखकरे च काले॥ ४८ | हे अम्बिके! आप ही इस मोहमय भव-सागरसे मेरी रक्षा कर सकती हैं। राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंके कारण अत्यन्त कष्टदायक तथा दुःखप्रद मिथ्या अन्तकालमें मेरी रक्षा कीजियेगा, मैं आपके शरणागत हूँ॥ ४८॥ | | नमो देवि महाविद्ये नमामि चरणौ तव।<br>सदा ज्ञानप्रकाशं मे देहि सर्वार्थदे शिवे॥ ४९ | हे देवि! आपको नमस्कार है। हे महाविद्ये! मैं आपके चरणोंमें नमन करता हूँ। हे सर्वार्थदात्री शिवे! आप ज्ञानरूपी प्रकाशसे मेरे हृदयको आलोक प्रदान कीजिये॥ ४९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
विष्णुना कृतं देवीस्तोत्रं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
~~ ० ~~
अथ पञ्चमोऽध्यायः
ब्रह्मा और शिवजीका भगवतीकी स्तुति करना
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा विरते विष्णौ देवदेवे जनार्दने।<br>उवाच शंकरः शर्वः प्रणतः पुरतः स्थितः॥ १ | ब्रह्माजी बोले— [हे नारद!] इस प्रकार देवदेव जनार्दन भगवान् विष्णुके स्तुति कर लेनेके उपरान्त भगवान् शिवशंकर विनीतभावसे देवीके सम्मुख स्थित होकर कहने लगे॥ १॥ | | शिव उवाच<br>यदि हरिस्तव देवि विभावज-<br>स्तदनु पद्मज एव तवोद्भवः।<br>किमहमत्र तवापि न सद्गुणः<br>सकललोकविधौ चतुरा शिवे॥ २ | शिवजी बोले— हे देवि! यदि भगवान् विष्णु आपके प्रभावसे प्रादुर्भूत हुए तथा उनके बाद ब्रह्माजी भी आपसे उत्पन्न हुए तो क्या मुझ तमोगुणीकी आपसे उत्पत्ति नहीं हुई है? हे शिवे! आप तो समग्र लोककी रचनामें चतुर हैं॥ २॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—9 D
| अ० ५ ] | तृतीय स्कन्ध | २६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वमसि भूः सलिलं पवनस्तथा<br>खमपि वह्निगुणश्च तथा पुनः।<br>जननि तानि पुनः करणानि च<br>त्वमसि बुद्धिमनोऽप्यथ हंकृतिः॥ ३ | पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि आप ही हैं। हे माता! आप ही इन्द्रियरूपिणी तथा आप ही बुद्धि, मन और अहंकारस्वरूपा हैं॥ ३॥ |
| न च विदन्ति वदन्ति च येऽन्यथा<br>हरिहराजकृतं निखिलं जगत्।<br>तव कृतास्त्रय एव सदैव ते<br>विरचयन्ति जगत्सचराचरम्॥ ४ | ब्रह्मा, विष्णु और शंकरने अखिल जगत्की रचना की है—ऐसा जो लोग अन्यथा बोलते हैं, वे कुछ भी नहीं जानते। आपने ही सदासे इन तीनोंकी सृष्टि की है, जो [आपकी ही प्रेरणासे] चराचर जगत्का सृजन-पालन-संहार करते हैं॥ ४॥ |
| अवनिवायुखवह्निजलादिभिः<br>सविषयैः सगुणैश्च जगद् भवेत्।<br>यदि तदा कथमद्य च तत्स्फुटं<br>प्रभवतीति तवाम्ब कलामृते॥ ५ | यदि पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि, जल आदि महाभूतोंके गुणों तथा विषयोंसे ही जगत्का निर्माण सम्भव हो तो भी हे अम्ब! आपकी [चिन्मयी] कलाके बिना वह कैसे व्यक्त हो सकता है?॥ ५॥ |
| भवसि सर्वमिदं सचराचरं<br>त्वमजविष्णुशिवाकृतिकल्पितम् ।<br>विविधवेषविलासकुतूहलै-<br>र्विरमसे रमसेऽम्ब यथारुचि॥ ६ | हे अम्ब! आपने ब्रह्मा, विष्णु और महेशद्वारा निर्मित इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है। आप अनेक प्रकारके वेष धारण करके कुतूहलपूर्ण क्रीड़ाएँ करती हुई यथेच्छ विहार करती हैं और पुनः शान्त भी हो जाती हैं॥ ६॥ |
| सकललोकसिसृक्षुरहं हरिः<br>कमलभूश्च भवाम यदाऽम्बिके।<br>तव पदाम्बुजपांसुपरिग्रहं<br>समधिगम्य तदा ननु चक्रिम॥ ७ | हे अम्बिके! जब मैं (शिव), विष्णु और ब्रह्मा सृष्टिकालमें इस ब्रह्माण्डकी रचना करनेकी इच्छा करते हैं, तब निश्चित ही आपके चरणकमलोंका रजकण प्राप्त करके ही हमलोग अपने-अपने कार्य करनेमें समर्थ होते हैं॥ ७॥ |
| यदि दयार्द्रमना न सदाम्बिके<br>कथमहं विहितश्च तमोगुणः।<br>कमलजश्च रजोगुणसम्भवः<br>सुविहितः किमु सत्त्वगुणो हरिः॥ ८ | हे अम्बिके! यदि आप सदा दयालु चित्तवाली न होतीं तो मैं तमोगुणयुक्त, ब्रह्मा रजोगुणसम्पन्न और विष्णु सत्त्वगुणयुक्त कैसे बनते?॥ ८॥ |
| यदि न ते विषमा मतिरम्बिके<br>कथमिदं बहुधा विहितं जगत्।<br>सचिवभूपतिभृत्यजनावृतं<br>बहुधनैरधनैश्च समाकुलम्॥ ९ | हे अम्बिके! यदि आपकी वैविध्यपूर्ण बुद्धि न होती तो यह संसार इतना विविधतापूर्ण कैसे होता, जिसमें मन्त्री, राजा, सेवक, धनी और निर्धन भरे पड़े हैं॥ ९॥ |
| तव गुणास्त्रय एव सदा क्षमाः<br>प्रकटनावनसंहरणेषु वै।<br>हरिहरद्रुहिणाश्च क्रमात्तया<br>विरचितास्त्रिजगतां किल कारणम्॥ १० | इस ब्रह्माण्डकी सृष्टि, स्थिति और संहार करनेमें आपके तीनों गुण (सत्-रज-तम) ही सर्वथा समर्थ हैं; फिर भी आपने हम ब्रह्मा, विष्णु और महेशको क्रमशः इन कार्योंको सम्पन्न करनेके लिये तीनों लोकोंके कारणरूपमें उत्पन्न किया है॥ १०॥ |
| परिचितानि मया हरिणा तथा<br>कमलजेन विमानगतेन वै।<br>पथिगतैर्भुवनानि कृतानि वा<br>कथय केन भवानि नवानि च॥ ११ | विमानमें बैठा हुआ मैं, ब्रह्मा तथा विष्णु—हमलोग इन भुवनोंसे पूर्णरूपेण परिचित हो गये हैं। हे भवानि! मार्गमें स्थित इन नवीन भुवनोंको किसने बनाया? इसे आप बतायें॥ ११॥ |
२६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
२६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
| सृजसि पासि जगजगदम्बिके<br>स्वकलया कियदिच्छसि नाशितुम्।<br>रमयसे स्वपतिं पुरुषं सदा<br>तव गतिं न हि विद्म वयं शिवे॥ १२ | हे जगदम्बिके! आप अपनी कलासे जगत्की रचना तथा पालन करती हैं और जब चाहती हैं तब उसका संहार कर देती हैं। आप सदा अपने पति परमपुरुषको रमण कराती रहती हैं। हे शिवे! आपकी इस लीलाको हम नहीं जान सकते॥ १२॥ | | जननि देहि पदाम्बुजसेवनं<br>युवतिभावगतानपि नः सदा।<br>पुरुषतामधिगम्य पदाम्बुजा-<br>द्विरहिताः क्व लभेम सुखं स्फुटम्॥ १३ | हे जननि! नारीभावको प्राप्त हमलोगोंको सदा अपने चरणकमलोंकी सेवा करनेका अवसर दें; क्योंकि कालान्तरमें पुनः पुंस्त्व प्राप्त होनेपर आपके चरणकमलोंसे पृथक् रहकर हमलोगोंको वह प्रत्यक्ष सुख कहाँ प्राप्त होगा!॥ १३॥ | | न रुचिरस्ति ममाम्ब पदाम्बुजं<br>तव विहाय शिवे भुवनेष्वलम्।<br>निवसितुं नरदेहमवाप्य च<br>त्रिभुवनस्य पतित्वमवाप्य वै॥ १४ | हे अम्ब! हे शिवे! आपके चरणकमलोंको त्यागकर यह नरदेह प्राप्त करके तीनों लोकोंका स्वामित्व प्राप्त करके भी समस्त लोकोंमें कहीं भी रहनेकी मेरी रुचि नहीं है—चाहे मुझे त्रिभुवनका स्वामित्व ही क्यों न मिल जाय॥ १४॥ | | सुदति नास्ति मनागपि मे रति-<br>र्युवतिभावमवाप्य तवान्तिके।<br>पुरुषता क्व सुखाय भवत्यलं<br>तव पदं न यदीक्षणगोचरम्॥ १५ | हे सुदति! आपके सांनिध्यमें स्त्रीभावको प्राप्त कर लेनेपर अब पुरुषभावमें मेरी थोड़ी भी रुचि नहीं है। जिसे पाकर आपके चरणारविन्दके दर्शनका सौभाग्य न मिले, वह पुरुषता कैसे सुख प्रदान कर सकती है?॥ १५॥ | | त्रिभुवनेषु भवत्वियमम्बिके<br>मम सदैव हि कीर्तिरनाविला।<br>युवतिभावमवाप्य पदाम्बुजं<br>परिचितं तव संसृतिनाशनम्॥ १६ | हे अम्बिके! स्त्रीका रूप पाकर मैं भवबन्धनसे मुक्त करनेवाले आपके चरणकमलोंसे परिचित हो गया हूँ। आपकी कृपासे तीनों लोकोंमें मेरा सुयश स्थिर रहे॥ १६॥ | | भुवि विहाय तवान्तिकसेवनं<br>क इह वाञ्छति राज्यमकण्टकम्।<br>त्रुटिरसौ किल याति युगात्मतां<br>न निकटं यदि तेऽङ्घ्रिसरोरुहम्॥ १७ | इस संसारमें ऐसा कौन प्राणी होगा, जो आपके सांनिध्यका सेवन छोड़कर निष्कण्टक राज्य करना चाहेगा? क्योंकि जिसे आपके चरणकमलका सांनिध्य प्राप्त नहीं होता, उसके लिये क्षणांश भी युगके समान प्रतीत होता है॥ १७॥ | | तपसि ये निरता मुनयोऽमला-<br>स्तव विहाय पदाम्बुजपूजनम्।<br>जननि ते विधिना किल वञ्चिताः<br>परिभवो विभवे परिकल्पितः॥ १८ | हे जननि! जो शुद्ध चित्तवाले मुनि आपके चरण-कमलकी सेवा त्यागकर केवल तपश्चर्यामें लगे रहते हैं, वे निश्चितरूपसे विधाताके द्वारा ठगे गये हैं और अपनी हानिको ही लाभ समझते हैं॥ १८॥ | | न तपसा न दमेन समाधिना<br>न च तथा विहितैः क्रतुभिर्यथा।<br>तव पदाब्जपरागनिषेवणा-<br>द्भवति मुक्तिरजे भवसागरात्॥ १९ | हे अजे! आपके पदारविन्दके परागकी सेवासे जैसी मुक्ति इस संसार-सागरसे प्राप्त होती है, वैसी मुक्ति तपस्या, इन्द्रियदमन, समाधि तथा विभिन्न वेदविहित यज्ञोंसे भी नहीं होती॥ १९॥ |
| अ० ५ ] | तृतीय स्कन्ध | २६३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुरु दयां दयसे यदि देवि मां<br>कथय मन्त्रमनाविलमद्भुतम्।<br>समभवं प्रजपन्सुखितो ह्यहं<br>सुविशदं च नवार्णमनुत्तमम् ॥ २० | हे देवि! यदि आप मेरे प्रति दयालु हैं तो मुझपर दया कीजिये और अपना निर्मल, अद्भुत, सर्वश्रेष्ठ एवं विशद नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) मुझे प्रदान कीजिये, जिससे उसका निरन्तर जप करके मैं सर्वदाके लिये सुखी हो जाऊँ॥ २०॥ |
| प्रथमजन्मनि चाधिगतो मया<br>तदधुना न विभाति नवाक्षरः।<br>कथय मां मनुमद्य भवार्णवा-<br>ज्जननि तारय तारय तारके ॥ २१ | पूर्वजन्ममें मैंने नवार्ण मन्त्रकी दीक्षा पायी थी; परंतु वह मुझे अब स्मरण नहीं रह गया है। इसलिये हे तारके! हे जननि! आज पुनः वह मन्त्र मुझे प्रदान कीजिये और भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये॥ २१॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्ता सा तदा देवी शिवेनाद्भुततेजसा।<br>उच्चचाराम्बिका मन्त्रं प्रस्फुटं च नवाक्षरम्॥ २२<br>तं गृहीत्वा महादेवः परां मुदमवाप ह।<br>प्रणम्य चरणौ देव्यास्तत्रैवावस्थितः शिवः॥ २३ | ब्रह्माजी बोले—[हे नारद!] अद्भुत तेजस्वी शिवजीके ऐसा कहनेपर जगदम्बाने स्पष्ट शब्दोंमें नवाक्षर मन्त्रका उच्चारण किया। उस मन्त्रको ग्रहण करके शिवजी बहुत प्रसन्न हो गये और भगवतीके चरणोंमें प्रणाम करके वहींपर स्थित हो गये॥ २२-२३॥ |
| जपन्नवाक्षरं मन्त्रं कामदं मोक्षदं तथा।<br>बीजयुक्तं शुभोच्चारं शङ्करस्तस्थिवांस्तदा ॥ २४ | उस समय सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ, मुक्तिप्रदायक तथा शुभ उच्चारणसे सम्पन्न उस बीजयुक्त नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए शंकरजी वहाँ विराजमान रहे॥ २४॥ |
| तं तथावस्थितं दृष्ट्वा शङ्करं लोकशङ्करम्।<br>अवोचं तां महामायां संस्थितोऽहं पदान्तिके॥ २५ | संसारका कल्याण करनेवाले शिवजीको इस प्रकार बैठा देखकर मैं उन महामायाके चरणोंके समीप बैठ गया और उनसे कहने लगा॥ २५॥ |
| न वेदास्त्वामेवं कलयितुमिहासन्नपटवो<br>यतस्ते नोचुस्त्वां सकलजनधात्रीमविकलाम्।<br>यदा स्वाहाभूता सकलमखहोमेषु विहिता<br>तदा त्वं सर्वज्ञा जननि खलु जाता त्रिभुवने ॥ २६ | हे जननि! वेद सभी लोगोंको धारण करनेवाली तथा सनातनी आप भगवतीकी कल्पना करनेमें अकुशल हैं—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि साधारण कार्योंमें उन्होंने आप भगवतीकी चर्चा नहीं की है। यदि वे आपको न जानते तो सभी यज्ञों तथा हवन-कार्योंमें आपको ही स्वाहादेवीके रूपमें प्रतिष्ठित कैसे करते? इसलिये आप तीनों लोकोंमें सर्वज्ञाके रूपमें विख्यात हुईं॥ २६॥ |
| कर्ताहं प्रकरोमि सर्वमखिलं ब्रह्माण्डमत्यद्भुतं<br>कोऽन्योऽस्तीह चराचरे त्रिभुवने मत्तः समर्थः पुमान्।<br>धन्योऽस्म्यत्र न संशयः किल यदा ब्रह्मास्मि लोकातिगो<br>मग्नोऽहं भवसागरे प्रवितते गर्वाभिवेशादिति ॥ २७ | मैं स्रष्टा हूँ, मैं अत्यन्त अद्भुत सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका निर्माण करता हूँ, इस चराचर त्रिभुवनमें मुझसे बढ़कर समर्थ दूसरा पुरुष कौन है, मैं निस्संदेह धन्य हूँ, मैं लोकोत्तर ब्रह्मा हूँ—इस मिथ्या अहंकारके कारण मैं सर्वदा इस विस्तृत संसारसागरमें निमग्न रहता हूँ; तथापि आज आपके चरण-कमलोंकी पराग-प्राप्तिके |
२६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
२६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अद्याहं तव पादपङ्कजपरागादानगर्वेण वै<br>धन्योऽस्मीति यथार्थवादनिपुणो जातः प्रसादाच्च ते।<br>याचे त्वां भवभीतिनाशचतुरां मुक्तिप्रदां चेश्वरीं<br>हित्वा मोहकृतं महार्त्तिनिगडं त्वद्भक्तियुक्तं कुरु ॥ २८ | गर्वसे मैं वस्तुतः धन्य हो गया हूँ और आपकी कृपासे ही आज मैं यथातथ्यके ज्ञानमें निपुण हो गया हूँ। सांसारिक भयका नाश करनेमें दक्ष, मुक्तिदायिनी आप परमेश्वरीसे मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि मोहनिर्मित महादुःखदायी भवबन्धनसे मुक्त करके आप मुझे अपनी भक्तिसे समन्वित कीजिये॥ २७-२८॥ |
| अतोऽहञ्च जातो विमुक्तः कथं स्यां<br>सरोजादमेयात्त्वदाविष्कृताद्वै ।<br>तवाज्ञाकरः किङ्करोऽस्मीति नूनं<br>शिवे पाहि मां मोहमग्नं भवाब्धौ ॥ २९ | आपसे ही निर्मित अद्भुत कमलसे मैं आविर्भूत हुआ हूँ और मैं आपका आज्ञाकारी सेवक हूँ, अतः मैं कैसे मुक्त हो सकूँगा? हे शिवे! इस भवसागरमें पड़े हुए मुझ मोहमग्नकी रक्षा कीजिये॥ २९॥ |
| न जानन्ति ये मानवास्ते वदन्ति<br>प्रभुं मां तवाद्यं चरित्रं पवित्रम्।<br>यजन्तीह ये याजकाः स्वर्गकामा<br>न ते ते प्रभावं विदन्त्येव कामम्॥ ३० | इस संसारमें जो लोग आपके सनातन पवित्र चरित्रको नहीं जानते, वे लोग मुझे ही ईश्वर कहते हैं और जो यज्ञकर्ता स्वर्गकी इच्छासे [इन्द्र आदि देवताओंका] यजन करते हैं, वे भी सर्वथा आपके प्रभावको नहीं जानते॥ ३०॥ |
| त्वया निर्मितोऽहं विधित्वे विहारं<br>विकर्तुं चतुर्धा विधायादिसर्गम्।<br>अहं वेद्मि कोऽन्यो विवेदादिमाये<br>क्षमस्वापराधं त्वहङ्कारजं मे ॥ ३१ | हे आदिमाये! सर्वप्रथम सृष्टिको चार भागों [अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और पिण्डज—जरायुज]—में विभक्त करनेके लिये ही आपने मुझे ब्रह्माके पदपर बैठाया, परंतु [मैंने यह समझ लिया कि] मैं ही सब कुछ जानता हूँ, दूसरा कौन जान सकता है—मेरे इस अहंकारजन्य अपराधको आप क्षमा कीजिये॥ ३१॥ |
| श्रमं येऽष्टधा योगमार्गे प्रवृत्ताः<br>प्रकुर्वन्ति मूढाः समाधौ स्थिता वै।<br>न जानन्ति ते नाम मोक्षप्रदं वा<br>समुच्चारितं जातु मातर्मिषेण॥ ३२ | जो लोग अष्टांगयोगका आश्रय लेते हैं और समाधि लगाकर व्यर्थ श्रम करते हैं, वे अज्ञानी हैं। हे माता! वे यह नहीं जानते कि किसी भी बहाने आपके नामोच्चारणमात्रसे ही उन्हें मुक्ति प्राप्त हो सकती है॥ ३२॥ |
| विचारे परे तत्त्वसंख्याविधाने<br>पदे मोहिता नाम ते संविहाय।<br>न किं ते विमूढा भवाब्धौ भवानि<br>त्वमेवासि संसारमुक्तिप्रदा वै॥ ३३ | कुछ लोग (सांख्यवादी) तो आपके नामका आश्रय छोड़कर विमोहित हो तत्त्वोंकी संख्याके फेरमें पड़ जाते हैं; क्या वे इस भवसागरमें मूर्ख नहीं हैं? हे भवानि! संसारसे मुक्ति प्रदान करनेवाली तो आप ही हैं॥ ३३॥ |
| परं तत्त्वविज्ञानमाद्यैर्जनैयै-<br>रजे चानुभूतं त्यजन्त्येव ते किम्।<br>निमेषार्धमात्रं पवित्रं चरित्रं<br>शिवा चाम्बिका शक्तिरीशेति नाम॥ ३४ | हे अजे! जिन विष्णु-शिव आदिने परम तत्त्वज्ञानका अनुभव कर लिया है, वे क्या आधे निमेषमात्रके लिये भी आपके पवित्र चरित्र तथा शिवा, अम्बिका, शक्ति, ईश्वरी आदि नामोंको विस्मृत करते हैं?॥ ३४॥ |
| अ० ५ ] | तृतीय स्कन्ध | २६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न किं त्वं समर्थासि विश्वं विधातुं<br>दृशैवाशु सर्वं चतुर्था विभक्तम्।<br>विनोदार्थमेवं विधिं मां विधाया-<br>दिसर्गे किलेदं करोषीति कामम्॥ ३५ | क्या आप विश्वकी रचना करनेमें समर्थ नहीं हैं? हे आदिसर्गे! आपके दृष्टिनिक्षेपमात्रसे ही यह सम्पूर्ण विश्व चार प्रकारके (अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, पिण्डज—जरायुज) जीवोंके रूपमें शीघ्र ही विभक्त हुआ है। इस प्रकार मुझ ब्रह्माकी सृष्टि तो आप अपने मनोविनोदके लिये करके पुनः स्वतन्त्र भावसे जो चाहती हैं, वह करती हैं॥ ३५॥ |
| हरिः पालकः किं त्वयासौ मधोर्वा<br>तथा कैटभाद्रक्षितः सिन्धुमध्ये।<br>हरः संहृतः किं त्वयासौ न काले<br>कथं मे भ्रुवोर्मध्यदेशात्स जातः॥ ३६ | [महाप्रलयकी स्थितिमें] यदि महासागरमें आप मधु-कैटभसे विष्णुकी रक्षा न करतीं तो वे सृष्टि-पालक कैसे बन पाते और यदि आप सबके संहारक शिवका संहार न करतीं तो वे मेरे भ्रूमध्यसे कैसे प्रकट होते?॥ ३६॥ |
| न ते जन्म कुत्रापि दृष्टं श्रुतं वा<br>कुतः सम्भवस्ते न कोऽपीह वेद।<br>किलाद्यासि शक्तिस्त्वमेका भवानि<br>स्वतन्त्रैः समस्तैरतो बोधितासि॥ ३७ | आपका जन्म कहाँ हुआ—इसे न तो किसीने देखा और न सुना और कोई यह भी नहीं जान पाया कि आपकी उत्पत्ति कहाँ हुई? हे भवानि! एकमात्र आप ही आद्या शक्ति हैं, अतएव वेदोंने इसी रूपमें आपका वर्णन किया है॥ ३७॥ |
| त्वया संयुतोऽहं विकर्तुं समर्थो<br>हरिस्त्रातुमम्ब त्वया संयुतश्च।<br>हरः सम्प्रहर्तुं त्वयैवेह युक्तः<br>क्षमा नाद्य सर्वे त्वया विप्रयुक्ताः॥ ३८ | हे अम्ब! आपकी ही शक्तिसे प्रेरित होकर मैं सृष्टि करनेमें, विष्णु पालन करनेमें तथा शिव संहार करनेमें समर्थ होते हैं। आपकी शक्तिसे विलग रहकर अब हमलोग कुछ भी करनेमें सक्षम नहीं हैं॥ ३८॥ |
| यथाहं हरिः शङ्करः किं तथान्ये<br>न जाता न सन्तीह नो वाभविष्यन्।<br>न मुह्यन्ति केऽस्मिंस्तवात्यन्तचित्रे<br>विनोदे विवादास्पदेऽल्पाशयानाम्॥ ३९ | जिस प्रकार मैं (ब्रह्मा), विष्णु और शिव उत्पन्न हुए हैं, उसी प्रकार क्या अन्य प्राणी उत्पन्न नहीं हुए, अथवा विद्यमान नहीं हैं या उत्पन्न नहीं होंगे? किंतु अल्प बुद्धिवाले प्राणियोंके लिये विवादास्पद तथा अत्यन्त विचित्र आपके इस लीलाविनोदसे कौन भ्रमित नहीं हो जाते?॥ ३९॥ |
| अकर्ता गुणस्पष्ट एवाद्य देवो<br>निरीहोऽनुपाधिः सदैवैकलश्च।<br>तथापीश्वरस्ते वितीर्णं विनोदं<br>सुसम्पश्यतीत्याहुरेवं विधिज्ञाः॥ ४० | वे आदिदेव ईश्वर अकर्ता, गुणोंसे स्फुट होनेवाले, निष्काम, उपाधिरहित तथा निर्गुण हैं, फिर भी वे आपके विस्तृत लीला-विनोदको भलीभाँति देखते रहते हैं—ज्ञानीजन ऐसा ही कहते हैं॥ ४०॥ |
| दृष्टादृष्टविभेदेऽस्मिन्प्राक्तत्त्वो वै पुमान्परः।<br>नान्यः कोऽपि तृतीयोऽस्ति प्रमेये सुविचारिते॥ ४१ | मूर्त और अमूर्त भेदोंसे युक्त इस संसारमें आपसे पूर्व वे ही परमपुरुष थे; ज्ञान-तत्त्वपर सम्यक् प्रकारसे विचार करनेपर यह सर्वथा सिद्ध होता है कि अन्य तीसरा कोई भी नहीं है॥ ४१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे हरब्रह्मकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
| २६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| न मिथ्या वेदवाक्यं वै कल्पनीयं कदाचन।<br>विरोधोऽयं मयात्यन्तं हृदये तु विशङ्कितः ॥ ४२<br><br>एकमेवाद्वितीयं यद् ब्रह्म वेदा वदन्ति वै।<br>सा किं त्वं वाप्यसौ वा किं सन्देहं विनिवर्तय ॥ ४३ | [यह सिद्धान्त है कि] वेद-वाक्यको कभी मिथ्या नहीं समझना चाहिये। वेद ब्रह्मको अद्वितीय और एक बताते हैं; तो फिर आप क्या हैं और वह ब्रह्म क्या है? यह विरोध मेरे हृदयमें महान् शंका उत्पन्न करता है। आप मेरे इस सन्देहका निवारण करें ॥ ४२-४३ ॥ | | निःसंशयं न मे चेतः प्रभवत्यविशङ्कितम्।<br>द्वित्वैकत्वविचारेऽस्मिन्मग्नं क्षुल्लकं मनः ॥ ४४ | इस प्रकार द्वैत-अद्वैतके इस विचारमें डूबा हुआ मेरा क्षुद्र मन निश्चितरूपसे शंकारहित नहीं हो पा रहा है ॥ ४४ ॥ | | स्वमुखेनापि सन्देहं छेत्तुमर्हसि मामकम्।<br>पुण्ययोगाच्च मे प्राप्ता सङ्गतिस्तव पादयोः ॥ ४५ | अब आप ही स्वयं अपने मुखसे मेरी इस शंकाका निवारण करनेकी कृपा करें; क्योंकि [अनेक जन्मोंके] पुण्ययोगसे ही आपके चरणोंका यह सांनिध्य मुझे प्राप्त हुआ है ॥ ४५ ॥ | | पुमानसि त्वं स्त्री वासि वद विस्तरतो मम।<br>ज्ञात्वाहं परमां शक्तिं मुक्तः स्यां भवसागरात् ॥ ४६ | आप पुरुष हैं अथवा स्त्री—यह मुझे विस्तारपूर्वक बतायें, जिससे मैं आप परम शक्तिको जानकर भवसागरसे मुक्त हो जाऊँ ॥ ४६ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे हरब्रह्मकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
भगवती जगदम्बिकाद्वारा अपने स्वरूपका वर्णन तथा ‘महासरस्वती’, ‘महालक्ष्मी’ और ‘महाकाली’ नामक अपनी शक्तियोंको क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिवको प्रदान करना
| ब्रह्मोवाच<br>इति पृष्टा मया देवी विनयावनतेन च।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णमाद्या भगवती हि सा॥ १ | **ब्रह्माजी बोले—**अत्यन्त नम्र भावसे मेरे पूछनेपर वे आद्या भगवती मधुर वचन कहने लगीं ॥ १ ॥ | | देव्युवाच<br>सदैकत्वं न भेदोऽस्ति सर्वदैव ममास्य च।<br>योऽसौ साहमहं योऽसौ भेदोऽस्ति मतिविभ्रमात् ॥ २ | **देवी बोलीं—**मैं और परब्रह्म सदा एक ही हैं; कोई भेद नहीं है; क्योंकि जो वे हैं, वही मैं हूँ, और जो मैं हूँ, वही वे हैं। बुद्धिभ्रमसे ही हम दोनोंमें भेद दिखायी पड़ता है ॥ २ ॥ | | आवयोरन्तरं सूक्ष्मं यो वेद मतिमान्हि सः।<br>विमुक्तः स तु संसारान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ३ | इसलिये हम दोनोंमें विद्यमान सूक्ष्म अन्तरको जो बुद्धिमान् जानता है, वह संसारके बन्धनसे छूटकर सदाके लिये मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ | | एकमेवाद्वितीयं वै ब्रह्म नित्यं सनातनम्।<br>द्वैतभावं पुनर्याति काल उत्पित्सुसंज्ञके ॥ ४ | ब्रह्म अद्वितीय, एक, नित्य एवं सनातन है; केवल सृष्टि-रचनाके समय वह पुनः द्वैतभावको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ |
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यथाद्दीपस्तथोपाधेर्योगत्सञ्जायते द्विधा।<br>छायेवादर्शमध्ये वा प्रतिबिम्बं तथावयोः॥ ५ | जिस प्रकार एक ही दीपक उपाधिभेदसे दो प्रकारका दिखायी देता है अथवा दर्पणमें पड़ती हुई छाया दर्पणभेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है, उसी प्रकार मैं और ब्रह्म एक होते हुए भी उपाधिभेदसे अनेक हो जाते हैं॥ ५॥ |
| भेद उत्पत्तिकाले वै सर्गार्थं प्रभवत्यज।<br>दृश्यादृश्यविभेदोऽयं द्वैविध्ये सति सर्वथा॥ ६ | हे अज! जगत्का निर्माण करनेके लिये सृष्टिकालमें भेद दिखता ही है। तब दृश्यादृश्यकी प्रतीति होना अनिवार्य ही है; क्योंकि बिना दोके सृष्टि होना असम्भव है॥ ६॥ |
| नाहं स्त्री न पुमांश्चाहं न क्लीबं सर्गसंक्षये।<br>सर्गे सति विभेदः स्यात्कल्पितोऽयं धिया पुनः॥ ७ | सृष्टिके प्रलयकालमें मैं न स्त्री हूँ, न पुरुष हूँ और न ही नपुंसक हूँ। परंतु जब पुनः सृष्टि होने लगती है, तब पूर्ववत् यह भेद बुद्धिके द्वारा उत्पन्न हो जाता है॥ ७॥ |
| अहं बुद्धिरहं श्रीश्च धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा।<br>श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा॥ ८<br><br>कान्तिः शान्तिः पिपासा च निद्रा तन्द्रा जराजरा।<br>विद्याविद्या स्पृहा वाञ्छा शक्तिश्चाशक्तिरेव च॥ ९<br><br>वसा मज्जा च त्वक्चाहं दृष्टिर्वागनृतानृता।<br>परा मध्या च पश्यन्ती नाड्योऽहं विविधाश्च याः॥ १० | मैं ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वाञ्छा, शक्ति, अशक्ति, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि, सत्यासत्य वाणी, परा, मध्या, पश्यन्ती आदि वाणीके भेद और जो विभिन्न प्रकारकी नाड़ियाँ हैं—वह सब मैं ही हूँ॥ ८-१०॥ |
| किं नाहं पश्य संसारे मद्वियुक्तं किमस्ति हि।<br>सर्वमेवाहमित्येवं निश्चयं विद्धि पद्मज॥ ११ | हे पद्मयोने! आप यह देखिये कि इस संसारमें मैं क्या नहीं हूँ और मुझसे पृथक् कौन-सी वस्तु है? इसलिये आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि सब कुछ मैं ही हूँ॥ ११॥ |
| एतैर्मे निश्चितै रूपैर्विहीनं किं वदस्व मे।<br>तस्मादहं विधे चास्मिन्सर्गे वै वितताभवम्॥ १२ | हे विधे! मेरे इन निश्चित रूपोंके अतिरिक्त यदि कुछ हो तो मुझे बतायें, अतः इस सृष्टिमें सर्वत्र मैं ही व्याप्त हूँ॥ १२॥ |
| नूनं सर्वेषु देवेषु नानानामधरा ह्यहम्।<br>भवामि शक्तिरूपेण करोमि च पराक्रमम्॥ १३<br><br>गौरी ब्राह्मी तथा रौद्री वाराही वैष्णवी शिवा।<br>वारुणी चाथ कौबेरी नारसिंही च वासवी॥ १४<br><br>उत्पन्नेषु समस्तेषु कार्येषु प्रविशामि तान्।<br>करोमि सर्वकार्याणि निमित्तं तं विधाय वै॥ १५ | निश्चित ही मैं समस्त देवताओंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे विराजती हूँ तथा शक्तिरूपसे प्रकट होती हूँ और पराक्रम करती हूँ। मैं ही गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, कौबेरी, नारसिंही और वासवी शक्तिके रूपमें विद्यमान हूँ। सब कार्योंके उपस्थित होनेपर मैं उन देवताओंमें प्रविष्ट हो जाती हूँ और देवविशेषको निमित्त बनाकर सब कार्य सम्पन्न कर देती हूँ॥ १३-१५॥ |
| जले शीतं तथा वह्नावौष्ण्यं ज्योतिर्दिवाकरे।<br>निशानाथे हिमा कामं प्रभवामि यथा तथा॥ १६ | जलमें शीतलता, अग्निमें उष्णता, सूर्यमें प्रकाश और चन्द्रमामें ज्योत्स्नाके रूपमें मैं ही यथेच्छ प्रकट होती हूँ॥ १६॥ |
२६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मया त्यक्तं विधे नूनं स्पन्दितुं न क्षमं भवेत्।<br>जीवजातं च संसारे निश्चयोऽयं ब्रुवे त्वयि॥ १७<br><br>अशक्तः शङ्करो हन्तुं दैत्यान्किल मयोज्झितः।<br>शक्तिहीनं नरं ब्रूते लोकश्चैवातिदुर्बलम्॥ १८ | हे विधे! इस संसारका कोई भी जीव मुझसे रहित होकर स्पन्दन भी करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। यह मेरा निश्चय है। इसे मैं आपको बता दे रही हूँ। इसी प्रकार यदि मैं शिवको छोड़ दूँ तो वे शक्तिहीन होकर दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। इसीलिये तो संसारमें भी अत्यन्त दुर्बल पुरुषको लोग शक्तिहीन कहते हैं॥ १७-१८॥ |
| रुद्रहीनं विष्णुहीनं न वदन्ति जनाः किल।<br>शक्तिहीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम्॥ १९<br><br>पतितः स्खलितो भीतः शान्तः शत्रुवशं गतः।<br>अशक्तः प्रोच्यते लोके नारुद्रः कोऽपि कथ्यते॥ २० | लोग अधम मनुष्यको विष्णुहीन या रुद्रहीन नहीं कहते बल्कि उसे शक्तिहीन ही कहते हैं। जो गिर गया हो, स्खलित हो गया हो, भयभीत हो, निश्चेष्ट हो गया हो अथवा शत्रुके वशीभूत हो गया हो—वह संसारमें अरुद्र नहीं कहा जाता, अपितु अशक्त ही कहा जाता है॥ १९-२०॥ |
| तद्विद्धि कारणं शक्तिर्यथा त्वं च सिसृक्षसि।<br>भविता च यदा युक्तः शक्त्या कर्ता तदाखिलम्॥ २१ | [हे ब्रह्मन्!] आप ही जब सृष्टि करना चाहते हैं तब उसमें शक्ति ही कारण है, ऐसा जानिये। जब आप शक्तिसे युक्त होते हैं तभी सृष्टिकर्ता हो पाते हैं॥ २१॥ |
| तथा हरिस्तथा शम्भुस्तथेन्द्रोऽथ विभावसुः।<br>शशी सूर्यो यमस्त्वष्टा वरुणः पवनस्तथा॥ २२ | इसी प्रकार विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, यम, विश्वकर्मा, वरुण और वायुदेवता भी शक्ति-सम्पन्न होकर ही अपना-अपना कार्य सम्पादित करते हैं॥ २२॥ |
| धरा स्थिरा तदा धर्तुं शक्तियुक्ता यदा भवेत्।<br>अन्यथा चेदशक्ता स्यात्परमाणोश्च धारणे॥ २३<br><br>तथा शेषस्तथा कूर्मो येऽन्ये सर्वे च दिग्गजाः।<br>मद्युक्ता वै समर्थाश्च स्वानि कार्याणि साधितुम्॥ २४ | पृथ्वी भी जब शक्तिसे युक्त होती है, तब स्थिर होकर सबको धारण करनेमें समर्थ होती है। यदि वह शक्तिहीन हो जाय तो एक परमाणुको भी धारण करनेमें समर्थ न हो सकेगी। शेषनाग, कच्छप एवं दसों दिग्गज मेरी शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्य सम्पन्न करनेमें समर्थ हो पाते हैं॥ २३-२४॥ |
| जलं पिबामि सकलं संहरामि विभावसुम्।<br>पवनं स्तम्भयाम्यद्य यदिच्छामि तथाचरम्॥ २५ | यदि मैं चाहूँ तो सम्पूर्ण संसारका जल पी जाऊँ, अग्निको नष्ट कर दूँ और वायुकी गति रोक दूँ; मैं जैसा चाहती हूँ, वैसा करती हूँ॥ २५॥ |
| तत्त्वानां चैव सर्वेषां कदापि कमलोद्भव।<br>असतां भावसन्देहः कर्तव्यो न कदाचन॥ २६<br><br>कदाचित्प्रागभावः स्यात्प्रध्वंसाभाव एव वा।<br>मृत्पिण्डेषु कपालेषु घटाभावो यथा तथा॥ २७ | हे कमलोद्भव! सभी तत्त्वोंके अभावका सन्देह अब आप कभी न कीजिये; क्योंकि कभी-कभी किसी वस्तुविशेषका प्रागभाव (जिसका आदि न हो, पर अन्त हो) तथा प्रध्वंसाभाव (जिसका आदि हो, किंतु अन्त न हो) उसी प्रकार हो जाता है, जिस प्रकार मिट्टीके पिण्डोंमें और कपालोंमें घटाभाव प्रतीत होता है॥ २६-२७॥ |
अ० ६ ] तृतीय स्कन्ध २६९
अ० ६ ] तृतीय स्कन्ध २६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अद्यात्र पृथिवी नास्ति क्व गतेति विचारणे।<br>सञ्जाता इति विज्ञेया अस्यास्तु परमाणवः॥ २८ | आज यहाँ पृथ्वी नहीं है, तब वह कहाँ चली गयी ? इसपर विचार करनेपर वह पृथ्वी परमाणुरूपसे विद्यमान तो है ही—ऐसा जानना चाहिये॥ २८॥ |
| शाश्वतं क्षणिकं शून्यं नित्यानित्यं सकर्तृकम्।<br>अहंकाराग्रिमञ्चैव सप्तभेदैर्विवक्षितम्॥ २९<br>गृहाणाज महत्तत्त्वमहङ्कारस्तदुद्भवः।<br>ततः सर्वाणि भूतानि रचयस्व यथा पुरा॥ ३० | शाश्वत, क्षणिक, शून्य, नित्य, अनित्य, सकर्तृक और अहंकार—इन सात भेदोंमें सृष्टिका वर्णन विवक्षित है। इसलिये हे अज! अब आप उस महत्तत्त्वको ग्रहण कीजिये, जिससे अहंकारकी उत्पत्ति होती है। तत्पश्चात् आप पूर्वकी भाँति समस्त प्राणियोंकी रचना कीजिये॥ २९-३०॥ |
| व्रजन्तु स्वानि धिष्ण्यानि विरच्य निवसन्तु वः।<br>स्वानि स्वानि च कार्याणि कुर्वन्तु दैवभाविताः॥ ३१ | अब आपलोग जाइये तथा अपने-अपने लोकोंकी रचना करके निवास कीजिये और दैवका चिन्तन करते हुए अपने-अपने कार्य कीजिये॥ ३१॥ |
| गृहाणेमां विधे शक्तिं सुरूपां चारुहासिनीम्।<br>महासरस्वतीं नाम्ना रजोगुणयुतां वराम्॥ ३२<br>श्वेताम्बरधरां दिव्यां दिव्यभूषणभूषिताम्।<br>वरासनसमारूढां क्रीडार्थं सहचारिणीम्॥ ३३ | हे विधे! सुन्दर रूपवाली, दिव्य हासवाली, रजोगुणसे युक्त, श्रेष्ठ श्वेत वस्त्र धारण करनेवाली, अलौकिक, दिव्याभूषणोंसे विभूषित, उत्तम आसनपर विराजमान इस महासरस्वती नामक शक्तिको क्रीडाविहारके लिये अपनी सहचरीके रूपमें स्वीकार कीजिये॥ ३२-३३॥ |
| एषा सहचरी नित्यं भविष्यति वराङ्गना।<br>मावमंस्था विभूतिं मे मत्वा पूज्यतमां प्रियाम्॥ ३४<br>गच्छ त्वमनया सार्धं सत्यलोकं बताशु वै।<br>बीजाच्चतुर्विधं सर्वं समुत्पादय साम्प्रतम्॥ ३५ | यह सुन्दरी सदा आपकी सहचरी बनकर रहेगी। इस पूज्यतम प्रेयसीको मेरी विभूति समझकर कभी भी इसका तिरस्कार न कीजियेगा। अब आप शीघ्र ही इसे साथ लेकर सत्यलोकमें प्रस्थान करें और तत्त्वबीजसे चार प्रकारकी समस्त सृष्टि करनेमें तत्पर हो जायँ॥ ३४-३५॥ |
| लिङ्गकोशाश्च जीवैस्तैः सहिताः कर्मभिस्तथा।<br>वर्तन्ते संस्थिताः काले तान्कुरु त्वं यथा पुरा॥ ३६<br>कालकर्मस्वभावाख्यैः कारणैः सकलं जगत्।<br>स्वभावस्वगुणैर्युक्तं पूर्ववत्सचराचरम्॥ ३७ | समस्त जीवों और कर्मोंके साथ जो लिंगकोश हैं, उन्हें पूर्वकी भाँति आप प्रतिष्ठित कर दें। काल, कर्म और स्वभाव नामवाले—इन कारणोंसे समस्त चराचर सृष्टिको पूर्वकी भाँति अपने-अपने स्वभाव और गुणोंसे युक्त कर दीजिये॥ ३६-३७॥ |
| माननीयस्त्वया विष्णुः पूजनीयश्च सर्वदा।<br>सत्त्वगुणप्रधानत्वादधिकः सर्वतः सदा॥ ३८ | विष्णु आपके सदा माननीय और पूजनीय हैं; क्योंकि सत्त्वगुणकी प्रधानताके कारण वे सर्वदा सब प्रकारसे श्रेष्ठ हैं॥ ३८॥ |
| यदा यदा हि कार्यं वो भविष्यति दुरत्ययम्।<br>करिष्यति पृथिव्यां वै अवतारं तदा हरिः॥ ३९ | जब-जब आपलोगोंका कोई कठिन कार्य उपस्थित होगा, उस समय भगवान् श्रीहरि पृथ्वीपर अवतार ग्रहण करेंगे॥ ३९॥ |
| तिर्यग्योनावथान्यात्र मानुषीं तनुमाश्रितः।<br>दानवानां विनाशं वै करिष्यति जनार्दनः॥ ४० | कहीं तिर्यक्-योनिमें तथा कहीं मानवयोनिमें शरीर धारण करके ये भगवान् जनार्दन दानवोंका अवश्य विनाश करेंगे॥ ४०॥ |
| २७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भवोऽयं ते सहायश्च भविष्यति महाबलः।<br>समुत्पाद्य सुरान्सर्वान्विहरस्व यथासुखम्॥ ४१ | ये महाबली शंकरजी भी आपकी सहायता करेंगे। अब आप समस्त देवताओंका सृजन करके स्वेच्छया सुखपूर्वक विहार कीजिये॥ ४१॥ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या नानायज्ञैः सदक्षिणैः।<br>यजिष्यन्ति विधानेन सर्वान्वः सुसमाहिताः॥ ४२ | ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यलोग दक्षिणायुक्त नानाविध यज्ञोंसे विधिपूर्वक पूर्ण मनोयोगके साथ आप सबकी पूजा करेंगे॥ ४२॥ |
| मन्नामोच्चारणात्सर्वे मखेषु सकलेषु च।<br>सदा तृप्ताश्च सन्तुष्टा भविष्यध्वं सुराः किल॥ ४३ | हे देवो! सभी यज्ञोंमें मेरे नामका उच्चारण करते ही आप सभी लोग निश्चितरूपसे सदैव तृप्त एवं सन्तुष्ट हो जायँगे॥ ४३॥ |
| शिवश्च माननीयो वै सर्वथा यत्ततोगुणः।<br>यज्ञकार्येषु सर्वेषु पूजनीयः प्रयत्नतः॥ ४४ | आपलोग तमोगुणसम्पन्न शंकरजीका सब प्रकारसे सम्मान कीजियेगा और सभी यज्ञकार्योंमें प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा कीजियेगा॥ ४४॥ |
| यदा पुनः सुराणां वै भयं दैत्याद्भविष्यति।<br>शक्तयो मे तदोत्पन्ना हरिष्यन्ति सुविग्रहाः॥ ४५<br><br>वाराही वैष्णवी गौरी नारसिंही सदाशिवा।<br>एताश्चान्याश्च कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव॥ ४६ | जब कभी भी देवताओंके समक्ष दैत्योंसे भय उत्पन्न होगा, उस समय सुन्दर रूपोंवाली वाराही, वैष्णवी, गौरी, नारसिंही, सदाशिवा तथा अन्य देवियोंके रूपमें मेरी शक्तियाँ प्रकट होकर उनका भय दूर कर देंगी। अतः हे कमलोद्भव! अब आप अपने कार्य करें॥ ४५-४६॥ |
| नवाक्षरमिमं मन्त्रं बीजध्यानयुतं सदा।<br>जपन्सर्वाणि कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव॥ ४७ | हे कमलोद्भव! बीज तथा ध्यानसे युक्त मेरे इस नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए आप समस्त कार्य कीजिये॥ ४७॥ |
| मन्त्राणामुत्तमोऽयं वै त्वं जानीहि महामते।<br>हृदये ते सदा धार्यः सर्वकामार्थसिद्धये॥ ४८ | हे महामते! आप इस मन्त्रको सभी मन्त्रोंसे श्रेष्ठ जानिये। सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आपको इस मन्त्रको सदा अपने हृदयमें धारण करना चाहिये॥ ४८॥ |
| इत्युक्त्वा मां जगन्माता हरिं प्राह शुचिस्मिता।<br>विष्णो व्रज गृहाणेमां महालक्ष्मीं मनोहराम्॥ ४९ | मुझसे ऐसा कहकर पवित्र मुसकानवाली जगज्जननीने भगवान् विष्णुसे कहा—हे विष्णो! अब आप इन मनोहर महालक्ष्मीको स्वीकार कीजिये और यहाँसे प्रस्थान कीजिये॥ ४९॥ |
| सदा वक्षःस्थले स्थाने भविता नात्र संशयः।<br>क्रीडार्थं ते मया दत्ता शक्तिः सर्वार्थदा शिवा॥ ५० | ये आपके वक्षःस्थलमें सदा निवास करेंगी, इसमें सन्देह नहीं है। आपके लीलाविनोदके लिये मैंने आपको यह सभी मनोरथ प्रदान करनेवाली कल्याणमयी शक्ति अर्पित की है॥ ५०॥ |
| त्वयेयं नावमन्तव्या माननीया च सर्वदा।<br>लक्ष्मीनारायणाख्योऽयं योगो वै विहितो मया॥ ५१ | आप इनका सर्वदा सम्मान करते रहियेगा और कभी भी तिरस्कार न कीजियेगा। लक्ष्मीनारायण नामक यह संयोग मेरे द्वारा ही रचा गया है॥ ५१॥ |
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जीवनार्थं कृता यज्ञा देवानां सर्वथा मया।<br>अविरोधेन सङ्गेन वर्तितव्यं त्रिभिः सदा॥ ५२ | मैंने देवताओंकी जीविकाके लिये ही यज्ञोंकी रचना की है। आप तीनों विरोधभावनासे रहित होकर व्यवहार कीजिये॥ ५२॥ |
| त्वं च वेधाः शिवस्त्वेते देवा मद्गुणसम्भवाः।<br>मान्याः पूज्याश्च सर्वेषां भविष्यन्ति न संशयः॥ ५३ | आप (विष्णु), ब्रह्मा, शिव तथा ये सभी देवता मेरे ही प्रभावसे प्रादुर्भूत हुए हैं। अतएव निस्सन्देह आपलोग सभी प्राणियोंके मान्य एवं पूज्य होंगे॥ ५३॥ |
| ये विभेदं करिष्यन्ति मानवा मूढचेतसः।<br>निरयं ते गमिष्यन्ति विभेदान्नात्र संशयः॥ ५४ | जो अज्ञानी मनुष्य इनमें भेदभाव करेंगे, वे इस विभेदके कारण नरकमें पड़ेंगे। इसमें सन्देह नहीं है॥ ५४॥ |
| यो हरिः स शिवः साक्षाद्यः शिवः स स्वयं हरिः।<br>एतयोर्भेदमातिष्ठन्नरकाय भवेन्नरः॥ ५५ | जो विष्णु हैं, वे ही साक्षात् शिव हैं और जो शिव हैं, वे ही स्वयं विष्णु हैं। इन दोनोंमें भेद रखनेवाला मनुष्य नरकगामी होता है॥ ५५॥ |
| तथैव द्रुहिणो ज्ञेयो नात्र कार्या विचारणा।<br>अपरो गुणभेदोऽस्ति शृणु विष्णो ब्रवीमि ते॥ ५६ | ब्रह्माजीके सम्बन्धमें भी ऐसा ही जानिये; इसमें कोई सन्देह नहीं है। हे विष्णो! गुणोंके कारण इनमें जो भेद हैं; उन्हें आपको बता रही हूँ, आप सुनें॥ ५६॥ |
| मुख्यः सत्त्वगुणस्तेऽस्तु परमात्मविचिन्तने।<br>गौणत्वेऽपि परौ ख्यातौ रजोगुणतमोगुणौ॥ ५७<br><br>लक्ष्म्या सह विकारेषु नानाभेदेषु सर्वदा।<br>रजोगुणयुतो भूत्वा विहरस्वानया सह॥ ५८ | परमात्म-चिन्तनकी दृष्टिसे आपका मुख्य गुण सत्त्वगुण है। दूसरे रजोगुण तथा तमोगुण आपके लिये गौण हैं। अतएव विभिन्न भेदयुक्त विकारोंमें रजोगुणसे सम्पन्न होकर आप इन लक्ष्मीके साथ विहार कीजिये॥ ५७-५८॥ |
| वाग्बीजं कामराजं च मायाबीजं तृतीयकम्।<br>मन्त्रोऽयं त्वं रमाकान्त मद्दत्तः परमार्थदः॥ ५९<br><br>गृहीत्वा जप तं नित्यं विहरस्व यथासुखम्।<br>न ते मृत्युभयं विष्णो न कालप्रभवं भयम्॥ ६० | हे लक्ष्मीकान्त! मेरे द्वारा आपको दिया गया वाग्बीज (ऐं), कामराज (क्लीं) तथा तृतीय मायाबीज (ह्रीं) इनसे युक्त यह मन्त्र परमार्थ प्रदान करनेवाला है। आप इसे ग्रहण करके निरन्तर इसका जप कीजिये तथा सुखपूर्वक विहार कीजिये। हे विष्णो! ऐसा करनेसे आपको न तो मृत्युभय होगा और न कालजनित भय ही होगा॥ ५९-६०॥ |
| यावदेष विहारो मे भविष्यति सुनिश्चितः।<br>संहरिष्याम्यहं सर्वं यदा विश्वं चराचरम्॥ ६१<br><br>भवन्तोऽपि तदा नूनं मयि लीना भविष्यथ।<br>स्मर्तव्योऽयं सदा मन्त्रः कामदो मोक्षदस्तथा॥ ६२ | जबतक मैं विहार करती रहूँगी, तबतक यह सृष्टि निश्चितरूपसे रहेगी और जब मैं सम्पूर्ण चराचर जगत्का संहार कर दूँगी, उस समय आपलोग भी मुझमें समाहित हो जायँगे। आपलोग समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले इस मन्त्रका अनवरत स्मरण करते रहें॥ ६१-६२॥ |
| उद्गीथेन च संयुक्तः कर्तव्यः शुभमिच्छता।<br>कारयित्वाथ वैकुण्ठं वस्तव्यं पुरुषोत्तम॥ ६३<br><br>विहरस्व यथाकामं चिन्तयन्मां सनातनीम्। | अपना कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिको इस मन्त्रके साथ 'ओंकार' जोड़कर चतुरक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये। हे पुरुषोत्तम! अब आप वैकुण्ठका निर्माण कराकर उसीमें निवास कीजिये और मुझ सनातनीका सतत ध्यान करते हुए इच्छापूर्वक विहार कीजिये॥ ६३ ½ ॥ |
| २७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा वासुदेवं सा त्रिगुणा प्रकृतिः परा ॥ ६४<br>निर्गुणा शङ्करं देवमवोचदमृतं वचः । | ब्रह्माजी बोले—[हे नारद!] विष्णुसे ऐसा कहकर उस त्रिगुणात्मिका तथा निर्गुणा परा प्रकृतिने देवाधिदेव शंकरसे अमृतमय वचन कहा ॥ ६४ १/२ ॥ |
| देव्युवाच<br>गृहाण हर गौरीं त्वं महाकालीं मनोहराम् ॥ ६५<br>कैलासं कारयित्वा च विहरस्व यथासुखम्।<br>मुख्यस्तमोगुणस्तेऽस्तु गौणौ सत्त्वरजोगुणौ ॥ ६६ | **देवी बोलीं—**हे हर ! आप इन मनोहरा महाकाली गौरीको अंगीकार कीजिये और कैलासशिखरकी रचना कराकर वहाँ सुखपूर्वक विहार कीजिये। तमोगुण आपमें प्रधानगुणके रूपमें विद्यमान रहेगा और सत्त्वगुण तथा रजोगुण आपमें गौणरूपसे व्याप्त रहेंगे ॥ ६५-६६ ॥ |
| विहरासुरनाशार्थं रजोगुणतमोगुणौ।<br>तपस्तप्तं तथा कर्तुं स्मरणं परमात्मनः ॥ ६७<br>शर्व सत्त्वगुणः शान्तो गृहीतव्यः सदानघ।<br>सर्वथा त्रिगुणा यूयं सृष्टिस्थित्यन्तकारकाः ॥ ६८ | रजोगुण और तमोगुणके द्वारा दैत्योंके विनाशके लिये आप वहाँ विहार करें और हे शर्व ! परमात्माका स्मरण-ध्यान करनेके लिये आप तप कर चुके हैं। आप शान्तिप्रधान सत्त्वगुणका अवलम्बन कीजिये। हे अनघ ! त्रिगुणात्मक आप तीनों देवता सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाले हैं ॥ ६७-६८ ॥ |
| एभिर्विहीनं संसारे वस्तु नैवात्र कुत्रचित्।<br>वस्तुमात्रं तु यद् दृश्यं संसारे त्रिगुणं हि तत् ॥ ६९ | संसारमें कहीं भी कोई भी वस्तु इन तीनों गुणोंसे रहित नहीं है। जगत्की जितनी भी दृश्य वस्तुएँ हैं, वे सब त्रिगुणात्मिका हैं ॥ ६९ ॥ |
| दृश्यं च निर्गुणं लोके न भूतं नो भविष्यति।<br>निर्गुणः परमात्मासौ न तु दृश्यः कदाचन ॥ ७० | इस संसारमें ऐसी कोई भी दृश्य वस्तु गुणरहित न तो हुई और न होगी। निर्गुण तो एकमात्र वह परमात्मा ही है और वह कभी दृष्टिगोचर नहीं होता ॥ ७० ॥ |
| सगुणा निर्गुणा चाहं समये शङ्करोत्तमा।<br>सदाहं कारणं शम्भो न च कार्यं कदाचन ॥ ७१ | हे शंकर ! समय आनेपर मैं श्रेष्ठरूपा ही वह सगुणा या निर्गुणा हो जाती हूँ। हे शम्भो ! मैं सर्वदा कारण हूँ, कार्य कभी नहीं ॥ ७१ ॥ |
| सगुणा कारणत्वाद्धै निर्गुणा पुरुषान्तिकै।<br>महत्तत्त्वमहङ्कारो गुणाः शब्दादयस्तथा ॥ ७२<br>कार्यकारणरूपेण संसरन्ते त्वहर्निशम्।<br>सदुद्भूतस्त्वहङ्कारस्तेनाहं कारणं शिवा ॥ ७३ | किसी कारणविशेषसे मैं सगुणा होती हूँ तो उस परमपुरुषके सांनिध्यमें निर्गुणा रहती हूँ। महत्तत्त्व, अहंकार, तीनों गुण और शब्द आदि विषय कार्यकारणभावसे निरन्तर गतिशील रहते हैं। सत्से अहंकार उत्पन्न होता है; इसीलिये मैं शिवा सबका कारण हूँ ॥ ७२-७३ ॥ |
| अहङ्कारश्च मे कार्यं त्रिगुणोऽसौ प्रतिष्ठितः।<br>अहङ्कारान्महत्तत्त्वं बुद्धिः सा परिकीर्तिता ॥ ७४ | अहंकार मेरा कार्य है और वह त्रिगुणात्मक रूपमें प्रतिष्ठित है। उस अहंकारसे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है; उसीको बुद्धि कहा गया है ॥ ७४ ॥ |
| महत्तत्त्वं हि कार्यं स्यादहङ्कारो हि कारणम्।<br>तन्मात्राणि त्वहङ्कारादुत्पद्यन्ते सदैव हि ॥ ७५ | वह महत्तत्त्व कार्य है तथा अहंकार उसका कारण है। इसी अहंकारसे तन्मात्राओंकी सदा |
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २७३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कारणं पञ्चभूतानां तानि सर्वसमुद्भवे।<br>कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि च॥ ७६<br><br>महाभूतानि पञ्चैव मनः षोडशमेव च।<br>कार्यञ्च कारणञ्चैव गणोऽयं षोडशात्मकः॥ ७७ | उत्पत्ति होती है। वे तन्मात्राएँ [पृथ्वी, जल आदि] पंचमहाभूतोंका कारण हैं। सबके सृजनमें पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और सोलहवाँ मन—यह षोडशात्मक समूह कार्य और कारणरूप होता है॥ ७५–७७॥ |
| परमात्मा पुमानाद्यो न कार्यं न च कारणम्।<br>एवं समुद्भवः शम्भो सर्वेषामादिसम्भवे॥ ७८ | वह आदिपुरुष परमात्मा न कार्य है और न कारण। हे शिव! सबकी प्रारम्भिक सृष्टिके उत्पत्तिका यही क्रम है॥ ७८॥ |
| संक्षेपेण मया प्रोक्तस्तव तत्र समुद्भवः।<br>व्रजन्त्वद्य विमानेन कार्यार्थं मम सत्तमाः॥ ७९ | अभी मैंने आपलोगोंकी यह उत्पत्ति-परम्परा संक्षेपमें कही। इसलिये हे श्रेष्ठदेव! अब आपलोग मेरा कार्य सम्पन्न करनेके लिये इस विमानसे प्रस्थान करें॥ ७९॥ |
| स्मरणाद्दर्शनं तुभ्यं दास्येऽहं विषमे स्थिते।<br>स्मर्त्तव्याहं सदा देवाः परमात्मा सनातनः॥ ८०<br><br>उभयोः स्मरणादेव कार्यसिद्धिरसंशयम्। | जब आपलोगोंपर कोई संकट आयेगा, तब मैं स्मरणमात्रसे तत्काल आपलोगोंको दर्शन दूँगी। अतः हे देवो! आपलोग सर्वदा मेरा तथा सनातन परमात्माका स्मरण करते रहें। हम दोनोंके स्मरणसे ही निःसन्देह आपलोगोंकी कार्यसिद्धि होगी॥ ८० १/२॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा विससर्जास्मान्दत्त्वा शक्तीः सुसंस्कृताः॥ ८१<br>विष्णोवेऽथ महालक्ष्मीं महाकालीं शिवाय च।<br><br>महासरस्वतीं मह्यं स्थानात्तस्माद्विसर्जिताः॥ ८२ | ब्रह्माजी बोले—हे नारद! ऐसा कहकर भगवतीने अपनी अद्भुत शक्तियाँ प्रदानकर हमें विदा किया। विष्णुको महालक्ष्मी, शिवको महाकाली और मुझे महासरस्वती प्रदान करके उस स्थानसे विदा कर दिया॥ ८१-८२॥ |
| स्थलान्तरं समासाद्य ते जाताः पुरुषा वयम्।<br>चिन्तयन्तः स्वरूपं तत्प्रभावं परमाद्भुतम्॥ ८३ | उनके स्वरूप तथा अत्यन्त अद्भुत प्रभावका स्मरण करते हुए अन्य स्थानपर पहुँचकर हमलोग पुनः पुरुषरूपमें हो गये॥ ८३॥ |
| विमानं तत्समासाद्य संरूढास्तत्र वै त्रयः।<br>न द्वीपोऽसौ न सा देवी सुधासिन्धुस्तथैव च।<br>पुनर्दृष्टं विमानं वै तत्रास्माभिर्न चान्यथा॥ ८४ | तब लौटकर हम तीनों पुनः उसी विमानमें बैठ गये। [हमने देखा कि] वहाँ न तो वह मणिद्वीप है, न वे महामाया हैं और न वह सुधासागर है। उस समय वहाँ उस विमानके अतिरिक्त और कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता था॥ ८४॥ |
| आसाद्य तस्मिन्वितते विमाने<br>प्राप्ता वयं पङ्कजसन्निधौ च।<br>महार्णवे यत्र हतौ दुरत्ययौ<br>मुरारिणा तौ मधुकैटभाख्यौ॥ ८५ | उस विशाल विमानमें बैठकर हम तीनों पुनः उसी महासागरमें विद्यमान उस कमलके निकट पहुँचे, जहाँ भगवान् विष्णुने मधु-कैटभ नामक दुर्धर्ष दैत्योंका वध किया था॥ ८५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
ब्रह्मणे श्रीदेव्या उपदेशवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
| २७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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अथ सप्तमोऽध्यायः
ब्रह्माजीके द्वारा परमात्माके स्थूल और सूक्ष्म स्वरूपका वर्णन; सात्त्विक, राजस और तामस शक्तिका वर्णन; पंचतन्मात्राओं, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा पंचीकरण-क्रियाद्वारा सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन
| ब्रहोवाच<br>एवंप्रभावा सा देवी मया दृष्टाथ विष्णुना।<br>शिवेनापि महाभाग तास्ता देव्यः पृथक्पृथक् ॥ १ | ब्रह्माजी बोले—हे महाभाग! [नारद!] मैंने, विष्णु तथा शंकरने इस प्रकारके प्रभाववाली उन देवीको तथा अन्य सभी देवियोंको पृथक्-पृथक् देखा॥ १ ॥ |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य पितुर्वाक्यं नारदो मुनिसत्तमः।<br>पप्रच्छ परमप्रीतः प्रजापतिमिदं वचः॥ २ | व्यासजी बोले—पिताका यह वचन सुनकर मुनिवर नारदने परम प्रसन्न होकर प्रजापति ब्रह्माजीसे यह बात पूछी॥ २ ॥ |
| नारद उवाच<br>पुमानाद्योऽविनाशी यो निर्गुणोऽच्युतिरव्ययः।<br>दृष्टश्चैवानुभूतश्च तद्वदस्व पितामह॥ ३ | नारदजी बोले—हे पितामह! आपने जिन आदि, अविनाशी, निर्गुण, अच्युत तथा अव्यय परमपुरुषका दर्शन तथा अनुभव किया, उनके विषयमें बताइये॥ ३ ॥ |
| त्रिगुणा वीक्षिता शक्तिर्निर्गुणा कीदृशी पितः।<br>तस्याः स्वरूपं मे ब्रूहि पुरुषस्य च पद्मज॥ ४ | हे पिताजी! आपने त्रिगुणसम्पन्ना देवीका दर्शन तो कर लिया है; निर्गुणा शक्ति कैसी होती हैं? हे कमलोद्भव! अब आप मुझे उन शक्तिका तथा परमपुरुषका स्वरूप बताइये॥ ४ ॥ |
| यदर्थञ्च मया तप्तं श्वेतद्वीपे महातपः।<br>दृष्टाः सिद्धा महात्मानस्तापसा गतमन्यवः॥ ५<br><br>परमात्मा न सम्प्राप्तो मयासौ दृष्टिगोचरः।<br>पुनः पुनस्तपस्तीव्रं कृतं तत्र प्रजापते॥ ६ | जिनके लिये मैंने श्वेतद्वीपमें महान् तपश्चर्या की और क्रोधशून्य सिद्धपुरुषों, महात्माओं तथा तपस्वियोंके दर्शन किये; वे परमात्मा मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुए। हे प्रजापते! इसके बाद भी [उनके दर्शनार्थ] मैंने वहाँ बार-बार घोर तपस्या की॥ ५-६ ॥ |
| भवता सगुणा शक्तिर्दृष्टा तात मनोरमा।<br>निर्गुणा निर्गुणश्चैव कीदृशौ तौ वदस्व मे॥ ७ | हे तात! आपने मनोरमा सगुणा शक्तिका दर्शन किया है। आप मुझे बताइये कि निर्गुणा शक्ति और निर्गुण परमात्मा कैसे हैं?॥ ७ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति पृष्टः पिता तेन नारदेन प्रजापतिः।<br>उवाच वचनं तथ्यं स्मितपूर्वं पितामहः॥ ८ | व्यासजी बोले—नारदजीने अपने पिता प्रजापति ब्रह्मासे ऐसा पूछा, तब उन पितामहने मुसकराते हुए रहस्यपूर्ण वचन कहा॥ ८ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>निर्गुणस्य मुने रूपं न भवेद् दृष्टिगोचरम्।<br>दृश्यञ्च नश्वरं यस्मादरूपं दृश्यते कथम्॥ ९ | ब्रह्माजी बोले—हे मुने! निर्गुणतत्त्वका रूप दृष्टिगोचर नहीं हो सकता; क्योंकि जो दिखायी पड़ता है, वह तो नाशवान् होता है। जो रूपरहित है, वह दृष्टिगोचर कैसे हो सकता है?॥ ९ ॥ |
| अ० ७ ] | तृतीय स्कन्ध | २७५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| निर्गुणा दुर्गमा शक्तिर्निर्गुणश्च तथा पुमान्।<br>ज्ञानगम्यौ मुनीनां तु भावनीयौ तथा पुनः॥ १० | निर्गुणा शक्तिको जान पाना अत्यन्त दुरूह है और उसी प्रकार निर्गुण परमपुरुषका साक्षात्कार भी अति दुष्कर है। ये दोनों केवल मुनिजनोंके द्वारा ज्ञानसे प्राप्त तथा अनुभूत किये जा सकते हैं॥ १०॥ |
| अनादिनिधनौ विद्धि सदा प्रकृतिपूरुषौ।<br>विश्वासेनाभिगम्यौ तौ नाविश्वासेन कर्हिचित्॥ ११ | आप प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको आदि-अन्तसे सर्वदा रहित जानिये। ये दोनों विश्वाससे जाने जा सकते हैं; अविश्वाससे कभी नहीं॥ ११॥ |
| चैतन्यं सर्वभूतेषु यत्तद्विद्धि परात्मकम्।<br>तेजः सर्वत्रगं नित्यं नानाभावेषु नारद॥ १२ | हे नारद! सभी प्राणियोंमें जो चैतन्य विद्यमान है, उसे ही परमात्मस्वरूप जानो। तेजःस्वरूप वे परमात्मा सर्वत्र व्याप्त हैं तथा सदा विराजमान हैं॥ १२॥ |
| तञ्च ताञ्च महाभाग व्यापकौ विद्धि सर्वगौ।<br>ताभ्यां विहीनं संसारे न किञ्चिद्वस्तु विद्यते॥ १३ | हे महाभाग! उन परमपुरुष तथा प्रकृतिको सर्वव्यापी तथा सर्वगामी समझिये। इस संसारमें कोई भी पदार्थ उन दोनोंसे रहित नहीं है॥ १३॥ |
| तौ विचिन्त्यौ सदा देहे मिश्रीभूतौ सदाव्ययौ।<br>एकरूपौ चिदात्मानौ निर्गुणौ निर्मलावुभौ॥ १४ | सर्वदा अव्यय, एकरूप, चिदात्मा, निर्गुण तथा निर्मल—उन दोनों (प्रकृति-पुरुष)-को एक ही शरीरमें सम्मिश्रित मानकर सदा इनका चिन्तन करना चाहिये॥ १४॥ |
| या शक्तिः परमात्मासौ योऽसौ सा परमा मता।<br>अन्तरं नैतयोः कोऽपि सूक्ष्मं वेद च नारद॥ १५ | हे नारद! जो शक्ति हैं, वे ही परमात्मा हैं और जो परमात्मा हैं, वे ही परमशक्ति मानी गयी हैं। इन दोनोंमें विद्यमान सूक्ष्म अन्तरको कोई भी नहीं जान सकता॥ १५॥ |
| अधीत्य सर्वशास्त्राणि वेदान्साङ्गांश्च नारद।<br>न जानाति तयोः सूक्ष्ममन्तरं विरतिं विना॥ १६ | हे नारद! कोई भी व्यक्ति समस्त शास्त्रों तथा अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन करके भी विरक्तिके बिना उन दोनोंके सूक्ष्म अन्तरको नहीं जान पाता है॥ १६॥ |
| अहङ्कारकृतं सर्वं विश्वं स्थावरजङ्गमम्।<br>कथं तद्रहितं पुत्र भवेत्कल्पशतैरपि॥ १७ | हे पुत्र! जड-चेतनरूप यह सारा जगत् अहंकारसे निर्मित है; ऐसी स्थितिमें सैकड़ों कल्पोंमें भी यह अहंकारसे रहित कैसे हो सकता है?॥ १७॥ |
| निर्गुणं सगुणः पुत्र कथं पश्यति चक्षुषा।<br>सगुणं च महाबुद्धे चेतसा संविचारय॥ १८ | हे पुत्र! सगुण मनुष्य निर्गुणको नेत्रसे कैसे देख सकता है? अतः हे महाबुद्धे! उन परमात्माके सगुण रूपका मनसे सम्यक् ध्यान करते रहो॥ १८॥ |
| पित्तेनाच्छादिता जिह्वा चक्षुश्च मुनिसत्तम।<br>कटु पित्तं विजानाति रसं रूपं न तत्तथा॥ १९ | हे मुनिश्रेष्ठ! पित्तसे आच्छादित जिह्वा जिस प्रकार यथार्थ रसका अनुभव न करके केवल कटुरसका अनुभव करती है तथा पित्ताच्छादित नेत्र यथार्थ रूप न देखकर केवल पीले रंगको ही देखता है, उसी प्रकार |
| गुणैः समावृतं चेतः कथं जानाति निर्गुणम्।<br>अहङ्कारोद्भवं तच्च तद्विहीनं कथं भवेत्॥ २० | गुणोंसे आच्छादित मन उस निर्गुण परमात्माको कैसे जान पायेगा? क्योंकि मन भी तो अहंकारसे उत्पन्न हुआ है, तब वह मन अहंकारसे रहित कैसे |
| २७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यावन्न गुणविच्छेदस्तावत्तद्दर्शनं कुतः।<br>तं पश्यति तदा चित्ते यदाहङ्कारवर्जितः॥ २१ | हो सकता है ? जबतक अन्तःकरण गुणोंसे रहित नहीं होता तबतक परमात्माका दर्शन कैसे सम्भव है ? जब मनुष्य अहंकारविहीन हो जाता है, तब वह अपने हृदयमें उनका साक्षात्कार कर लेता है॥ १९—२१॥ |
| नारद उवाच<br>स्वरूपं देवदेवेश त्रयाणामेव विस्तरात्।<br>गुणानां यत्स्वरूपोऽस्ति ह्यहङ्कारस्त्रिरूपकः॥ २२<br>सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च तथापरः।<br>विभेदेन स्वरूपाणि वदस्व पुरुषोत्तम॥ २३<br>यज्ज्ञात्वा विप्रमुच्येऽहं ज्ञानं तद्वद मे प्रभो।<br>गुणानां लक्षणान्येव विततानि विभागशः॥ २४ | **नारदजी बोले—**हे देवदेवेश! तीनों गुणोंका जो स्वरूप है, उसका विस्तारपूर्वक विवेचन कीजिये और त्रिगुणात्मक अहंकारके स्वरूपका भी वर्णन कीजिये। हे पुरुषोत्तम! सात्त्विक, राजस तथा तीसरे तामस अहंकारके स्वरूप-भेदको बताइये। इस प्रकार गुणोंके विस्तृत लक्षणोंको विभागपूर्वक मुझको बताइये। हे प्रभो! मुझे ऐसा ज्ञान दीजिये जिसे जानकर मैं पूर्णरूपेण मुक्त हो जाऊँ॥ २२—२४॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>त्रयाणां शक्तयस्तिस्रस्तद् ब्रवीमि तवानघ।<br>ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिरर्थशक्तिस्तथापरा॥ २५ | **ब्रह्माजी बोले—**हे निष्पाप! इस त्रिविध अहंकारकी तीन शक्तियाँ हैं, मैं उन्हें बताता हूँ। वे हैं—ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति तथा तीसरी अर्थशक्ति॥ २५॥ |
| सात्त्विकस्य ज्ञानशक्ती राजसस्य क्रियात्मिका।<br>द्रव्यशक्तिस्तामसस्य तिस्रश्च कथितास्तव॥ २६ | उनमें सात्त्विक अहंकारकी ज्ञानशक्ति, राजसकी क्रियाशक्ति और तामसकी द्रव्यशक्ति—ये तीन शक्तियाँ आपको बता दीं॥ २६॥ |
| तेषां कार्याणि वक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः।<br>तामस्या द्रव्यशक्तेश्च शब्दस्पर्शसमुद्भवः॥ २७<br>रूपं रसश्च गन्धश्च तन्मात्राणि प्रचक्षते।<br>शब्दैकगुणमाकाशं वायुः स्पर्शगुणस्तथा॥ २८<br>सुरूपैकगुणोऽग्निश्च जलं रसगुणात्मकम्।<br>पृथ्वी गन्धगुणा ज्ञेया सूक्ष्माण्येतानि नारद॥ २९ | हे नारद! अब मैं उनके कार्योंको सम्यक् रूपसे बताऊँगा, सुनिये। तामसी द्रव्यशक्ति (अर्थशक्ति)-से उत्पन्न शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये तन्मात्राएँ कही गयी हैं। आकाशका एकमात्र गुण शब्द, वायुका गुण स्पर्श, अग्निका गुण रूप, जलका गुण रस तथा पृथ्वीका गुण गन्ध है—ऐसा जानना चाहिये। हे नारद! ये तन्मात्राएँ अत्यन्त सूक्ष्म हैं॥ २७—२९॥ |
| दशैतानि मिलित्वा तु द्रव्यशक्तियुतानि वै।<br>तामसाहङ्कारजः स्यात्सर्गस्तदनुवृत्तिकः॥ ३० | द्रव्यशक्तिसे युक्त इन दसों (पाँच तन्मात्राओं तथा उनके पाँच गुणों)-से मिलकर तामस अहंकारकी अनुवृत्तिसे सृष्टिकी रचना होती है॥ ३०॥ |
| राजस्याश्च क्रियाशक्तेरुत्पन्नानि शृणुष्व मे।<br>श्रोत्रं त्वग्रसना चक्षुर्घाणं चैव च पञ्चमम्॥ ३१<br>ज्ञानेन्द्रियाणि चैतानि तथा कर्मेन्द्रियाणि च।<br>वाक्पाणिपादपायुश्च गुह्यान्तानि च पञ्च वै॥ ३२<br>प्राणोऽपानश्च व्यानश्च समानोदानवायवः।<br>पञ्चदश मिलित्वैव राजसः सर्ग उच्यते॥ ३३<br>साधनानि किलैतानि क्रियाशक्तिमयानि च।<br>उपादानं किलैतेषां चिदनुवृत्तिरुच्यते॥ ३४ | अब राजसी क्रियाशक्तिसे उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियोंके विषयमें मुझसे सुनिये। श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाणी, हाथ, पैर, गुदा और गुह्यांग—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ उससे उत्पन्न हैं। प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान—ये पाँच वायु होती हैं। इन पन्द्रह (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच वायु)-से मिलकर होनेवाली सृष्टि राजसी सृष्टि कही जाती है। ये सभी साधन क्रियाशक्तिसे सदा युक्त रहते हैं और इनके उपादानकारणको चित्-अनुवृत्ति कहा जाता है॥ ३१—३४॥ |
| अ० ७ ] | तृतीय स्कन्ध | २७७ |
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| ज्ञानशक्तिसमायुक्ताः सात्त्विकाच्च समुद्भवाः ।<br>दिशो वायुश्च सूर्यश्च वरुणश्चाश्विनावपि ॥ ३५<br><br>ज्ञानेन्द्रियाणां पञ्चानां पञ्चाधिष्ठातृदेवताः ।<br>चन्द्रो ब्रह्मा तथा रुद्रः क्षेत्रज्ञश्च चतुर्थकः ॥ ३६<br><br>इत्यन्तःकरणाख्यस्य बुद्ध्यादेश्चाधिदैवतम् ।<br>चत्वार्यैव तथा प्रोक्ताः किलाधिष्ठातृदेवताः ॥ ३७<br><br>मनसा सह चैतानि नूनं पञ्चदशैव तु ।<br>सात्त्विकस्य तु सर्गोऽयं सात्त्विकाख्यः प्रकीर्तितः ॥ ३८ | दिशाएँ, वायु, सूर्य, वरुण और दोनों अश्विनीकुमार ज्ञानशक्तिसे युक्त हैं और ये सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके ये ही पाँच अधिष्ठातृदेवता हैं। इसी प्रकार बुद्धि आदि अन्तःकरणचतुष्टयके चन्द्रमा, ब्रह्मा, रुद्र तथा क्षेत्रज्ञ—ये अधिदेव हैं। ये चारों अधिष्ठातृदेवता कहे गये हैं। मनसहित ये सब पन्द्रह होते हैं। यह सात्त्विक अहंकारकी सृष्टि है और ‘सात्त्विकी सृष्टि’ कही गयी है॥ ३५–३८॥ | | स्थूलसूक्ष्मादिभेदेन द्वे रूपे परमात्मनः ।<br>ज्ञानरूपं निराकारं निदानं तत्प्रचक्षते ॥ ३९ | स्थूल और सूक्ष्मभेदसे परमात्माके दो रूप होते हैं, उनमें ज्ञानरूप निराकारस्वरूप सबका कारण कहा गया है॥ ३९॥ | | साधकस्य तु ध्यानादौ स्थूलरूपं प्रचक्षते ।<br>शरीरं सूक्ष्ममेवेदं पुरुषस्य प्रकीर्तितम् ॥ ४० | साधकके ध्यान आदि कार्योंके लिये परमात्माके स्थूल रूपकी उपासना कही गयी है। यह उस परमपुरुषका सूक्ष्म शरीर ही बताया गया है॥ ४०॥ | | मम चैव शरीरं वै सूत्रमित्यभिधीयते ।<br>स्थूलं शरीरं वक्ष्यामि ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ४१<br><br>शृणु नारद यत्नेन यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यते ।<br>तन्मात्राणि पुरोक्तानि भूतसूक्ष्माणि यानि वै ॥ ४२ | मेरा यह शरीर सूत्रसंज्ञक है। अब मैं उस परब्रह्म परमात्माके स्थूल विराट् स्वरूपका वर्णन करूँगा। हे नारद! आप उसे सुनें, जिसे सावधानीसे सुनकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। इसके पहले मैंने गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द—इन पंच तन्मात्राओं तथा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन सूक्ष्म पंच महाभूतोंका वर्णन विस्तारसे कर दिया है॥ ४१-४२॥ | | पञ्चीकृत्य तु तान्येव पञ्चभूतसमुद्भवः ।<br>पञ्चीकरणभेदोऽयं शृणु संवदतः किल ॥ ४३ | उन्हीं पाँचोंको मिलाकर पंचीकरणकी क्रियासे परमात्माने पंचभूतमय देहकी सृष्टि की है। अब मैं पंचीकरणका भेद बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनिये—॥ ४३॥ | | प्रथमं रसतन्मात्रामुपादाय मनस्यपि ।<br>कल्पयेच्च तथा तद्वै यथा भवति चोदकम् ॥ ४४ | सबसे पहले रसरूप तन्मात्राका मनमें निश्चय करके जिस स्थूल रूपमें जल होता है, वैसी ही उसकी दो अंशोंमें भावना करे॥ ४४॥ | | शिष्टानां चैव भूतानामंशान्कृत्वा पृथक्पृथक् ।<br>उदके मिश्रयेच्चांशान्कृते रसमये ततः ॥ ४५<br><br>तदा भूतविभागे च चैतन्ये च प्रकाशिते । | उसी प्रकार अवशिष्ट चार भूतोंके भी दो-दो भाग करके, उसमेंसे आधे भागको पृथक् कर ले। शेष आधे अंशको चार प्रकारसे अलग करके आधे भागसे रहित उन अंशोंमें मिला दे। रस तन्मात्राको आधे भाग जलमें मिलाकर अवशिष्टभूत तन्मात्राके आधेको चारों भागोंमें मिश्रित कर दे। ऐसा करनेसे जब रसमय स्थूल जल हो जाय तब अन्य चार भूतोंके पंचीकरणका विभाग करे। उन |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे तत्त्वनिरूपणवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
| २७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| चैतन्यस्य प्रवेशात्तु तदाहमिति संशयः ॥ ४६<br><br>प्रतीयमाने तेनैव विशेषेणाभिमानतः ।<br>आदिनारायणो देवो भगवानिति चोच्यते ॥ ४७ | पंचीकृत पंचभूतोंमें अधिष्ठानताके कारण उनके प्रतिबिम्बरूपसे जब चैतन्य प्रविष्ट हो जाता है, तब उस पंचभूतात्मक शरीरमें ‘अहम्’ भावरूप संशय उत्पन्न हो जाता है। वह संशय स्पष्टरूपसे जब भासित होने लगता है, तब उस स्थूल शरीरमें देहाभिमानके साथ चैतन्य जाग्रत् होने लगता है, वही दिव्य चैतन्य आदिनारायण भगवान्, परमात्मा आदि नामोंसे पुकारा जाता है॥ ४६-४७॥ |
| घनीभूतेऽथ भूतानां विभागे स्पष्टतां गते ।<br>वृद्धिं प्राप्य गुणैश्चेत्यमेकैकगुणवृद्धितः ॥ ४८ | इस प्रकार पंचीकरणसे सभी भूतोंका विभाग स्पष्ट हो जाने पर आकाश आदि सभी पंचभूत पूर्वोक्त तन्मात्राओंके कारण अपने-अपने विशेष गुणोंसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं और एक-एक गुणकी वृद्धिसे एक-एक भूत उत्पन्न हो जाता है॥ ४८॥ |
| आकाशस्य गुणश्चैकः शब्द एव न चापरः ।<br>शब्दस्पर्शौ च वायोश्च द्वौ गुणौ परिकीर्तितौ ॥ ४९<br><br>अग्नेः शब्दश्च स्पर्शश्च रूपमेते त्रयो गुणाः ।<br>शब्दस्पर्शरूपरसाश्चत्वारो वै जलस्य च ॥ ५०<br><br>स्पर्शशब्दरसा रूपं गन्धश्च पृथिवीगुणाः ।<br>एवं मिलितयोगैश्च ब्रह्माण्डोत्पत्तिरुच्यते ॥ ५१<br><br>सर्वे जीवा मिलित्वैव ब्रह्माण्डांशसमुद्भवाः ।<br>चतुरशीतिलक्षाश्च प्रोक्ता वै जीवजातयः ॥ ५२ | आकाशका केवल एकमात्र गुण शब्द है, दूसरा नहीं। वायुके शब्द और स्पर्श—ये दो गुण कहे गये हैं। शब्द, स्पर्श और रूप—ये तीन गुण अग्निके हैं। शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चार गुण जलके हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच गुण पृथ्वीके हैं। इस प्रकार इन पंचीकृत महाभूतोंके योगसे ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति कही जाती है। ब्रह्माण्डके अंशसे उत्पन्न सभी जीवोंको मिलाकर चौरासी लाख जीव-योनियाँ कही गयी हैं॥ ४९-५२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे तत्त्वनिरूपणवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणका वर्णन
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजी बोले— |
| सर्गोऽयं कथितस्तात यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना ।<br>गुणानां रूपसंस्थां वै शृणुष्वैकाग्रमानसः ॥ १ | हे तात! आपने जो मुझसे पूछा था, वह सृष्टिका वर्णन मैंने कर दिया। अब गुणोंका स्वरूप कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ १॥ |
| सत्त्वं प्रीत्यात्मकं ज्ञेयं सुखात्प्रीतिसमुद्भवः ।<br>आर्जवं च तथा सत्यं शौचं श्रद्धा क्षमा धृतिः ॥ २<br><br>अनुकम्पा तथा लज्जा शान्तिः सन्तोष एव च ।<br>एतैः सत्त्वप्रतीतिश्च जायते निश्चला सदा ॥ ३ | सत्त्वगुणको प्रीतिस्वरूप समझना चाहिये, वह प्रीति सुखसे उत्पन्न होती है। सरलता, सत्य, शौच, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, कृपा, लज्जा, शान्ति और सन्तोष—इन लक्षणोंसे सदैव निश्चल सत्त्वगुणकी प्रतीति होती है॥ २-३॥ |
| अ० ८ ] | तृतीय स्कन्ध | २७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्वेतवर्णं तथा सत्त्वं धर्मे प्रीतिकरं सदा।<br>सच्छ्रद्धोत्पादकं नित्यमसच्छ्रद्धानिवारकम् ॥ ४ | सत्त्वगुणका वर्ण श्वेत है, यह सर्वदा धर्मके प्रति प्रीति उत्पन्न करता है, सत्-श्रद्धाका आविर्भाव करता है तथा असत्-श्रद्धाको समाप्त करता है ॥ ४ ॥ |
| सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च तथापरा।<br>श्रद्धा तु त्रिविधा प्रोक्ता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ५ | तत्त्वदर्शी मुनियोंने तीन प्रकारकी श्रद्धा बतलायी है—सात्त्विकी, राजसी एवं तीसरी तामसी ॥ ५ ॥ |
| रक्तवर्णं रजः प्रोक्तमप्रीतिकरमद्भुतम्।<br>अप्रीतिर्दुःखयोगत्वाद्वर्तत्येव सुनिश्चिता ॥ ६ | रजोगुण रक्तवर्णवाला कहा गया है। यह आश्चर्य एवं अप्रीतिको उत्पन्न करता है। दुःखसे योगके कारण ही निश्चितरूपसे अप्रीति उत्पन्न होती है ॥ ६ ॥ |
| प्रद्वेषोऽथ तथा द्रोहो मत्सरः स्तम्भ एव च।<br>उत्कण्ठा च तथा निद्रा श्रद्धा तत्र च राजसी ॥ ७ | जहाँ ईर्ष्या, द्रोह, मत्सर, स्तम्भन, उत्कण्ठा एवं निद्रा होती है, वहाँ राजसी श्रद्धा रहती है ॥ ७ ॥ |
| मानो मदस्तथा गर्वो रजसा किल जायते।<br>प्रत्येतव्यं रजस्त्वैतैर्लक्षणैश्च विचक्षणैः ॥ ८ | अभिमान, मद और गर्व—ये सब भी राजसी श्रद्धासे ही उत्पन्न होते हैं। अतः विद्वान् मनुष्योंको चाहिये कि वे इन लक्षणोंद्वारा राजसी श्रद्धा समझ लें ॥ ८ ॥ |
| कृष्णवर्णं तमः प्रोक्तं मोहनं च विषादकृत्।<br>आलस्यं च तथाज्ञानं निद्रा दैन्यं भयं तथा ॥ ९<br><br>विवादश्चैव कार्पण्यं कौटिल्यं रोष एव च।<br>वैषम्यं वातिनास्तिक्यं परदोषानुदर्शनम् ॥ १०<br><br>प्रत्येतव्यं तमस्त्वैतैर्लक्षणैः सर्वथा बुधैः।<br>तामस्या श्रद्धया युक्तं परतापोपपादकम् ॥ ११ | तमोगुणका वर्ण कृष्ण होता है। यह मोह और विषाद उत्पन्न करता है। आलस्य, अज्ञान, निद्रा, दीनता, भय, विवाद, कायरता, कुटिलता, क्रोध, विषमता, अत्यन्त नास्तिकता और दूसरोंके दोषको देखनेका स्वभाव—ये तामसिक श्रद्धाके लक्षण हैं। पण्डितजन इन लक्षणोंसे तामसी श्रद्धा जान लें; तामसी श्रद्धासे युक्त ये सभी लक्षण परपीड़ादायक हैं ॥ ९-११ ॥ |
| सत्त्वं प्रकाशयितव्यं नियन्तव्यं रजः सदा।<br>संहर्तव्यं तमः कामं जनेन शुभमिच्छता ॥ १२ | आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवालेको अपनेमें निरन्तर सत्त्वगुणका विकास करना चाहिये, रजोगुणपर नियन्त्रण रखना चाहिये तथा तमोगुणका नाश कर डालना चाहिये ॥ १२ ॥ |
| अन्योन्याभिभवाच्चैते विरुध्यन्ति परस्परम्।<br>तथान्योन्याश्रयाः सर्वे न तिष्ठन्ति निराश्रयाः ॥ १३ | ये तीनों गुण एक-दूसरेका उत्कर्ष होनेकी दशामें परस्पर विरोध करने लगते हैं। ये सब एक-दूसरेके आश्रित हैं, निराश्रय होकर नहीं रहते ॥ १३ ॥ |
| सत्त्वं न केवलं क्वापि न रजो न तमस्तथा।<br>मिलिताश्च सदा सर्वे तेनान्योन्याश्रयाः स्मृताः ॥ १४ | सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुणमेंसे कोई एक अकेला कभी नहीं रह सकता; ये सभी सदैव मिलकर रहते हैं, इसीलिये ये अन्योन्याश्रय सम्बन्धवाले कहे गये हैं ॥ १४ ॥ |
| अन्योन्यमिथुनाच्चैव विस्तारं कथयाम्यहम्।<br>शृणु नारद यज्ज्ञात्वा मुच्यते भवबन्धनात् ॥ १५ | हे नारद! ध्यानसे सुनिये, अब मैं इनके अन्योन्याश्रय-सम्बन्धसे होनेवाले विस्तारका वर्णन करता हूँ, जिसे जानकर मनुष्य भव-बन्धनसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है। इसमें आपको किसी प्रकारका |