देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 272, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 272
| अ० ५ ] | तृतीय स्कन्ध | २६३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कुरु दयां दयसे यदि देवि मां<br>कथय मन्त्रमनाविलमद्भुतम्।<br>समभवं प्रजपन्सुखितो ह्यहं<br>सुविशदं च नवार्णमनुत्तमम् ॥ २० | हे देवि! यदि आप मेरे प्रति दयालु हैं तो मुझपर दया कीजिये और अपना निर्मल, अद्भुत, सर्वश्रेष्ठ एवं विशद नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) मुझे प्रदान कीजिये, जिससे उसका निरन्तर जप करके मैं सर्वदाके लिये सुखी हो जाऊँ॥ २०॥ |
| प्रथमजन्मनि चाधिगतो मया<br>तदधुना न विभाति नवाक्षरः।<br>कथय मां मनुमद्य भवार्णवा-<br>ज्जननि तारय तारय तारके ॥ २१ | पूर्वजन्ममें मैंने नवार्ण मन्त्रकी दीक्षा पायी थी; परंतु वह मुझे अब स्मरण नहीं रह गया है। इसलिये हे तारके! हे जननि! आज पुनः वह मन्त्र मुझे प्रदान कीजिये और भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये॥ २१॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्ता सा तदा देवी शिवेनाद्भुततेजसा।<br>उच्चचाराम्बिका मन्त्रं प्रस्फुटं च नवाक्षरम्॥ २२<br>तं गृहीत्वा महादेवः परां मुदमवाप ह।<br>प्रणम्य चरणौ देव्यास्तत्रैवावस्थितः शिवः॥ २३ | ब्रह्माजी बोले—[हे नारद!] अद्भुत तेजस्वी शिवजीके ऐसा कहनेपर जगदम्बाने स्पष्ट शब्दोंमें नवाक्षर मन्त्रका उच्चारण किया। उस मन्त्रको ग्रहण करके शिवजी बहुत प्रसन्न हो गये और भगवतीके चरणोंमें प्रणाम करके वहींपर स्थित हो गये॥ २२-२३॥ |
| जपन्नवाक्षरं मन्त्रं कामदं मोक्षदं तथा।<br>बीजयुक्तं शुभोच्चारं शङ्करस्तस्थिवांस्तदा ॥ २४ | उस समय सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ, मुक्तिप्रदायक तथा शुभ उच्चारणसे सम्पन्न उस बीजयुक्त नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए शंकरजी वहाँ विराजमान रहे॥ २४॥ |
| तं तथावस्थितं दृष्ट्वा शङ्करं लोकशङ्करम्।<br>अवोचं तां महामायां संस्थितोऽहं पदान्तिके॥ २५ | संसारका कल्याण करनेवाले शिवजीको इस प्रकार बैठा देखकर मैं उन महामायाके चरणोंके समीप बैठ गया और उनसे कहने लगा॥ २५॥ |
| न वेदास्त्वामेवं कलयितुमिहासन्नपटवो<br>यतस्ते नोचुस्त्वां सकलजनधात्रीमविकलाम्।<br>यदा स्वाहाभूता सकलमखहोमेषु विहिता<br>तदा त्वं सर्वज्ञा जननि खलु जाता त्रिभुवने ॥ २६ | हे जननि! वेद सभी लोगोंको धारण करनेवाली तथा सनातनी आप भगवतीकी कल्पना करनेमें अकुशल हैं—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि साधारण कार्योंमें उन्होंने आप भगवतीकी चर्चा नहीं की है। यदि वे आपको न जानते तो सभी यज्ञों तथा हवन-कार्योंमें आपको ही स्वाहादेवीके रूपमें प्रतिष्ठित कैसे करते? इसलिये आप तीनों लोकोंमें सर्वज्ञाके रूपमें विख्यात हुईं॥ २६॥ |
| कर्ताहं प्रकरोमि सर्वमखिलं ब्रह्माण्डमत्यद्भुतं<br>कोऽन्योऽस्तीह चराचरे त्रिभुवने मत्तः समर्थः पुमान्।<br>धन्योऽस्म्यत्र न संशयः किल यदा ब्रह्मास्मि लोकातिगो<br>मग्नोऽहं भवसागरे प्रवितते गर्वाभिवेशादिति ॥ २७ | मैं स्रष्टा हूँ, मैं अत्यन्त अद्भुत सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका निर्माण करता हूँ, इस चराचर त्रिभुवनमें मुझसे बढ़कर समर्थ दूसरा पुरुष कौन है, मैं निस्संदेह धन्य हूँ, मैं लोकोत्तर ब्रह्मा हूँ—इस मिथ्या अहंकारके कारण मैं सर्वदा इस विस्तृत संसारसागरमें निमग्न रहता हूँ; तथापि आज आपके चरण-कमलोंकी पराग-प्राप्तिके |